Monday, February 17, 2014

बिहारी होने पर हमें गर्व है

बिहारी होने पर हमें गर्व है।


हमारे यहाँ कोई Tension नही लेता, We Suggest ‘’लोड मत ले’’

हमलोग किसी को जान से नही मारते, मार कर ‘’मुआ’’ देते हैं।

We don’t like surprises, काहे की अलबला जाते हैं।

We don’t go for shopping, हमलोग समान किनने जाते हैं।

हमारे यहाँ Uncivilized लोगों को, हम चोहार बोलते हैं।

Idiot and dumbs are too mainstream, हमलोग तो भकलोल बोलकर काम चला लेते हैं।

We Prefer Borolin over Detol, काहे की डेटॉल लगाने पर परपराने लगता है ।

Tension में हमलोग हदस जाते हैं।

हमारे यहाँ Shirt नहीं बुशर्ट होता है।

हमारे ‍लिए Awesome या epic कुछ नही होता, सब गरदा होता है।

हमारें यहाँ फालतू के ‘Show Off’ को हमलोग, सुख्खल फुटानी बोलते हैं।

हमारे यहाँ बच्चा नहीं, बुतरू होता है।

Most Common quote written on back of tractors and trucks in Bihar, लटकला बेटा तो गइला बेटा

हमारे यहाँ ना ज्यादा ना कम, सब तनी मनी होता है।

हमारे यहाँ ट्रेन कभी चलती नहीं है, हमेशा खुल जाती है।

हमारा कभी Bad Day नही होता है, हमलोग का बस जतरा खराब हो जाता है।

लहरिया कट इज ऑवर फेवरेट बाईक स्टंट,

हमलोग रोड दो साइड नही, चारो पट्टी देख कर पार करते हैं।

हमारे यहाँ कपड़े को धोया नहीं जाता, फीचा जाता है ।

हमलोग गला नही दबाते, नरेठी चीप देते हैं।

हमारे यहाँ कुत्ता भगाता नहीं है, रगेद देता है।

We don’t believe in competition, लेकिन हमरे आगे कोई नही सकेगा।

हमलोग Irritate नही होते, खीज बढ़ता है।

हमें मच्छर काटता नहीं है, भंम्भोर लेता हैं।

हमलोग ताकत नहीं बरियारी दिखाते हैं।

हमलोग इरिटेट नहीं होते, हमलोगों को अन्नस लगता हैं।



फेसबुक पर किसी अनजाने वाल से टुटी पलस्तर का टुकड़ा ।

Sunday, February 16, 2014

जमाना क्या से क्या हुआ

एक सपना जो आज पुरा हो गया । मेरे आइकॉन पि‍यूष मिश्रा जी से मुलाकात हुई । मौका था पटना लिटरेसी फेस्टि‍वल की । अंतिम दिन मौका मिला था और चाहत भी थी, क्योंकी मुझे पता था कि इसी दिन मुझे पि‍यूष मिश्रा जी से मुलाकात हो सकती है । सो पहूंच गए । करीब 11:30 बजे गुलजार साहब ‘’मुझको भी तरक़ीब सीखा दे’’ पर यतिन्द्र मिश्रा जी से गुफ्तगु कर रहे थे । उसके बाद आखि‍रकार जिसका इंतजार था वो समय आ ही गया।

मंच पर पहुंचे पि‍यूष मिश्रा, क्रार्यक्रम का नाम था ‘’ जो संवाद नहीं कह पाए : गीतों की जुबानी’’ इसमे इनके साथ थे यतीन्द्र मिश्रा और प्रोग्राम को मॉडरेट कर रहे थे डा विभावरी । एकदम जानदार और मज़ेदार शेशन रहा । पि‍यूष जी ने बहुत से अनसुने गीतो को सुनाया । कुछ पुराने भी थे और कुछ ऐसे जो बकौल पि‍यूष  जी फिल्मों से रिजेक्ट हो गये थे । उन्होनें कहा की जो गाने फिल्मों में रिजेक्ट हो जाती है उसे मैं क्लासिक समझकर पॉकेट में रख लेता हूं । एकदम सादगी और साधारण शब्दों में । पीयूश जी का यही व्यक्ति‍त्व मुझे उनका फैन बना दिया । फोटो खिचावाने के अनुरोध‍ पर एकदम आत्मीयता से फोटो खि‍चवाए । इस मौके उनके कुछ अनछुए गीतो को शब्द देने की कोशीश की है...

