Saturday, January 7, 2017

मैथि‍ली पत्रकारिता का इतिहास

मैथिली में पत्रकारिता का अपना गौरवशाली इतिहास है । हितसाधन से लेकर मिथि‍ला आवाज तक की अपनी विशेषता और विविधता रही है । लेकिन मैथि‍ली पत्रकारिता के इतिहास को संकलित करने का काम बहुत कह ही लोगों ने किया । पंडित चन्द्रनाथ मिश्र "अमर" की ‘’मैथिली पत्रकारिता का इतिहास” और डॉ यॊगानन्द झा की “ मैथिली पत्रकारिता के सौ वर्ष“ के साथ साथ विजय भाष्‍कर लिखि‍त ‘’बिहार मे पत्रकारिता का इतिहास’’ इस विषय में उल्लॆखनीय संदर्भ स्रॊत है । 

सबसे पहले 1905 में मैथि‍ली हितसाधन का प्रकाशन मासिक के रूप में जयपूर में हुआ । संभावनाओं के विपरीत विशाल मैथि‍ली आबादीवाले प्रदेश में इसकी नींव नहीं पड़ी, न ही शुरूआती प्रसार का कार्य यहाँ हुआ । अन्‍य स्‍थान पर ग्रहण कर पल्‍लवित और पुष्‍पि‍त होने के लिए ये बिहार जरूर आई । मैथि‍ली हितसाधन के संपादकीय बोर्ड के प्रमुख थे विद्यावाचस्‍पति मधुसूदन झा । पत्र‍िका ने उँचे आदर्श तय कर रखे थे । सामग्री में व्‍यापक विभिन्‍नता और साहित्‍यि‍क संपन्‍नता थी । फिर भी मैथि‍ली हितसाधन तीन साल से ज्‍यादा नहीं चल पाया । मैथि‍ली प्रकाशन की इस विफलता से पहले ही बनारस के मैथि‍ल विद्वानों का ध्‍यान अपनी ओर खींचा । यहाँ से मैथि‍ल विद्वानों ने 1906 में मिथलिामोद मासिक पत्र की शुरूआत की । इसके संपादक बने महामहोपाध्याय पंडित मुरलीधर झा और अनूप मिश्र एवं सीताराम झा । पंडित मुरलीधर झा ने तब एक समृद्ध पत्रि‍का की नींव रखी । इसकी टिप्‍पणि‍यो, आलोचनाओं, ‍विषय में व्‍यापक विभि‍न्‍नता और व्‍यंगात्‍मक शैली ने मैथि‍ली पाठकों का ध्‍यान बरबस आकृष्‍ट किया और पाठकों के बीच इसने अच्‍छी पैठ बना ली थी । लगभग 14 वर्षो तक निरंतर पंडित मुरलीधर झा इसका संपादन करते रहे । 1920 से 1927 तक इसका संपादन अनूप मिश्र और सीताराम झा ने किया । 1936 में पत्रि‍का को नया स्‍वरूप दिया गया और इसकी नई श्रंखला का संपादकीय दायित्‍व सौंपा गया उपेन्‍द्रनाथ झा को । नए स्‍वरूप में भी पत्रि‍का ने अपनी पुरानी अस्‍मिता कायम रखी । इस पत्रि‍का को टोन शुरू से अंत तक साहित्‍य‍िक ही रहा । 

1908 वह वर्ष है जब मिथि‍ला मिहिर ने प्रकाशन की दुनिया में दस्‍तक दी । बतौर मासिक शुरू हुई इस पत्रि‍का ने तीन वर्षों में अपना स्‍वरूप बदलकर साप्‍ताहिक कर लिया । 1911 से साप्‍ताहिक मिथि‍ला मिहिर का प्रकाशन शुरू हुआ हो गया । यह दरभंगा महाराज की मिल्‍कियत थी । पर 1912 तक आते-आते लगने लगा कि केवल मैथि‍ली भाषा की पत्रि‍का का चलना शायद मुश्‍कि‍ल हो । इसलिए पत्रि‍का को द्व‍िभाषी बनाकर इसमें हिंदी को भी शामिल कर लिया गया और मिथि‍ला मिहिर मैथि‍ली और हिंदी दोनों की पत्रि‍का हो गई । मिथि‍ला मिहिर के साथ किए गए निरंतर प्रयोगों से यह साफ जाहिर है कि प्रबंधकों का आत्‍मविश्‍वास डगमगाने लगा था और दो साल 1930-31 में इसमें अंग्रेजी मिलाकर इसे त्रिभाषी कर दिया गया । आजादी से पूर्व के इतिहास में दो ही पत्रि‍काएँ ऐसी मिलती है जो द्विभाषी से आगे त्रि‍भाषी अवधारणा लेकर सामने आई । इसके पूर्व राममोहन राय बंगाल में बंगदूत के साथ अभि‍नव प्रयोग कर चुके थे, जिसमें एक साथ अंग्रेजी, बँगला, फारसी और हिंदी के प्रयोग किए गए थे । पर 1930-31 के बाद मिथि‍ला मिहिर अपने द्व‍िभाषी स्‍वरूप में लौट आया और 1954 तक निर्बाध चलता रहा । बाद में यह एक और प्रयोग से गुजरा । 1960 में यह सचित्र साप्‍त‍ाहिक के रूप में सामने आया । बिहार की की पत्रकारिता के इतिहास में यह सबसे प्रयोगधर्मी पत्र साबित हुआ । इसके संपादकों में पंडित विष्‍णुकांत शास्‍त्री (1908-12), महामहोपाध्‍याय परमेश्‍वर झा, जगदीश प्रसाद, योगानंद कुमार (1911-19), जनार्दन झा ‘जनसीदान’ (1919-21), कपिलेश्‍वर झा शास्‍त्री (1922-35) और सुरेन्‍द्र झा सुमन (1935-54) शामिल थे । 1970 के दशक में इसके संपादन का जिम्‍मा सुधांशु शेखर चौधरी पर था । पत्रि‍का के कई संग्रहणीय विशेषांक निकले, जिनमें ‘मिथि‍लांक’ (अंक अगस्‍त 1935) मैथि‍ली पत्रकारिता के लिए एक अमुल्‍य योगदान माना जाता है । 

1920 के दशक में मैथि‍ली प्रकाशन के प्रयत्‍न बिहार के अलावा बाहर से भी होते रहे । इससे यह भी पता लगता है कि तब भी मिथि‍ला के लोग बाहर भी काफी संखया में फैले हुए थे । प्रकाशनों की अपेक्षा थी कि बाहर रहने के बावजूद अपनी माटी और बोली से एक समर्पण का भाव उनमें मौजूद होगा । इसी भावनात्‍मक लगाव की अभिव्‍यक्‍त‍ि 1920 में मथुरा से प्रकाशि‍त मिथि‍ला प्रभा में हुई, जिसे रामचंद्र मिश्र जैत ने निकाला । अक्‍तूबर 1929 में अजमेर से मैथि‍ल प्रभाकर का प्रकाशन शुरू हुआ । इन पत्रों का उद्देश्‍य समाज हित मे आवश्‍यक सूचनाओं का आदान-प्रदान करने के साथ मैथि‍ल समाज को अपनी जड़ों से जोड़े रखना था । पर मैथि‍ल लोगों के सरंक्षण के अभाव और उदासीनता ने दोनों पत्रों को असमय बंद होने पर मजबूर किया । मिथि‍ला-प्रभा अगस्‍त 1920 से दिसंबर 1924 तक चली और मैथि‍ल प्रभाकर अक्‍तूबर 1929 से दिसंबर 1930 तक । उत्‍साहजनक पाठकीय संरक्षण के अभाव के बावजूद तत्‍कालीन मैथि‍ल पत्रकारों ने हार नहीं मानी, बल्‍कि‍ उन्‍हें इस दिशा में और कोशि‍श करने के लिए प्रेरित ही किया । पर मैथि‍ली पत्रकारिता को अपेक्षाकृत समृद्ध और समर्थ मैथि‍ल समाज का वह स्‍नेह कभी नहीं मिला, जो अपेक्षि‍त था । बहुत साहस और स्‍वत: स्फूर्त प्रेरणा से मिथि‍ला के दो विद्वानों उदित नारायण लाल राय और नंदकिशोर लाल दास ने 1925 में श्री मैथि‍ली का प्रकाशन शुरू किया । उन्‍होंने तत्‍कालीन समय के हिसाब से लोकप्रिय शैली में पत्रि‍का निकाली और एक पेशेवर रंग-रूप देते हुए पूर्व के विपरीत गैर-साहित्‍यि‍क आलेख भी शामिल किए । पर पत्रि‍का केवल दो साल ही चल पाई । यह दौर ऐसा था जिसमें मैथि‍ली पत्रों के संपादक संभवत: यह तय नहीं कर पा रहे थे कि पत्रों का स्‍वरूप साहित्‍यि‍क रखा जाए या गैर साहित्‍यि‍क ? दोनों तरह की पत्रि‍काऍं पहले निकाली जा चुकी थीं और विफल रही थी । बावजूद इसके 1929 में पंडित कामेश्‍वर कुमार और भोला लाल दास ने 1924 में मिथि‍ला नाम की साहित्‍यि‍क पत्र‍िका का प्रकाशन शुरू किया और इसके शि‍ल्‍प में सामाजिक-सांस्‍कृतिक विषय भी शामिल किए । इसका प्रकाशन लहेरिया सराय, दरभंगा विद्यापति प्रेस से शुरू हुआ । इसके संपादकों ने अवैतनिक काम किया और मिथि‍ला ऐसा पत्र बना, जिसने समाज-सुधार को लक्ष्‍य कर कार्टून का प्रकाशन शुरू किया, पर सामाजिक- सांस्‍कृतिक और साहित्‍य‍िक स्‍वरूपवाली पत्रि‍का भी पाठकीय रुचि परिवर्तन करने में विफल रही और 1931 में इसे बंद कर देना पड़ा । 

बनैली के राजा कुमार कृष्‍णानंद सिंह ने अपने सद्प्रयास से मैथि‍लीं पत्रों को उबारने की एक कोशि‍श की । 1931 में उनके संरक्षण में मिथि‍ला मित्र का प्रकाशन शुरू हुआ, पर इसे उसी साल बंद करना पड़ा । कृष्‍णानंद सिंह ने हिंदी पत्रकारिता को संरक्षण देने में अच्‍छी भुमिका निभाई थी और विशेषांक निकालने के प्रति वे काफी गंभीर रहते थे । इसलिए उनके संरक्षण में निकली हिंदी पत्रि‍का गंगा का पुरातत्‍वांक विशेषांक हो या इस नई-नई मैथि‍ली पत्र‍िका का ‘जानकी-नवमी विशेषांक’, आज तक समृद्ध विरासत के रूप में संरक्षि‍त है । मिथि‍ला-मित्र को प्रकाशन के वर्ष 1931 में ही बंद करना पड़ा, पर पाठकों को यह एक संग्रहणीय विशेषांक दे गया । एक और महत्‍वपूर्ण कोशि‍श हुई बिहार के बाहर से । अजमेर से पंडित रधुनाथ 

