Monday, July 16, 2018

मत्‍युभोज कितना जाएज, कितना नाज़ायज

अब जबकि फेसबुक पर श्राद्ध को लेकर विभिन्‍न प्रकार के विलाप किए जा रहे हैं । मृत्‍युभोज को अनर्गल और अहितकारी बताया जा रहा है उस समय फेसबुक पर धर्मशास्‍त्रों के ज्ञाता और मैथिली और लिपि क अनन्‍य विद्वान पंडित भवनाथ झा ने विष्‍णुपुराण के इन दस श्‍लोकों के तरफ लोगों का ध्‍यान आकृष्‍ट किया है जिससे लोगों को श्राद्ध और मृत्युभोज समझने में आसानी हो - ब्‍लॉगर


विष्णुपुराण (3.14.21-30), वराहपुराण (13.53-58) एवं अन्य धर्मशास्त्रों में श्राद्ध पर होने वाले व्यय का विधान है। यहाँ पर अत्यन्त प्रतिष्ठित विष्णुपुराण से उन दस श्लोकों को उद्धृत किया जाता है जिनमें यह उल्लेख है कि श्राद्ध में व्यय केसे किया जाना चाहिए। ध्यान रहे कि यह निर्देश हमारे पितरों का है जिनकी सन्तुष्टि के लिए श्राद्ध किया जाता है।

पितृगीतांस्तथैवात्र श्लोकास्तांश्च शृणुष्व मे।
श्रुत्वा तथैव भवता भाव्यं तत्रादृतात्मना।।21।।

पितरों के द्वारा कही गयी पितृगीता के श्लोकों को मुझसे सुनें और सुनकर आदरपूर्वक इसी प्रकार का आचरण करें।।21।।

अपि धन्यः कुले जायेदस्माकं मतिमान्नरः।
अकुर्वत् वित्तशाठ्यो यः पिण्डान्नो निर्वपिष्यति।।22।।

क्या हमलोंगों के कुल में ऐसा विचारवाला धन्य व्यक्ति उत्पन्न होगा जो धन का घमण्ड न करता हुआ हमें पिण्ड देगा? 22।।

रत्नं वस्त्रं महायानं सर्वभोगादिकं वसु।
विभवे सति विप्रेभ्यो योस्मानुद्दिश्य दास्यति।।23।।

सामर्थ्य होने पर हमें लक्ष्य कर ब्राह्मणों को रत्न, वस्त्र, विशाल वाहन, सभी प्रकार की भोग्य सामग्रियों का दान करेगा?।।23।।

अन्नेन वा यथाशक्त्या कालेस्मिन् भक्तिनम्रधीः।
भोजयिष्यति विप्राग्र्यांस्तन्मात्रविभवो नरः।।24।।

अथवा इस समय, श्राद्ध के समय, भक्ति से नम्र बुद्धि वाला अपने सामर्थ्य के अनुसार उतना ही विभव वाला व्यक्ति अन्न से ब्राह्मणश्रेष्ठों को भोजन करायेगा।24।

असमर्थोन्नदानस्य धन्यमात्रां स्वशक्तितः।
प्रदास्यति द्रिजाग्रेभ्यः स्वल्पाल्पां वापि दक्षिणाम्।25।।

अन्नदान करने में भी यदि वह समर्थ नहीं है तो अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणश्रेष्ठों को केवल धन दान करेगा, साथ ही, थोड़ी ही सही दक्षिणा भी देगा।25।

तत्राप्यसामथ्र्ययुतः कराग्राग्रस्थितांस्तिलान्।
प्रणम्य द्विजमुख्याय कस्मैचिद् भूप! दास्यति।।26।।

हे राजन्, यदि इतना भी सामर्थ्य न हो तो उंगलि के अगले भाग से तिल (एक चुटकी भर तिल) उठाकर किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को देगा।26।

तिलैः सप्ताष्टभिर्वापि समवेतं जलाञ्जलिम्।
भक्तिनम्रः समुद्दिश्य भुव्यस्माकं प्रदास्यति।।27।।

अथवा सात या आठ तिल से युक्त जल अंजलि में लेकर भक्ति से नम्र होकर हमें लक्ष्य कर धरती पर देगा।27।

यतः कुतश्चित् सम्प्राप्य गोभ्यो वापि गवादिकम्।
अभावे प्रीणयन्नस्माञ्छ्रद्धायुक्तः प्रदास्यति ।।28।।

अथवा इसके अभाव में भी जहाँ कहीं से भी गाय के एक दिन का भोजन संग्रह कर हमें प्रसन्न करते हुए श्रद्धा के साथ गाय को अर्पित करेगा।28।

सर्वाभावे वनं गत्वा कक्षमूलप्रदर्शकः।
सूर्यादिलोकपालानामिदमुच्चैर्वदिष्यति ।।29।।
न मेस्ति वित्तं न धनं न चान्यच्छ्राद्धोपयोग्यं स्वपितृन्नतोस्मि।
तृप्यन्तु भक्त्या पितरो मयैतौ कृतौ भुजौ वर्त्मनि मारुतस्य।।30।।

कुछ भी नहीं रहने पर वन जाकर अपनी काँख दिखाते हुए अर्थात् दोनों हाथ ऊपर उठाकर सूर्य आदि लोकपालों के प्रति जोर से यह कहेगा-
मेरे पास न तो सम्पत्ति है, न अन्न है न ही श्राद्ध के लिए उपयोगी अन्य वस्तुएँ हैं। मैं अपने पितरों के प्रति नतमस्तक हूँ। मेरी इस भक्ति से मेरे पितर तृप्त हों, मैंने वायु के रास्ते अपने दोनो हाथ ऊपर उठा लिए हैं।।29-30।

इत्येतत् पितृभिर्गीतं भावाभावप्रयोजनम्।
यः करोति कृतं तेन श्राद्धं भवति पार्थिव।।31।।

हे राजन्, इस प्रकार, सामर्थ्य एवं अभाव दोनों बातें कहनेवाली पितरों की इस वाणी के अनुसार जो कर्म करते हैं उनके द्वारा श्राद्ध सम्पन्न माना जाता है।31।।

यही अंश वाराहपुराण में भी 13.51 से 13.61 तक अविकल उद्धृत है।

Sunday, February 25, 2018

बिजली की रानी हवा-हवाई हो गई


सुनो हिम्‍मतवाली(1983), जानी दोस्‍त (1983) यू जो तूम एकाएक गई हो, सदमा (1983) दे गई हो । तूम बॉलीवूड की एक नंबर की मवाली (1983) कलाकार (1983) थी । तुम्‍हारा ये आखिरी सरगम (1984) हमें इन्‍कलाब (1984) के अंत तक याद रहेगा । बॉलीवुड तुम्‍हारा मकसद (1984) था और तुम्‍हारा अभिनय हम सबके लिए तौफा (1984), लेकिन इस अकलमंद (1984) को इस तरह जो तूम छोड़कर चली गई तो कईयों के अंदर जाग उठा इंसान (1984) है । नया जमाना के साथ नया कदम (1984) मिलाकर तुमने आज के दादा (1985) का अच्‍छा बलिदान दिया, वो कहते है न सरफरोशी (1985) की तम्‍मना अब हमारे दिल में है टाईप । 

ओ मास्‍टरजी (1985) ये आग और शोला (1986) एक  साथ क्‍यों भड़काती थी तूम । सुहागन (1986) न होने के बावजूद भी सुहागन होकर इस जादू नगरी (1986) में घुमती रही । क्‍या फायदा हुआ इस सल्‍तनत (1986) को नज़राना (1986) देकर । तुम बॉलीवूड की न केवल धर्म अधिकारी (1986) रही बल्‍क‍ि आखिरी रास्‍ता (1986) पकड़ कर पूरे बॉलीवूड की भगवान दादा (1986) बन गई । 

अरी ओ जांबांज (1986) अदाकारा इस घर संसार (1986) के चक्‍कर में तुम ने कईयों को नागीन (1986) बनकर डसा, लेकिन किसी की क्‍या मज़ाल(1987) जो कर्मा (1986) के इस औलाद (1987) का मुंह बंद कर दे, क्‍योंकि तुमने पहले ही कह रखा था किसी भी बात का जवाब हम देंगे (1987) । 

खैर तुम मी0 इंडिया (1987) बनी, वतन के रखवाले बनी (1987) और अपने हिम्‍म्‍त और मेहनत (1987) से सोने पे सुहागा कर दिया (1987) । वाह री मेरी शेरनी (1988) तुम राम अवतार (1987) बनकर इस कलियुग में आई और वक्‍त की आवाज (1988) सुनकर जोशिले (1989) अंदाज में मेरा फर्ज (1989) अदा कर गई । 

ओ मेरी चांदनी (1989) तुम्‍हारी निगाहें (1989) जब गैर-कानूनी (1989) ढंग से उठती है न तो कइयों को मैं तेरा दुश्‍मन (1989) बना जाती है । 

अरी ओ चालबाज़ (1989) तुम्‍हारे जुल्‍म के जंजीर (1989) से की गई नाकाबंदी (1990) हैरान (1990) करती है । ओ बंजारान (1991) तुम्‍हारे इस लैला मजनू (1992) और हीर-रांझे (1992) वाले लम्‍हे (1991) का तो खुदा गवाह (1992) भी है । वॉलीवूड के फरिश्‍ते (1991) भी तुमसे फना मांगते थे । तुम्‍हारे गुमराह (1993) ने तो कईयों को आसमान से गिरा (1992) दिया ।

ओ मेरी चंद्रमुखी (1993) तुम तो रूप की रानी, चोरों का राजा (1993) थी ये अचानक से गुरूदेव(1993) क्‍यों बन गई । तूम बॉलीवूड का लाडला (1994) थी, चांद का टुकड़ा (1994) थी फिर एकाएक आर्मी (1996) बनकर तुमने ग्रेट रॉबरी (1996) क्‍यों कर डाली । बॉलीवूड को मी0 बेचारा (1997) बनाकर तुमने इस इंडस्‍ट्री को जुदाई (1997) दे दी, अब ये कितना सही है कौन सच्‍चा है कौन झूठा (1997) ये तो तूम ही समझो । मेरे लिए तो अब भी तूम मेरी बीबी का जवाब नही (2004) है हो । फिर ये इस दुनिया को इंग्‍ल‍िश-विग्‍लिश (2012) देकर तुम बॉलीवूड की मॉम (2017) बनकर इस दुनिया को ही छोड़ चली । हे श्री अम्मा यंगर मयप्पन तूम जो चले गए हो यू अचानक से इस फैन को बहुत तड़पा गए हो । तुम्‍हारी याद आएगी । 

Monday, January 8, 2018

पाट का ठाठ

मिथि‍ला में एक कहावत है– ज्‍यों उपजतो पाट, त दखिह ठाठ...। सोन अर्थात जूट मिथिला के किसानों के लिए केवल फसल मात्र नहीं है, अपि‍तु ये इस जगह के संस्कृति का हिस्सा भी है । जूट से संबंध खत्‍म होनेका मतलब है इस जगह की संस्‍कृती से संबंध टूटना । कभी ‘’हरा नोट’’ और ‘’गोल्डेन फाइबर’’ के नाम से विख्यात बिहार का जूट आज अपने अस्तित्‍व के लिए संघर्षरत है । सरकार और समाज की अवहेलना और उदारवाद से उपजे प्लास्ट‍िक प्रेम इस ‘’गोल्डेन फाइबर’’ को ‘’गोल्डेन हिस्‍ट्री’’ मे बदलने ही वाला था कि सरकार ने एक फरमान जारी किया अब खाद्यान और अनाज की पैकेजिंग के लिए जुट का थैला अनिवार्य कर दिया गया है । एक समय था जब विश्व के कुल उत्पादन का 80 फिसदी जूट का उत्पादन अकेला बंगाल करता था । बंगाल में जूट कारोबार जब शुरु हुआ था तब बिहार भी उसका हिस्‍सा था । बिहार बंगाल से अलग हुआ तथापि बिहार में जूट का रकबा कम नहि हुआ । बिहार में जूट के लिए बाजार भी पर्याप्‍त था । आजादी के समय विश्‍व का 80 फिसदी जूट प्रोसेसिंग भारत के कुल 90 जूट मिल में होता था । लेकिन देश के विभाजन ने जूट कारोबार को प्रभावित किया । वैसे अभी भी देश मे समग्र जूट मिल की संख्या 79 है, जिनमे मे से 62 सिर्फ पश्च‍िम बंगाल में है, सात आंध्रप्रदेश मे, बिहार और उत्तर प्रदेश मे तीन-तीन, असम, ओडिशा, त्रिपुरा और छत्तीसगढ़ में एक–एक है । ‘’गोल्डेन फाइबर’’ से ‘’गोल्डेन हिस्‍ट्री’’ मे परिणत जूट की यात्रा पर बहुत तार्किक ढंग से प्रकाश देने की कोशिश की है इसमाद (मैथि‍ली के पहले इपेपर) के पत्रकार सुनील कुमार झा और कुमुद सिंह ने ।




18वीं शताब्‍दी में पटुआ बना जूट

कहने के लिए जूट का मिथिला में कई नाम है, कोई सोन, त कोई इसको पटुआ कहता हैं। लेकिन ‘जूट’ शब्द संस्कृत के ‘जटा’ या ‘जूट’ से निकला दिखाई पड़ता है । यूरोप में 18वीं शताब्दी में सबसे पहले इस शब्द का प्रयोग मिलता है, यद्यपि उस जगह इसका आयात 18वीं शताब्दी के पूर्व “पाट” के नाम से होता रहा है । 1590 में अबुल फजल लिखि‍त आइन-ए-अकबरी जैसे कई दस्तावेज कहते हैं कि जूट का प्रयोग भारत में कपडा के रूप में भी खूब होता था । दस्‍तावेज के अनुसार भारतीय खास करके मिथिला और बंगाल में सफेद जूट से बने वस्त्र का प्रयोग बहुतायात में होता था । 17वीं शताब्दी में जब अंग्रेज भारत आए, तब ईस्‍ट इंडिया कंपनी जूट के पहिले वितरक बनें और इसका निर्यात बड़े पैमाने पर शुरु हुआ । इस से पहले भारत में जूट का उत्पादन केवल घरेलू उपयोग के लिए होता था । 18वीं शताब्दी के प्रारंभ में कंपनी स्कॉटलैंड के डूडी में अपना पहला कारखाना लगाया । इसके साथ ही भारतीय जूट को स्कॉटलैंड के डूडी भेजने के लिए कलकत्ता के हुगली तट पर बंदरगाह बनाया गया । कच्‍चा माल और सस्‍ता मजदूर दोनो भारत में उपलब्‍ध था, ऐसे में मिस्टर जॉर्ज ऑकलैड डूडी नाम के स्कॉटलैंड के जूट कारोबारी को समझ आया जो स्कॉटलैंड में जूट कारखाना मंहगा धंधा है । इसलिए मिस्‍टर ऑकलैंड की कंपनी ने 1855 में हुगली नदी के तट पर रिशरा में पहला जूट मिल खोला । चार साल बाद मिस्टर जॉर्ज ऑकलैड के देखा-देखी पॉंच और नया मिल चालु हो गया । 1910 तक इसकी संख्या 38 हो गई । 1880 से पहले तक पूरा विश्व जूट के लिए कलकत्ता और डुंडी पर निर्भर रहता था, लेकिन 1880 के बाद जूट फ्रांस, अमेरिका, जमर्नी, बेल्जीयम, इटली, रूस और आस्ट्रीया तक पहुंचि‍ गया । इसी दौरान भारत का जूट उद्योग भी बहुत विस्‍तार पाया । 1930 में दरभंगा महाराज कामेश्‍वर सिंह कालकाता के साथ साथ समस्तीपुर के मुक्‍तापुर में भी एक जूट मिल खोलें तो 1934 में कोलकाता के तीन कारोबारियों के साथ संयुक्‍त रूप से कटिहार जूट मिल की स्‍थापना की । रायबहादुर हरदत राय भी 1935 में कटिहार में जूट कारखाना लगाऍं । कटिहार और समस्‍तीपुर में मुख्‍य रूप से बोरा निर्माण होता था । हाल के दशक में कटिहार के दोनो मिल बंद हो चुके हैं, वैसे पूर्णिया में इस मिल की दो इकाई अभी भी चालू है, जिसमें से एकट में बोरा तो दुसरों में कपडा बनाने का काम हो रहा है ।