जमाना क्या से क्या हुआ 

कहीं पे लड़की जाए लुढ़की
कहीं पे बच्चा फांके सुरती।
कहीं पे अम्मा वो भी ठरकी
जमाना क्या से क्या हुआ ।।

कहीं पे नींद, कहीं पे शोर
कहीं पे रात, कहीं पे भोर – 2
कहीं पे हाय, कहीं पे बाय
कहीं पे फिस्स, कहीं पे ठाय – 2

कहीं नींद कहीं शोर, कहीं रात कभी भोर
कहीं ठाय ठाय ठाय, कहीं फिस्स
उंह आह आउच

कहीं पे गाड़ी चम्मकवाली
कहीं पे लगड़े पैर की लाली
कहीं पे कुबड़े हाथ की ताली
जमाना क्या से क्या हुआ – 2

कहीं पे लड़की जाए लुढ़की
कहीं पे बच्चा फांके सुरती
कहीं पे अम्मा वो भी ठरकी
जमाना क्या से क्या हुआ

काम तो नहीं फिर भी काम किए जा
सड़को की धूल को सलाम किए जा ।
साले
काम तो नहीं फिर भी काम किए जा
सड़को की धूल को सलाम किए जा ।

जीसस को बोल तू सतसिरियाकाल जी ।
अल्ला मिया को राम-राम किये जा ।

दिल हो खुजली तो आंखो को मीच
पौव्वा निकाल के मोटा वाला खीच ।

झूठा तव्वसुर है तो क्या हुआ ।
सच्चे की खोज में तु आज ना जला ।
कहीं आंशुओं की नाव, कहीं अंतरी की घॉव
कहीं ठाय ठाय ठाय कहीं फिस्स ।
उंह आह आउच

कहीं पे होटल रंग बिरंगा
कहीं पे इंशा नंग धड़ंगा ।
कहीं पे चमके दूर तिरंगा
जमाना क्या से क्या हुआ ।

कहीं पे लड़की जाए लुढ़की
कहीं पे बच्चा फांके सुरती
कहीं पे अम्मा वो भी ठरकी
जमाना क्या से क्या हुआ


गाना सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें।

Wednesday, January 29, 2014

पढ़े राहुल गांधी के पहले इंटर्व्यू का फुल टेक्स्ट

अपने दस साल के सार्वजनिक राजनीतिक जीवन में राहुल गांधी ने टाइम्स नाऊ के अरनब गोस्वामी को पहला औपचारिक इंटर्व्यू दिया है. पढ़ें पूरा इंटर्व्यू-

अरनब: राहुल, आपका बहुत धन्यवाद। सांसद के तौर पर आपको 10 साल हो गए हैं, आपने पहला चुनाव 2004 में लड़ा था और यह आपका पहला इंटरव्यू है।
राहुल: यह मेरा पहला इंटरव्यू नहीं है, हां इस तरह अनौपचारिक तौर पर पहली बार इंटरव्यू दे रहा हूं।

अरनब: इतनी देर क्यों लग गई।
राहुल : मैंने इससे पहले भी थोड़ा मीडिया इंटरेक्शन किया है, प्रेस कॉन्फ्रेंस की हैं और बातचीत भी की है। लेकिन मेरा जोर खासतौर पर पार्टी के अंदरूनी काम पर रहा है और इसी काम में मेरी ज्यादा एनर्जी लगी।

अरनब: या फिर आप सीधे किसी के साथ बातचीत करने से हिचकते रहे हैं।
राहुल: बिल्कुल नहीं। मैंने कई प्रेस कॉन्फ्रेंस की हैं, ऐसी कोई बात नहीं है।

अरनब: या फिर ऐसा तो नहीं है कि आप कठिन मुद्दों पर बात करने से हिचक रहे थे? 
राहुल: मुझे कठिन मुद्दे अच्छे लगते हैं, मैं उनका सामना करना चाहता हूं।

अरनब: राहुल गांधी, पहला पॉइंट तो यह है कि आप प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी उम्मीदवारी के सवाल को टालते रहे हैं। मुझे ऐसा लगता है कि राहुल कठिन मुकाबले से डरते हैं? 
राहुल: आप अगर कुछ दिन पहले की एआईसीसीसी में मेरी स्पीच को सुनें, तो साफ मुद्दा है कि इस देश में प्रधानमंत्री किस तरह चुना जाता है। यह चयन सांसदों के जरिए होता है। हमारे सिस्टम में सांसद चुने जाते हैं और वे प्रधानमंत्री चुनते हैं। एआईसीसी की स्पीच में मैंने साफ कहा कि अगर कांग्रेस पार्टी मुझे किसी भी जिम्मेदारी के लिए चुनती है तो मैं तैयार हूं। यह इस प्रक्रिया का सम्मान है। चुनाव से पहले ही पीएम उम्मीदवार का ऐलान का मतलब है कि आप सांसदों से पूछे बिना ही अपने प्रधानमंत्री को चुन रहे हैं, और हमारा संविधान ऐसा नहीं कहता।