प्रसाद मिश्र ‘पुरोहित’ ने मैथि‍ली बंधु की शुरूआत की । पंडित मिश्र ने इस पत्रि‍का का शि‍ल्‍प तय करने में पर्याप्‍त सावधानी बरती । इसके शि‍ल्‍प से ऐसा लगता है कि विफल रहे मैथि‍ल पत्रों का उन्‍होंने व्‍यापक अध्‍ययन किया और अपने हिसाब से कमियों को पूरा करने की कोशि‍श की । पत्रि‍का का फलक व्‍यापक कर इसके शि‍ल्‍प में समाज और संस्‍कृति‍ के अलावा साहित्‍य विषय तो रखे ही गए, इतिहास को भी इसमें शामिल करके पत्रि‍का को अनुसंधान की दृष्‍ट‍ि से महत्‍वपूर्ण बनाया गया । इस पत्रि‍का की स्‍वीकार्यता पहे के मुकाबले बढ़ी, जिससे इस बात को बल मिलता है कि गंभीर और अनुसंधानात्‍मक सामग्री में मैथि‍ली पाठकों ने अपेक्षाकृत ज्‍यादा रूचि ली । इसलिए पहले चरण में यह चार वर्ष (1939-1943) तक आबाध चली । बीच में इसका प्रकाशन दो वर्षों के लिए स्‍थगित करना पड़ा । 1945 में इसका प्रकाशन पुन: शुरू हुआ और दस वर्षों तक देशव्‍यापी मैथि‍ल समाज का प्रि‍य पत्र बना रहा । 

दुसरी ओर बिहार में मैथि‍ल पत्रों को लेकर कोशि‍श जारी रही । भुवनेश्‍वर सिंह भुवन ने 1937 में मुजफ्फरपुर से विभूति का प्रकाशन शुरू किया, जो महज एक साल चला । भोला दास ने 1937 में ही दरभंगा से भारती मासिक का प्रकाशन शुरू किया, जो कुछ ही समय चल पाया । 1938 में अजमेर से मैथि‍ली युवक का प्रकाशन शुरू हुआ, जो 1941 तक चला । आगरा से ब्रज मोहन झा ने जीवनप्रभा 1946 में शुरू की, जो 1950 तक चली । एक क्षणि‍क परिवर्तन पत्रि‍काओं के नामकरण में देखने में आया । पहले मैथि‍ल पहचान के लिए ‘मैथि‍ल’ या ‘मिथि‍ला’ शब्‍द पत्रि‍काओं के नाम के लिए आवश्‍यक समझे जाते थे । उस मिथक को इधर के प्रकाशनों ने विभूति और भारती निकालकर तोड़ने की कोशि‍श की । 

पटना में भी मैथि‍ली पत्रों को लेकर गतिविधि‍याँ बंद नहीं हुई थी । बाबू दुर्गापति सिंह ने संस्‍थापक-संपादक और लक्ष्‍मीपित सिंह ने बतौर प्रबंध-निदेशक के एक सुप्रबंधि‍त माहौल में मिथि‍ला-ज्‍योति का प्रकाशन शुरू किया, पर 1948 में शुरू हुई इस पत्रि‍का को सुप्रबंधन भी 1950 से आगे तक नहीं ले जा पाया । 

पंडित रामलाल झा ने 1937 में मैथि‍ली साहित्‍य पत्रि‍का की शुरूआत की । इस पत्रि‍का ने साहित्‍य समालोचना के क्षेत्र में एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्‍तुत किया । यह पत्रि‍का भी महज दो साल चल पाई । 

दरभंगा से प्रकाशि‍त मासिक वैदेही, कोलकाता से प्रकाशि‍त मासिक मिथि‍ला दर्शन, इलाहाबाद से प्रकाशि‍त मैथि‍ली बाल पत्रि‍का बटुक और मैथि‍ल समाचार पांडू, असम से प्रकाशि‍त संपर्क सुत्र और कानपुर से प्रकाशित मासिक मिथि‍ला दूत मैथि‍ली पत्रकारिता की अपवाद रहीं, जिन्‍होंने दो-तीन दशकों तक अपनी उपस्‍थि‍ती बनाए रखी । इनमें वैदैही का संपादन कृष्‍णकांत, अमर आदि ने ;किया । मिथि‍ला दर्शन के संपादन का दायि‍त्‍व डॉ.प्रबोध नारायण सिन्‍हा और डॉ. नचिकेता पर था । इसके अलावा ऐसे मैथि‍ली पत्रों की संख्‍या दर्जनाधिक थीं, जिन्‍होंने जितना हो सका, अपने पत्रकारिता दायित्‍व का निर्वाह किया । मैथि‍ली पत्राकारिता का इतिहास कम से कम –से-कम इनके उल्‍लेख की तो माँग करता है । इनमें दरभंगा से प्रकाशि‍त और सुरेन्‍द्र झा द्वारा संपादित स्‍वदेश 1948, निर्माण (साप्‍ताहिक) और इजोता (मासिक संपादन सुमन और शेखर) स्‍वेदश दैनिक (संपादक-सुमन), दरभंगा से ही प्रकाशि‍त साप्‍ताहिक जनक (संपादन –भोलानाथ मिश्र), यहीं से प्रकाशि‍त मासिक पल्‍लव (संपादक –गौरीनंदन सिंह), कोलकाता से प्रकाशि‍त साप्‍ताहिक सेवक ( संपादक –शुंभकात झा और हरिश्‍चंद्र मिश्र ‘मिथि‍लेंदू’), दरभंगा से प्रकाशि‍त त्रैमासिक परिषद पत्रि‍का (संपादक – सुमन और अमर), मासिक बाल पत्रि‍का धीया-पुता (संपादन-धीरेन्‍द्र), मासिक मैथिली परिजात (संपादक – रामनाथ मिश्र ‘मिहिर’), कोलकाता से प्रकाशि‍त त्रैमासिक कविता संकलन मैथि‍ली कविता ( संपादक – नचिकेता), मासिक (संपादक –कृति नारायण मिश्र और वीरेन्‍द्र मलिक ), दरभंगा से प्रकाशि‍त साप्‍ताहिक मिथि‍ला वाणी (संपादक –योगेन्‍द्र झा), गाजियाबाद से प्रकाशि‍त मैथि‍ली हिंदी द्व‍िभाषी पत्रिका प्रवासी मैथि‍ली ( संपादक –चिरंजी लाल झा) शामिल है । एक साहित्‍य‍िक डाइजेस्‍ट सोना माटी का प्रकाशन पटना से 1969 में शुरू किया गया । बिहार गजट ने मैथि‍ली पत्रों की असफलता का मुख्‍य कारण पाठकों का अभाव तो बताया ही है, साथ ही इस विरोधाभास पर आशर्च्य व्‍यक्‍त किया है कि उत्‍तरी बिहार और नेपाल की तराई की मैथि‍ली बहुल आबादी क्रय शक्‍त‍िसंपन्‍न शिक्षि‍त मैथि‍ल परिवारों के औधोगिक नगरों, मसलन राँची, धनबाद, जमशेदपुर, राउरकेल, मुंबई, वाराणसी और इलाहाबाद में अच्‍छी उपस्‍थि‍ति के बावजूद किसी मैथि‍ली पत्रि‍का ने स्‍थायित्‍व ग्रहण नहीं किया । दरअसल, मिथिला मिहिर के बंद होने के बाद नयी पीढी मैथिली में अखबार का पन्‍ना कैसा होता है, वो भूल चुकी थी । कोलकाता से प्रकाशि‍त मिथि‍ला समाद ने इस कमी को भरा और लोगों को फिर से मैथि‍ली में समाचार पढने का सुख मिला । फिर सौभाग्‍य मिथि‍ला आया जिसने पहली बार टेलिविजन मैथि‍ली समाचार से लोगों को अवगत किया । फिर मिथि‍ला आवाज का दौर आया । मिथि‍ला में हर्ष ध्वनी हुई । लोगों को पहली बार रंगीन मैथि‍ली अखबार पढ़ने का सुख मिला । लेकिन इसे मैथि‍लों की फूटी किस्‍मत ही कही जाय की अपने आरंभ से मात्र दूसरे वर्ष में इसने दम तोड़ दिया । मैथि‍ली पत्रकारिता का ये अंत था । लोगो को अब कागज पर मैथि‍ली अखबार पढ़ना सपने जैसा हो गया है । हलाँकि वेब मीडिया इसमें कुछ हद तक सफल हो पायी है लेकिन कागज पर अखबार पढ़ने का सुख तीन करोड़ मैथि‍लों को कब तक मिलेगा ये कहना मुश्‍कि‍ल है । 

मैथिली मे वेब पत्रकारिता 

भारत के लगभग समस्त भाषा मे अखबार, पत्रिका के संग संग उसका ऑनलाइन वर्जन भी बाहर आया है । लेकिन मैथिली में वेब पत्रकारिता अभी भी शैशवाकाल में है । मैथिली में दैनिक पत्र के साथ साथ वेब पत्रिका कि‍ वर्तमान स्थिति अति दयनीय एवं चिन्तनीय है । अखबारी रिपोर्ट के अनुसार विश्वमे लगभग तीन करोड़ मैथिली भाषी है । स्वभाविक रुप से इसके पाठक वर्ग की संख्या अधिक होगी । लेकिन स्थिति दुखद है ! विपुल साहित्य भंडार से हम सब गौरवान्वित होते है । प्रतिभाशाली युवा मैथिल हरेक सेक्टर मे अपनी प्रतिभा का लॊहा मना रहा है । उसके बाद भी सूचना प्रौद्योगिकी के इस युगमे मैथिली मे अखबारी प्रकाशन की समस्या यथावत बनी हुई है । पत्र पत्रिका की कमी हमेशा खटक रही है । मि‍थि‍ला समाद और मिथि‍ला आवाज का ऑनलाइन संस्करण का स्थायी स्थगन भी मैथिली वेब पत्रकारिता के इतिहास में बहुत बड़ी छति थी ।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि मैथि‍ली में साहित्‍यि‍क पत्र पत्रि‍का की भरमार रही है । लेकिन ऑनलाइन पत्रकारिता के क्षेत्र में हम अन्‍य भाषाओं की अपेक्षा काफी पीछे छुट गए है । वेब पत्रकारिता की स्थिति और उपस्थिति ना के ही बराबर है । कुछ जोशि‍लो युवा है जो अपनी तकनीनकी और पत्रकारिय ज्ञान को लेकर इंटरनेट पर सक्रि‍य है । मिथि‍ला से लेकर कोलकाता और दिल्‍ली मुंबई के मैथि‍ल इस कार्य मे लगे हैं । मिथिला मैथिली से संबंधित समस्त राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक, आर्थिक मुद्दों की बात इन्टरनेट पर ब्लॉगिंग के माध्यम से सामने ला रहे हैं । इतना ही नहि, किछु मिथिला-मैथिली प्रेमी मैथिलीमे न्यूज पॊर्टल भी चला रहे हैं । ऐसे न्यूज पोर्टलों में ई-समाद, मिथिमीडिया, प्राईम न्यूज, मिथि‍ला जिंदाबाद, मिथिला मिरर,ऑनलाईन मिथि‍ला और नव मिथिला कुछ उल्लेखनीय नाम है ।



प्रारंभिक मैथिल ब्लॉगर ई-समाद, मिथिमीडिया, मिथिला मिरर, मिथिला प्राइम, नव मिथिला आदि मैथिली न्यूज पोर्टलों की गतिविधि, इसके उद्देश्य और उपलब्धी की विवेचना के उपरान्त ये बात स्पष्ट है कि इन्टरनेट पर मिथिला में वेब आधारित पत्रकारिता का उज्जवल भविष्य आने वाला है । जिस तरह से युवा वर्ग मैथि‍ली ब्‍लॉगिंग की और आकर्षीत हो रहे हैं इसमें कोई दो राय नहीं है कि आने वाला समय मैथि‍ली वेब पत्रकारिता का स्‍वर्णि‍म युग लाएगा ।

Sunday, December 28, 2014

लिखने से ज्यादा मिटाया गया बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का इतिहास