1930 में रामेश्वर जूट मिल से रखी गई थी आधारशिला


बिहार में जूट कारखाना का आधारशिला रखनेवाले दरभंगा महाराज कामेश्‍वर सिंह थे । 1930 में कामेश्‍वर सिंह विन्सम इंटरनेशनल लिमिटेड नाम की कंपनी के अंतर्गत कलकत्‍ता के साथ साथ समस्तीपुर जिला के मुक्तापुर में भी रामेश्वर जूट मिल की स्‍थापना की गई । तकरीबन 69 एक़ड जमीन पर स्थापित इस औद्योगिक इकाई में स्थापना काल में करीब 5 हजार मजदूर और 150 कर्मी कार्यरत थे । 4 सौ करघा की क्षमता वाले इस मिल में तीन सत्र में कर्मी कार्य का निष्पादन करते थे । उस काल खंड मे कोसी अंचल मजदूर और किसानों के लिए स्‍वर्णकाल कहलाता था । इस मिल के मजदूर अपने परिवार का भरण-पोषण कर खुशहाली के जिन्दगी जीते थे । मिल का कच्चा माल पूर्णिया, सुपौल, अररिया और किशनगंज समेत राज्‍य के अन्य जिलों के किसान उपलब्‍ध कराते थे । आज स्थिति ये चुकी है कि करीब सा़ढे नौ दशक पुराने मिल में कार्यरत मजदूर की संख्या जहॉं ढाई हजार तक पहुंचि‍ गया है वैसे कर्मी की संख्या सिर्फ सवा सौ के आस-पास है ।


कभी मांग पूरा करना था मुश्किल, आज पड़ा हुआ है माल 


रामेश्‍वर जूट मिल का इतिहास कहता है कि अपने सर्वाधिक उत्‍पादन के बावजूद एक समय था जब ये बाजार का मांग पूरा नहीं कर सकता था, वर्तमान में मिल प्रबंधन के लिए तैयार जूट का बोरा एक समस्या बन गया है । मिल सूत्र के अनुसार फिलहाल जूट मिल में करीब 12 से 13 करोड़ रूपया का तैयार बोरा गोदाम में प़डा है । बाजार में मांग नहि होने के कारण इसका बाजार नही है । मिल के एक पुराने कर्मी रामवतार सिंह कहते हैं कि एैसी स्थिति रातोराति नहीं हुई है । दरअसल 80 के दशक में सरकारी स्तर पर विदेशी कंपनी सब को लाभ पहुंचाने की नीति जूट मिल के लिए संकट को बढ़ा दिया है । आज सरकारी स्‍तर पर भी विदेशी कंपनी का प्लास्टिक बोरा ध़डल्ले से प्रयोग हो रहा है । जबकि जूट का बोरा गोदाम में पड़ा है । देखा जाए तो पिछले 30 साल में जुट के विकल्‍प के तरफ बाजार तेजी से बढ़ता गया और धीरे-धीरे भारतीय बाजार जूट से अपने को दूर करता गया । आज बेशक रामेश्‍वर जूट मिल में निर्मित बोरा की मांग नहीं के बराबर रह गया है, लेकिन रामेश्वर जूट मिल निर्मित बोरा का मांग पंजाब में सर्वाधिक हो रहा है । एसके अलावा हरियाणा, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य से भी भारी मात्रा में जूट के बोरे की मांग की जा रही है । मिल के प्रशासनिक प्रबंधक आरके सिंह का कहना है कि 2012 और 2014 में मिल को भारी आर्थिक क्षति हुई, जब मिल के गोदाम में आग लग गया और करोड़ों से ज्‍यादा की संपत्ती खाक हो गई । पिछला घटना को छोड़ दे तो भी 19 अप्रैल, 2014 में हुई दुर्घटना में मिल को करीब 7 से 8 करोड़ रूपये का नुकसान हुआ । कभी बिहार के पटुआ से किसान और मजदूर को सोने का भाव देने वाले रामेश्‍वर जूट मिल आज अपने अस्तित्व रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है । दो साल के अवधि में दो बड़े आपदा का सामना कर चुके कारखाना अपने पुराने तेबर में पुन: तैयार होने का हर संभव प्रयास कर रहा है । लेकिन प्राकृतिक आपदा के संग-संग सरकारी बेरुखी इसके विकास में बाधक बनल हुआ है ।


जूट नगरी था कटिहार


बिहार में तीन में से दो जूट मिल अकेले कटिहार में है । इस कारण से कभी कटिहार को जूट नगरी कहा जाता था । समस्‍तीपुर में 1930 में स्‍थापित हुए रामेश्‍वर जूट मिल के ठीक चार साल बाद 25 जून, 1934 को कलकत्‍ता के तीन कारोबारी क्रमश: बिनोद कुमार चमरिया, रामलाल जयपुरिया और विजय कुमार चमरिया ने संयुक्‍त रूप से कटिहार जूट मिल लि. की स्‍थापना की । इसके कारपोरेट आइडेंटिफिकेशन नंबर (CIN) –u17125wb1934pl007999 और पंजीयन संख्‍या 007999 था । इस कंपनी का कार्यालय 178, दुसरा तल्‍ला, महात्‍मा गांधी रोड, कोलकाता-07, प. बंगाल दर्ज है । 71.07 एकड में अवस्थित इस कारखाना का 30 मैट्रिक टन उत्‍पादन क्षमता था । इस जगह करीब 5 हजार लोगों को रोजगार मिलता था । इस कारखाना को खुलने के एक साल बाद 1935 में राय बहादुर हरदत राय भी कटिहार में एक जूट मिल की स्‍थापना की । जो आज राष्ट्रीय जूट विनिर्माण लिमिटेड का उपक्रम है । प्रति‍दिन 17 मैट्रि‍क टन उत्पादन करने वाले इस मिल में करीब 1 हजार लोगों को प्रत्‍यक्ष रोजगार मिलता था, जबकि करीब 50 हजार किसान इस मिल से सीधा जुड़ा हुआ था । कहा जाता है जो पाट से ठाठ दिखाने की परंपरा इसी ईलाके के किसान को इन्ही दोनों मिल का दिया हुआ था । मिल बंद हुआ तो पाट और ठाठ दोनो खतम हो गया । आज बेशक कटिहार का परिचय धूमिल हो गया हो, लेकिन कटिहार मिल के उत्‍पाद का पहचान समस्‍त भारत में था । बोरा के साथ साथ इस जगह का बना हुआ जूट के अन्‍य उत्‍पादों की मांग देश से विदश तक में होती थी । पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से भी भारी मात्रा में जूट के सामान की मांग की जाती थी । साथ ही नेपाल इसका एक बड़ा बाजार था ।


जिंदगी के आस में मर गया कारखाना


वैसे तो 1947 का विभाजन इस कारोबार को खासा प्रभावित किया, लेकिन बिहार में सत्‍तर से बदतर होती गई स्थिति । देखा जाय तो देश विभाजन के फलस्वरूप जूट उत्पादन का लगभग तीन चौथाई जूट क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान में चला गया, जबकि जूट मिल सब भारत के हुगली नदी के कछार में कच्‍चा माल के लिए तरसता रहा । पाकिस्तान और भारत में संबंध लगातार खराब होते गए, जिससे जुट का संबंध कभी जुड़ नही सका । बिहार के जूट उद्योग को कच्‍चा माल या बाजार की कभी कमी नही रही, लेकिन बंगाल में जूट का संकट बिहार के कारखाना को भी वाम आंदोलन का भेंट चढा दिया । बंगाल के वाम आंदोलन और देश के अराजक राजनीतिक हालात के कारण निजी प्रबंधन कोई ठोस निर्णय लेने में असमर्थ हो गया । कारखानों की हालत दिन ब दिन बदतर होती गेई । तथापि न्यूनतम मजदूरी, पेंशन, भविष्यनिधि‍, स्वास्थ्य सुविधा में कटौती के वामपंथी नेताओं के आरोप के बावजूद किसान-मजदूर मिल में उत्पादन बढ़ाने के लिए सक्रि‍य था । अंतत: वामपंथी दल के दबाव में आकर 1980 में सरकार ने एक महत्‍वपूर्ण कदम उठाया और राष्‍ट्रीय जूट वि‍निर्माण नि‍गम (एनजेएमसी) लि‍मि‍टेड की स्‍थापना की । छह जूट मिलों का राष्‍ट्रीयकरण कर दिया गया । इसमें कटि‍हार का राय बहादुर हरदत राय मि‍ल भी शामिल था । सन् 1935 में स्थापित इस कारखाना का 18-8-1978 को भारत सरकार के तरफ से अधिग्रिहित किया गया । 20-12-1980 को कारखाना का राष्ट्रीयकरण किया गया । पिछले 35 साल में सरकार कंपनी के पुनरुद्धार के लिए करोडो रूपये खर्च किए । पिछला दशक में भी 1562.98 करोड़ का पैकेज मंजूर हुआ और 6815.06 करोड़ के ऋण का बकाया और ब्‍याज माफ हुआ । इसके बावजूद छ: के छ: इकाई 6 से लेकर 9 साल से नहीं चल रही है । पुनर्बहाल पैकेज के तहत कटिहार मिल को चालू करबाना था, लेकिन संभव नहि हो सका है । उम्‍मीद है सरकार की इस नई नीति से मिल चालू हो सके, और अनुमान है कि इस मिल को चालू होने से बि‍हार में 5 हजार से ज्‍यादा लोगों को प्रत्‍यक्ष रोजगार मिलेगा । दस्‍तावेज के अनुसार 2004 से 2010 तक उत्पादन ठप (मिल बन्द) था । 2007 में कर्मचारी का स्वेच्छा सेवा निवृति (भी.आर.एस) और 2011 में अधिकारी का स्वेच्छा सेवा निवृति हुआ । 2010 में कारखाना पुनर्जिवित हुआ । 14-2-2011 को कॉन्ट्रेक्टर की बहाली और उत्पादन प्रारम्भ हुआ । लेकिन इस सबके बाद 6-7 जुलाई, 2013 को मध्य रात्रि‍ मे आरबीएचएम जूट मिल में तालाबंदी कर दी गई । मिल से जुड़े रामसेवक राय का कहना है कि पुराने मशीन और एनजेएमसी के मजदूर विरोधी नीति कारण स्थि‍ति बिगड़ता गया । मील के उत्पादन क्षमता में भारी गिरावट आई । जहॉं प्रति‍दिन 16-17 मैट्रि‍क टन उत्पादन होता था वह मुश्किल से 10 मैट्रि‍क टन हो गया । दुसरे तरफ वामपंथी यूनियन का हो हल्‍ला भी बढता गया । इसी दबाव के कारण यूनिट हेड डीके सिंह पत्नी के बीमारी का बहाना बनाकर बिना सूचनाके कटिहार से विदा हो गए । चार दिन के बाद मिल के प्रबंधक एसके विश्वास त्यागपत्र देकर चलते बने । लगभग एक महिने तक पूरा मिल श्रम अधिकारी नवीन कुमार सिंह और एक सुरक्षा प्रहरी द्वारा चलता रहा । अंतत: मशीन के मरम्मती और रंग-रौगन का बहाना बनाकर 6-7 जुलाई, 2013 को मध्य रात्रि‍ मे आरबीएचएम जूट मिल में तालाबंदी कर दी गई । ऐसा ही इतिहास कटिहार जूट मिल का भी है । कटिहार जूट मिल लि. को बिहार राज्‍य वि‍त्‍तीय निगम 13 सितंबर, 2001 में चलाने में असमर्थ होने पर गोविंद शारदे की कंपनी सनवायो मैन्‍यूफैक्‍चर प्रा. लि. को सौंप दिया । राज्‍य वित्‍तीय निगम के अधिनियम 1951 के तहत अंडर सेक्‍सन 29 और 30 के तहत सनवायो मैन्‍यूफैक्‍चर प्रा. लि. को कटिहार जूट मिल लि. के 77.07 एकड जमीन बेच दिया । कंपनी के प्रबंधनक श्‍याम सुंदर बेगानी का कहना है कि कंपनी मांग कम रहने के कारण घाटा मे चल रहल थी, जिस कारण 20 मार्च, 2013 को गोविंद शारदे ने अपने कटिहार जूट को मिल बंद करने का नोटिस लगा दिया । दुसरे तरफ कंपनी के गोदाम में भीषण अगलगी हुआ जिसमें हजार क्विटल के करीब जूट राख हो गया । इससे पूर्व भी इस जगह कुछ छोटे-मोटे अगलगी की घटना हुई थी । कुल मिलाकर मिल लेने वाले ने अपनी पूंजी बीमा और अन्‍य स्रोतों से निकालने का प्रयास किया, मिल चलाने में उनका प्रयास कम दिखाई दिया । इसका परिणाम ये हुआ कि एक तरफ कंपनी के गेट पर ताला लगा वहीं कंपनी के जमीन पर कब्‍जा का मामला थाना तक पहुंचि‍ चुका था । कारखाने से ज्‍यादा कारखाना के जमीन पर आज बहस हो रहा है ।


पाट के पटरी पर विदा हुए किसान


जो पटरी कभी पाट भेजने के लिए बिछाया गया था, वह पटरी पाट उपजाने वाले किसान और पाट से बोरा तैयार करनेवाले मजदूरों को देस से पलायन करने के लिए मजबुर कर चुका था । जूट उपजाने वाले हजार की संख्‍या में किसान और कामगार हरेक साल रोजगार के तलाश में पलायन करने लगे । सरकारी स्तर पर जूट उपजाने वाले को किस प्रकार का सहयोग दिया जा रहा है इसका अंदाजा महज जूट के न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य को देखकर लगाया जा सकता है । कभी ‘’हरा नोट’’ और ‘’गोल्डेन फाइबर’’ के नाम से विख्यात जूट 1984 में 1400 रूपया प्रति क्व‍िंटल था, जबकि 2014 में यानि 30 साल बाद सरकार ने इसका न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य महज 1150 रूपया प्रति क्व‍िंटल तय किया है । पिछले 30 साल में न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य का ऐसा अवमूल्यन अन्‍य किसी भी नकदी फसल मे संभवत: नहीं दिखाई देगा । जूट लगाने वाले किसान का दर्द इस से समझा जा सकता है । उल्‍लेखनीय है कि भारतीय जूट नि‍गम कपड़ा मंत्रालय के तहत एक सार्वजनि‍क उपक्रम है और ये कि‍सान के लिए कच्‍चे जूट का समर्थन मूल्‍य को लागू करने का काम करती है । ये स्थिति तब है जब कि‍सान के हि‍त में हरेक साल कच्‍चा जूट और मेस्‍टा के लिए न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य तय किया जाता है । वि‍भि‍न्‍न श्रेणी के मूल्‍य को तय करते समय नि‍म्‍न श्रेणी के जूट को हत्‍सोसाहि‍त किया जाता है और उच्‍च श्रेणी के जूट को प्रोत्‍साहन दिया जाता है, ताकि‍ कि‍सान उच्‍च श्रेणी के जूट के उत्‍पादन के लिए प्रेरि‍त हो ।


राष्‍ट्रीय जूट नीति‍-2005


ऐसा नहि है कि सरकारी अधिकारी के पास जूट पर कहने के लिए कुछ नही है । सरकारी दस्‍तावेज देखकर कतिपय ऐसा नही समझा जाएगा कि किसान का दर्द सरकार नहीं समझ पा रही है या सरकार को इसका भान नहीं है । सरकारी पदाधिकारी अपने स्तर पर बहुत कुछ नीति तैयार की है लेकिन बिचौलियों और भ्रष्टाचारी के जद में आकर ये योजना सब धरातल पर पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देती है । बदलते वैश्‍वि‍क परि‍दृश्‍य में प्राकृति‍क रेशा का वि‍कास, भारत में जूट उद्योग की कमी और खूबी, वि‍श्‍व बाजार में वि‍वि‍ध और नूतन जूट उत्‍पाद के बढ़ते मांग को ध्‍यान में रखकर सरकार अपना लक्ष्‍य और उद्देश्‍य को पुनर्परि‍‍भाषि‍त करने और जूट उद्योग को गति‍ प्रदान करने के लिए राष्‍ट्रीय जूट नीति‍-2005 की घोषणा की है ।