अरनब: लेकिन आपने पीएम उम्मीदवार का ऐलान 2009 में किया था। 
राहुल: हमारे पास सरकार चला रहे पीएम थे और उन्हें बदलने का सवाल ही नहीं था।

अरनब: क्या आप नरेंद्र मोदी का सीधा आमना सामना करने से बच रहे हैं। क्या यह डर है कि कांग्रेस के लिए यह चुनाव बेहतर नहीं लग रहा है और राहुल गांधी को हार का डर है? साथ ही यह सोच भी कि राहुल गांधी चुनौती के हिसाब से तैयार नहीं हो पाए हैं और हार का डर है। इसलिए वह नरेंद्र मोदी के साथ सीधे टकराव से बच रहे हैं? आपको इसका जवाब देना चाहिए। 
राहुल: इस सवाल को समझने के लिए आपको यह भी समझना होगा कि राहुल गांधी कौन है और राहुल गांधी के हालात क्या रहे हैं और अगर आप इस बात को समझ पाते हैं तो आपको जवाब मिल जाएगा कि राहुल गांधी को किस बात से डर लगता है और किस बात से नहीं लगता। असली सवाल यह है कि मैं यहां क्यों बैठा हूं? आप एक पत्रकार हो, जब आप छोटे रहे होगे तो आपने सोचा होगा कि मैं कुछ करना चाहता हूं, किसी एक पॉइंट पर आपने जर्नलिस्ट बनने का फैसला किया होगा, आपने ऐसा क्यों किया?

अरनब: इसलिए, क्योंकि मुझे पत्रकार होना अच्छा लगता है। यह मेरे लिए एक प्रफेशनल चैलेंज है। मेरा सवाल है कि आप नरेंद्र मोदी से सीधा आमना-सामना करने से क्यों बच रहे हैं? 
राहुल: मैं इसी सवाल का जवाब देने जा रहा हूं, लेकिन मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि जब आप छोटे थे और पत्रकार बनने का फैसला किया तो क्या वजह थी?

अरनब: जब मैंने पत्रकार बनने का फैसला किया तो मैं आधा पत्रकार नहीं बन सकता था। जब एक बार आपने राजनीति में आने का फैसला कर लिया और पार्टी को आप नेतृत्व भी दे रहे हैं तो आप यह आधे मन से नहीं कर सकते हैं। अब मैं आपसे वही सवाल वापस पूछता हूं, नरेंद्र मोदी तो आपको रोज चैलेंज कर रहे हैं? 
राहुल: आप मेरे सवाल का सीधा जवाब नहीं दे रहे हैं। लेकिन मैं आपको जवाब देता हूं, जिससे आपको मेरे सोचने के बारे में कुछ झलक मिल पाएगी। जैसे अर्जुन के बारे में कहा जाता है कि उन्हें सिर्फ अपना निशाना दिखाई देता था। आपने मुझसे नरेंद्र मोदी के बारे में पूछा, आप मुझसे कुछ और भी पूछ लो। लेकिन मुझे जो बस एक चीज दिखाई देती है वह यह कि इस देश का सिस्टम बदलना चाहिए। मुझे कुछ और नहीं दिखाई देता, मैं और कुछ नहीं देख सकता। मैं बाकी चीजों के लिए अंधा हूं, क्योंकि मैं अपनों को सिस्टम से तबाह होते हुए देखा है, क्योंकि सिस्टम हमारे लोगों के लिए भेदभाव करता है। मैं आपसे पूछता हूं, आप असम से हैं और मुझे यकीन है कि आप भी अपने कामकाज में सिस्टम का यह भेदभाव महसूस करते होंगे। सिस्टम रोज रोज लोगों को दुख देता है और मैंने इसे महसूस किया है। यह दर्द मैंने अपने पिता के साथ महसूस किया, उन्हें रोज इससे टकराते हुए देखा। इसलिए यह सवाल कि क्या मुझे चुनाव हारने से डर लगता है या मैं नरेंद्र मोदी से डरता हूं, कोई पॉइंट ही नहीं है। मैं यहां एक चीज के लिए हूं, हमारे देश में बहुत ज्यादा ऊर्जा है, किसी भी देश से ज्यादा, हमारे पास अरबों से युवा हैं और यह ऊर्जा फंसी है।

अरनब: मैं आपका ध्यान फिर से अपने सवाल की तरफ लाता हूं। जो आप कह रहे हैं वह मैं समझता हूं। लेकिन सीधे तौर पर लेते हैं, नरेंद्र मोदी आपको शहजादा कहते हैं, इस बारे में आपकी क्या राय है? क्या आपको मोदी से हारने का डर है? राहुल इसका प्लीज सीधा जवाब दीजिए। 
राहुल: देश के लाखों युवा यहां के सिस्टम में बदलाव लाना चाहते हैं, राहुल गांधी ये चाहता है कि देश की महिलाओं का सशक्तिकरण हो। हम सुपर पावर बनने की बात करते हैं…