जितने समृद्ध इतिहास के लिए भारत अपने आपमें जाना जाता है उससे कहीं ज्यादा इस बात के लिए जाना जाता है कि यहाँ के इतिहास को हमेशा तोड़ मरोड़ कर पेश किया जाता रहा है । ऐसा ही कुछ हुआ है बनारस हिंदू वि‍श्व‍वि‍द्यालय के इतिहास के साथ भी । बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के संबंध में जो मान्य इतिहास है उसमें इस बात की कहीं चर्चा नहीं है कि इसकी स्थापना कैसे हुई और उसके लिए क्या-क्या पापड़ बेलने पड़े । बनारस हिन्दू वि‍श्व‍वि‍द्यालय की गलियों से लेकर संसद के सैंट्रल हॉल तक में लगी मालवीय जी की मूर्ति बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक के रूप में दिख जाएगी लेकिन इस आंदोलन के नेतृत्वकर्ता बिहार के सपूत दरभंगा के महाराजा रामेश्वर सिंह का जिक्र तक नहीं मिलेगा जिनके बिना इस हिन्दू वि‍श्व‍वि‍द्यालय की कल्पना तक नहीं की जा सकती है । बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की इतिहास पर लिखी गई एकमात्र किताब जो स्थापना के कई वर्षों बाद 1936 में छपी थी और इसे संपादित किया था बनारस हिन्दू विश्वविद्याल के तत्कालीन कोर्ट एंड कॉउसिल (सीनेट) के सदस्य वी सुन्दरम् ने । सुन्दरम की इस किताब को पढ़कर यही कहा जा सकता है कि उन्होंने जितना बीएचयू का इतिहास लिखा है उससे कहीं ज्यादा इस किताब में उन्होंने बीएचयू के इतिहास को छुपाया या मिटाया है । यह बात साबित होती है बीएचयू से संबंधि‍त दस्तावेज से । बीएचयू के दस्तावेजों की खोज करने वाले तेजकर झा के अनुसार बीएचयू की स्थापना के लिए चलाये गये आंदोलन का नेतृत्व पंडित मालवीय ने नहीं बल्कि‍ दरभंगा के महाराजा रामेश्वर सिंह के हाथों में था । जिसका जिक्र बीएचयू के वर्तमान लिखि‍त इतिहास में कहीं नहीं मिलता है । बीएचयू के वर्तमान लिखि‍त इतिहास के संबंध में श्री झा बताते हैं कि वी सुन्दरम् उस समय बनारस हिन्दू वि‍श्व‍वि‍द्यालय के कोर्ट एंड कॉउसिल के सदस्य थे और उस समय के कुलपति पंडित मदन मोहन मालविय जी के अनुरोध पर जो चाहते थे कि बनारस हिन्दू विश्चविद्यालय का एक ‍अधि‍कारीक इतिहास लिखा जाना चाहिये के कारण इस किताब को संपादित करने का जिम्मा लिया । और अंतत: यह किताब ‘’बनारस हिन्दू युनिवर्सि‍टी 1905-1935’’ रामेश्चर पाठक के द्वारा तारा प्र‍िटिंग वर्क्स, बनारस से मुद्र‍ित हुआ ।
यह पुस्तक बिकानेर के महाराजा गंगा सिंह जी के उस वक्तव्य को प्रमुखता से दिखाती है जब उन्होनें पहली बार मदन मोहन मालविय को इस वि‍श्व‍वि‍द्यालय के संस्थापक के रूप में सम्मान दिया था । यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि बिकानेर के महाराजा का इन सब परिदृष्य में पदार्पण 1914-15 में हुआ था ज‍बकि वि‍श्व‍वि‍द्यालय की परिकल्पना और प्रारूप 1905 से ही शुरू हो गयी थी । पुस्तक के पहले पन्ने पर लॉर्ड हॉर्डिग के उस भाषण का अंश दिया गया है जिसमे वो वि‍श्व‍वि‍द्यालय की नींव का पत्थर रखने आये थे । लेकिन उनकी पंक्त‍ियों में कहीं भी किसी व्यक्त‍ि का नाम नहीं लिया गया है । चौथे पैराग्राफ में उस बात की चर्चा की गई थी कि नींव के पत्थर के नीचे एक कांस्य पत्र में देवी सरस्वती की अराधना करते हुए कुछ संस्कृत के श्लोक लिखे गये थे । पांचवे  पैराग्राफ में लिखा गया था कि "The prime instrument of the Divine Will in this work was the Malaviya Brahmana, Madana Mohana, lover of his motherland. Unto him the Lord gave the gift of speech, and awakened India with his voice, and induced the leaders and the rulers of the people unto this end.” और इसलिए ये प्रसिद्ध हो गया कि मालवीय जी ही इस वि‍श्व‍वि‍द्यालय के एकमात्र संस्थापक हैं ।
किताब के छट्ठे पैराग्राफ में संस्कृत में मालवीय जी ने बिकानेर के महाराजा गंगा सिंह जी, दरभंगा के महा‍राजाधि‍राज रामेश्वर सिंह जी के साथ कॉंउसलर सुंदर लाल, कोषाध्यक्ष गुरू दास, रास विहारी, आदित्या राम और ले‍डी वसंती की चर्चा की है । साथ ही युवा वर्गों के कार्यों और अन्य भगवद् भक्तों का जिक्र किया है जिन्होनें कई प्रकार से इस विश्वविद्यालय के निर्माण में सहयोग दिया । इस पैराग्राफ में रामेश्वर सिंह के नाम को अन्य भगवद् भक्तों के साथ कोष्टक में रखा था जिन्हाने सिर्फ किसी तरह से मदद की थी । ऐनी बेसेंट का जिक्र इस अध्याय में करना उन्होंने जरूरी नहीं समझा ।
जबकि 1911 में छपे हिन्दू विश्वविद्याल के दर्शनिका के पेज 72 में लेखक ने इस विश्वविद्यालय के पहले ट्रस्टी की जो लिस्ट छापी है उसमे उपर से दंरभगा के महाराज रामेश्वर सिंह, कॉसिम बजार के महाराजाश्री एन सुब्बा रॉव मद्रास, श्री वी. पी. माधव राव बैंगलौर, श्री विट्ठलदास दामोदर ठाकरे  बॉम्बे, श्री हरचन्द्र राय विशि‍नदास कराची, श्री आर. एन. माधोलकर अमरोठी, राय बहादूर लाला लालचंद लाहौर, राय बहादूर हरिश्चन्द्र मुल्तान, श्री राम शरण दास लाहौर, माधो लाल बनारस, बाबू मोती चंद और बाबू गोविन्द दास बनारसराजा राम पाल सिंह राय बरेली, बाबू गंगा प्रसाद वर्मा लखनउ, सुरज बख्श सिंह सीतापुरश्री बी. सुखबीर मुजफ्फरपुर, महामहोपाध्याय पंडित आदित्या राम भट्टाचार्य इलाहाबाद, डॉ सतीश चन्द्र बैनर्जी इलाहाबाद, डॉ तेज बहादूर सापरू इलाहाबाद और पंडित मदन मोहन मालविय इलाहाबाद  का नाम लिखा गया था ।
अध्याय तीन जो पेज नंबर 80 से शुरू होता में इस बात की चर्चा कही नहीं की गई है कि किस प्रकार ऐनी बेसेंट ने बनारस में अपने केन्द्रीय हिन्दू महाविद्यालय को द यूनीवर्सिटी ऑफ इंडियामें तब्दील करने की योजना बनाई । ना ही एक भी शब्द में उस ‘’शारदा विश्वविद्यालय’’ का जिक्र किया जिसका सपना महाराजा रामेश्वर सिंह ने भारत के हिन्दू विश्वविद्याय के रूप में देखा था और जिसको लेकर उन्होंने पुरे भारत वर्ष में बैठकें भी की थी । इस पुस्तक में सिर्फ इस बात की चर्चा हुई की किस प्रकार अप्रैल 1911 में पंडित मालवीय जी, श्रीमती ऐनी बैसेंट जी से इलाहाबाद में मिले थी और प्रस्तावों पर सहमती के बाद किस प्रकार डील फाइनल हुई थी । ( इस पुस्तक में ना तो बैठकों की विस्तृत जानकारी दी गई है ना ही समझौते के बिन्दूओ को रखा गया है) उसके बाद वो महाराजा रामेश्वर सिंह से मिले और तीनो ने मिलकर धार्मिक शहर बनारस में एक विश्वविद्यालय खोलने का फैसला किया । पृष्ठ संख्या 80-81 पर साफ लिखा गया है कि यह कभी संभव नहीं हो पाता कि तीन लोग एक ही जगह, एक ही समय तीन यूनीवर्सीटी खोल पाते और उनको सही तरीके से संचालित कर पाते लेकिन लेखक ने उस जगह ये बिल्कुल भी जिक्र नहीं किया की उन तीनों की आर्थ‍िक, राजनैतिक, सामाजिक और उस समय के सरकार में पहुंच कितनी थी । खैर...
प्राप्त दस्तावेज से पता चलता है कि तीनों के बीच सहमति के बाद महाराजाधि‍राज दरभंगा की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन कर लिया गया और तत्कालीन वॉयसराय और शि‍क्षा सचिव को पत्राचार द्वारा सूचित कर दिया गया गया । महाराजधि‍राज ने अपने पहले पत्र जो 10 अक्टूबर 1911 को अपने शि‍मला स्थ‍ित आवास से शि‍क्षा सचिव श्री हरकॉर्ट बटलर को लिखे थे में लिखा था -  भारत के हिन्दू समुदाय चाहते हैं कि एक उनका एक अपना विश्चविद्यालय खोला जाय । बटलर ने प्रतिउत्तर में 12 अक्टूबर 1911 को महाराजा रामेश्वर सिंह को इस काम के लिए शुभकमानाएं दी और प्रस्तावना कैसे तैयार की जाए इसके लिए कुछ नुस्खे भी दिये (पेज 83-85) । इस पुस्तक के पेज संख्या 86 पर लिखा गया है कि इस विश्वविद्यालय को पहला दान महाराजाधि‍राज ने ही 5 लाख रूपये के तौर पर दिया । उसके साथ खजूरगॉव के राणा सर शि‍वराज सिंह बहादूर ने भी एक लाख 25 हजार रूपये दान दिये थे ।
22 अक्टूबर 1911 को महाराजा रामेश्वर सिंह, श्रीमती एनी बेसेंट, पंडित मदन मोहन मालवीय और कुछ खास लोगों ने इलाहाबाद में एक बैठक की जिसमें ये तय किया गया कि इस विश्वविद्यालय का नाम ‘’हिन्दू विश्चविद्यालय’’ रखा जाएगा । यह दस्तावेज इस बात का भी सबूत है कि मदन मोहन मालवीय जी ने अकेले इस विश्वविद्यालय का नाम नही रखा था ।
28 अक्टूबर 1911 को इलाहाबाद के दरभंगा किले में माहाराजा रामेश्वर सिंह की अध्यक्षता में एक बैठक का आयोजन हुआ जिसमें इस प्रस्तावित विश्वविद्यालय के संविधान के बारे में एक खाका खीचा गया ( पेज संख्या 87) । पेज संख्या 90 पर इस किताब ने मैनेजमेंट कमीटी की पहली लिस्ट दिखाई है जिसमें महाराजा रामेश्वर सिंह को अध्यक्ष के तौर पर दिखाया गया है और 58 लोगों की सूची में पंडित मदन मोहन मालवीय जा का स्थान 55वां रखा गया है ।
इस किताब में प्रारंभि‍क स्तर के कुछ पत्रों को भी दिखाया गया है जिसमें दाताओं की लिस्ट, रजवाड़ों के धन्यवाद पत्र, और साथ ही विश्वविद्यालय के पहले कुलपति सर सुंदर लाल के उस भाषण को रखा गया है जिसमें उन्होंने पहले दीक्षांत समारोह को संबोधि‍त किया है ।  अपने संभाषण में श्री सुंदर जी ने महाराजा रामेश्वर सिंह, श्रीमती एनी बेसेंट और पंडित मदन मोहन मालवीय जी के अतुलित योगदान को सराहा है जिसके बदौलत इस विश्वविद्यालय का निर्माण हुआ । यहाँ गौर करने वाली बात ये भी है कि अपने संभाषण में उन्होंने कभी भी पंडित मदन मोहन मालवीय जी को संस्थापक के रूप में संबोधि‍त नही किया है ( पेज 296)। इस किताब के दसवें अध्याय में पंडित मदन मोहन मालवीय जी के उस संबोधन को विस्तार से रखा गया है जिसमें उन्होंने दिक्षांत समाहरोह को संबोधि‍त किया था । यह संबोधन इस मायने में भी गौरतलब है कि इस पूरे भाषण में उन्होंने एक भी बार महाराजा रामेश्वर सिंह, श्रीमती ऐनी बेसेंट, सर सुंदर लाल आदि‍ की नाम बिल्कुल भी नहीं लिया । उन्होंने सिर्फ लॉर्ड हॉर्डिग, सर हरकॉर्ट बटलर और सभी रजवाड़ो के सहयोग के लिए उन्हें धन्यवाद दिया ।
आज भारत के विभि‍न्न पुस्तकालयों, आर्काइव्स और में 1905 से लेकर 1915 तक के बीएचयू के इतिहास और मीटींग्स रिपोर्ट को खंगालने से यह पता चलता है कि जो भी पत्राचार चाहे वो वित्तीय रिपोर्ट, डोनेशन लिस्ट, शि‍क्षा सचिव और वायसराय के साथ पत्राचार, रजवाड़ाओं को दान के लिए पत्राचार हो यो अखबार की रिपोर्ट हो या नि‍जी पत्र आदि ऐसे तमाम दस्तावेज है जिसमें ना ही पंडित मदन मोहन मालवीय जी को इसके संस्थापक के रूप में लिखा गया है ना ही कोई भी पत्र सीधे तौर पर उन्हे लिखा गया है । पत्राचार के कुछ अंश जो इसमाद के पास है उससे साफ साबित होता है कि सभी पत्राचार महाराजा रामेश्वर सिंह जी को संबोधि‍त कर लिखे गये हैं । ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि बीएचयू के लिखि‍त इतिहास में जहां रामेश्वर सिंह को महज एक दानदाता के रूप में उल्लेखि‍त किया गया है और तमाम दानदाताओं की सूची के बीच रखा गया है । ऐसे व्यक्त‍ि‍ को इन तमाम दस्तावेजो में बीएचयू के आंदोलन के नेतृत्वकर्ता या फिर बीएचयू के आधि‍कारीक हस्ताक्षर के रूप में  संबोधन कैसे किया गया है । किसी संस्थान के महज दानकर्ता होने के कारण किसी व्यक्त‍ि के साथ ना तो ऐसे पत्राचार संभव है और न हीं ऐसा संबोधन संभव है । अगर इस आंदोलन के नेतृत्वकर्ता कोई और थे तो पत्राचार उनके नाम से भी होने चाहिये थे । वैसे ही अगर दानकर्ताओं के लिए यह एक संबोधन था तो ऐसे संबोधन अन्य दानदाताओं के लिए भी होने चाहिये थे । लेकिन ऐसे कोई दस्तावेज ना तो बीएचयू के पास उपलब्ध है और ना ही किसी निजी संग्रहकर्ता के पास । ऐसे में सवाल उठता है कि क्या रामेश्वर सिंह महज एक दानदाता थे या फिर उन्हें दानदाता तक सिमित करने का कोई सूनियोजित प्रयास किया गया ।