इस नीति‍ का मुख्‍य उद्देश्‍य सार्वजनि‍क और नि‍जी भागीदारी से जूट की खेती में अनुसंधान और वि‍कास गति‍वि‍धि में तेजी लाना था ताकि‍ जूट कि‍सान अच्‍छे प्रजाति के जूट का उत्‍पादन करें और उसका प्रति‍ हेक्‍टेयर उत्‍पादन बढ़े साथ ही साथ आकर्षक कीमत भी मिलें । लेकिन बिहार में यह नीति कागज से बाहर अभी तक देखने के लिए भी नहीं मिली है ।


कुछ ऐसा ही हाल जूट प्रौद्योगि‍की मि‍शन का भी है । सरकार जूट उद्योग के सर्वांगीण वि‍कास और जूट क्षेत्र के वृद्धि‍ के लिए ग्‍यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान पांच साल के लिए जूट प्रौद्योगि‍की मि‍शन की शुरूआत की । 355.5 करोड़ के इस मि‍शन में भी कृषि‍ अनुसंधान और बीज वि‍कास, कृषि‍ प्रवि‍धि‍, फसल कटाई और उसके बाद की तकनीकी, कच्‍चा जूट का प्राथमि‍क और द्वि‍तीयक प्रस्‍संकरण और वि‍वि‍ध उत्‍पाद वि‍कास और वि‍पणन -वि‍तरण से संबंधि‍त चार उपमि‍शन है । इस उपमि‍शन को कपड़ा और कृषि‍ मंत्रालय मि‍लकर लागू किए है, लेकिन बिहार के किसान के लिए यह एक सरकारी सपना से ज्‍यादा कुछ नही है । ऐसे ही जेपीएम अधि‍नि‍यम बिहार में कहॉं लागू हुआ पता नहि । जूट पैकेजिंग पदार्थ (पैकेजिंग जिंस मे अनि‍वार्य इस्‍तेमाल) अधि‍नि‍यम, 1987 (जेपीएम अधि‍नि‍यम) नौ मई, 1987 को प्रभाव में आया । इस अधि‍नि‍यम के तहत कच्‍चा जूट के उत्‍पादन , जूट पैकेजिंग पदार्थ और इसके उत्‍पादन में लगे लोगों के हि‍त में कुछ खास जिंस की आपूर्ति और वि‍तरण में जूट पैकेजिंग अनि‍वार्य बना दिया गया । एसएसी के सि‍फारि‍श के आधार पर सरकार जेपीएम, 1987 के अतंर्गत जूट वर्ष 2010-11 के लिए अनि‍वार्य पैकेजिंग के नि‍यम को तय किया गया, इसके बाद अनाज और चीनी के लिए अनि‍वार्य पैकेजिंग का शर्त तय किया गया । तदनुसार , जेपीएम अधि‍नि‍यम के अंतर्गत सरकारी गजट के तहत आदेश जारी किया गया जो 30 जून, 2011 तक वैध था । उसके बाद सरकार इस तरफ देखने के लिए समय नहीं निकाल पाई । बिहार में प्रौद्योगि‍की उन्‍नयन कोष योजना सेहो असफल रहल । इस योजना का उद्देश्‍य प्रौद्योगि‍की उन्‍नयन के माध्‍यम से कपड़ा / जूट उद्योग को प्रति‍स्‍पर्धी बनाना था और उसके प्रति‍स्‍पर्धात्‍मकता में सुधार लाना था साथ ही साथ उसको संपोषणीयता प्रदान करना छल । जूट उद्योग के आधुनि‍कीकरण के लिए सरकार 1999 से अब तक 722.29 करोड़ का नि‍वेश कर चुकी है । पॉलि‍थि‍न पर प्रतिबंध के बाद उम्मीद है कि जूट के दिन लौटेंगे लेकिन उदारीकरण के इस दौर में नियम को ताक पर राखकर सरकारी स्‍तर पर जूट की खरीद नहि होती है । ऐसे में जूट श्रमि‍क की कार्यस्‍थि‍ति‍ में सुधार का कोई सरकारी दावा झूठ के अलावा कुछ नहीं है । कहने के लिए सरकार जूट उद्योग के श्रमि‍कों के लाभ के लिए एक अप्रैल, 2010 को गैर योजना कोष के तहत कपड़ा मंत्रालय के अनुमोदन से नया योजना शुरु किए है । जूट क्षेत्र के श्रमि‍कों के लिए कल्‍याण योजना जूट मि‍ल और वि‍वि‍ध जूट उत्‍पादों के उत्‍पादन में लगे छोटे इकाइयों में कार्यरत श्रमिकों को संपूर्ण कल्याण और लाभ के लिए है । इसके अंतर्गत राजीव गांधी शि‍ल्‍पी स्‍वास्‍थ्‍य बीमा योजना के तर्ज पर इस क्षेत्र के श्रमि‍क को बीमा सुवि‍धा प्रदान किया जाना था । कहने के लिए राष्‍ट्रीय जूट बोर्ड इसको लागु किया । लेकिन लाभ किसको मिला इसकी सूची आज तक नहीं बन सकी है । कुल मिलाकर निवेशको के अभाव, सरकार की उपेक्षा और अलाभकारी फसल हो चुकि जूट के किसान अब इस फसल से मुंह मोड़ रहे हैं । अब तो ये बस किसान की जिद और देसी उपयोगिता के बल पर हमारे बीच ‘’गोल्डेन फाइबर’’ समझि‍ए ‘’गोल्डेन हिस्‍ट्री’’ जैसे है ।

साभार इसमाद ( मैथि‍ली क पहिल ईपेपर )


Wednesday, December 20, 2017

चेंज फॉर श्योर बहा रहा है परिवर्तन की हवा

सोनवर्षा राज । कहते हैं वो खुद ही पुरा करते हैं मंजिल आसमानों की, परिंदों को नहीं दी जाती तालीम उड़ानों की । ठीक इसी को चरितार्थ किया है सहरसा जिला के, सोनवर्षा राज के कुछ उत्‍साही युवाओं के समूह ने । विकास के लिए सरकार और प्रशासन के दरवाजों पर हाजि़री न बनाकर इन युवाओं ने गॉंवों की तकदीर और तकरीर बदलने का जिम्‍मा खुद अपने हिस्‍से लिया और ‘’चेंज फॉर श्‍योर’’ नाम से एक ऐसे संस्‍थान का गठन किया जो बिना कागज के ही कुछ वर्षों में ही सोनवर्षा राज में विकाश की एक नई इबारत लीख दी ।


जी हॉं हम बात कर रहे हैं, सहरसा जिले के एक छोटे से गाँव सोनवर्षा राज की जहाँ के कुछ उत्‍साही युवाओं की टोली गॉंव के विकाश के लिए अपने स्‍तर से प्रयासशील है । शहर के विकाश के लिए ये हमेशा अपने स्‍तर से प्रयासशील रहते हैं, फिर बात स्‍वच्‍छता की हो या स्‍वास्‍थय की, गरीबों के मदद की हो या समाजिक कार्यों की ये युवा हमेशा बढ़-चढ़कर हिस्‍सा लेते हैं । विगत कुछ वर्षो से इन युवाओं ने अपने स्‍तर से प्रयास कर समाज में परिवर्तन की जो हवा चलाई है वो काबिले तारिफ है । आलम ये है कि गाँव के इन युवाओं की सरहाना बड़े बुजुर्ग भी खुले मन से करने लगे है ।

‘’ संस्‍था के अध्‍यक्ष संतोष वर्मा कहते हैं कि युवाओं के कंधे पर ही देश का भविष्‍य टिका है, ये चाहे तो छोटे से गॉंव से शुरू हुआ ये कारवॉं पुरे देश में परिवर्तन की गंगा बहा देंगे।‘’


रक्‍त दान दे दिलाई पुरे जिले में पहचान
 
चेंज फॉर श्‍योर की सफलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है, सोनवर्षा जैसे छोटे से गॉंव में भी लोग अब खुलकर रक्‍तदान करने लगे हैं । चेंज फॉर के सदस्‍यों के प्रयास का ही यह नतीजा है कि गॉंव में हुए रक्‍तदान शि‍विर में सौ से ज्‍यादा युवाओं ने हिस्‍सा लिया, और हमेशा रक्‍त की कमी से जुझते लोगों के मदद के लिए खड़े रहते हैं । आलम ये है कि अब हमारे इस मुहिम की गुँज पटना तक जा रही है । दिन में कई कई कॉल खुन की उपलब्धता के लिए आने लगी है ।

‘’ संस्‍था के सचिव मनीष कुमार कहते हैं कि हम और हमारे सदसयों ने यह सपथ ली है कि खुन की कमी से इस इलाके में किसी को मरने नहीं देगें और हमारी ये कोशि‍श हमारे शरीर में खुन के आखि‍री कतरे तक जारी रहेगी’’

मनीष कुमार बताते है कि हमें प्रतिदिन सप्‍ताह तीन से चार कॉल आता है कि खुन की उपलब्धता के लिए, और हम हर संभव मदद के लिए तैयार भी रहते हैं । अगर डोनर उपलब्ध नहीं हो तो हमारी कोशि‍श रहती है कि हम डोनर कार्ड मरीज के परिजनों तक पहुँचा सके ताकि नजदीकी बल्‍ड बैंक से उन्‍हे खुन उपलब्‍ध हो सके । विगत कुछ महिनों में हमारी संस्था ने सौ से ज्‍यादा लोगों को रक्‍त उपलब्ध करवाया है । और इसके लिए हमारे युवा साथी हरवक्‍त तैयार रहते हैं फिर चाहे वो दिन हो या रात । कई बार तो ऐसा भी होता है कि हमारी संस्‍था ने ऐसे लोगों को रक्‍त उपलब्ध करवाया है जिनसे आज तक हमारी जान पहचान भी नहीं है या आज तक उनसे मिले भी नहीं है । मनीष कुमार बताते है कि रक्‍त ही एक एसी वस्‍तु है जिन्‍हे किसी भी मशीन द्वारा तैयार नहीं किया जा सकता है, यह हमारे और आपके ही दान से किसी का जिवन बचा सकता है । इसलिए यह जरूरी है हम नियमित रूप से रक्‍तदान करते रहें ताकि लोगों कि जिंदगी ससमय बचाया जा सके ।

गाँधी के सपनों को पुरा करेगा चेंज फॉर श्‍योर

चेंज फॉर श्‍योर के युवा साथी गाँधी के सपनो को पुरा करने में लगें । स्‍वच्‍छता की बात जब भी आती है हमारे युवा साथी झाड़ू उठाने के लिए हमेशा तत्‍पर रहते हैं । फिर बात गॉंधी जयंती हो अथवा छठ घाटों की सफाई, हमने हमेशा शासन और प्रशासन से एक कदम आगे बढ़कर समाज में सफाई का काम किया है । हर वर्ष छठ घाटों की सफाई का जिम्‍मा हमने बिना किसी मदद की अपने सदस्‍यों के द्वारा जमा किए गए चंदों से करते हैं । 
"संस्‍था के फडिंग के सवाल पर कोषाध्‍यक्ष अमित कुमार टिंकु बताते हैं कि हमें न तो सरकार से अपेक्षा है न ही प्रशासन से कोई उम्‍मीद । इस बाबत हमने अपने युवा साथि‍यों के साथ एक मिलकर सामज्‍सय बैठाया है । हरेक साथी अपने आय का कुछ प्रतिशत प्रति महिने संस्‍था में जमा करते है, जो भविष्‍य में हमारी कार्ययोजना को मजबूती प्रदान करता है ।"

परिवर्तन का संक्‍लप हमारा मूल उदेश्‍य है

संस्‍था का नाम अंग्रेजी में क्‍यो है इस सवाल पर प्रवक्‍ता सह सोशल मीडिया प्रभारी सुनील कुमार झा जी कहते है, दरअसल गॉंव आज तक मंडली और संस्‍थान जैसे नाम से उपर नहीं उठ पाया है । यह नाम एक बार कम से कम लोगों को अपने ओर आकर्षि‍त तो करती है, लोग रूककर एकबारगी पढ़ते हैं समझते है फिर आगे बढ़ते हैं । युवाओं के लिए http://facebook.com/changeforsure  नाम से एक पेज भी बनाया है जिसमें हमारी कार्ययोजना और हमारे द्वारा किए गए कार्य की रिपोर्ट देश-विदेश तक पहुँच पाती है ।  वैसे हमने इसका टैगलाईन ‘परिवर्तन के लिए दृढ़ संकल्‍पित’ दिया है । इसमे परिवर्तन का अर्थ है समाज की सोच को बदलना, फिर चाहे वो भौतिक हो, मानसिक हो, सामाजिक हो, या देश में फैले कुरीतियो का हो और हम अपने इस मुहिम में सफल होते भी दिख रहे हैं । लोगों की सोच में परिवर्तन हो रहा है, लोग जाग रहे है । ये हमारी सबसे बड़ी जीत है ।

हिम्‍मत से पतवार संभालो, फिर क्‍या दुर किनारा

संस्‍था के वरीष्‍ट सदस्‍य तपेश प्रसाद जायसवाल बताते है कि शुरू में हमे बहुत दिक्‍क्‍त आई । लोगों ने हमें दुत्‍कारा भला बुरा कहा । ऐसी-ऐसी बहुत सी संस्‍था आई और गई लेकिन हमारा कुछ भला नहीं कर पाई । तुम लोग भी ऐसे ही करोगे, जनता का पैसा लूटेगे आदि आदि कई बातें सुनने को मिली । लेकिन हम हार नहीं माने और अपने धुन में लगे रहें नतीजा आज वही लोग कंधे से कंधा मिलाकर हमारे साथ चल रहे हैं, हमारा साथ दे रहे हैं । आज हमारे पास 200 से ज्‍यादा सक्रि‍य सदस्‍य है ।


साथी हा‍थ बटॉना

समाजिक सहयोग पर समवेत स्‍वर में हमारे सदस्‍य आनंद वर्मा, समीर कुमार, गोविन्‍द कुमार, कुंदन कुमार, अमन कुमार, गोपाल चौधरी, अमित विश्‍वास, रमेश चौधरी, रंजीत गुप्‍ता, प्रो0 नवल सिंह, रूपेश सिंह, विप्‍लव कुमार, चिंटू सिंह, अखि‍लेस ठाकुर, शुभम भारती, कन्हैया राठौर, प्रीतम चौधरी आदि कहते हैं कि परिवर्तन तभी संभव है जब सबका साथ सबका हाथ मिलें । और यह सबका समवेत प्रयास ही है कि आज यह संस्‍था इस मुकाम पर है । हमारे युवा साथी हमारे हरेक कार्यों पर मिल-जुलकर अपना सहयोग दे रहे हैं ।

गॉंव में स्‍वच्‍छता के लिए निकालेंगे स्‍वचछता रथ

हमारी आगामी कार्ययोजना जिसपर कार्य चल रहा है वह है स्‍वच्‍छता रथ का । ये स्‍वचछता रथ रोज सुबह हरेक गली मोहल्‍ले से गुजरेगा और लोगों को कचड़ा प्रबंधन को लेकर जागरूक बनाएगा । दरअसल यह रथ डोर टू डोर कुड़ा उठाव और उसके निस्‍तारण के लिए चलेगा । साथ ही साथ यह लोगों को जागरूक भी करेगा ताकि लोगा अपने आस-पास गंदगी न फैलाए । अपने गॉंव से शुरू होकर यह रथ भविष्‍य में और गॉंवों को भी इससे जोड़ेगा ताकि ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों मे जागरूकता फैल सके ।

...और अंत मे

यह न कोई संस्‍था है न कोई सगंठन, चेंज फॉर श्‍योर एक सोच है जिसे हर एक के दिलों में जिंदा रखना हमारा लक्ष्‍य है । और जब देश के प्रति, समाज के प्रति, और इंसान के प्रति लोगों के सोच में परिवर्तन होगा तभी हम अपने लक्ष्‍य अपने मिशन में कामयाब हो पाऍंगे । 