अरनब: मेरा सवाल है कि कांग्रेस के उपाध्यक्ष का बीजेपी के पीएम कैंडिडेट पर क्या नजरिया है। 
राहुल: मुझे लगता है कि हम बीजेपी को अगले चुनाव में हरा देंगे।

अरनब: आपके प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लगाते हैं कि उनके दौर में अहमदाबाद की सड़कों पर मासूमों का नरसंहार हुआ। इस पर आपका क्या नजरिया है? क्या आप इससे सहमत हैं। 
राहुल: प्रधानमंत्री जो कह रहे हैं, वह एक तथ्य है। गुजरात में दंगे हुए और लोग मारे गए। लेकिन असली सवाल है…

अरनब: लेकिन मोदी कैसे जिम्मेदार? 
राहुल: जब वह सीएम थे, तब दंगे हुए।

अरनब: लेकिन मोदी को क्लीन चिट मिल चुकी है। क्या ऐसे में कांग्रेस उन पर हमले जारी रख सकती है? राहुल: कांग्रेस और बीजेपी अलग सोच पर काम करती है। हमारा बीजेपी पर हमला इस पर आधारित है कि देश को लोकतांत्रिक तरीके से आगे बढ़ना चाहिए। इसमें गांवों का, महिलाओं का युवाओं का सशक्तिकरण जरूरी है।

अरनब: लेकिन नरेंद्र मोदी दंगों के लिए कैसे जिम्मेदार हैं, जब उन्हें दंगों के लिए क्लीनचिट मिल चुकी है? राहुल: हमारी पार्टी विचारधारा के आधार पर बीजेपी पर हमले कर रही है। हमारी पार्टी का मानना है कि महिलाएं सशक्त हों, लोकतंत्र हर घर तक पहुंचे। बीजेपी की सोच है कि ताकत केंद्रित रहे और कुछ लोग देश को चलाएं।

अरनब: लेकिन नरेंद्र मोदी 2002 के दंगों के लिए कैसे जिम्मेदार हैं, जब उन्हें कोर्ट और एसआईटी से क्लीनचिट मिल चुकी है। इसलिए राहुल जी आप नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगों पर निजी तौर पर कैसे घसीट सकते हैं? आपको नहीं लगता कि कांग्रेस की यह रणनीति मूलभूत तौर पर गलत है? 
राहुल: हमारी पार्टी की रणनीति साफ है। हमने जो कुछ पिछले पांच-दस सालों में किया है और जैसे लोगों को अधिकार दिए हैं, उसको आप आजादी के आंदोलन से अब तक जोड़ सकते हैं। हमने किसानों को हरित क्रांति दी। लोगों को टेलिकॉम क्रांति दी। सूचना का अधिकार दिया। जो चीजें बंद होती थीं, जिनके बारे में कोई नहीं जानता था। उनके बारे में अब लोग जान सकते हैं।

अरनब: लेकिन आपने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया? गुजरात दंगों पर आपकी पार्टी मोदी को घेरती रही है। और वह कहते हैं कि मुझे कोर्ट से क्लीन चिट मिल चुकी है। मैं आपसे यह पूछ रहा हूं कि कोर्ट से क्लीन चिट के बाद क्या दंगों पर मोदी को घेरने की रणनीति गलत है? 
राहुल: प्रधानमंत्री ने दंगों पर अपनी स्थिति रखी है। गुजरात में दंगे हुए। लोग मरे। मोदी उस समय राज्य के मुखिया थे। अब असली विचारधारा की लड़ाई यह है और जिसे हम जीतने जा रहे हैं, वह लोगों के सशक्तिकरण की बात है। गुजरात दंगों पर आपका नजरिया अपनी जगह पर है और यह भी जरूरी है कि जो इनके कसूरवार हैं, उन्हें सजा मिले। लेकिन असली सवाल देश की महिलाओं को ज्यादा अधिकार देने का है। हम अभी सुपरपावर बनने की बात करते हैं। लेकिन जब तक औरतों को हक नहीं मिलेगा, हम आधी सुपर पावर ही रहेंगे। मैं चाहता हूं कि देश के युवा पार्टी में लोकतंत्र को आगे बढ़ाएं। मैं चाहता हूं कि हम सब मिलकर सबको साथ लेते हुए भारत निर्माण करें। मैं चाहता हूं कि हम भारत को दुनिया में मैन्युफैक्चरिंग का केंद्र बनाएं। कम से कम चीन की तरह।