तमाम दस्तावेजों को ध्यान रखते हुए यह कहा जा सकता है कि बीएचयू का वर्तमान इतिहास उसका संपूर्ण इतिहास नहीं है और उसे फिर से लिखने की आवश्यकता है । अपने सौ साल के शैक्षणि‍क यात्रा के दौराण बीएचयू ने कभी अपने इतिहास को खंगालने की कोशि‍श नहीं की । 2016 में बीएचयू की 100वीं वर्षगांठ मनाया जायेगा । ऐसे में बीएचयू के इस अधूरे इतिहास को पूरा करने की जरूरत है । 

Wednesday, May 21, 2014

गुजरात एक सच

गुजरात के विकास को एप्को के चश्में से देखने वालों के लिए एक छोटा सा प्रयास । बहुत से ऐसे लोग है जिसको गुजरात देश में सबसे ज्यादा विकसि‍त राज्य लगता है । दरअसल और एप्को और मीडिया जो दिखाना चाहती है हम वही देख पाते हैं । गुजरात मॉडल को देश में लागू करने से पहले गुजरात के विकास के आंकड़े पर डालते है एक नज़र ।

विकास का पोल
आर बी आई के ताजा आकड़े के मुताबिक गुजरात का हिस्सा देश के कुल एफडीआई में मात्र 2.38 प्रतिशत है । 2000 से 2011 तक गुजरात को सात हज़ार दौ सौ करोड़ का विदेशी निवेश मिला जबकी वहीं महाराष्ट्रा को पैंतालिस हजार आठ सौ करोड़ डॉलर मिला । यानी गुजरात के मुकाबले छ: गुणा ज्यादा । तथ्यात्मक आंकड़े बताते है कि मोदी के मुख्यमंत्र‍ित्व काल में 8300 एमओयू को साईन कराने के लिए गुजरात सरकार ने एक अमेरिकन फर्म जिसका नाम- एप्को वर्ल्ड वाईड है, को रखा करोड़ो रूपये की फीस देकर । ओर यही एपको वर्ल्ड वाईड का काम मोदी के लार्जर देन लाईफ पोलिटिशि‍यन बनाना है । इनके पीआर का काम भी यही देखता है । यह बात इनके बेवसाईट पर भी देख सकते हैं । हमेशा ग्रोथ रेट की बात करने वालें मोदी के गुजरात से आगे और भी कई राज्य है । सिक्क‍िम – 1995 से 2002 तक 6.30 था जोकि 2004 से 2012 में 12.62 प्रतिशत हो गया यानी ग्रोथरेट में 100 प्रतिशत की बढ़ोतरी । उत्तराखंड 1995 से 2002 तक 4.61 था जोकि 2004 से 2012 में 12.37 प्रतिशत हो गया यानी ग्रोथरेट में 168 प्रतिशत की बढ़ोतरी । और गुजरात 1995 से 2002 में 6.48 था जोकि 2004 से 2012 में 10.68 प्रतिशत यानी ग्रोथ रेट में मात्र 56 प्रतिशत की बढ़ोतरी जबकि सिक्क‍िम, उत्तराखंड, महाराष्ट्रा, हरियाणा जैसे राज्य काफी आगे निकल गए । मेादी के गुजरात में 60000 से ज्यादा लघु उद्योग बंद हो गए हैं । केंद्रीय सांख्य‍िकी कार्यालय के एनुअल सर्वे बताता है कि महाराष्ट्रा और आंध्रा में ज्यादा फैक्टरी और ज्यादा नौकरियां है । कहा जाता है कि गुजरात विकास क मॉडल इंडस्ट्रीयल विकास पर आधारित है और वहां उद्योग का ये हाल है ।
Source : Director, Department of Economics and Statistics, Government of Gujarat.2011-12), Director, Department of Economics and Statistics, Government of Gujarat. & Report by reserve bank of India.2011-12, TIMES NEWS NETWORK, 25th Jan 2013), UNDP human development report to UN-2011-12, National Sample Survey,

गुजरात में रोजगार
नेशनल सेंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन का डाटा बताता है कि पिछले 12 सालों में गुजरात में रोजगार का विकास दर घट कर शून्य हो गया है । ग्रामीण गुजरात की तो और बुरी हालत है । ग्रामीण किसान तत्कालिक पैसे के लोभ में पड़कर अपनी जमीन बेच देते हैं और बहुत जल्द वे किसान से बेरोजगार की श्रेणी में आ जाते हैं ।

मोदी ये दावा करते हैं कि 2009 में 25 लाख रोजगार पैदा किये गए । जबकि प्लानिंग कमीशन का इंप्लॉयमेंट रिपोर्ट का पेज नं० 126 कहता है कि प्रमुख सेक्टरों में इंप्लाय लोगों की संख्या जो 2004-05 में 25.3 मिलियन था वह 2009-10 में घटकर 24.0 रह गया है । हाल ही में 1500 सरकारी नौकरी के लिए 13 लाख लोगों ने अप्लाई किया है और मोदी कहते है गजरात में बेरोजगारी की समस्या समाप्त हो गयी है । मोदी कहते हैं कि गुजरात में बेरोजगारी की समस्या समाप्त हो गयी है । जबकि गुजरात मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी देने के मामले में भी देश के अन्य राज्यों से 14 पायदान नीचे है । मनरेगा को अगर छोड़ दें तो नेशनल सेंपल सर्वे ऑर्गनाईजेशन NSSO के 2011 के रिपोर्ट के मूताबिक शहरों में दिहारी पर काम करने वाले मजदूरों की मजदूरी गुजरात में 106-115 रूपये है जबकि केरला में 218रू है । और देहात में दिहारी मजदूर की मजदूरी गुजरात में 83रू है जबकि पंजाब में 152रू । गुजरात वेतन देने के मामले में भी अन्य राज्यों के मुकाबलें 12वें पायदान पर है । NSSO के ताजा आंकड़े के मुताबिक गुजरात में वेतन/सैलरी पाने वाले लोगों का औसतन एक दिन की कमाई 311रू है जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 411रू है ।
Source : RTI filed by Vinod Pandya GOG reply to RTI, 2011-12, Planning Commission Report-2012-13, Report by NASSO on poverty 2012-13, CAG Report 2011-12

गुजरात में कृषि‍
मोदीजी का दावा है कि पिछले दस सालों में गुजरात का कृषि‍ विकास दर देश के सभी राज्यों में उत्तम रह है । जबकि असलियत यह है कि प्लानिंग कमीशन का स्टेटवाईज कृषि‍ सेक्टर का विकास आंकड़ा देखते हैं तो पता चलता है कि 2005 से 2012 के बीच में गुजरात का कृषी क्षेत्र में विकास 6.47 प्रतिशत रहा जबकि बिहार का 15.17 प्रतिशत, पांडिचेरी का 9.95 प्रतिशत, झारखंड का 7.99 प्रतिशत, महाराष्ट्रा का 7.74 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ का 7.29 प्रतिशत के दर से विकास हुआ । साफ है कि कृषि‍ के मामले में भी गुजरात छठे पायदान पर है । गुजरात में फर्टिलाईजर पर भी 5 प्रतिशत का वैट लगता है जो कि भारत में सबसे ज्यादा है । मार्च 2011 से 455885 किसानों का कृषि‍ के लिए बिजली की कनेक्शन का आवेदन लंबित है ।
Source : Gujarat economics and statistics department, govt.of Gujarat And Times Of India http://timesofindia.indiatimes.com/city/ahmedabad/Gujarat ranked-8th-in-agricultural-growth Centre/articleshow/20040305.cms?intenttarget=novia @Archive Digger, Ministry of agriculture, Gujarat,2010-11-12)