Saturday, January 7, 2017

मैथि‍ली पत्रकारिता का इतिहास

मैथिली में पत्रकारिता का अपना गौरवशाली इतिहास है । हितसाधन से लेकर मिथि‍ला आवाज तक की अपनी विशेषता और विविधता रही है । लेकिन मैथि‍ली पत्रकारिता के इतिहास को संकलित करने का काम बहुत कह ही लोगों ने किया । पंडित चन्द्रनाथ मिश्र "अमर" की ‘’मैथिली पत्रकारिता का इतिहास” और डॉ यॊगानन्द झा की “ मैथिली पत्रकारिता के सौ वर्ष“ के साथ साथ विजय भाष्‍कर लिखि‍त ‘’बिहार मे पत्रकारिता का इतिहास’’ इस विषय में उल्लॆखनीय संदर्भ स्रॊत है । 

सबसे पहले 1905 में मैथि‍ली हितसाधन का प्रकाशन मासिक के रूप में जयपूर में हुआ । संभावनाओं के विपरीत विशाल मैथि‍ली आबादीवाले प्रदेश में इसकी नींव नहीं पड़ी, न ही शुरूआती प्रसार का कार्य यहाँ हुआ । अन्‍य स्‍थान पर ग्रहण कर पल्‍लवित और पुष्‍पि‍त होने के लिए ये बिहार जरूर आई । मैथि‍ली हितसाधन के संपादकीय बोर्ड के प्रमुख थे विद्यावाचस्‍पति मधुसूदन झा । पत्र‍िका ने उँचे आदर्श तय कर रखे थे । सामग्री में व्‍यापक विभिन्‍नता और साहित्‍यि‍क संपन्‍नता थी । फिर भी मैथि‍ली हितसाधन तीन साल से ज्‍यादा नहीं चल पाया । मैथि‍ली प्रकाशन की इस विफलता से पहले ही बनारस के मैथि‍ल विद्वानों का ध्‍यान अपनी ओर खींचा । यहाँ से मैथि‍ल विद्वानों ने 1906 में मिथलिामोद मासिक पत्र की शुरूआत की । इसके संपादक बने महामहोपाध्याय पंडित मुरलीधर झा और अनूप मिश्र एवं सीताराम झा । पंडित मुरलीधर झा ने तब एक समृद्ध पत्रि‍का की नींव रखी । इसकी टिप्‍पणि‍यो, आलोचनाओं, ‍विषय में व्‍यापक विभि‍न्‍नता और व्‍यंगात्‍मक शैली ने मैथि‍ली पाठकों का ध्‍यान बरबस आकृष्‍ट किया और पाठकों के बीच इसने अच्‍छी पैठ बना ली थी । लगभग 14 वर्षो तक निरंतर पंडित मुरलीधर झा इसका संपादन करते रहे । 1920 से 1927 तक इसका संपादन अनूप मिश्र और सीताराम झा ने किया । 1936 में पत्रि‍का को नया स्‍वरूप दिया गया और इसकी नई श्रंखला का संपादकीय दायित्‍व सौंपा गया उपेन्‍द्रनाथ झा को । नए स्‍वरूप में भी पत्रि‍का ने अपनी पुरानी अस्‍मिता कायम रखी । इस पत्रि‍का को टोन शुरू से अंत तक साहित्‍य‍िक ही रहा । 

1908 वह वर्ष है जब मिथि‍ला मिहिर ने प्रकाशन की दुनिया में दस्‍तक दी । बतौर मासिक शुरू हुई इस पत्रि‍का ने तीन वर्षों में अपना स्‍वरूप बदलकर साप्‍ताहिक कर लिया । 1911 से साप्‍ताहिक मिथि‍ला मिहिर का प्रकाशन शुरू हुआ हो गया । यह दरभंगा महाराज की मिल्‍कियत थी । पर 1912 तक आते-आते लगने लगा कि केवल मैथि‍ली भाषा की पत्रि‍का का चलना शायद मुश्‍कि‍ल हो । इसलिए पत्रि‍का को द्व‍िभाषी बनाकर इसमें हिंदी को भी शामिल कर लिया गया और मिथि‍ला मिहिर मैथि‍ली और हिंदी दोनों की पत्रि‍का हो गई । मिथि‍ला मिहिर के साथ किए गए निरंतर प्रयोगों से यह साफ जाहिर है कि प्रबंधकों का आत्‍मविश्‍वास डगमगाने लगा था और दो साल 1930-31 में इसमें अंग्रेजी मिलाकर इसे त्रिभाषी कर दिया गया । आजादी से पूर्व के इतिहास में दो ही पत्रि‍काएँ ऐसी मिलती है जो द्विभाषी से आगे त्रि‍भाषी अवधारणा लेकर सामने आई । इसके पूर्व राममोहन राय बंगाल में बंगदूत के साथ अभि‍नव प्रयोग कर चुके थे, जिसमें एक साथ अंग्रेजी, बँगला, फारसी और हिंदी के प्रयोग किए गए थे । पर 1930-31 के बाद मिथि‍ला मिहिर अपने द्व‍िभाषी स्‍वरूप में लौट आया और 1954 तक निर्बाध चलता रहा । बाद में यह एक और प्रयोग से गुजरा । 1960 में यह सचित्र साप्‍त‍ाहिक के रूप में सामने आया । बिहार की की पत्रकारिता के इतिहास में यह सबसे प्रयोगधर्मी पत्र साबित हुआ । इसके संपादकों में पंडित विष्‍णुकांत शास्‍त्री (1908-12), महामहोपाध्‍याय परमेश्‍वर झा, जगदीश प्रसाद, योगानंद कुमार (1911-19), जनार्दन झा ‘जनसीदान’ (1919-21), कपिलेश्‍वर झा शास्‍त्री (1922-35) और सुरेन्‍द्र झा सुमन (1935-54) शामिल थे । 1970 के दशक में इसके संपादन का जिम्‍मा सुधांशु शेखर चौधरी पर था । पत्रि‍का के कई संग्रहणीय विशेषांक निकले, जिनमें ‘मिथि‍लांक’ (अंक अगस्‍त 1935) मैथि‍ली पत्रकारिता के लिए एक अमुल्‍य योगदान माना जाता है । 

1920 के दशक में मैथि‍ली प्रकाशन के प्रयत्‍न बिहार के अलावा बाहर से भी होते रहे । इससे यह भी पता लगता है कि तब भी मिथि‍ला के लोग बाहर भी काफी संखया में फैले हुए थे । प्रकाशनों की अपेक्षा थी कि बाहर रहने के बावजूद अपनी माटी और बोली से एक समर्पण का भाव उनमें मौजूद होगा । इसी भावनात्‍मक लगाव की अभिव्‍यक्‍त‍ि 1920 में मथुरा से प्रकाशि‍त मिथि‍ला प्रभा में हुई, जिसे रामचंद्र मिश्र जैत ने निकाला । अक्‍तूबर 1929 में अजमेर से मैथि‍ल प्रभाकर का प्रकाशन शुरू हुआ । इन पत्रों का उद्देश्‍य समाज हित मे आवश्‍यक सूचनाओं का आदान-प्रदान करने के साथ मैथि‍ल समाज को अपनी जड़ों से जोड़े रखना था । पर मैथि‍ल लोगों के सरंक्षण के अभाव और उदासीनता ने दोनों पत्रों को असमय बंद होने पर मजबूर किया । मिथि‍ला-प्रभा अगस्‍त 1920 से दिसंबर 1924 तक चली और मैथि‍ल प्रभाकर अक्‍तूबर 1929 से दिसंबर 1930 तक । उत्‍साहजनक पाठकीय संरक्षण के अभाव के बावजूद तत्‍कालीन मैथि‍ल पत्रकारों ने हार नहीं मानी, बल्‍कि‍ उन्‍हें इस दिशा में और कोशि‍श करने के लिए प्रेरित ही किया । पर मैथि‍ली पत्रकारिता को अपेक्षाकृत समृद्ध और समर्थ मैथि‍ल समाज का वह स्‍नेह कभी नहीं मिला, जो अपेक्षि‍त था । बहुत साहस और स्‍वत: स्फूर्त प्रेरणा से मिथि‍ला के दो विद्वानों उदित नारायण लाल राय और नंदकिशोर लाल दास ने 1925 में श्री मैथि‍ली का प्रकाशन शुरू किया । उन्‍होंने तत्‍कालीन समय के हिसाब से लोकप्रिय शैली में पत्रि‍का निकाली और एक पेशेवर रंग-रूप देते हुए पूर्व के विपरीत गैर-साहित्‍यि‍क आलेख भी शामिल किए । पर पत्रि‍का केवल दो साल ही चल पाई । यह दौर ऐसा था जिसमें मैथि‍ली पत्रों के संपादक संभवत: यह तय नहीं कर पा रहे थे कि पत्रों का स्‍वरूप साहित्‍यि‍क रखा जाए या गैर साहित्‍यि‍क ? दोनों तरह की पत्रि‍काऍं पहले निकाली जा चुकी थीं और विफल रही थी । बावजूद इसके 1929 में पंडित कामेश्‍वर कुमार और भोला लाल दास ने 1924 में मिथि‍ला नाम की साहित्‍यि‍क पत्र‍िका का प्रकाशन शुरू किया और इसके शि‍ल्‍प में सामाजिक-सांस्‍कृतिक विषय भी शामिल किए । इसका प्रकाशन लहेरिया सराय, दरभंगा विद्यापति प्रेस से शुरू हुआ । इसके संपादकों ने अवैतनिक काम किया और मिथि‍ला ऐसा पत्र बना, जिसने समाज-सुधार को लक्ष्‍य कर कार्टून का प्रकाशन शुरू किया, पर सामाजिक- सांस्‍कृतिक और साहित्‍य‍िक स्‍वरूपवाली पत्रि‍का भी पाठकीय रुचि परिवर्तन करने में विफल रही और 1931 में इसे बंद कर देना पड़ा । 

बनैली के राजा कुमार कृष्‍णानंद सिंह ने अपने सद्प्रयास से मैथि‍लीं पत्रों को उबारने की एक कोशि‍श की । 1931 में उनके संरक्षण में मिथि‍ला मित्र का प्रकाशन शुरू हुआ, पर इसे उसी साल बंद करना पड़ा । कृष्‍णानंद सिंह ने हिंदी पत्रकारिता को संरक्षण देने में अच्‍छी भुमिका निभाई थी और विशेषांक निकालने के प्रति वे काफी गंभीर रहते थे । इसलिए उनके संरक्षण में निकली हिंदी पत्रि‍का गंगा का पुरातत्‍वांक विशेषांक हो या इस नई-नई मैथि‍ली पत्र‍िका का ‘जानकी-नवमी विशेषांक’, आज तक समृद्ध विरासत के रूप में संरक्षि‍त है । मिथि‍ला-मित्र को प्रकाशन के वर्ष 1931 में ही बंद करना पड़ा, पर पाठकों को यह एक संग्रहणीय विशेषांक दे गया । एक और महत्‍वपूर्ण कोशि‍श हुई बिहार के बाहर से । अजमेर से पंडित रधुनाथ 

प्रसाद मिश्र ‘पुरोहित’ ने मैथि‍ली बंधु की शुरूआत की । पंडित मिश्र ने इस पत्रि‍का का शि‍ल्‍प तय करने में पर्याप्‍त सावधानी बरती । इसके शि‍ल्‍प से ऐसा लगता है कि विफल रहे मैथि‍ल पत्रों का उन्‍होंने व्‍यापक अध्‍ययन किया और अपने हिसाब से कमियों को पूरा करने की कोशि‍श की । पत्रि‍का का फलक व्‍यापक कर इसके शि‍ल्‍प में समाज और संस्‍कृति‍ के अलावा साहित्‍य विषय तो रखे ही गए, इतिहास को भी इसमें शामिल करके पत्रि‍का को अनुसंधान की दृष्‍ट‍ि से महत्‍वपूर्ण बनाया गया । इस पत्रि‍का की स्‍वीकार्यता पहे के मुकाबले बढ़ी, जिससे इस बात को बल मिलता है कि गंभीर और अनुसंधानात्‍मक सामग्री में मैथि‍ली पाठकों ने अपेक्षाकृत ज्‍यादा रूचि ली । इसलिए पहले चरण में यह चार वर्ष (1939-1943) तक आबाध चली । बीच में इसका प्रकाशन दो वर्षों के लिए स्‍थगित करना पड़ा । 1945 में इसका प्रकाशन पुन: शुरू हुआ और दस वर्षों तक देशव्‍यापी मैथि‍ल समाज का प्रि‍य पत्र बना रहा । 

दुसरी ओर बिहार में मैथि‍ल पत्रों को लेकर कोशि‍श जारी रही । भुवनेश्‍वर सिंह भुवन ने 1937 में मुजफ्फरपुर से विभूति का प्रकाशन शुरू किया, जो महज एक साल चला । भोला दास ने 1937 में ही दरभंगा से भारती मासिक का प्रकाशन शुरू किया, जो कुछ ही समय चल पाया । 1938 में अजमेर से मैथि‍ली युवक का प्रकाशन शुरू हुआ, जो 1941 तक चला । आगरा से ब्रज मोहन झा ने जीवनप्रभा 1946 में शुरू की, जो 1950 तक चली । एक क्षणि‍क परिवर्तन पत्रि‍काओं के नामकरण में देखने में आया । पहले मैथि‍ल पहचान के लिए ‘मैथि‍ल’ या ‘मिथि‍ला’ शब्‍द पत्रि‍काओं के नाम के लिए आवश्‍यक समझे जाते थे । उस मिथक को इधर के प्रकाशनों ने विभूति और भारती निकालकर तोड़ने की कोशि‍श की । 

पटना में भी मैथि‍ली पत्रों को लेकर गतिविधि‍याँ बंद नहीं हुई थी । बाबू दुर्गापति सिंह ने संस्‍थापक-संपादक और लक्ष्‍मीपित सिंह ने बतौर प्रबंध-निदेशक के एक सुप्रबंधि‍त माहौल में मिथि‍ला-ज्‍योति का प्रकाशन शुरू किया, पर 1948 में शुरू हुई इस पत्रि‍का को सुप्रबंधन भी 1950 से आगे तक नहीं ले जा पाया । 

पंडित रामलाल झा ने 1937 में मैथि‍ली साहित्‍य पत्रि‍का की शुरूआत की । इस पत्रि‍का ने साहित्‍य समालोचना के क्षेत्र में एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्‍तुत किया । यह पत्रि‍का भी महज दो साल चल पाई । 