अरनब: आप कहते हैं कि गुजरात दंगों के समय मोदी सत्ता में थे, यूपी में दंगों के दौरान अखिलेश रहे। और 1984 के दंगे के दौरान कांग्रेस सत्ता में थी। आपने अपने भाषण में दादी की मौत और उससे उपजे गुस्से का जिक्र किया था। और आपने कहा था कि गुस्से को काबू में रखकर उसे ताकत बनाना चाहिए। उसके बाद नरेंद्र मोदी ने आपकी खूब आलोचना की थी और कहा था कि वह अपनी दादी की मौत पर तो आंसू बहा रहे हैं, लेकिन क्या 1984 के दंगों में मारे गए लोगों के लिए आंसू बहाए? वह आपको बार-बार शहजादा कहते हैं। मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि क्या आपकी पार्टी के लोग 1984 के दंगों में शामिल थे? क्या आप इन दंगों के लिए माफी मांगेंगे जैसे कि मोदी से आप गुजरात दंगों के लिए माफी चाहते हैं? 
राहुल: 1977 में हार के बाद हमें कई लोग छोड़कर चले गए। लेकिन सिख समुदाय हमारी दादी के साथ जुड़ा रहा। सिख इस देश के सबसे उद्यमी लोगों में से हैं और मैं उनका सम्मान करता हूं। हमारे पीएम भी सिख हैं। मेरा अपने विरोधियों जैसा नजरिया नहीं है। जिन लोगों ने दादी की हत्या की वे दो लोग थे। मैं पीछे मुड़कर उस गुस्से को नहीं देखता हूं। वह मेरे लिए खत्म हो चुका है।

अरनब: तो फिर आप 84 के दंगों के लिए माफी क्यों नहीं मांगते? 2009 में तो जगदीश टाइटलर कांग्रेसी उम्मीदवार बनने जा रहे थे, जिनकी उम्मीदवारी को मीडिया में उठे विवाद के बाद वापस लेना पड़ा। 
राहुल: 1984 के दंगों में मासूम लोग मारे गए थे और उनका मारा जाना बहुत भयानक था, जैसा नहीं होना चाहिए। 1984 और गुजरात दंगों में फर्क यह है कि गुजरात दंगों में सरकार शामिल थी।

अरनब: आप ऐसा कैसे कह सकते हैं? उन्हें क्लीन चिट मिली है। 
राहुल: 84 के दंगों के दौरान सरकार दंगे रोकने की कोशिश कर रही थी। मैं तब बच्चा था और मुझे याद है कि सरकार पूरी कोशिश कर रही थी। गुजरात में इसके उलट हुआ। सरकार दंगों को भड़का रही थी। इन दोनों में बहुत फर्क है। मासूम लोगों का मरना कतई सही नहीं है।

अरनब: आरटीआई करप्शन से लड़ने का सबसे बड़ा हथियार है। जैसा कि आपने एआईसीसी की स्पीच में कहा था। आपकी पार्टी के 2008 से 2012 के फंड का 90 फीसदी कैश से आया है। जिसमें से 89.11 फीसदी हिस्सा बेनामी स्रोतो से है। आप अपने घर से शुरुआत क्यों नहीं करते? क्यों कांग्रेस पार्टी के फंड को आरटीआई के तहत नहीं लाते? 
राहुल: मुझे लगता है कि राजनीतिक दल अगर ऐसा मानते हैं तो उन्हें आरटीआई के तहत आना चाहिए। मेरा नजरिया है कि ज्यादा खुलापन हो तो अच्छा है। कानून संसद से बनता है। और राजनीतिक दलों को आरटीआई के तहत लाने के लिए ऐसा ही करना होगा। मेरा यह निजी नजरिया है। …असली सवाल हमारे सिस्टम के अलग-अलग स्तंभों का है। अगर आप किसी एक को आरटीआई में लाते हैं और बाकियों को मसलन जुडिशरी और प्रेस इससे बाहर रहते हैं तो असंतुलन हो सकता है। मैं आरटीआई के दायरे में ज्यादा से ज्यादा चीजों को लाने के पक्ष में हूं और ऐसा करने से असंतुलन नहीं बनेगा।

अरनब: आपकी महाराष्ट्र सरकार ने आदर्श पर बने जुडिशल कमिशन की रिपोर्ट को खारिज कर दिया था। यह सब लोगों के सशक्तिकरण का हिस्सा तो नहीं था। अफसरों को दोषी ठहरा दिया गया, लेकिन नेता बचते दिखे। क्या आप अशोक चव्हाण को बचा रहे हैं? 
राहुल: कांग्रेस पार्टी में जब भी भ्रष्टाचार का मामला आता है तो हम एक्शन लेते हैं। हम लोग ही आरटीआई लाए थे, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार है। प्रेस कॉन्फ्रेंस करके मैंने इस मामले में अपनी स्थिति साफ कर दी थी। कांग्रेस पार्टी में जो भी करप्शन का हिस्सा है, सजा दी जाएगी। मैं कहता हूं कि संसद में जो 6 विधेयक फंसे हैं, उन्हें पास किया जाए।