गुजरात में शि‍क्षा की दशा
एजुकेशन डेवलपमेंट इंडेक्स 2012-13 के अनुसार देश के कुल देश के कुल 35 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में में 29वें स्थान पर आता है । वैसे अगर ओवर ऑल रैकिंग किया जाय – जिसमें शिक्षक छात्र का रेशि‍यो, शि‍क्षण योग्य उचित भवन, आबादी के अनुसार छात्रों का दाखि‍ला इत्यादि‍ के अनुसार तो गुजरात और नीचे फिसल कर 34वें पायदान पर आ जाता है । गुजरात में अपर प्राइमरी लेवल पर स्कूल छोड़ने का प्रतिशत 29.3 है जबकि देश में इसका प्रतिशत 6.6 है । मोदी जी अपने भाषण में साक्षरता दर की बात कर रहे थे, पर यह बताना भूल गए कि गुजरात में सरकारी स्कूलों की हालत कैसी है ? क्या पढ़ाया जाता है इन स्कूलों में ? कैसे इतिहास को तोड़-मरोड़ कर बच्चों को पेश किया जा रहा है ? गुजरात के बच्चे गांधी के जन्म दिवस तक गलत जानते हैं । गुजरात ही के एक गैर सरकारी संगठन ‘’प्रथम’’ के मुताबिक ग्रामीण गुजरात में करीब 95 फीसदी बच्चे विद्यालयों में पंजीकृत हैं, लेकिन ज्ञान का स्तर काफी कम है । पांचवीं कक्षा में पढऩे वाले करीब 55 फीसदी बच्चे दूसरी कक्षा के पाठ्यक्रम नहीं पढ़ पाते हैं । लगभग 65 फीसदी बच्चे ऐसे हैं जो गणित के सामान्य जोड़ घटाव भी नहीं कर पाते हैं । इससे बड़ी शर्म की बात गुजरात के लिए क्या होगी? आप स्कूल टाईम में गुजरात के किसी हाईवे पर चले जाईये आपके स्कूल जाने वाले बच्चें रोड साईड ढ़ाबों और कार वर्कशॉप में काम करते दिख जाएंगे । आगा खां रूरल सपोर्ट प्रोग्राम नाम का एक एनजीओ वहां कई सालों से कई काम रहा है । उसका रिपोर्ट कहता है – गार्जियन अपने बच्चों को स्कूल तो भेजते हैं लेकिन वहां शि‍क्षक आते ही नहीं । आदिवासी क्षेत्र में तो हालत और खराब है । इसके बावजूद गुजरात में मोदी जी का मेनीफेस्टो दावा करता है कि वे 100 प्रतिशत छात्रों को प्राथमिक शि‍क्षा के लिए एनरौल करान में सफल हो गए हैं और स्कूल से पढ़ाई छोड़ने वाले छात्रों का प्रतिशत अब मात्र 2 प्रतिशत रह गया है । इस तथ्य का आंकड़ा जानने के लिए UNDP का ये आंकड़ा देखि‍ये – यूएनडीपी ने गुजरात को देश को 18वें पायदान पर रखा है, छात्रों को स्कूल में टिकाए रखने के मामले में । यूनीसेफ कहता है कि प्राथमिक शि‍क्षा की गुणवत्ता में अभी बहुत सुधार की आवश्यकता है । क्योंकि मुश्किल से आधे बच्चे ही लिख-पढ़ और गणि‍त का सवाल समझा पाते हैं जितना कि उन्हें उनके उम्र के मुताबिक जानना चाहिए । और गुजरात सरकार है कि शि‍क्षा के निजीकरण पर ज्यादा जोड़ दे रही है बजाय शि‍क्षा के ढ़ांचागत सुधार करने के ।
और आखिर में एक बात और… गुजरात मोदी सरकार से पहले भी एक सम्पन्न राज्य रहा है । इसे पहले से एक इंजस्ट्रीयल स्टेट के तौर पर देखा जाता रहा है । ऐसे में बिहार से तुलना कितना जायज है नमोनिया के मरीजों को ये सोच लेना चाहिए ।
Source – Education Development index 2012-13, NGO Pratham, BeyondHeadlines.com, Aga Khan Rural Support Program, UNDP,UNISEF, NASSO Report, GOI, 2011-12 etc

स्वास्थ और पोषण
मजदूरों को कम मजदूरी के परिणामस्वरूप उनकी क्रय क्षमता काफी कम होता है और वे सपरिवार कुपोषण के शि‍कार हो जाते हैं । मिनि‍स्ट्री ऑफ स्टेटिस्ट‍िक एण्ड प्रोगामिंग के आंकड़े के अनुसार 2012 में गुजरात के 40 से 50 प्रतिशत बच्चे अंडरवेट थे । वहीं ह्यूमन डेवलेपमेंट रिपोर्ट 2011 भी कहता है कि गुजरात के आधे बच्चे कुपोषण के शि‍कार हैं । शि‍शु मृत्यूदर जो कि किसी भी प्रदेश के विकास का असल पैमाना होता है, गुजरात इसे रोकने में भी फिसड्डी साबित हो रहा है । शि‍शु मृत्यू दर रोकने में गुजरात का स्थान देश में 11वां है । गुजरात में प्रति हजार बच्चा जो जन्म लेता है उसमें 44 बच्चें तत्काल मर जाते हैं । यूनीसेफ 2012 के अपने राज्यवार रिपोर्ट में कहता है कि पांच साल के उम्र का हर दूसरा बच्चा कुपोषि‍त है और चार में से तीन बच्चा एनीमिया का शि‍कार है । बाल विवाह में भी गुजरात देश में चौथे नंबर पर है । स्वास्थ सेवाओं पर खर्च में गुजरात कोई खास मुकाम नही पा सका है । 1990 से 1995 के बीच जो गुजरात स्वास्थ सेवाओं पर 4.25 प्रतिशत खर्च करता था वो अब 2005 से 2010 में घटकर 0.77 प्रतिशत रह गया है । राज्य बजट में स्वास्थ पर खर्च करने के मामले में गुजरात नीचे से दुसरे पायदान पर है ।
Source : Planning Commission Report-2012-13, Central Bureau of Health Intelligence, UNDP report on global hunger 2009-10


गुजरात में गरीबी
NSSO के मुताबिक गरीबी धटाने में गुजरात उड़ीसा से भी पीछे है । 2010-14 के बीच उड़ीसा में 20 प्रतिशत की दर से गरीबी कम हुआ है और गुजरात महज 8.6 प्रतिशत लोगों को गरीबी रेखा से बाहर ला पाया है । राज्य का कुल ऋण 10 हजार करोड़ का है । जब 1995 में मोदी जी पहली बार सत्ता में आए तब गुजरात का एक्चुअल ऋण 45301 करोड़ था । 2011 का सेंसस बताता है कि मात्र 43 प्रतिशत लोगों को अपने घरों में पानी मिलता है बांकि सबको कहीं और से पानी का प्रबंध करने जाना पड़ता है । गुजरात प्रशासन के ही सेवा निवृत अधि‍कारी ने प्रतिष्ठ‍ित पत्रिका फ्रंटलाईन को कहा है – ‘’मोदी रन्स गुजरात लाइक शॉपकीपर । प्रोफिट एंड लॉसेज आर मेजर्ड ओनली इन इकोनोमिक एंड मोनिटरी टर्म । द लार्जर पिक्चर ऑफ ह्यूमन डेवलपमेंट एंड आई इंक्लूड द एनवारमेंट इन दिस, इस कंप्लीटली इग्नोर्ड नॉट नेग्लेक्टेड, माइंड यू । इट इज विलफूली इगनॅार्ड।‘’ अर्थात ‘’मोदी गुजरात को दुकानदार की तरह चलाते हैं । नफा और नुकसान को सिर्फ इकोनॉमी और मुद्रा के पैमाने पर तौलते हैं । मानव विकास का असल तथा बृहद स्वरूप और मैं इसमें पर्यावरण को भी शामिल करता हूं, को पूरी तरह से द‍रकिनार कर दिया गया है । जान बूझ कर और सोच समझ कर । परिणाम स्वरूप प्रदूषि‍त शहरों के मामले में भी गुजरात 13वें पायदान पर है । गुजरात के वापी तथा अंक्लेश्वर तो देश के सबसे दो प्रदूषि‍त जहगों में से एक है । शौचालयों के उपयोग में भी गुजरात का स्थान दसवां है । गुजरात के 26 जिलों में से 57 ब्लॉक डार्क जोन में आते हैं । सेसंस 2011 के अनुसार गुजरात के 1.75 करोड़ लोगों को पीने का शुद्ध पानी नहीं मिलता । 2001 में गुजरात की गरीबी 32 प्रतिशत था जो 2011 में बढ़कर 39.5 प्रतिशत हो गया । हरेक सौ लोगों में से 40 लोग गरीब है । गरीबी उन्मूलन भी गुजरात सबसे कम है आंकड़े बताते है कि गुजरात में ये प्रतिशत सिर्फ 8.6 प्रतिशत रहा है । गुजरात का पर्यटन का इतना व्यापक प्रसार-प्रचार करने के बाद भी गुजरात में टूरिज्म का विकास मात्र 13 प्रतिशत हुआ है जिसे मोदी जी 16 प्रतिशत बताते हैं । अगर ये 16 प्रतिशत भी मान लें तो भी देश के औसत पर्यटन मे हुई बृद्धि‍ से कम ही है । देश में 19 प्रतिशत का विकास हुआ है । और देशी आगंतुकों की बात करें तो कुल दस राज्यों में गुजरात 9वें स्थान पर आता है ।
Source : Director, Department of Economics and Statistics, Government of Gujarat. & Gujarat assembly question hours2011-12, National Sample Survey 2011-12, Ministry of Agriculture, Gujarat and Annual Report Narmada Nigam, 2011-12, National Sample Survey, Report by NASSO on poverty 2012-13)

गुजरात में करप्शन

पुरषोत्म सोलंकी के 400 करोड़ रूपये का मछली घोटाले वाले जनाब मोदी जी के ही मंत्रीमंडल में ही हैं । लोकायुक्त का मामला पूरी दुनियां को पता है । वैसे आनन-फानन में उन्होने गुजरात लोकायुक्त आयोग का गठन किया । ऐसा आयोग जिसमें लोकायुक्त मोदीजी खुद चुनेंगे और ये लोकायुक्त इनके तथा इनके मंत्रीयों की जांच नहीं कर सकते । हाईकोर्ट के चीफ जस्ट‍िस और राज्य के राज्यपाल का लोकायुक्त के नियुक्त‍ि की शक्त‍ि नहीं है । ये कैसा मॉडल ऑफ गवर्नेंस है । आज भी लोगों को सरकारी नौकरी, बीपीएल काई यहॉं तक कि औधोगिक लाइसेंस लेने में भी घूस देना पड़ता है । नर्मदा डैम की उंचाई बढ़ाए हुए भी 9 साल हो गए लेकिन कच्छ के लोगों को अभी तक पानी नहीं नसीब हुआ । किसानों से बाजार मूल्य से भी सस्ती दरों पर जमीन लेकर अंबानी को 1 रू के भाव से दे दिया गया । गुजरात के आधे से ज्यादा गांवों के प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र बंद पड़े है । और जिला अस्पतालों में चिकित्सा के साधन नहीं है । गुजरात में बिना टेंडर के 13 रू के दर से सोलर पावर खरीदे गए जबकि वही सोलर पावर मध्यप्रदेश और कर्नाटक में टेंडर करने के बाद 7.5 रू और 5.5 रू में खरीदा गया । पिछले सालों में गुजरात में 800 से ज्यादा किसान फसल का समर्थन मूल्य नहीं मिलने के कारण आत्महत्या को मजबूर हो गए । बिजली कनेक्शन के 4 लाख किसानों के आवेदन लंबित पड़े है और मोदी जी कहते हैं कि पूरे गुजरात में बिजली लग गई है ।