दरभंगा से प्रकाशि‍त मासिक वैदेही, कोलकाता से प्रकाशि‍त मासिक मिथि‍ला दर्शन, इलाहाबाद से प्रकाशि‍त मैथि‍ली बाल पत्रि‍का बटुक और मैथि‍ल समाचार पांडू, असम से प्रकाशि‍त संपर्क सुत्र और कानपुर से प्रकाशित मासिक मिथि‍ला दूत मैथि‍ली पत्रकारिता की अपवाद रहीं, जिन्‍होंने दो-तीन दशकों तक अपनी उपस्‍थि‍ती बनाए रखी । इनमें वैदैही का संपादन कृष्‍णकांत, अमर आदि ने ;किया । मिथि‍ला दर्शन के संपादन का दायि‍त्‍व डॉ.प्रबोध नारायण सिन्‍हा और डॉ. नचिकेता पर था । इसके अलावा ऐसे मैथि‍ली पत्रों की संख्‍या दर्जनाधिक थीं, जिन्‍होंने जितना हो सका, अपने पत्रकारिता दायित्‍व का निर्वाह किया । मैथि‍ली पत्राकारिता का इतिहास कम से कम –से-कम इनके उल्‍लेख की तो माँग करता है । इनमें दरभंगा से प्रकाशि‍त और सुरेन्‍द्र झा द्वारा संपादित स्‍वदेश 1948, निर्माण (साप्‍ताहिक) और इजोता (मासिक संपादन सुमन और शेखर) स्‍वेदश दैनिक (संपादक-सुमन), दरभंगा से ही प्रकाशि‍त साप्‍ताहिक जनक (संपादन –भोलानाथ मिश्र), यहीं से प्रकाशि‍त मासिक पल्‍लव (संपादक –गौरीनंदन सिंह), कोलकाता से प्रकाशि‍त साप्‍ताहिक सेवक ( संपादक –शुंभकात झा और हरिश्‍चंद्र मिश्र ‘मिथि‍लेंदू’), दरभंगा से प्रकाशि‍त त्रैमासिक परिषद पत्रि‍का (संपादक – सुमन और अमर), मासिक बाल पत्रि‍का धीया-पुता (संपादन-धीरेन्‍द्र), मासिक मैथिली परिजात (संपादक – रामनाथ मिश्र ‘मिहिर’), कोलकाता से प्रकाशि‍त त्रैमासिक कविता संकलन मैथि‍ली कविता ( संपादक – नचिकेता), मासिक (संपादक –कृति नारायण मिश्र और वीरेन्‍द्र मलिक ), दरभंगा से प्रकाशि‍त साप्‍ताहिक मिथि‍ला वाणी (संपादक –योगेन्‍द्र झा), गाजियाबाद से प्रकाशि‍त मैथि‍ली हिंदी द्व‍िभाषी पत्रिका प्रवासी मैथि‍ली ( संपादक –चिरंजी लाल झा) शामिल है । एक साहित्‍य‍िक डाइजेस्‍ट सोना माटी का प्रकाशन पटना से 1969 में शुरू किया गया । बिहार गजट ने मैथि‍ली पत्रों की असफलता का मुख्‍य कारण पाठकों का अभाव तो बताया ही है, साथ ही इस विरोधाभास पर आशर्च्य व्‍यक्‍त किया है कि उत्‍तरी बिहार और नेपाल की तराई की मैथि‍ली बहुल आबादी क्रय शक्‍त‍िसंपन्‍न शिक्षि‍त मैथि‍ल परिवारों के औधोगिक नगरों, मसलन राँची, धनबाद, जमशेदपुर, राउरकेल, मुंबई, वाराणसी और इलाहाबाद में अच्‍छी उपस्‍थि‍ति के बावजूद किसी मैथि‍ली पत्रि‍का ने स्‍थायित्‍व ग्रहण नहीं किया । दरअसल, मिथिला मिहिर के बंद होने के बाद नयी पीढी मैथिली में अखबार का पन्‍ना कैसा होता है, वो भूल चुकी थी । कोलकाता से प्रकाशि‍त मिथि‍ला समाद ने इस कमी को भरा और लोगों को फिर से मैथि‍ली में समाचार पढने का सुख मिला । फिर सौभाग्‍य मिथि‍ला आया जिसने पहली बार टेलिविजन मैथि‍ली समाचार से लोगों को अवगत किया । फिर मिथि‍ला आवाज का दौर आया । मिथि‍ला में हर्ष ध्वनी हुई । लोगों को पहली बार रंगीन मैथि‍ली अखबार पढ़ने का सुख मिला । लेकिन इसे मैथि‍लों की फूटी किस्‍मत ही कही जाय की अपने आरंभ से मात्र दूसरे वर्ष में इसने दम तोड़ दिया । मैथि‍ली पत्रकारिता का ये अंत था । लोगो को अब कागज पर मैथि‍ली अखबार पढ़ना सपने जैसा हो गया है । हलाँकि वेब मीडिया इसमें कुछ हद तक सफल हो पायी है लेकिन कागज पर अखबार पढ़ने का सुख तीन करोड़ मैथि‍लों को कब तक मिलेगा ये कहना मुश्‍कि‍ल है । 

मैथिली मे वेब पत्रकारिता 

भारत के लगभग समस्त भाषा मे अखबार, पत्रिका के संग संग उसका ऑनलाइन वर्जन भी बाहर आया है । लेकिन मैथिली में वेब पत्रकारिता अभी भी शैशवाकाल में है । मैथिली में दैनिक पत्र के साथ साथ वेब पत्रिका कि‍ वर्तमान स्थिति अति दयनीय एवं चिन्तनीय है । अखबारी रिपोर्ट के अनुसार विश्वमे लगभग तीन करोड़ मैथिली भाषी है । स्वभाविक रुप से इसके पाठक वर्ग की संख्या अधिक होगी । लेकिन स्थिति दुखद है ! विपुल साहित्य भंडार से हम सब गौरवान्वित होते है । प्रतिभाशाली युवा मैथिल हरेक सेक्टर मे अपनी प्रतिभा का लॊहा मना रहा है । उसके बाद भी सूचना प्रौद्योगिकी के इस युगमे मैथिली मे अखबारी प्रकाशन की समस्या यथावत बनी हुई है । पत्र पत्रिका की कमी हमेशा खटक रही है । मि‍थि‍ला समाद और मिथि‍ला आवाज का ऑनलाइन संस्करण का स्थायी स्थगन भी मैथिली वेब पत्रकारिता के इतिहास में बहुत बड़ी छति थी ।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि मैथि‍ली में साहित्‍यि‍क पत्र पत्रि‍का की भरमार रही है । लेकिन ऑनलाइन पत्रकारिता के क्षेत्र में हम अन्‍य भाषाओं की अपेक्षा काफी पीछे छुट गए है । वेब पत्रकारिता की स्थिति और उपस्थिति ना के ही बराबर है । कुछ जोशि‍लो युवा है जो अपनी तकनीनकी और पत्रकारिय ज्ञान को लेकर इंटरनेट पर सक्रि‍य है । मिथि‍ला से लेकर कोलकाता और दिल्‍ली मुंबई के मैथि‍ल इस कार्य मे लगे हैं । मिथिला मैथिली से संबंधित समस्त राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक, आर्थिक मुद्दों की बात इन्टरनेट पर ब्लॉगिंग के माध्यम से सामने ला रहे हैं । इतना ही नहि, किछु मिथिला-मैथिली प्रेमी मैथिलीमे न्यूज पॊर्टल भी चला रहे हैं । ऐसे न्यूज पोर्टलों में ई-समाद, मिथिमीडिया, प्राईम न्यूज, मिथि‍ला जिंदाबाद, मिथिला मिरर,ऑनलाईन मिथि‍ला और नव मिथिला कुछ उल्लेखनीय नाम है ।



प्रारंभिक मैथिल ब्लॉगर ई-समाद, मिथिमीडिया, मिथिला मिरर, मिथिला प्राइम, नव मिथिला आदि मैथिली न्यूज पोर्टलों की गतिविधि, इसके उद्देश्य और उपलब्धी की विवेचना के उपरान्त ये बात स्पष्ट है कि इन्टरनेट पर मिथिला में वेब आधारित पत्रकारिता का उज्जवल भविष्य आने वाला है । जिस तरह से युवा वर्ग मैथि‍ली ब्‍लॉगिंग की और आकर्षीत हो रहे हैं इसमें कोई दो राय नहीं है कि आने वाला समय मैथि‍ली वेब पत्रकारिता का स्‍वर्णि‍म युग लाएगा ।

Sunday, December 28, 2014

लिखने से ज्यादा मिटाया गया बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का इतिहास













जितने समृद्ध इतिहास के लिए भारत अपने आपमें जाना जाता है उससे कहीं ज्यादा इस बात के लिए जाना जाता है कि यहाँ के इतिहास को हमेशा तोड़ मरोड़ कर पेश किया जाता रहा है । ऐसा ही कुछ हुआ है बनारस हिंदू वि‍श्व‍वि‍द्यालय के इतिहास के साथ भी । बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के संबंध में जो मान्य इतिहास है उसमें इस बात की कहीं चर्चा नहीं है कि इसकी स्थापना कैसे हुई और उसके लिए क्या-क्या पापड़ बेलने पड़े । बनारस हिन्दू वि‍श्व‍वि‍द्यालय की गलियों से लेकर संसद के सैंट्रल हॉल तक में लगी मालवीय जी की मूर्ति बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक के रूप में दिख जाएगी लेकिन इस आंदोलन के नेतृत्वकर्ता बिहार के सपूत दरभंगा के महाराजा रामेश्वर सिंह का जिक्र तक नहीं मिलेगा जिनके बिना इस हिन्दू वि‍श्व‍वि‍द्यालय की कल्पना तक नहीं की जा सकती है । बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की इतिहास पर लिखी गई एकमात्र किताब जो स्थापना के कई वर्षों बाद 1936 में छपी थी और इसे संपादित किया था बनारस हिन्दू विश्वविद्याल के तत्कालीन कोर्ट एंड कॉउसिल (सीनेट) के सदस्य वी सुन्दरम् ने । सुन्दरम की इस किताब को पढ़कर यही कहा जा सकता है कि उन्होंने जितना बीएचयू का इतिहास लिखा है उससे कहीं ज्यादा इस किताब में उन्होंने बीएचयू के इतिहास को छुपाया या मिटाया है । यह बात साबित होती है बीएचयू से संबंधि‍त दस्तावेज से । बीएचयू के दस्तावेजों की खोज करने वाले तेजकर झा के अनुसार बीएचयू की स्थापना के लिए चलाये गये आंदोलन का नेतृत्व पंडित मालवीय ने नहीं बल्कि‍ दरभंगा के महाराजा रामेश्वर सिंह के हाथों में था । जिसका जिक्र बीएचयू के वर्तमान लिखि‍त इतिहास में कहीं नहीं मिलता है । बीएचयू के वर्तमान लिखि‍त इतिहास के संबंध में श्री झा बताते हैं कि वी सुन्दरम् उस समय बनारस हिन्दू वि‍श्व‍वि‍द्यालय के कोर्ट एंड कॉउसिल के सदस्य थे और उस समय के कुलपति पंडित मदन मोहन मालविय जी के अनुरोध पर जो चाहते थे कि बनारस हिन्दू विश्चविद्यालय का एक ‍अधि‍कारीक इतिहास लिखा जाना चाहिये के कारण इस किताब को संपादित करने का जिम्मा लिया । और अंतत: यह किताब ‘’बनारस हिन्दू युनिवर्सि‍टी 1905-1935’’ रामेश्चर पाठक के द्वारा तारा प्र‍िटिंग वर्क्स, बनारस से मुद्र‍ित हुआ ।
यह पुस्तक बिकानेर के महाराजा गंगा सिंह जी के उस वक्तव्य को प्रमुखता से दिखाती है जब उन्होनें पहली बार मदन मोहन मालविय को इस वि‍श्व‍वि‍द्यालय के संस्थापक के रूप में सम्मान दिया था । यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि बिकानेर के महाराजा का इन सब परिदृष्य में पदार्पण 1914-15 में हुआ था ज‍बकि वि‍श्व‍वि‍द्यालय की परिकल्पना और प्रारूप 1905 से ही शुरू हो गयी थी । पुस्तक के पहले पन्ने पर लॉर्ड हॉर्डिग के उस भाषण का अंश दिया गया है जिसमे वो वि‍श्व‍वि‍द्यालय की नींव का पत्थर रखने आये थे । लेकिन उनकी पंक्त‍ियों में कहीं भी किसी व्यक्त‍ि का नाम नहीं लिया गया है । चौथे पैराग्राफ में उस बात की चर्चा की गई थी कि नींव के पत्थर के नीचे एक कांस्य पत्र में देवी सरस्वती की अराधना करते हुए कुछ संस्कृत के श्लोक लिखे गये थे । पांचवे  पैराग्राफ में लिखा गया था कि "The prime instrument of the Divine Will in this work was the Malaviya Brahmana, Madana Mohana, lover of his motherland. Unto him the Lord gave the gift of speech, and awakened India with his voice, and induced the leaders and the rulers of the people unto this end.” और इसलिए ये प्रसिद्ध हो गया कि मालवीय जी ही इस वि‍श्व‍वि‍द्यालय के एकमात्र संस्थापक हैं ।
किताब के छट्ठे पैराग्राफ में संस्कृत में मालवीय जी ने बिकानेर के महाराजा गंगा सिंह जी, दरभंगा के महा‍राजाधि‍राज रामेश्वर सिंह जी के साथ कॉंउसलर सुंदर लाल, कोषाध्यक्ष गुरू दास, रास विहारी, आदित्या राम और ले‍डी वसंती की चर्चा की है । साथ ही युवा वर्गों के कार्यों और अन्य भगवद् भक्तों का जिक्र किया है जिन्होनें कई प्रकार से इस विश्वविद्यालय के निर्माण में सहयोग दिया । इस पैराग्राफ में रामेश्वर सिंह के नाम को अन्य भगवद् भक्तों के साथ कोष्टक में रखा था जिन्हाने सिर्फ किसी तरह से मदद की थी । ऐनी बेसेंट का जिक्र इस अध्याय में करना उन्होंने जरूरी नहीं समझा ।
जबकि 1911 में छपे हिन्दू विश्वविद्याल के दर्शनिका के पेज 72 में लेखक ने इस विश्वविद्यालय के पहले ट्रस्टी की जो लिस्ट छापी है उसमे उपर से दंरभगा के महाराज रामेश्वर सिंह, कॉसिम बजार के महाराजाश्री एन सुब्बा रॉव मद्रास, श्री वी. पी. माधव राव बैंगलौर, श्री विट्ठलदास दामोदर ठाकरे  बॉम्बे, श्री हरचन्द्र राय विशि‍नदास कराची, श्री आर. एन. माधोलकर अमरोठी, राय बहादूर लाला लालचंद लाहौर, राय बहादूर हरिश्चन्द्र मुल्तान, श्री राम शरण दास लाहौर, माधो लाल बनारस, बाबू मोती चंद और बाबू गोविन्द दास बनारसराजा राम पाल सिंह राय बरेली, बाबू गंगा प्रसाद वर्मा लखनउ, सुरज बख्श सिंह सीतापुरश्री बी. सुखबीर मुजफ्फरपुर, महामहोपाध्याय पंडित आदित्या राम भट्टाचार्य इलाहाबाद, डॉ सतीश चन्द्र बैनर्जी इलाहाबाद, डॉ तेज बहादूर सापरू इलाहाबाद और पंडित मदन मोहन मालविय इलाहाबाद  का नाम लिखा गया था ।
अध्याय तीन जो पेज नंबर 80 से शुरू होता में इस बात की चर्चा कही नहीं की गई है कि किस प्रकार ऐनी बेसेंट ने बनारस में अपने केन्द्रीय हिन्दू महाविद्यालय को द यूनीवर्सिटी ऑफ इंडियामें तब्दील करने की योजना बनाई । ना ही एक भी शब्द में उस ‘’शारदा विश्वविद्यालय’’ का जिक्र किया जिसका सपना महाराजा रामेश्वर सिंह ने भारत के हिन्दू विश्वविद्याय के रूप में देखा था और जिसको लेकर उन्होंने पुरे भारत वर्ष में बैठकें भी की थी । इस पुस्तक में सिर्फ इस बात की चर्चा हुई की किस प्रकार अप्रैल 1911 में पंडित मालवीय जी, श्रीमती ऐनी बैसेंट जी से इलाहाबाद में मिले थी और प्रस्तावों पर सहमती के बाद किस प्रकार डील फाइनल हुई थी । ( इस पुस्तक में ना तो बैठकों की विस्तृत जानकारी दी गई है ना ही समझौते के बिन्दूओ को रखा गया है) उसके बाद वो महाराजा रामेश्वर सिंह से मिले और तीनो ने मिलकर धार्मिक शहर बनारस में एक विश्वविद्यालय खोलने का फैसला किया । पृष्ठ संख्या 80-81 पर साफ लिखा गया है कि यह कभी संभव नहीं हो पाता कि तीन लोग एक ही जगह, एक ही समय तीन यूनीवर्सीटी खोल पाते और उनको सही तरीके से संचालित कर पाते लेकिन लेखक ने उस जगह ये बिल्कुल भी जिक्र नहीं किया की उन तीनों की आर्थ‍िक, राजनैतिक, सामाजिक और उस समय के सरकार में पहुंच कितनी थी । खैर...
प्राप्त दस्तावेज से पता चलता है कि तीनों के बीच सहमति के बाद महाराजाधि‍राज दरभंगा की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन कर लिया गया और तत्कालीन वॉयसराय और शि‍क्षा सचिव को पत्राचार द्वारा सूचित कर दिया गया गया । महाराजधि‍राज ने अपने पहले पत्र जो 10 अक्टूबर 1911 को अपने शि‍मला स्थ‍ित आवास से शि‍क्षा सचिव श्री हरकॉर्ट बटलर को लिखे थे में लिखा था -  भारत के हिन्दू समुदाय चाहते हैं कि एक उनका एक अपना विश्चविद्यालय खोला जाय । बटलर ने प्रतिउत्तर में 12 अक्टूबर 1911 को महाराजा रामेश्वर सिंह को इस काम के लिए शुभकमानाएं दी और प्रस्तावना कैसे तैयार की जाए इसके लिए कुछ नुस्खे भी दिये (पेज 83-85) । इस पुस्तक के पेज संख्या 86 पर लिखा गया है कि इस विश्वविद्यालय को पहला दान महाराजाधि‍राज ने ही 5 लाख रूपये के तौर पर दिया । उसके साथ खजूरगॉव के राणा सर शि‍वराज सिंह बहादूर ने भी एक लाख 25 हजार रूपये दान दिये थे ।
22 अक्टूबर 1911 को महाराजा रामेश्वर सिंह, श्रीमती एनी बेसेंट, पंडित मदन मोहन मालवीय और कुछ खास लोगों ने इलाहाबाद में एक बैठक की जिसमें ये तय किया गया कि इस विश्वविद्यालय का नाम ‘’हिन्दू विश्चविद्यालय’’ रखा जाएगा । यह दस्तावेज इस बात का भी सबूत है कि मदन मोहन मालवीय जी ने अकेले इस विश्वविद्यालय का नाम नही रखा था ।
28 अक्टूबर 1911 को इलाहाबाद के दरभंगा किले में माहाराजा रामेश्वर सिंह की अध्यक्षता में एक बैठक का आयोजन हुआ जिसमें इस प्रस्तावित विश्वविद्यालय के संविधान के बारे में एक खाका खीचा गया ( पेज संख्या 87) । पेज संख्या 90 पर इस किताब ने मैनेजमेंट कमीटी की पहली लिस्ट दिखाई है जिसमें महाराजा रामेश्वर सिंह को अध्यक्ष के तौर पर दिखाया गया है और 58 लोगों की सूची में पंडित मदन मोहन मालवीय जा का स्थान 55वां रखा गया है ।
इस किताब में प्रारंभि‍क स्तर के कुछ पत्रों को भी दिखाया गया है जिसमें दाताओं की लिस्ट, रजवाड़ों के धन्यवाद पत्र, और साथ ही विश्वविद्यालय के पहले कुलपति सर सुंदर लाल के उस भाषण को रखा गया है जिसमें उन्होंने पहले दीक्षांत समारोह को संबोधि‍त किया है ।  अपने संभाषण में श्री सुंदर जी ने महाराजा रामेश्वर सिंह, श्रीमती एनी बेसेंट और पंडित मदन मोहन मालवीय जी के अतुलित योगदान को सराहा है जिसके बदौलत इस विश्वविद्यालय का निर्माण हुआ । यहाँ गौर करने वाली बात ये भी है कि अपने संभाषण में उन्होंने कभी भी पंडित मदन मोहन मालवीय जी को संस्थापक के रूप में संबोधि‍त नही किया है ( पेज 296)। इस किताब के दसवें अध्याय में पंडित मदन मोहन मालवीय जी के उस संबोधन को विस्तार से रखा गया है जिसमें उन्होंने दिक्षांत समाहरोह को संबोधि‍त किया था । यह संबोधन इस मायने में भी गौरतलब है कि इस पूरे भाषण में उन्होंने एक भी बार महाराजा रामेश्वर सिंह, श्रीमती ऐनी बेसेंट, सर सुंदर लाल आदि‍ की नाम बिल्कुल भी नहीं लिया । उन्होंने सिर्फ लॉर्ड हॉर्डिग, सर हरकॉर्ट बटलर और सभी रजवाड़ो के सहयोग के लिए उन्हें धन्यवाद दिया ।
आज भारत के विभि‍न्न पुस्तकालयों, आर्काइव्स और में 1905 से लेकर 1915 तक के बीएचयू के इतिहास और मीटींग्स रिपोर्ट को खंगालने से यह पता चलता है कि जो भी पत्राचार चाहे वो वित्तीय रिपोर्ट, डोनेशन लिस्ट, शि‍क्षा सचिव और वायसराय के साथ पत्राचार, रजवाड़ाओं को दान के लिए पत्राचार हो यो अखबार की रिपोर्ट हो या नि‍जी पत्र आदि ऐसे तमाम दस्तावेज है जिसमें ना ही पंडित मदन मोहन मालवीय जी को इसके संस्थापक के रूप में लिखा गया है ना ही कोई भी पत्र सीधे तौर पर उन्हे लिखा गया है । पत्राचार के कुछ अंश जो इसमाद के पास है उससे साफ साबित होता है कि सभी पत्राचार महाराजा रामेश्वर सिंह जी को संबोधि‍त कर लिखे गये हैं । ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि बीएचयू के लिखि‍त इतिहास में जहां रामेश्वर सिंह को महज एक दानदाता के रूप में उल्लेखि‍त किया गया है और तमाम दानदाताओं की सूची के बीच रखा गया है । ऐसे व्यक्त‍ि‍ को इन तमाम दस्तावेजो में बीएचयू के आंदोलन के नेतृत्वकर्ता या फिर बीएचयू के आधि‍कारीक हस्ताक्षर के रूप में  संबोधन कैसे किया गया है । किसी संस्थान के महज दानकर्ता होने के कारण किसी व्यक्त‍ि के साथ ना तो ऐसे पत्राचार संभव है और न हीं ऐसा संबोधन संभव है । अगर इस आंदोलन के नेतृत्वकर्ता कोई और थे तो पत्राचार उनके नाम से भी होने चाहिये थे । वैसे ही अगर दानकर्ताओं के लिए यह एक संबोधन था तो ऐसे संबोधन अन्य दानदाताओं के लिए भी होने चाहिये थे । लेकिन ऐसे कोई दस्तावेज ना तो बीएचयू के पास उपलब्ध है और ना ही किसी निजी संग्रहकर्ता के पास । ऐसे में सवाल उठता है कि क्या रामेश्वर सिंह महज एक दानदाता थे या फिर उन्हें दानदाता तक सिमित करने का कोई सूनियोजित प्रयास किया गया ।