अरनब: लेकिन आपके बोल आपके काम से मेल नहीं खाते राहुल? अशोक चव्हाण की तरह सारे नेता बच जाते हैं। इस मामले में कई एनसीपी के मंत्री भी हैं। अपने फायदे के लिए इन्होंने करगिल के नाम तक का इस्तेमाल किया। 
राहुल: मैंने अपनी स्थिति प्रेस के सामने साफ कर दी है। चाहे जो भी हो उस पर कार्रवाई जरूर होगी। हमने अपने मंत्रियों को भी सजा दी है।

अरनब : यह भी आरोप है कि आप बहुत अच्छे इंसान हैं। आप आलोचना से प्रभावित होते हैं। सुब्रमण्यम स्वामी आपकी डिग्री पर सवाल उठाते हैं। वह कहते हैं कि कैंब्रिज में आपकी एमफिल डिग्री की कोई थीसिस ही नहीं है। किसी ने 110 लाख डॉलर हार्वर्ड मेडिकल स्कूल को देकर आपका एडमशिन कराया। उन्होंने आपकी दोनों डिग्रियों पर सवाल उठाए हैं।
राहुल : क्या आप कैंब्रिज में थे?

अरनब : मैं ऑक्सफर्ड में था? 
राहुल : लेकिन, आपने कैंब्रिज में भी कुछ वक्त बिताया।

अरनब : मैं कैंब्रिज में कुछ समय के लिए विजिटिंग फेलो था। 
राहुल : क्रैंब्रिज में कहां?

अरनब : सिडनी ससेक्स कॉलेज… 
राहुल : मैं कैंब्रिज में ट्रिनिटी में था। मैंने एक साल वहां गुजारा और मैंने वहीं एमफिल किया। आप मेरी डिग्री देखना चाहते हैं तो मैं दिखा सकता हूं।

अरनब : क्या आप सुब्रमण्यम स्वामी को डिग्री दिखाना चाहेंगे? क्या आप उन्हें चैलेंज करेंगे? 
राहुल : उन्होंने शायद मेरी डिग्री देखी है। मैंने हलफनामे दाखिल किए हैं कि मेरे पास ये डिग्रियां हैं। अगर मैं झूठ बोल रहा हूं तो उन्हें कानूनी प्रक्रिया अपनानी चाहिए। इससे ज्यादा मैं क्या करूं? मैं क्यों उन्हें चैलेंज करूं। वह मेरे परिवार पर 40 साल से हमले कर रहे हैं। मैं क्यों उन्हें चुनौती दूं?

अरनब : क्या आप नरेंद्र मोदी के साथ बहस के लिए तैयार होंगे। अगर वह भी तैयार होते हैं? मैं आपसे सीधा सवाल पूछ रहा हूं। क्यों बड़ी पार्टियों के उम्मीदवारों के बीच सीधी बहस नहीं होनी चाहिए। 
राहुल : मैं कांग्रेस पार्टी का ढांचा बनाकर यह बहस ही कर रहा हूं। बहस के लिए आप का स्वागत है। जहां तक मेरा सवाल है तो बहस शुरू हो चुकी है।

अरनब : मैं यह पूछ रहा हूं कि क्या आप तैयार हैं? ताकि मैं मोदी से पूछ सकूं कि वह भी तैयार हैं। 
राहुल : आप बहस शुरू करो, लेकिन असली मुद्दा पार्टी मशीनरी है। और हम ही यह कर रहे हैं। हम 15 सीटों पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं से उम्मीदवार चुनेंगे। राष्ट्रीय बहस शुरू हो चुकी है। एक तरफ कांग्रेस पार्टी है, जो खुलेपन में विश्वास रखती है और दूसरी तरफ विपक्ष है जो सत्ता को केंद्रित रखता है। यह बहस शुरू हो चुकी है और इसी के बारे में सारा चुनाव है।

अरनब : मोदी कहते हैं कि आपको 60 साल दिए। हमें 60 महीने दो… राहुल : मेरा जवाब है कि पिछले 10 साल में हमने देश को सबसे तेज आर्थिक तरक्की दी है। हमने किसी भी सरकार से ज्यादा खुला सिस्टम दिया है। हमने मनरेगा, आधार जैसी व्यवस्थाएं दी हैं। कांग्रेस की सरकार 60 साल से है, इसलिए हम इस रफ्तार से तरक्की कर रहे हैं।