गुजरात में अल्पसंख्यकों की स्थ‍िती

काश ! मोदी जी सच्चर रिपोर्ट के इस बात को भी बता पाते कि उनके गुजरात में सबसे अधिक मुसलमान नौजवान जेलों में बंद हैं । यह बात खुद हाल-फिलहाल में राजेन्द्र सच्चर साहब भी बता चुके हैं । सच्चर साहब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश से मिलकर यह भी कह चुके हैं कि गुजरात के जेलों में बंद अधिकतर मुस्लिम युवा उत्तर प्रदेश के हैं ।
वहीं नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो 2012 की रिपोर्ट बताती है कि इस साल गुजरात में 932 मुसलमान बच्चों को सज़ा सुनाई दी गई । जो जेल की जनसंख्या का 21 फीसद आबादी है । वहीं 1583 मुसलमान कैदी अंडर ट्रायल हैं, जो जेल की आबादी के 24 फीसद है । वहीं साल 2012 में 151 मुसलमान कैदियों को डिटेन किया गया है, जो गुजरात के जेल की आबादी का 30 फीसद है । यहां के गरीब अल्पसंख्यक छात्रों को छात्रवृत्ति तक नहीं मिल पाती । इससे बड़ा अन्याय यहां के अल्पसंख्यकों के साथ और क्या होगा? काश ! मोदी जी यह भी बताते कि गुजरात के पॉलिटिक्स में मुसलमानों की हिस्सेदारी क्या है ? आलम तो यह है कि गुजरात के दो मुस्लिम विधायको पर भी भाजपा में शामिल होने का दबाव लगातार डाला जाता रहा है । दूसरी तरफ सच्चाई यह कि इसी गुजरात के मुसलमान अपने चंदे से भाजपा को चलाने का काम भी कर रहे हैं । अब यह जानना दिलचस्प होगा कि गुजरात के अमीर मुसलमान पार्टी को चंदा अपनी खुशी से देते हैं या फिर वो आज भी किसी डर में जी रहे हैं । केन्द्र द्वारा अल्पसंख्यकों को दी जाने वाली छात्रवृति जो गरीब अल्पसंख्यकों को अपनी स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के लिए दी जाती है और जिसमें केन्द्र और राज्य का प्रतिशत 75:25 है । गुजरात में ऐसे अल्पसंख्यकों की संख्या 52260 है । लेकिन मोदी जी ने केन्द्र को एक प्रपोजल तक नहीं भेजा ताकि इनको सहारा मिल सके । गुजरात के बैंको में मुश्लि‍मों का शेयर 12 प्रतिशत है । लेकिन इनको लोन मिलने का प्रतिशत मात्र 2.6 प्रतिशत है । यूएनडीपी के अनुसार देश के जिन चार राज्यों में मुसलमानों की स्थ‍िती बद से बदतर है उनमें गुजरात भी है । इन चार राज्यों में गुजरात, आसाम, उत्तर प्रदेश, और पश्च‍िम बंगाल है ।
Source : A report by Ministry of Minority Affair,MMA,GOI,2011-12, UNDP human development report to UN-2011-12)

गुजरात में अपराध

सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद 1958 दंगों का जवाब दिया गया । जिसमें सिर्फ 117 केसों में गिरफ्तारी हुई है । जो कुल केस का सिर्फ 5 प्रतिशत है । गुजरात वन अधि‍कार नियम 2006 को लागू करने में 11वें स्थान पर है । गुजरात में प्रत्येक तीन दिन में एक बलात्कार होता है । महिलाओं के अपराध में 39 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है । 60 प्रतिशत महिलाएं अपने पति‍ से और 35 प्रतिशत बेटियां अपने पापा के साथ दुर्व्यवहार का शि‍कार होती हैं । इन सभी अपराधो को छुपाने में गुजरात की मीडिया का बहुत बड़ा योगदान है और सत्ता के लोग उनसे ऐसा करवाते हैं । दरअसल लोगों को वही दिखाई देता है जो सत्ता पक्ष दिखाना चाहता है । वो नहीं दिखता जो हकीकत है ।
Source : An article on Gujarat is not tribal friendly? DNA Ahmedabad, Tuesday, Apr 3, 2012,) A report by NGO Ahmadabad Women Association Gujarat-AWAG-(TIMES NEWS NETWORK, 25th Jan 2013)

Monday, May 19, 2014

ई भी कोई नाम है महराज - भाग एक

बरगाही के भाई -:

यू तो बिहार के हरेक लोग इस नाम से परिचित होंगे लेकिन अगर आप खगड़ि‍या से बेगुसराय की और बढ़ते रहें तो इस नाम का अर्थ भी भली भांती समझ जाएंगे । हरेक दुसरे कदम पर लोग इसका उपयोग करते हुए सुनाई पड़ेंगे । दिल्ली पंजाब का ''इरिटेट वाला हैल्लाे'' या ''ओए'', ''अबे'' यहाँ का बरगाही भाई होता है । अब आप सोच रहे होगें की ये सम्बोधन है या गाली तो श्रीमान आपको बता दे ये ना ही सम्बोधन है और ना ही गाली ये तो प्यार है जो रिक्शे-ठेलेवाले से लेकर हरेक मजदूर की जुबान पर हरेक समय होता है । वैसे कुछ एलीट क्लास के लोग इसे गाली की श्रेणी में भी रखते है लेकिन मूल रूप से ये प्यार है । जो बेगुसराय के हृदय में बसता है ।

Tuesday, May 13, 2014

गंधवरिया राजवंश का इतिहास


स्व. श्री राधाकृष्ण चौधरी के अनुसार – स्वर्गीय पुलकित लाल दास ‘मधुर’ जी ने अथक परिश्रम करके गन्धवरिया के इतिहास को लिखकर श्री भोला लाल दास जी के यहॉं प्रकाशन के लिए भेजे थे । किसी कारणवश यह पाण्डुलिपी (जो कि उस समय जीर्णावस्थामें में था ) प्रकाशि‍त नहीं हो सका । फिर बहुत दिनों के बाद ये पाण्डुलिपी श्री चौधरी को प्राप्त हुआ । उनके अनुसार ये इतिहास किंवदंती के आधार पर लिखा गया था । क्योंकि गंधवरिया के विषय में कहीं भी कुछ भी प्रामाणि‍क इतिहास सामग्री नही है । सोनवर्षा राज के केसमें गन्धवरिया का इतिहास दिया गया है लेकिन उसमें से जो गन्धवरिया के लोग सोनवर्षा राज के विरोध में गवाही दिये थे उनमें से एक प्रमुख व्यक्ति‍ स्वर्गीय श्री चंचल प्रसाद सिंह मरने से पहले श्री राधाकृष्ण चौधरी से मिले थे । उन्होंने व्यक्त‍िगत रूप से ये कहा था कि उनका बयान जो उस केज में हुआ था से एकदम उल्टा है । इसलिए गन्धवरिया के इतिहास के लिए उसका उपयोग करते समय उसको रिभर्स करके पढ़ा जाय । उसी केस में एक महत्वपूर्ण बात ये मिला जो गन्धवरिया के द्वारा दिया गया दानपत्र था । जिसमें से कुछ चुने हुए दानपत्र के अंग्रेजी अनुवाद का अंश ‘हिस्ट्री ऑफ मुस्लिम रूल इन तिरहूत ‘ में प्रकाशि‍त किया गया है । सहरसा जिला में गंधवरिया वंश का इतना प्रभूत्व था तब भी उसका कोई उल्लेख ना ही पुराने वाले भागलपुर गजेटियर में है ना ही जब सहरसा जिला बना और उसका नया गजेटियर बना तब भी उसमें गन्धवरिया की चर्चा एक पाराग्राफ में हुई । इस संबंध में ना ही कोई प्रमाणि‍क इतिहास है और ना ही इसके लिए कोई पहल और प्रयास की जा रही है ।

गंन्धवरिया लोगों का गन्धवारडीह अभी भी शकरी और दरभंगा स्टेशन के बीच में है और वहां वो लोग अभी भी जीवछ की पूजा करते हैं । गंधवरिया डीह पंचमहला में फैला हुआ है । ये पंचमहला है – बरूआरी, सुखपुर, परशरमा, बरैल आ जदिया मानगंज । इन सबको मिलाकर पंचमहला कहा जाता है । 

दरभंगा विशेषत: उत्तर भागलपुर (सम्प्रति सहरसा जिला ) मे गन्धवरिया वंशज राजपूत की संख्या अत्याधि‍क है । दरभंगा जिलांतर्गत भीठ भगवानपुर के राजा साहेब तथा सहरसा जिलांतगर्त दुर्गापुर भद्दी के राजा साहेब और बरूआरी, पछगछिया, सुखपुर, बरैल, परसरमा, रजनी, मोहनपुर, सोहा, साहपुर, देहद, नोनैती, सहसौल, मंगुआर, धवौली, पामा, पस्तपार, कपसिया, विष्णुपुर एवं बारा इत्यादि‍ गॉव बहुसंख्यक छोटे बड़े जमीन्दार इसी वंश के वंशज थे । सोनवर्षा के स्वर्गीय महाराज हरिवल्लभ नारायण सिंह भी इसी वंश के राजा थे । ये राजवंश बहुत पुराना था । इस राजवंश का सम्बन्ध मालवा के सुप्रसिद्ध धारानगरी के परमारवंशीय राजा भोज देव के वंशज है । इस वंश का नाम ‘’गंधवरिया’’ यहाँ आ के पड़ा है । राजा भोज देव की 35वीं पीढ़ी के बाद 36वीं पीढ़ी राजा प्रतिराज साह की हुई । एक बार राजा प्रतिराज सिंह अपनी धर्मपत्नी तथा दो पुत्र के साथ ब्रह्मपुत्र स्नान के लिए आसाम गए थे । इस यात्रा से लौटने के क्रम में पुर्ण‍ियॉं जिलांतगर्त सुप्रसिद्ध सौरिया ड्योढ़ी के नजदीक किसी मार्ग में किसी संक्रामक रोग से राजा-रानी दोनों को देहांत हो गया । 