तमाम दस्तावेजों को ध्यान रखते हुए यह कहा जा सकता है कि बीएचयू का वर्तमान इतिहास उसका संपूर्ण इतिहास नहीं है और उसे फिर से लिखने की आवश्यकता है । अपने सौ साल के शैक्षणि‍क यात्रा के दौराण बीएचयू ने कभी अपने इतिहास को खंगालने की कोशि‍श नहीं की । 2016 में बीएचयू की 100वीं वर्षगांठ मनाया जायेगा । ऐसे में बीएचयू के इस अधूरे इतिहास को पूरा करने की जरूरत है । 

Wednesday, May 21, 2014

गुजरात एक सच

गुजरात के विकास को एप्को के चश्में से देखने वालों के लिए एक छोटा सा प्रयास । बहुत से ऐसे लोग है जिसको गुजरात देश में सबसे ज्यादा विकसि‍त राज्य लगता है । दरअसल और एप्को और मीडिया जो दिखाना चाहती है हम वही देख पाते हैं । गुजरात मॉडल को देश में लागू करने से पहले गुजरात के विकास के आंकड़े पर डालते है एक नज़र ।

विकास का पोल
आर बी आई के ताजा आकड़े के मुताबिक गुजरात का हिस्सा देश के कुल एफडीआई में मात्र 2.38 प्रतिशत है । 2000 से 2011 तक गुजरात को सात हज़ार दौ सौ करोड़ का विदेशी निवेश मिला जबकी वहीं महाराष्ट्रा को पैंतालिस हजार आठ सौ करोड़ डॉलर मिला । यानी गुजरात के मुकाबले छ: गुणा ज्यादा । तथ्यात्मक आंकड़े बताते है कि मोदी के मुख्यमंत्र‍ित्व काल में 8300 एमओयू को साईन कराने के लिए गुजरात सरकार ने एक अमेरिकन फर्म जिसका नाम- एप्को वर्ल्ड वाईड है, को रखा करोड़ो रूपये की फीस देकर । ओर यही एपको वर्ल्ड वाईड का काम मोदी के लार्जर देन लाईफ पोलिटिशि‍यन बनाना है । इनके पीआर का काम भी यही देखता है । यह बात इनके बेवसाईट पर भी देख सकते हैं । हमेशा ग्रोथ रेट की बात करने वालें मोदी के गुजरात से आगे और भी कई राज्य है । सिक्क‍िम – 1995 से 2002 तक 6.30 था जोकि 2004 से 2012 में 12.62 प्रतिशत हो गया यानी ग्रोथरेट में 100 प्रतिशत की बढ़ोतरी । उत्तराखंड 1995 से 2002 तक 4.61 था जोकि 2004 से 2012 में 12.37 प्रतिशत हो गया यानी ग्रोथरेट में 168 प्रतिशत की बढ़ोतरी । और गुजरात 1995 से 2002 में 6.48 था जोकि 2004 से 2012 में 10.68 प्रतिशत यानी ग्रोथ रेट में मात्र 56 प्रतिशत की बढ़ोतरी जबकि सिक्क‍िम, उत्तराखंड, महाराष्ट्रा, हरियाणा जैसे राज्य काफी आगे निकल गए । मेादी के गुजरात में 60000 से ज्यादा लघु उद्योग बंद हो गए हैं । केंद्रीय सांख्य‍िकी कार्यालय के एनुअल सर्वे बताता है कि महाराष्ट्रा और आंध्रा में ज्यादा फैक्टरी और ज्यादा नौकरियां है । कहा जाता है कि गुजरात विकास क मॉडल इंडस्ट्रीयल विकास पर आधारित है और वहां उद्योग का ये हाल है ।
Source : Director, Department of Economics and Statistics, Government of Gujarat.2011-12), Director, Department of Economics and Statistics, Government of Gujarat. & Report by reserve bank of India.2011-12, TIMES NEWS NETWORK, 25th Jan 2013), UNDP human development report to UN-2011-12, National Sample Survey,

गुजरात में रोजगार
नेशनल सेंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन का डाटा बताता है कि पिछले 12 सालों में गुजरात में रोजगार का विकास दर घट कर शून्य हो गया है । ग्रामीण गुजरात की तो और बुरी हालत है । ग्रामीण किसान तत्कालिक पैसे के लोभ में पड़कर अपनी जमीन बेच देते हैं और बहुत जल्द वे किसान से बेरोजगार की श्रेणी में आ जाते हैं ।

मोदी ये दावा करते हैं कि 2009 में 25 लाख रोजगार पैदा किये गए । जबकि प्लानिंग कमीशन का इंप्लॉयमेंट रिपोर्ट का पेज नं० 126 कहता है कि प्रमुख सेक्टरों में इंप्लाय लोगों की संख्या जो 2004-05 में 25.3 मिलियन था वह 2009-10 में घटकर 24.0 रह गया है । हाल ही में 1500 सरकारी नौकरी के लिए 13 लाख लोगों ने अप्लाई किया है और मोदी कहते है गजरात में बेरोजगारी की समस्या समाप्त हो गयी है । मोदी कहते हैं कि गुजरात में बेरोजगारी की समस्या समाप्त हो गयी है । जबकि गुजरात मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी देने के मामले में भी देश के अन्य राज्यों से 14 पायदान नीचे है । मनरेगा को अगर छोड़ दें तो नेशनल सेंपल सर्वे ऑर्गनाईजेशन NSSO के 2011 के रिपोर्ट के मूताबिक शहरों में दिहारी पर काम करने वाले मजदूरों की मजदूरी गुजरात में 106-115 रूपये है जबकि केरला में 218रू है । और देहात में दिहारी मजदूर की मजदूरी गुजरात में 83रू है जबकि पंजाब में 152रू । गुजरात वेतन देने के मामले में भी अन्य राज्यों के मुकाबलें 12वें पायदान पर है । NSSO के ताजा आंकड़े के मुताबिक गुजरात में वेतन/सैलरी पाने वाले लोगों का औसतन एक दिन की कमाई 311रू है जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 411रू है ।
Source : RTI filed by Vinod Pandya GOG reply to RTI, 2011-12, Planning Commission Report-2012-13, Report by NASSO on poverty 2012-13, CAG Report 2011-12

गुजरात में कृषि‍
मोदीजी का दावा है कि पिछले दस सालों में गुजरात का कृषि‍ विकास दर देश के सभी राज्यों में उत्तम रह है । जबकि असलियत यह है कि प्लानिंग कमीशन का स्टेटवाईज कृषि‍ सेक्टर का विकास आंकड़ा देखते हैं तो पता चलता है कि 2005 से 2012 के बीच में गुजरात का कृषी क्षेत्र में विकास 6.47 प्रतिशत रहा जबकि बिहार का 15.17 प्रतिशत, पांडिचेरी का 9.95 प्रतिशत, झारखंड का 7.99 प्रतिशत, महाराष्ट्रा का 7.74 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ का 7.29 प्रतिशत के दर से विकास हुआ । साफ है कि कृषि‍ के मामले में भी गुजरात छठे पायदान पर है । गुजरात में फर्टिलाईजर पर भी 5 प्रतिशत का वैट लगता है जो कि भारत में सबसे ज्यादा है । मार्च 2011 से 455885 किसानों का कृषि‍ के लिए बिजली की कनेक्शन का आवेदन लंबित है ।
Source : Gujarat economics and statistics department, govt.of Gujarat And Times Of India http://timesofindia.indiatimes.com/city/ahmedabad/Gujarat ranked-8th-in-agricultural-growth Centre/articleshow/20040305.cms?intenttarget=novia @Archive Digger, Ministry of agriculture, Gujarat,2010-11-12)

गुजरात में शि‍क्षा की दशा
एजुकेशन डेवलपमेंट इंडेक्स 2012-13 के अनुसार देश के कुल देश के कुल 35 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में में 29वें स्थान पर आता है । वैसे अगर ओवर ऑल रैकिंग किया जाय – जिसमें शिक्षक छात्र का रेशि‍यो, शि‍क्षण योग्य उचित भवन, आबादी के अनुसार छात्रों का दाखि‍ला इत्यादि‍ के अनुसार तो गुजरात और नीचे फिसल कर 34वें पायदान पर आ जाता है । गुजरात में अपर प्राइमरी लेवल पर स्कूल छोड़ने का प्रतिशत 29.3 है जबकि देश में इसका प्रतिशत 6.6 है । मोदी जी अपने भाषण में साक्षरता दर की बात कर रहे थे, पर यह बताना भूल गए कि गुजरात में सरकारी स्कूलों की हालत कैसी है ? क्या पढ़ाया जाता है इन स्कूलों में ? कैसे इतिहास को तोड़-मरोड़ कर बच्चों को पेश किया जा रहा है ? गुजरात के बच्चे गांधी के जन्म दिवस तक गलत जानते हैं । गुजरात ही के एक गैर सरकारी संगठन ‘’प्रथम’’ के मुताबिक ग्रामीण गुजरात में करीब 95 फीसदी बच्चे विद्यालयों में पंजीकृत हैं, लेकिन ज्ञान का स्तर काफी कम है । पांचवीं कक्षा में पढऩे वाले करीब 55 फीसदी बच्चे दूसरी कक्षा के पाठ्यक्रम नहीं पढ़ पाते हैं । लगभग 65 फीसदी बच्चे ऐसे हैं जो गणित के सामान्य जोड़ घटाव भी नहीं कर पाते हैं । इससे बड़ी शर्म की बात गुजरात के लिए क्या होगी? आप स्कूल टाईम में गुजरात के किसी हाईवे पर चले जाईये आपके स्कूल जाने वाले बच्चें रोड साईड ढ़ाबों और कार वर्कशॉप में काम करते दिख जाएंगे । आगा खां रूरल सपोर्ट प्रोग्राम नाम का एक एनजीओ वहां कई सालों से कई काम रहा है । उसका रिपोर्ट कहता है – गार्जियन अपने बच्चों को स्कूल तो भेजते हैं लेकिन वहां शि‍क्षक आते ही नहीं । आदिवासी क्षेत्र में तो हालत और खराब है । इसके बावजूद गुजरात में मोदी जी का मेनीफेस्टो दावा करता है कि वे 100 प्रतिशत छात्रों को प्राथमिक शि‍क्षा के लिए एनरौल करान में सफल हो गए हैं और स्कूल से पढ़ाई छोड़ने वाले छात्रों का प्रतिशत अब मात्र 2 प्रतिशत रह गया है । इस तथ्य का आंकड़ा जानने के लिए UNDP का ये आंकड़ा देखि‍ये – यूएनडीपी ने गुजरात को देश को 18वें पायदान पर रखा है, छात्रों को स्कूल में टिकाए रखने के मामले में । यूनीसेफ कहता है कि प्राथमिक शि‍क्षा की गुणवत्ता में अभी बहुत सुधार की आवश्यकता है । क्योंकि मुश्किल से आधे बच्चे ही लिख-पढ़ और गणि‍त का सवाल समझा पाते हैं जितना कि उन्हें उनके उम्र के मुताबिक जानना चाहिए । और गुजरात सरकार है कि शि‍क्षा के निजीकरण पर ज्यादा जोड़ दे रही है बजाय शि‍क्षा के ढ़ांचागत सुधार करने के ।
और आखिर में एक बात और… गुजरात मोदी सरकार से पहले भी एक सम्पन्न राज्य रहा है । इसे पहले से एक इंजस्ट्रीयल स्टेट के तौर पर देखा जाता रहा है । ऐसे में बिहार से तुलना कितना जायज है नमोनिया के मरीजों को ये सोच लेना चाहिए ।
Source – Education Development index 2012-13, NGO Pratham, BeyondHeadlines.com, Aga Khan Rural Support Program, UNDP,UNISEF, NASSO Report, GOI, 2011-12 etc