अरनब : आम आदमी पार्टी पर आपकी क्या राय है? आपका नजरिया आम आदमी पार्टी की ओर क्यों बढ़ रहा था? अचानक ऐसा क्यों लगता है कि अब आप उनकी आलोचना कर रहे हैं? जब आपने ऐसा कहा था कि कुछ लोग गंजों को भी कंघी बेच देते हैं, तो क्या आप आम आदमी पार्टी की ओर इशारा कर रहे थे? 
राहुल : कांग्रेस और मैंने युवाओं के बीच जो काम किया है। उससे पार्टी में नई पीढ़ी आएगी। उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया मजबूत होगी। आम आदमी पार्टी के बारे में मैंने यह कहा कि हम उससे कुछ सीख सकते हैं, किस तरह लोगों तक पहुंचा जाए, यह उनसे समझा जा सकता है। लेकिन कुछ ऐसी भी चीजें हैं, जो उनसे नहीं लेनी चाहिए। हमारे पास कांग्रेस की मजबूत बातें हैं और हम उन पर तीन-चार साल से काम कर रहे हैं। हमारी पार्टी की गहरी जड़ें उसकी सबसे बड़ी ताकत हैं और बदलाव के नाम पर हम उन्हें खत्म नहीं कर सकते।

अरनब : पिछले दिनों चिदंबरम ने कहा कि आम आदमी पार्टी को समर्थन देना जरूरी नहीं था? क्या आप उससे सहमत हैं, क्या आपको लगता है कि आपने गलत किया। कृपया सच्चा जवाब दीजिए। 
राहुल : जहां तक मेरा नजरिया है, आप ने दिल्ली में चुनाव जीता और मुझे लगता है कि हमें उनकी मदद करनी चाहिए। हमारी पार्टी को लगा कि उनको अपने को साबित करने का मौका दिया जाना चाहिए। अब हम देख सकते हैं कि वे क्या कर रहे हैं और उन्होंने अपने को किस हद तक साबित किया है।

अरनब : अरविंद केजरीवाल के बारे में आपकी क्या राय है? 
राहुल : वह विपक्ष के कई नेताओं की तरह हैं। हमें बतौर कांग्रेस पार्टी तीन चीजें करनी हैं। पहला, हमें खुद को बदलना होगा, ज्यादा युवाओं को लाना होगा और उन्हें जगह देनी होगी। इसके अलावा हमें मैन्युफैक्चरिंग पर जोर देना होगा। हमने नॉर्थ, साउथ, ईस्ट-वेस्ट कॉरिडोर बनाए हैं और भारत को मैन्युफैक्चरिंग सुपर हाउस बनाना होगा।

अरनब : क्या आप आम आदमी पार्टी को एंटी कांग्रेस वोट बैंक काटने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं? 
राहुल : आपका मतलब है कि क्या हम आप को लेकर आए हैं। मुझे लगता है कि आप कांग्रेस की ताकत को कम करके आंक रहे हैं। यह पार्टी अगर ऐसा चाहे तो भी असर नहीं करेगी। कांग्रेस बहुत पावरफुल सिस्टम है और हमें चुनावों में नए चेहरों को लाने की जरूरत है, जो हम करने जा रहे हैं और हम चुनाव जीतेंगे।

अरनब: क्या आप चुनाव जीतेंगे? अगर ऐसा नहीं हुआ तो इसकी पूरी जिम्मेदारी लेंगे?
राहुल: हां हम चुनाव जीतेंगे। अगर नहीं जीते तो पार्टी उपाध्यक्ष होने के नाते मैं इसकी पूरी जिम्मेदारी लूंगा।

साभार नव भारत टाइम्स डॉट कॉम

Friday, January 17, 2014

मिथिला राज्य आंदोलन - इतिहास और वर्तमान

भारत में प्रस्तावित म‍िथ‍िला राज्य
विष्णु पुराण के मिथि‍ला पुराण अध्याय और चंदा झा लिखि‍त रामायण के आधार पर अलग मिथिला राज्य आंदोलन का आधार बताया जा रहा है। लेकिन जार्ज ग्रीर्यसन के १८९१ में हुए भारतीय भाषा सर्वेक्षण ने इस बात को और बल देने का काम किया। बिहार के २४ जिलें (अररि‍या, बांका, बेगुसराय, भागलपुर, दरभंगा, पूर्वी चम्पारण, जमुई, कटिहार, खगड़ि‍या, किशनगंज, लखीसराय, मधेपुरा, मधुबनी, मुंगेर, मुज्जफरपुर, पुर्णि‍या, सहरसा, समस्तीपुर, शेखपुरा, शि‍वहर, सीतामढ़ी, सुपौल, वैशाली और पश्चिमी चम्पारण) और झारखंड के ६ जिले (देवघर, दुमका, गोड्डा, जामताड़ा, साहेबगंज और पाकुड़) को मिलाकर अलग मिथि‍ला राज्य बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