सौरिया राज के प्रतिनिधि‍ अभी भी दुर्गागंज में है । माता-पिता के देहांत होने पर दोनों अनाथ बालक भटकते-भटकते सौरिया राजा के यहॉं उपस्थ‍ित हुए, और अपना पूर्ण परिचय दिए । सौरिया राज उस समय बहुत बड़ा और प्रतिष्ठि‍त राज था । उन्होंने दोनो भाईयों का यथोचित आदर सत्कार किया । और अपने यहॉं दोनों को आश्रय प्रदान किये । बाद में सौरिया के राजा ने ही दौनों का उपनयन (जनेउ) संस्कार भी करवाएं । उपनयन के समय उन दोनों भाईयों का गोत्र पता नहीं होने के कारण उन दोनों भाईयों को परासर गोत्र दियें जबकि परमार वंश का गोत्र कौण्ड‍िल्य था । दोनो राजकुमार का नाम लखेशराय और परवेशराय था । दोनों वीर और योद्धा थे । सौरिया राज की जमीन्दारी दरभंगा में भी आता था । किसी कारण से एकबार वहां युद्ध शुरू हो गया । राजा साहेब इन दौनो भाईयों को सेनानायक बनाकर अपने सेना के साथ वहां भैजे । कहा जाता है कि दोनो भाई एक रात किसी जगह पर विश्राम करने के लिए रूकें कि नि:शब्द रात में शि‍विर के आगें कुछ दूर पर एक वृद्धा स्त्री के रोने की आवाज उन दोनों को सुनाई पड़ा । दोनो उठकर उस स्त्री के पास गए । रोने का कारण पुछा । उस स्त्री ने बताया कि ‘’ हम आपदोनों के घर के गोसाई भगवती हैं । मुझे आपलोग कही स्थान (स्थापित कर) दे‘’ । इस पर उन दोनो भाईयों ने कहा हम सब तो स्वयं पराश्रि‍त हैं । इसलिए हमलोगों को वरदान दीजिए कि इस युद्ध में विजयी हो । कहा जाता है उस स्त्री ने तत्पश्चात उन दोनों भाईयों को एक उत्तम खड़ग प्रदान किएं । जिसके दोनों भागपर सुक्ष्म अक्षर में संपुर्ण दुर्गा सप्तशती अंकित था । ये खड़ग पहले दुर्गापुर भद्दी में था । उसके पश्चात सोनवर्षा के महाराजा हरिवल्लभ नारायण सिंह उसे सोनवर्षा ले आएं थे । उस खड़ग में कभी जंग नहीं लगता था । वो खड़ग एक पनबट्टा (पानदान – पान रखने का बॉक्स) में मोड़ कर रखा जाता था । और खोल कर झाड़ देने से एक संपुर्ण खड़ग के आकार में आ जाता था । उस खड़ग और देवी की महिमा से दोनो भाई युद्ध में विजयी हुएं । पुरा रणक्षंत्र मुर्दा से पट गया और लाश की दुर्गन्ध दुर-दुर तक व्याप्त हो गई । इससे सौरिया के राजा बहुत प्रसन्न हुए और इस वंश का ना ‘’गन्धवरिया’’ रखें । ये युद्ध दरभंगा जिलांतर्गत गंधवारि नामक स्थान में हुआ था । गंधवारी और कई और क्षेत्र इन लोगों को उपहार में मिला । लखेशराय के शाखा में दरभंगा जिलांतर्गत (अभी का मधुबनी) भीठ भगवानपुर के राजा निर्भय नारायणजी आएं । और परवेशराय के शाखा में सहरसा के गन्धवरिया जमीन्दार लोग हुए । सहरसा का अधि‍कतर भूभाग इसी शाखा के अधीन था । दुर्गापुर भद्दी इसका प्रमुख केन्द्र था । 

परिसेशराय को चार पुत्र हुए । लक्ष्मण सिंह, भरत सिंह, गणेश सिंह, वल्लभ सिंह । गणेश सिंह और वल्लभ सिंह निसंतान भेलाह । भरत सिंह के शाखा में धवौली की जमीन्दार आई । लक्ष्मण सिंह को तीन पुत्र हुए – रामकृष्ण सिंह, निशंक सिंह और माधव सिंह । इसमें माधव सिंह मुसलमान हो गए और नौहट्टाक शासक हुए । ‘निशंक’ के नाम पर निशंकपुर कुढ़ा परगन्ना का नामकरण हुआ । पहले इस परगना का नाम सिर्फ ‘’कुढ़ा’’ था बाद में उसमें‍ निशंकपुर जोड़ा गया । निशंक को चार पुत्र हुए – दान शाह, दरियाव शाह, गोपाल शाह और छत्रपति शाह । दरियाव शाह के शाखा में बरूआरी, सुखपुर, बरैल तथा परसरमा के गन्धवरिया लोक हुए । 

लक्ष्मण सिंह के बड़े बेटे रामकृष्ण को चार पुत्र हुए – वसंत सिंह, वसुमन सिंह, धर्मागत सिंह, रंजित सिंह । वसुमन सिंह के शाखा में पछगछिया का राज मिला । धर्मागत सिंह के शाखा में जदिया मानगंज की जमीन्दारी मिली । और रंजित सिंह के शाखा में सोनवर्षा राज मिला । इसी वंश का राजा हरिवल्लभ नारायण सिंह हुए । 1908 में सोनवर्षा राज से 10-12 मील उत्तर में कांप नामक सर्किल में साढ़े नौ बजे रात में शौच के समय मार‍ दिया गया । इनकी एक कन्या का विवाह जयपुर स्टेट के संम्बन्धी के संग हुआ । और इनको एक पुत्र भी नहीं थे । उस कन्या के पुत्र रूद्रप्रताप सिंह सोनवर्षा राज के राजा हुए । इस शाखा में सोहा, साहपुर, सहमौरा, देहद, बेहट, विराटपुर, तथा मंगुआर के गंधवरिया की जमीन्दारी आई । इसमें साहपुर की राजदरबार भी प्रसिद्ध था । उनके दरबार में बिहपुर मिलकी श्यामसुंद कवि और शाह आलमनागर के गोपीनाथ कवि उपस्थ‍ित थे । स्वर्गीय चंचल प्रसाद सिंह भी सोनवर्षा के दामाद थे । 

वसंत सिंह को जहाँगीर से राजा की उपाधि‍ मिली थी । राजा वसंत सिंह गंधवरिया से अपने राजधानी हटाकर सहरसा जिला में वसंतपुर नामक गाव में बसाएं और वहीं अपनी राजधानी बनाएं । वसंतपुर मधेपुरा से 18 से 20 मील पुरब है । वसंत सिंह को चार पुत्र हुए – रामशाह, वैरिशाह, कल्याण शाह, गंगाराम शाह । पहले बेटे का शाखा नहीं चला वो निसंतान हुए । वैरिशाह राजा हुए । कल्याण शाह के शाखा में रजनी की जमीन्दारी आई । और गंगाराम शाह के शाखा में बारा की जमीन्दारी आई । इन्होंने अपने नाम पर गंगापुर की तालुका बसाई । वैरीशाह को दो रानी हुए । जिसमें पहले वाली पत्नी से केसरी सिंह और जोरावर सिंह हुए और दुसरे पत्नी से पद्मसिंह हुए । जोरावर सिंह के शाखा में मोहनपुर और पस्तपार की जमीन्दारी आई । पद्मसिंह की शाखा में कोड़लाही की जमीन्दारी आई । राजा केसरी सिंह बड़े प्रतिभाशाली व्यक्त‍ि थे । उनको औरंगजेब से उपाधि‍ मिली थी । केसरी सिंह को धीरा सिंह, धीरा सिंह को कीर्ति सिंह और कीर्ति सिंह को जगदत्त सिंह नामक पुत्र हुए जो बड़े वीर, दयालू और प्रतापी थे । गंगापुर, दुर्गापुर और बेलारी तालुका इनके अधि‍कार में था । ए‍क जनश्रुति‍ इस इलाके में विख्यात है कि उस समय दरभंगा राज की कोई महारानी कौशि‍की स्नान के लिए आई थी । उन्हें जब ये पता चला कि ये दुसरे लोगों का राज्य है तो बोली – हम किसी दुसरे के राज्य में अन्न जल ग्रहण नहीं कर सकते हैं । उसके बाद जगदत्त सिंह तुरंत उनको बेलारी तालुका का दानपत्र लिख उनसे स्नान भोजन का आग्रह कियें । वो बेलारी तालुका अभी तक बड़हगोरियाक खड़ोडय बबुआन लोगों के अधि‍कार में था । उसके बाद राज दरभंगा का हुआ । जगदत्त सिंह को चार पुत्र हुए । हरिहर सिंह, नल सिंह, त्र‍िभुवन सिंह और रत्न सिंह । त्र‍िभुवन सिंह ‘’पामा’’ में अपनी ड्योढ़ी बनाई । 

वैसे पंचगछि‍या के राजवंश अपने आपको नान्यदेव का वंशज बताते थे । हरिसिंह देव के पुत्र पतिराज सिंह की उत्पति मानते हैं । पतिराज सिंह ‘गन्धवारपुर’ में अपना निवास स्थान बताए थे । और इसलिए गन्धवरिया कहलाएं । लेकिन ये भी लोग अपने आपको पतिराज सिंह के पुत्र और परवेश राय के वंशज कहते हैं । रामकृष्ण सिंह के वंशज पछगछिया स्टेट हुए । सोनवर्षा राज, पछगछिया तथा बरूआरी प्रसिद्ध स्टेट माना जाता है । पंचमहला में बरूआरी स्टेट प्रमुख था । इस वंश में राजा कोकिल सिंह प्रख्यात हुए । इनको शाह आलम से 1184 हिजरी में शाही फरमान मिला था । राजा की उपाधी इनको सम्राठ से मिला था । बरूआरी तिरहुत सरकार के अधीन था । और कोकिल सिंह को इस क्षेत्र के ननकार का हैसियत मिला था । गन्धविरया की कूलदेवी ‘’जीवछ’’ की प्रतिमा बरूआरी राजदरबार में थी और नियमित रूप से वहां के लोग इनकी पूजा करते थे । जीवछ की प्रतिमा नोहट्टा से यहाँ लाई गई थी । 

इतना सबकुछ होते हुए भी गन्धवरिया के वंश का कोई प्रमाणि‍क इतिहास नही बन पाया है । जो कुछ दानपत्र अंग्रेजी दानपत्र के अनुवाद से मिला है उसमें से भी ज्यादा भीठ-भगवानपुर राजा साहेब का । भीठ-भगवानपुर गन्धवरिया के सबसे बड़े हिस्से की राजधानी थी और उनलोगों का स्ति‍त्व निश्च‍ित रूप से दृढ़ था और वो दानपत्र देते थे जिनका की प्रमाण है । दरभंगा के गन्धवरिया लोगों ने भी अपनी इतिहास की रूपरेखा प्रकाशि‍त नहीं की है । इसलिए इस सम्बन्ध में कुछ कहना असंभव है । बकौल राधाकृष्ण चौधरी ओइनवार वंश के पतन के बाद ‘भौर’ क्षेत्र में राजपुत लोगों ने अपना प्रभुत्व जमा लिए थे । और स्वतंत्र राज्य स्थापित किये थे । खण्डवला कुल से उनका संघर्ष भी हुआ था । और इसी संघर्ष के क्रम में वो लोग भीठ-भगवानपुर होते हुए सहरसा- पुर्ण‍ियाँ की सीमा तक फैल गए । गन्ध आ भर (राजपुत) के शब्द मिलन से गन्धवारि बनल और उसी गाँव को इन लोगों ने अपनी राजधानी बनाई । कालांतर में भीठ भगवानपुर इन लोगों को प्रधान केन्द्र बना । इतिहास की परंपरा का पालन करते हुए इन लोगों ने भी अपना सम्बन्ध प्राचीन परमार वंश के जोड़ा और ‘’नीलदेव’’ नामक एक व्यक्त‍ि की खोज की । उसी क्रम में कोई अपने आप को विक्रमादित्य के वंशज तो कोई अपने आप को नान्यदेव के वंशज बतलाते हैं । राधाकृष्ण चौधरी के अनुसार – उनके पास भीठ भगवानपुर की वंश तालिका नहीं है । लेकिन सहरसा के गंधवरिया लोगों की वंश तालिका देखने से ये स्पष्ट होता है कि परमार भोज और नान्यदेव से अपने को जोड़ने वाले गन्धवरिया लखेश और परवेश राय को अपना पूर्वज मानते हैं । एक परंपरा ये भी कहती है कि नीलदेव गंधवरिया में आकर बसे थे और ‘जीवछ’ नदी को अपना कुलदेवता बनाए थे । कहा जाता है कि नीलदेव राजा गंध को मारकर अपना राज्य बनाए थे । सहरसा जिला में भगवती के आशीष स्वरूप राज मिलने की जो बात है इसमें भी कई प्रकार की किंवदंती है । सिर्फ एक बात पर सभी एकमत है कि उपनयन के समय इन लोगों को अपना गोत्र याद नहीं रहने पर इन्हे परासर गोत्र दे दिया गया था । अब जब तक कोई वैज्ञानिक साधन उपलब्ध नहीं होता तबतक गंधवरिया को इतिहास ऐसे ही किंवदंती बनी रहेगी । 