स्वास्थ और पोषण
मजदूरों को कम मजदूरी के परिणामस्वरूप उनकी क्रय क्षमता काफी कम होता है और वे सपरिवार कुपोषण के शि‍कार हो जाते हैं । मिनि‍स्ट्री ऑफ स्टेटिस्ट‍िक एण्ड प्रोगामिंग के आंकड़े के अनुसार 2012 में गुजरात के 40 से 50 प्रतिशत बच्चे अंडरवेट थे । वहीं ह्यूमन डेवलेपमेंट रिपोर्ट 2011 भी कहता है कि गुजरात के आधे बच्चे कुपोषण के शि‍कार हैं । शि‍शु मृत्यूदर जो कि किसी भी प्रदेश के विकास का असल पैमाना होता है, गुजरात इसे रोकने में भी फिसड्डी साबित हो रहा है । शि‍शु मृत्यू दर रोकने में गुजरात का स्थान देश में 11वां है । गुजरात में प्रति हजार बच्चा जो जन्म लेता है उसमें 44 बच्चें तत्काल मर जाते हैं । यूनीसेफ 2012 के अपने राज्यवार रिपोर्ट में कहता है कि पांच साल के उम्र का हर दूसरा बच्चा कुपोषि‍त है और चार में से तीन बच्चा एनीमिया का शि‍कार है । बाल विवाह में भी गुजरात देश में चौथे नंबर पर है । स्वास्थ सेवाओं पर खर्च में गुजरात कोई खास मुकाम नही पा सका है । 1990 से 1995 के बीच जो गुजरात स्वास्थ सेवाओं पर 4.25 प्रतिशत खर्च करता था वो अब 2005 से 2010 में घटकर 0.77 प्रतिशत रह गया है । राज्य बजट में स्वास्थ पर खर्च करने के मामले में गुजरात नीचे से दुसरे पायदान पर है ।
Source : Planning Commission Report-2012-13, Central Bureau of Health Intelligence, UNDP report on global hunger 2009-10


गुजरात में गरीबी
NSSO के मुताबिक गरीबी धटाने में गुजरात उड़ीसा से भी पीछे है । 2010-14 के बीच उड़ीसा में 20 प्रतिशत की दर से गरीबी कम हुआ है और गुजरात महज 8.6 प्रतिशत लोगों को गरीबी रेखा से बाहर ला पाया है । राज्य का कुल ऋण 10 हजार करोड़ का है । जब 1995 में मोदी जी पहली बार सत्ता में आए तब गुजरात का एक्चुअल ऋण 45301 करोड़ था । 2011 का सेंसस बताता है कि मात्र 43 प्रतिशत लोगों को अपने घरों में पानी मिलता है बांकि सबको कहीं और से पानी का प्रबंध करने जाना पड़ता है । गुजरात प्रशासन के ही सेवा निवृत अधि‍कारी ने प्रतिष्ठ‍ित पत्रिका फ्रंटलाईन को कहा है – ‘’मोदी रन्स गुजरात लाइक शॉपकीपर । प्रोफिट एंड लॉसेज आर मेजर्ड ओनली इन इकोनोमिक एंड मोनिटरी टर्म । द लार्जर पिक्चर ऑफ ह्यूमन डेवलपमेंट एंड आई इंक्लूड द एनवारमेंट इन दिस, इस कंप्लीटली इग्नोर्ड नॉट नेग्लेक्टेड, माइंड यू । इट इज विलफूली इगनॅार्ड।‘’ अर्थात ‘’मोदी गुजरात को दुकानदार की तरह चलाते हैं । नफा और नुकसान को सिर्फ इकोनॉमी और मुद्रा के पैमाने पर तौलते हैं । मानव विकास का असल तथा बृहद स्वरूप और मैं इसमें पर्यावरण को भी शामिल करता हूं, को पूरी तरह से द‍रकिनार कर दिया गया है । जान बूझ कर और सोच समझ कर । परिणाम स्वरूप प्रदूषि‍त शहरों के मामले में भी गुजरात 13वें पायदान पर है । गुजरात के वापी तथा अंक्लेश्वर तो देश के सबसे दो प्रदूषि‍त जहगों में से एक है । शौचालयों के उपयोग में भी गुजरात का स्थान दसवां है । गुजरात के 26 जिलों में से 57 ब्लॉक डार्क जोन में आते हैं । सेसंस 2011 के अनुसार गुजरात के 1.75 करोड़ लोगों को पीने का शुद्ध पानी नहीं मिलता । 2001 में गुजरात की गरीबी 32 प्रतिशत था जो 2011 में बढ़कर 39.5 प्रतिशत हो गया । हरेक सौ लोगों में से 40 लोग गरीब है । गरीबी उन्मूलन भी गुजरात सबसे कम है आंकड़े बताते है कि गुजरात में ये प्रतिशत सिर्फ 8.6 प्रतिशत रहा है । गुजरात का पर्यटन का इतना व्यापक प्रसार-प्रचार करने के बाद भी गुजरात में टूरिज्म का विकास मात्र 13 प्रतिशत हुआ है जिसे मोदी जी 16 प्रतिशत बताते हैं । अगर ये 16 प्रतिशत भी मान लें तो भी देश के औसत पर्यटन मे हुई बृद्धि‍ से कम ही है । देश में 19 प्रतिशत का विकास हुआ है । और देशी आगंतुकों की बात करें तो कुल दस राज्यों में गुजरात 9वें स्थान पर आता है ।
Source : Director, Department of Economics and Statistics, Government of Gujarat. & Gujarat assembly question hours2011-12, National Sample Survey 2011-12, Ministry of Agriculture, Gujarat and Annual Report Narmada Nigam, 2011-12, National Sample Survey, Report by NASSO on poverty 2012-13)

गुजरात में करप्शन

पुरषोत्म सोलंकी के 400 करोड़ रूपये का मछली घोटाले वाले जनाब मोदी जी के ही मंत्रीमंडल में ही हैं । लोकायुक्त का मामला पूरी दुनियां को पता है । वैसे आनन-फानन में उन्होने गुजरात लोकायुक्त आयोग का गठन किया । ऐसा आयोग जिसमें लोकायुक्त मोदीजी खुद चुनेंगे और ये लोकायुक्त इनके तथा इनके मंत्रीयों की जांच नहीं कर सकते । हाईकोर्ट के चीफ जस्ट‍िस और राज्य के राज्यपाल का लोकायुक्त के नियुक्त‍ि की शक्त‍ि नहीं है । ये कैसा मॉडल ऑफ गवर्नेंस है । आज भी लोगों को सरकारी नौकरी, बीपीएल काई यहॉं तक कि औधोगिक लाइसेंस लेने में भी घूस देना पड़ता है । नर्मदा डैम की उंचाई बढ़ाए हुए भी 9 साल हो गए लेकिन कच्छ के लोगों को अभी तक पानी नहीं नसीब हुआ । किसानों से बाजार मूल्य से भी सस्ती दरों पर जमीन लेकर अंबानी को 1 रू के भाव से दे दिया गया । गुजरात के आधे से ज्यादा गांवों के प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र बंद पड़े है । और जिला अस्पतालों में चिकित्सा के साधन नहीं है । गुजरात में बिना टेंडर के 13 रू के दर से सोलर पावर खरीदे गए जबकि वही सोलर पावर मध्यप्रदेश और कर्नाटक में टेंडर करने के बाद 7.5 रू और 5.5 रू में खरीदा गया । पिछले सालों में गुजरात में 800 से ज्यादा किसान फसल का समर्थन मूल्य नहीं मिलने के कारण आत्महत्या को मजबूर हो गए । बिजली कनेक्शन के 4 लाख किसानों के आवेदन लंबित पड़े है और मोदी जी कहते हैं कि पूरे गुजरात में बिजली लग गई है ।

गुजरात में अल्पसंख्यकों की स्थ‍िती

काश ! मोदी जी सच्चर रिपोर्ट के इस बात को भी बता पाते कि उनके गुजरात में सबसे अधिक मुसलमान नौजवान जेलों में बंद हैं । यह बात खुद हाल-फिलहाल में राजेन्द्र सच्चर साहब भी बता चुके हैं । सच्चर साहब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश से मिलकर यह भी कह चुके हैं कि गुजरात के जेलों में बंद अधिकतर मुस्लिम युवा उत्तर प्रदेश के हैं ।
वहीं नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो 2012 की रिपोर्ट बताती है कि इस साल गुजरात में 932 मुसलमान बच्चों को सज़ा सुनाई दी गई । जो जेल की जनसंख्या का 21 फीसद आबादी है । वहीं 1583 मुसलमान कैदी अंडर ट्रायल हैं, जो जेल की आबादी के 24 फीसद है । वहीं साल 2012 में 151 मुसलमान कैदियों को डिटेन किया गया है, जो गुजरात के जेल की आबादी का 30 फीसद है । यहां के गरीब अल्पसंख्यक छात्रों को छात्रवृत्ति तक नहीं मिल पाती । इससे बड़ा अन्याय यहां के अल्पसंख्यकों के साथ और क्या होगा? काश ! मोदी जी यह भी बताते कि गुजरात के पॉलिटिक्स में मुसलमानों की हिस्सेदारी क्या है ? आलम तो यह है कि गुजरात के दो मुस्लिम विधायको पर भी भाजपा में शामिल होने का दबाव लगातार डाला जाता रहा है । दूसरी तरफ सच्चाई यह कि इसी गुजरात के मुसलमान अपने चंदे से भाजपा को चलाने का काम भी कर रहे हैं । अब यह जानना दिलचस्प होगा कि गुजरात के अमीर मुसलमान पार्टी को चंदा अपनी खुशी से देते हैं या फिर वो आज भी किसी डर में जी रहे हैं । केन्द्र द्वारा अल्पसंख्यकों को दी जाने वाली छात्रवृति जो गरीब अल्पसंख्यकों को अपनी स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के लिए दी जाती है और जिसमें केन्द्र और राज्य का प्रतिशत 75:25 है । गुजरात में ऐसे अल्पसंख्यकों की संख्या 52260 है । लेकिन मोदी जी ने केन्द्र को एक प्रपोजल तक नहीं भेजा ताकि इनको सहारा मिल सके । गुजरात के बैंको में मुश्लि‍मों का शेयर 12 प्रतिशत है । लेकिन इनको लोन मिलने का प्रतिशत मात्र 2.6 प्रतिशत है । यूएनडीपी के अनुसार देश के जिन चार राज्यों में मुसलमानों की स्थ‍िती बद से बदतर है उनमें गुजरात भी है । इन चार राज्यों में गुजरात, आसाम, उत्तर प्रदेश, और पश्च‍िम बंगाल है ।
Source : A report by Ministry of Minority Affair,MMA,GOI,2011-12, UNDP human development report to UN-2011-12)

गुजरात में अपराध

सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद 1958 दंगों का जवाब दिया गया । जिसमें सिर्फ 117 केसों में गिरफ्तारी हुई है । जो कुल केस का सिर्फ 5 प्रतिशत है । गुजरात वन अधि‍कार नियम 2006 को लागू करने में 11वें स्थान पर है । गुजरात में प्रत्येक तीन दिन में एक बलात्कार होता है । महिलाओं के अपराध में 39 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है । 60 प्रतिशत महिलाएं अपने पति‍ से और 35 प्रतिशत बेटियां अपने पापा के साथ दुर्व्यवहार का शि‍कार होती हैं । इन सभी अपराधो को छुपाने में गुजरात की मीडिया का बहुत बड़ा योगदान है और सत्ता के लोग उनसे ऐसा करवाते हैं । दरअसल लोगों को वही दिखाई देता है जो सत्ता पक्ष दिखाना चाहता है । वो नहीं दिखता जो हकीकत है ।
Source : An article on Gujarat is not tribal friendly? DNA Ahmedabad, Tuesday, Apr 3, 2012,) A report by NGO Ahmadabad Women Association Gujarat-AWAG-(TIMES NEWS NETWORK, 25th Jan 2013)

Monday, May 19, 2014

ई भी कोई नाम है महराज - भाग एक

बरगाही के भाई -:

यू तो बिहार के हरेक लोग इस नाम से परिचित होंगे लेकिन अगर आप खगड़ि‍या से बेगुसराय की और बढ़ते रहें तो इस नाम का अर्थ भी भली भांती समझ जाएंगे । हरेक दुसरे कदम पर लोग इसका उपयोग करते हुए सुनाई पड़ेंगे । दिल्ली पंजाब का ''इरिटेट वाला हैल्लाे'' या ''ओए'', ''अबे'' यहाँ का बरगाही भाई होता है । अब आप सोच रहे होगें की ये सम्बोधन है या गाली तो श्रीमान आपको बता दे ये ना ही सम्बोधन है और ना ही गाली ये तो प्यार है जो रिक्शे-ठेलेवाले से लेकर हरेक मजदूर की जुबान पर हरेक समय होता है । वैसे कुछ एलीट क्लास के लोग इसे गाली की श्रेणी में भी रखते है लेकिन मूल रूप से ये प्यार है । जो बेगुसराय के हृदय में बसता है ।

Tuesday, May 13, 2014

गंधवरिया राजवंश का इतिहास


स्व. श्री राधाकृष्ण चौधरी के अनुसार – स्वर्गीय पुलकित लाल दास ‘मधुर’ जी ने अथक परिश्रम करके गन्धवरिया के इतिहास को लिखकर श्री भोला लाल दास जी के यहॉं प्रकाशन के लिए भेजे थे । किसी कारणवश यह पाण्डुलिपी (जो कि उस समय जीर्णावस्थामें में था ) प्रकाशि‍त नहीं हो सका । फिर बहुत दिनों के बाद ये पाण्डुलिपी श्री चौधरी को प्राप्त हुआ । उनके अनुसार ये इतिहास किंवदंती के आधार पर लिखा गया था । क्योंकि गंधवरिया के विषय में कहीं भी कुछ भी प्रामाणि‍क इतिहास सामग्री नही है । सोनवर्षा राज के केसमें गन्धवरिया का इतिहास दिया गया है लेकिन उसमें से जो गन्धवरिया के लोग सोनवर्षा राज के विरोध में गवाही दिये थे उनमें से एक प्रमुख व्यक्ति‍ स्वर्गीय श्री चंचल प्रसाद सिंह मरने से पहले श्री राधाकृष्ण चौधरी से मिले थे । उन्होंने व्यक्त‍िगत रूप से ये कहा था कि उनका बयान जो उस केज में हुआ था से एकदम उल्टा है । इसलिए गन्धवरिया के इतिहास के लिए उसका उपयोग करते समय उसको रिभर्स करके पढ़ा जाय । उसी केस में एक महत्वपूर्ण बात ये मिला जो गन्धवरिया के द्वारा दिया गया दानपत्र था । जिसमें से कुछ चुने हुए दानपत्र के अंग्रेजी अनुवाद का अंश ‘हिस्ट्री ऑफ मुस्लिम रूल इन तिरहूत ‘ में प्रकाशि‍त किया गया है । सहरसा जिला में गंधवरिया वंश का इतना प्रभूत्व था तब भी उसका कोई उल्लेख ना ही पुराने वाले भागलपुर गजेटियर में है ना ही जब सहरसा जिला बना और उसका नया गजेटियर बना तब भी उसमें गन्धवरिया की चर्चा एक पाराग्राफ में हुई । इस संबंध में ना ही कोई प्रमाणि‍क इतिहास है और ना ही इसके लिए कोई पहल और प्रयास की जा रही है ।

गंन्धवरिया लोगों का गन्धवारडीह अभी भी शकरी और दरभंगा स्टेशन के बीच में है और वहां वो लोग अभी भी जीवछ की पूजा करते हैं । गंधवरिया डीह पंचमहला में फैला हुआ है । ये पंचमहला है – बरूआरी, सुखपुर, परशरमा, बरैल आ जदिया मानगंज । इन सबको मिलाकर पंचमहला कहा जाता है । 

दरभंगा विशेषत: उत्तर भागलपुर (सम्प्रति सहरसा जिला ) मे गन्धवरिया वंशज राजपूत की संख्या अत्याधि‍क है । दरभंगा जिलांतर्गत भीठ भगवानपुर के राजा साहेब तथा सहरसा जिलांतगर्त दुर्गापुर भद्दी के राजा साहेब और बरूआरी, पछगछिया, सुखपुर, बरैल, परसरमा, रजनी, मोहनपुर, सोहा, साहपुर, देहद, नोनैती, सहसौल, मंगुआर, धवौली, पामा, पस्तपार, कपसिया, विष्णुपुर एवं बारा इत्यादि‍ गॉव बहुसंख्यक छोटे बड़े जमीन्दार इसी वंश के वंशज थे । सोनवर्षा के स्वर्गीय महाराज हरिवल्लभ नारायण सिंह भी इसी वंश के राजा थे । ये राजवंश बहुत पुराना था । इस राजवंश का सम्बन्ध मालवा के सुप्रसिद्ध धारानगरी के परमारवंशीय राजा भोज देव के वंशज है । इस वंश का नाम ‘’गंधवरिया’’ यहाँ आ के पड़ा है । राजा भोज देव की 35वीं पीढ़ी के बाद 36वीं पीढ़ी राजा प्रतिराज साह की हुई । एक बार राजा प्रतिराज सिंह अपनी धर्मपत्नी तथा दो पुत्र के साथ ब्रह्मपुत्र स्नान के लिए आसाम गए थे । इस यात्रा से लौटने के क्रम में पुर्ण‍ियॉं जिलांतगर्त सुप्रसिद्ध सौरिया ड्योढ़ी के नजदीक किसी मार्ग में किसी संक्रामक रोग से राजा-रानी दोनों को देहांत हो गया । 

सौरिया राज के प्रतिनिधि‍ अभी भी दुर्गागंज में है । माता-पिता के देहांत होने पर दोनों अनाथ बालक भटकते-भटकते सौरिया राजा के यहॉं उपस्थ‍ित हुए, और अपना पूर्ण परिचय दिए । सौरिया राज उस समय बहुत बड़ा और प्रतिष्ठि‍त राज था । उन्होंने दोनो भाईयों का यथोचित आदर सत्कार किया । और अपने यहॉं दोनों को आश्रय प्रदान किये । बाद में सौरिया के राजा ने ही दौनों का उपनयन (जनेउ) संस्कार भी करवाएं । उपनयन के समय उन दोनों भाईयों का गोत्र पता नहीं होने के कारण उन दोनों भाईयों को परासर गोत्र दियें जबकि परमार वंश का गोत्र कौण्ड‍िल्य था । दोनो राजकुमार का नाम लखेशराय और परवेशराय था । दोनों वीर और योद्धा थे । सौरिया राज की जमीन्दारी दरभंगा में भी आता था । किसी कारण से एकबार वहां युद्ध शुरू हो गया । राजा साहेब इन दौनो भाईयों को सेनानायक बनाकर अपने सेना के साथ वहां भैजे । कहा जाता है कि दोनो भाई एक रात किसी जगह पर विश्राम करने के लिए रूकें कि नि:शब्द रात में शि‍विर के आगें कुछ दूर पर एक वृद्धा स्त्री के रोने की आवाज उन दोनों को सुनाई पड़ा । दोनो उठकर उस स्त्री के पास गए । रोने का कारण पुछा । उस स्त्री ने बताया कि ‘’ हम आपदोनों के घर के गोसाई भगवती हैं । मुझे आपलोग कही स्थान (स्थापित कर) दे‘’ । इस पर उन दोनो भाईयों ने कहा हम सब तो स्वयं पराश्रि‍त हैं । इसलिए हमलोगों को वरदान दीजिए कि इस युद्ध में विजयी हो । कहा जाता है उस स्त्री ने तत्पश्चात उन दोनों भाईयों को एक उत्तम खड़ग प्रदान किएं । जिसके दोनों भागपर सुक्ष्म अक्षर में संपुर्ण दुर्गा सप्तशती अंकित था । ये खड़ग पहले दुर्गापुर भद्दी में था । उसके पश्चात सोनवर्षा के महाराजा हरिवल्लभ नारायण सिंह उसे सोनवर्षा ले आएं थे । उस खड़ग में कभी जंग नहीं लगता था । वो खड़ग एक पनबट्टा (पानदान – पान रखने का बॉक्स) में मोड़ कर रखा जाता था । और खोल कर झाड़ देने से एक संपुर्ण खड़ग के आकार में आ जाता था । उस खड़ग और देवी की महिमा से दोनो भाई युद्ध में विजयी हुएं । पुरा रणक्षंत्र मुर्दा से पट गया और लाश की दुर्गन्ध दुर-दुर तक व्याप्त हो गई । इससे सौरिया के राजा बहुत प्रसन्न हुए और इस वंश का ना ‘’गन्धवरिया’’ रखें । ये युद्ध दरभंगा जिलांतर्गत गंधवारि नामक स्थान में हुआ था । गंधवारी और कई और क्षेत्र इन लोगों को उपहार में मिला । लखेशराय के शाखा में दरभंगा जिलांतर्गत (अभी का मधुबनी) भीठ भगवानपुर के राजा निर्भय नारायणजी आएं । और परवेशराय के शाखा में सहरसा के गन्धवरिया जमीन्दार लोग हुए । सहरसा का अधि‍कतर भूभाग इसी शाखा के अधीन था । दुर्गापुर भद्दी इसका प्रमुख केन्द्र था । 

परिसेशराय को चार पुत्र हुए । लक्ष्मण सिंह, भरत सिंह, गणेश सिंह, वल्लभ सिंह । गणेश सिंह और वल्लभ सिंह निसंतान भेलाह । भरत सिंह के शाखा में धवौली की जमीन्दार आई । लक्ष्मण सिंह को तीन पुत्र हुए – रामकृष्ण सिंह, निशंक सिंह और माधव सिंह । इसमें माधव सिंह मुसलमान हो गए और नौहट्टाक शासक हुए । ‘निशंक’ के नाम पर निशंकपुर कुढ़ा परगन्ना का नामकरण हुआ । पहले इस परगना का नाम सिर्फ ‘’कुढ़ा’’ था बाद में उसमें‍ निशंकपुर जोड़ा गया । निशंक को चार पुत्र हुए – दान शाह, दरियाव शाह, गोपाल शाह और छत्रपति शाह । दरियाव शाह के शाखा में बरूआरी, सुखपुर, बरैल तथा परसरमा के गन्धवरिया लोक हुए । 

लक्ष्मण सिंह के बड़े बेटे रामकृष्ण को चार पुत्र हुए – वसंत सिंह, वसुमन सिंह, धर्मागत सिंह, रंजित सिंह । वसुमन सिंह के शाखा में पछगछिया का राज मिला । धर्मागत सिंह के शाखा में जदिया मानगंज की जमीन्दारी मिली । और रंजित सिंह के शाखा में सोनवर्षा राज मिला । इसी वंश का राजा हरिवल्लभ नारायण सिंह हुए । 1908 में सोनवर्षा राज से 10-12 मील उत्तर में कांप नामक सर्किल में साढ़े नौ बजे रात में शौच के समय मार‍ दिया गया । इनकी एक कन्या का विवाह जयपुर स्टेट के संम्बन्धी के संग हुआ । और इनको एक पुत्र भी नहीं थे । उस कन्या के पुत्र रूद्रप्रताप सिंह सोनवर्षा राज के राजा हुए । इस शाखा में सोहा, साहपुर, सहमौरा, देहद, बेहट, विराटपुर, तथा मंगुआर के गंधवरिया की जमीन्दारी आई । इसमें साहपुर की राजदरबार भी प्रसिद्ध था । उनके दरबार में बिहपुर मिलकी श्यामसुंद कवि और शाह आलमनागर के गोपीनाथ कवि उपस्थ‍ित थे । स्वर्गीय चंचल प्रसाद सिंह भी सोनवर्षा के दामाद थे । 

वसंत सिंह को जहाँगीर से राजा की उपाधि‍ मिली थी । राजा वसंत सिंह गंधवरिया से अपने राजधानी हटाकर सहरसा जिला में वसंतपुर नामक गाव में बसाएं और वहीं अपनी राजधानी बनाएं । वसंतपुर मधेपुरा से 18 से 20 मील पुरब है । वसंत सिंह को चार पुत्र हुए – रामशाह, वैरिशाह, कल्याण शाह, गंगाराम शाह । पहले बेटे का शाखा नहीं चला वो निसंतान हुए । वैरिशाह राजा हुए । कल्याण शाह के शाखा में रजनी की जमीन्दारी आई । और गंगाराम शाह के शाखा में बारा की जमीन्दारी आई । इन्होंने अपने नाम पर गंगापुर की तालुका बसाई । वैरीशाह को दो रानी हुए । जिसमें पहले वाली पत्नी से केसरी सिंह और जोरावर सिंह हुए और दुसरे पत्नी से पद्मसिंह हुए । जोरावर सिंह के शाखा में मोहनपुर और पस्तपार की जमीन्दारी आई । पद्मसिंह की शाखा में कोड़लाही की जमीन्दारी आई । राजा केसरी सिंह बड़े प्रतिभाशाली व्यक्त‍ि थे । उनको औरंगजेब से उपाधि‍ मिली थी । केसरी सिंह को धीरा सिंह, धीरा सिंह को कीर्ति सिंह और कीर्ति सिंह को जगदत्त सिंह नामक पुत्र हुए जो बड़े वीर, दयालू और प्रतापी थे । गंगापुर, दुर्गापुर और बेलारी तालुका इनके अधि‍कार में था । ए‍क जनश्रुति‍ इस इलाके में विख्यात है कि उस समय दरभंगा राज की कोई महारानी कौशि‍की स्नान के लिए आई थी । उन्हें जब ये पता चला कि ये दुसरे लोगों का राज्य है तो बोली – हम किसी दुसरे के राज्य में अन्न जल ग्रहण नहीं कर सकते हैं । उसके बाद जगदत्त सिंह तुरंत उनको बेलारी तालुका का दानपत्र लिख उनसे स्नान भोजन का आग्रह कियें । वो बेलारी तालुका अभी तक बड़हगोरियाक खड़ोडय बबुआन लोगों के अधि‍कार में था । उसके बाद राज दरभंगा का हुआ । जगदत्त सिंह को चार पुत्र हुए । हरिहर सिंह, नल सिंह, त्र‍िभुवन सिंह और रत्न सिंह । त्र‍िभुवन सिंह ‘’पामा’’ में अपनी ड्योढ़ी बनाई । 

वैसे पंचगछि‍या के राजवंश अपने आपको नान्यदेव का वंशज बताते थे । हरिसिंह देव के पुत्र पतिराज सिंह की उत्पति मानते हैं । पतिराज सिंह ‘गन्धवारपुर’ में अपना निवास स्थान बताए थे । और इसलिए गन्धवरिया कहलाएं । लेकिन ये भी लोग अपने आपको पतिराज सिंह के पुत्र और परवेश राय के वंशज कहते हैं । रामकृष्ण सिंह के वंशज पछगछिया स्टेट हुए । सोनवर्षा राज, पछगछिया तथा बरूआरी प्रसिद्ध स्टेट माना जाता है । पंचमहला में बरूआरी स्टेट प्रमुख था । इस वंश में राजा कोकिल सिंह प्रख्यात हुए । इनको शाह आलम से 1184 हिजरी में शाही फरमान मिला था । राजा की उपाधी इनको सम्राठ से मिला था । बरूआरी तिरहुत सरकार के अधीन था । और कोकिल सिंह को इस क्षेत्र के ननकार का हैसियत मिला था । गन्धविरया की कूलदेवी ‘’जीवछ’’ की प्रतिमा बरूआरी राजदरबार में थी और नियमित रूप से वहां के लोग इनकी पूजा करते थे । जीवछ की प्रतिमा नोहट्टा से यहाँ लाई गई थी । 

इतना सबकुछ होते हुए भी गन्धवरिया के वंश का कोई प्रमाणि‍क इतिहास नही बन पाया है । जो कुछ दानपत्र अंग्रेजी दानपत्र के अनुवाद से मिला है उसमें से भी ज्यादा भीठ-भगवानपुर राजा साहेब का । भीठ-भगवानपुर गन्धवरिया के सबसे बड़े हिस्से की राजधानी थी और उनलोगों का स्ति‍त्व निश्च‍ित रूप से दृढ़ था और वो दानपत्र देते थे जिनका की प्रमाण है । दरभंगा के गन्धवरिया लोगों ने भी अपनी इतिहास की रूपरेखा प्रकाशि‍त नहीं की है । इसलिए इस सम्बन्ध में कुछ कहना असंभव है । बकौल राधाकृष्ण चौधरी ओइनवार वंश के पतन के बाद ‘भौर’ क्षेत्र में राजपुत लोगों ने अपना प्रभुत्व जमा लिए थे । और स्वतंत्र राज्य स्थापित किये थे । खण्डवला कुल से उनका संघर्ष भी हुआ था । और इसी संघर्ष के क्रम में वो लोग भीठ-भगवानपुर होते हुए सहरसा- पुर्ण‍ियाँ की सीमा तक फैल गए । गन्ध आ भर (राजपुत) के शब्द मिलन से गन्धवारि बनल और उसी गाँव को इन लोगों ने अपनी राजधानी बनाई । कालांतर में भीठ भगवानपुर इन लोगों को प्रधान केन्द्र बना । इतिहास की परंपरा का पालन करते हुए इन लोगों ने भी अपना सम्बन्ध प्राचीन परमार वंश के जोड़ा और ‘’नीलदेव’’ नामक एक व्यक्त‍ि की खोज की । उसी क्रम में कोई अपने आप को विक्रमादित्य के वंशज तो कोई अपने आप को नान्यदेव के वंशज बतलाते हैं । राधाकृष्ण चौधरी के अनुसार – उनके पास भीठ भगवानपुर की वंश तालिका नहीं है । लेकिन सहरसा के गंधवरिया लोगों की वंश तालिका देखने से ये स्पष्ट होता है कि परमार भोज और नान्यदेव से अपने को जोड़ने वाले गन्धवरिया लखेश और परवेश राय को अपना पूर्वज मानते हैं । एक परंपरा ये भी कहती है कि नीलदेव गंधवरिया में आकर बसे थे और ‘जीवछ’ नदी को अपना कुलदेवता बनाए थे । कहा जाता है कि नीलदेव राजा गंध को मारकर अपना राज्य बनाए थे । सहरसा जिला में भगवती के आशीष स्वरूप राज मिलने की जो बात है इसमें भी कई प्रकार की किंवदंती है । सिर्फ एक बात पर सभी एकमत है कि उपनयन के समय इन लोगों को अपना गोत्र याद नहीं रहने पर इन्हे परासर गोत्र दे दिया गया था । अब जब तक कोई वैज्ञानिक साधन उपलब्ध नहीं होता तबतक गंधवरिया को इतिहास ऐसे ही किंवदंती बनी रहेगी । 


संदर्भ – मिथि‍लाक इतिहास ( स्व. श्री राधाकृष्ण चौधरी )