संदर्भ – मिथि‍लाक इतिहास ( स्व. श्री राधाकृष्ण चौधरी )

Wednesday, March 26, 2014

पक्ष्र और विपक्ष

पक्ष 
जन-जन की है यही पुकार, अबकी बार मोदी सरकार

विकास के ये खोलेंगे द्वार, अबकी बार मोदी सरकार

हिन्दू के जो हैं सरदार, अबकी बार मोदी सरकार

पाकिस्तान को मारे जूते चार, अबकी बार मोदी सरकार

विपक्ष
मर्दों को पहनाए सलवार, ना हो एसी मोदी सरकार 

दंगे के जो खोल द्वार, ऐसी ना हो मोदी सरकार 

जीसकी उम्र हो साठ के पार, ऐसी ना हो मोदी सरकार

बीबी पर करे जो अत्याचार, ऐसी ना हो मोदी सरकार 


और अंत में
मोदी सा ना लो तुम पंगे
इन्होनें करवाए बड़े हैं दंगे
वाराणासी में अपने पाप को
धोकर करेंगे हर-हर गंगे

मोदी है बड़ा वीर महान
बढ़ाया है हिन्दुओं की शान
हाथों में ले कमल निशान
वापस लाएगा हमारा मान

Sunday, March 23, 2014

छी छी छी


मेरी एक गर्लफ्रेंड थी
छी छी छी 

मै उसकी हर बात मानता था
जी जी जी

मैं रोता था वो हसती थी
खी खी खी

उसने मुझे उल्लू बनाया
भी भी भी

मै डरता था वो डराती थी
ही ही ही 

मैं पागल था जो ऐसा करता था
जी जी जी 



बिजली का बुरा हाल सोनवर्षा राज बेहाल

सियासी पारे के साथ सूरज भी गरमा रहा है । और गरमा रही है राजनीति । लेकिन इस राज‍नीति के चक्कर में नेताजी ये भूल गए है कि इस पारे का आम-जन पर क्या असर पड़ने वाला है । लोग गर्मी से हलकान हुए जा रहे है और बिजली है की आने का नाम ही नहीं ले रही । पहले जो लाईट 8 से 10 घंटे तक रह जाती थी अब 2 से 4 घंटे में ही मुंह-दिखाई कर वापसी की राह पकड़ लेती है । इस बार होली की मस्ती को भी अंधेरे ने लील लिया । लोग इन्वर्टर और जेनरेटर के सहारे अपने आप को राहत पहुंचाने की जुगत में लगे रहे । सबसे ज्यादा परेशानी तो युवाओं को हुआ । उनकी ‘’डीजे’’ की सारी तैयारी धरी की धरी रह गई । डीजे के घुन पर थि‍रकने को तैयार युवा मोबाइल से ही काम चलाकर रह गए । लेकिन आखि‍रकार कब तक ? मोबाइल को भी तो कभी ना कभी चार्ज करना ही पड़ता, सो कइयों को निराशा हाथ लगी ।

गाँव-गाँव में पावर सब स्टेशन तो खुल गए हैं, लेकिन बिजली नदारद है । कभी अगर बिजली आ भी जाती है तो वोल्टेज इतना कम होता है कि‍ कुछ भी करना मुश्कि‍ल हो जाता है । नाम मात्र की बिजली डिबीया से भी कम रोशनी करती है । कभी-कभी तो बल्ब देखकर ये भी भ्रम हो जाता है कि डिबीया जल रही है । एसी और फ्रिज की तो बात ही छोड़ दीजि‍ए, घर का छोटा टुल्लू पम्प भी नही चल पाता । ऐसे में पानी की मारामारी है सो अलग । सरकार ने हरेक प्रखंड में पानी की टंकी तो लगा रखी है, लेकिन बिजली के अभाव में उसका भी मोटर सिर्फ दिखावे का बनकर रह गया है । हरेक मुहल्ले में नल तो लग गया, लेकिन पानी कहीं नहीं ।

कुछ बड़े घरों ने हाई पॉवर के स्टेबलाइजर लगा रखे है जो सारे इलाके की बिजली अकेले ही चट कर जाते हैं । आम जन परेशान है, लेकिन नेता अपने चुनाव प्रचार में लगे हैं । जनता की सुधि‍ लेने की बजाय एसी गाड़ी में घूम-घूम कर चुनाव प्रचार कर रहे हैं । नीतीश बाबु दिन-प्रतिदिन बिजली की नई-नई योजनाओं का शि‍लान्यास और उद्घाटन तो कर रहें हैं, लेकिन हकीकत महज कागजों तक ही सिमटी दिखाई दे रही है । बिहार को बिजली के क्षेत्र में सक्षम बनाने का दावा कर नीतीश जी ने अपनी पीठ जरूर थपथपा ली हो लेकिन हकीकत आज भी कोसों दूर है । हाथ में झुलता पंखा और डिबीया की रोशनी सच्चाई बयां करने के लिए काफी है ।

Thursday, March 13, 2014

कह-मुकरी (होली स्पेशल)



(१)

चढ़ता सबको उसका खुमार
आता जब भी लाता प्यार
प्रेम रंग सी उनकी बोली
ए सखि‍ साजन ?
ना सखि‍ होली ।

(२)

तन भीगे मन भीगा जाय
याद कभी जब उसकी आय
खुशियों की वो रचे रंगोली
ए सखि‍ साजन ?
ना सखि‍ होली ।

(३)

कानो में है मीसरी घोले
अपनी ताल पे जब वो बोले
तन मन जाता दोनो डोल
ए सखि‍ साजन ?
ना सखि‍ ढ़ोल ।

(४)

महक है ऐसी मन भरमाए
चेहरे को जब भी सहलाए
तन-मन दोनो होए अधीर
ए सखि‍ साजन ?
ना सखि‍ अबीर ।

(५)

जब आता वो रंग बरसाता
अपने प्यार से हमे नहलाता
तन-मन भीगे भीगी चोली
ए सखि‍ साजन?
ना सखि‍ होली ।

Sunday, March 9, 2014

चुनावी कह - मुकरी


सर्वे को थोथा बतलाता 
अपनी अपनी ही चलवाता 
कहता हैं सबका हूं ईश 
ए सखि‍ टीवी, ना नीतीश 

आम आदमी बनकर आया 
खास आदमी बन गया भाया 
ऐसा फैला उसका जाल 
ए सखि‍ नेता, केजरीवाल 

खेलता है चिट्ठी- चिट्ठी 
गुम है अभी सिट्टी-पिट्टी 
बगावत मेँ मिलता आनंद 
ए सखि प्र॓मी, ना शिवानंद 

काँग्रॆस की वो जोहता बाट 
नही करेंगा जदयू से सांठ 
गठजोड़ी में फस्ट किलास 
ए सखि लालू, ना रामविलास 

आता है वो मफलर डाल 
खांसी से उनका बुरा हाल 
फिस्स हो गई आपकी चाल 
ए सखि‍ गरीब, ना केजरीवाल 

विशेष राज्य का गाये राग 
जनता की दब गई आवाज 
कहते खुद को मठाधीश 
ए सखि बिहार? 
ना सखि‍ नीतीश !! 

धरना प्रदर्शन इनका काम 
युगांडा को भी मिलेगा मान 
अनशन की फिर चली है चाल 
ए सखि अन्ना ? ना केजरीवाल !! 

परवीन संग गया पीटर 
बीजेपी की चली है हीटर 
और बनो तुम मठाधीश 
ए सखि‍ चुनाव ना सखि नीतीश 

फिर से जादू उनका बोला 
उतरेगा भाई उड़नखटोला 
भाग्य हैं बैठे उनके गोदी 
कि‍ सखि मेला? ना सखि‍ मोदी !! 


जदयू में जब गली ना दाल 
उसने चली 'आप' की चाल 
जदयू का तो बज गया बीन 
ए सखि वोटर ना परवीन !! 

आर सी पी को पड़ गये जुते 
रंजन भी ना रहे अछुते 
जनता ने फिर पीटा यूं 
ऐ सखि चोर ना सखि‍ जदयू !! 

विराटनगर जा करे रंगरेली 
पटना हाईकोर्ट ने कसी नकेली 
उनका गया है बाजा बज 
के सखि‍ लुच्चा ना सखि‍ जज !! 

बक्सर से लड़ सकते भैया 
पकडेंगे भोजपुरी नैया 
नेता की पकड़ी है गाड़ी 
कि सखि बाउंसर? ना मनोज तिवारी !! 

कपड़े तक वो लियो खोलाय 
मोदी की फिर महिमा गाय 
निर्लज्जता में है वो घना 
के सखि‍ बीबी ?? 
ना रे मेघना !! 

मातिहारी की थामे कमान
नेता ने कर दिया ऐलान
भाजपा दांत रहें हैं पीस
ए सख‍ि गंगेश्वर ?
ना अवनीश !! 

लालू की हो गई हैकरी गुल
मोदी का जब बजा बिगुल 
दावा किए थे सीना तान 
कि सखि चुनाव ?
ना सखि‍ मैदान !! 

मातिहारी की थामे कमान 
नेता ने कर दिया ऐलान 
भाजपा दांत रहें हैं पीस 
ए सखि‍ गंगेश्वर ? 
ना अवनीश !! 

कपड़े तक वो लियो खोलाय 
मोदी की फिर महिमा गाय 
निर्लज्जता में है वो घना 
के सखि‍ बीबी ?? 
ना रे मेघना !! 

इस्तिफे का है खेल निराला 
दिल्ली का मुंह किया है काला 
लोकपाल की चली है चाल 
ए सखि नेता ? 
ना केजरीवाल !! 

चाय दूध का चला है खेल 
जनता की हो गई रेलम-पेल 
यूं पार करेंगे अपनी 
नाव ए सखि‍ मेला? 
ना चुनाव !! 

चाय की चली है आँधी 
उड़ ना जाए सारे गांधी 
भाग्य है बैठे उनके गोदी 
ए सखि‍ चुनाव ? 
ना सखि मोदी !! 

एक कमरे में दो दबंग 
टीवी को कर दिया था बंद 
नेताऔ का है ये अंगना 
ए सखि संसद? 
ना तेलांगना !! 

डंडा बिस्कुट मिलेगा फ्री 
उनका है ये आइडिया थ्री 
राजनीति में है वो चालू 
ए सखि मोदी ? 
ना सखि लालू !! 

पोटा पर कर दिया है चोट 
है उनकी नीयत में खोट 
राजनीति में सबसे बीस 
ए सखि‍ राजद ? 
ना नीतीश !! 

मोदी को कर दिया खड़ा 
जोशी अपनी जिद पर अड़ा 
देश प्रेम का भरा है रस 
ए सखि‍ भाजपा ? 
ना बनारस !! 

जोशी ने है खेला खेल 
हो गई इनकी इंजन फेल 
और बैठे तुम इनके गोदी 
ए सखि‍ भाजपा ? 
ना सखि‍ मोदी !! 

पांच-पांच को भेजा घर 
है इनकी हालत बदतर 
कहते थे अपने को बीस 
ए सखि‍ खेल ? 
ना नीतीश !! 

गांधी राह पर चले नीतीश 
सत्याग्रह कर झुकाया शीश 
विपक्ष‍ियों का किया झंड 
ऐ सखि‍ अनशन ? 
ना बिहार बंद !! 

आऐंगे वो आज बिहार 
होगी उनकी फिर हुंकार 
बैठेंगे लोजपा की गोदी 
ए सखि भाजपा ? 
ना सखि‍ मोदी !!