झारखंड राज्य के अलग होने के अगले ही दिन यानी ४ अगस्त २००४ को एक प्रेस कांफ्रेस में बिहार के पूर्व महाधि‍वक्ता एवं भाजपा नेता पं० ताराकांत झा ने अलग मिथि‍ला राज्य हेतु आंदोलन की घोषणा कर दी। भाजपा से निष्कासि‍त होने पर वे मिथिला आंदोलन को समय समय पर हवा देते रहे परन्तु विधान परिषद सदस्य बनते ही उन्होने इस आंदोलन को ठंडे बस्ते में डाल दिया।

वर्तमान में मिथिला राज्य आंदोलन के लिए सबसे सक्रिय और पुरानी संस्था अंतर्राष्ट्रीय मैथि‍ली परिषद है जिसकी कमान मुख्य रूप से डा. धनाकर ठाकुर और डा. कमल नाथ ठाकुर के हाथों में है, वहीं महासचिव के. एन. झा दिल्ली में रहकर भी कार्यकर्ताओं के संग जमीनी रूप से जुड़े हुए हैं।

उधर अखिल भारतीय मिथिला राज्य संघर्ष समिति के अध्यक्ष और विद्यापति सेवा संस्थान के महासचिव वैद्यनाथ चौधरी बैजू भी समय समय पर मिथिला आंदोलन को हवा देते रहते है। इन्होनें मिथिला आंदोलन को धरना, रैली और बैठकों से आगे बढ़ाते हुए साहित्य अकादमी, मिथि‍ला के नाम पर पुरस्कार और अनुदान को बढ़ावा दि‍लाने का भी काम किया है, वैसे इनकी सक्रियता मिथि‍ला के बाहर ज्यादा रहती हैं और पूरे देश के मैथि‍लों को जोड़ने का भी किया इन्होनें किया है।

इसके बाद मिथि‍ला आंदोलन के लिए आगे आए स्व. जयकांत मिश्र और इन्होने मिथि‍ला राज्य संर्घष समिति का गठन किया और मिथि‍ला राज्य आंदोलन को एक नयी आवाज दी। वर्तमान में चुनचुन मिश्र इसके अध्यक्ष एवं उदयशंकर मिश्र इस संस्था के महासचिव हैं।

दिल्ली में प्रवासी मैथिलों को जोड़ने के लिए अखिल भारतीय मिथिला संघ के अध्यक्ष पूर्व सांसद राजेन्द्र प्रसाद यादव एवं महासचिव विजय चंद्र झा की सक्रियता भी दिल्ली में मिथिला आंदोलन को जगाए हुए है।

वहीं यूथ ऑफ मिथिला (अंतर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद की दिल्ली इकाई) और वॉईस ऑफ मिथि‍ला के भवेश नंदन और आनंद कुमार झा जमीनी कार्यकर्त्ताओं, युवाओं एवं बुद्धिजीवियों को जोड़ने में जुटे हैं। यह दोनो संस्था समय समय पर दिल्ली में विभीन्न प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन कर दिल्ली में अपनी उपस्थ‍िति और मिथिला आंदोलन को हवा देने का काम कर रही है।

उसके बाद समय समय पर मिथि‍ला राज्य के निर्माण के लिए बहुतो लोग आगे आए कभी मिथि‍लांचल विकास सेना के नाम पर तो कभी दीना भद्री संस्थान, और मिथिला फ़ॉउडेशन आदि के नाम पर लेकिन हाल में ही २२-२५ मार्च तक दिल्ली के जंतर-मंतर पर चार दिनों का आमरण अनशन कर राजीव कुमार झा उर्फ कवि एकांत ने इस आंदोलन को एक नयी जान देने का काम किया। उन्होनें सभी संगठनों से एकजुट और एकसाथ मिलकर आंदोलन को बढ़ावा देने का न्योता दिया ताकी आंदोलन को मजबूत तरीके से पेश किया जा सके और सरकार पर दबाव बनाया जा सके। अभी राजीव जी राइज फॉर मिथि‍ला के नाम से एक नया दल बनाकर आंदोलन को हवा देने में लगे हैं।

अभी हाल में मिथि‍ला राज्य की लड़ाई के लिए जो संस्था सबसे आगे है वो है मिथि‍ला राज्य निर्माण सेना बहुत कम से सबसे ज्यादा जमीनी कार्य, धरणा प्रदर्शन और चक्का जाम कर देश को प्रमुख लोगों का ध्यान अपने और आकर्षि‍त करने का काम किया। इनके ही प्रयासों के फलस्वरूप भाजपा के सांसद कृति आजाद भी मिथि‍ला राज्य आंदोलन के लिए कूद पड़े हैं। चाहे बात रथ यात्रा की हो या जंतर मंतर पर प्रदर्शन की इन्होंने देश के दिग्गज नेताओं को साथ कर आंदोलन का रूख अपनी और करने का काम किया है।


क्यों जरूरी है मिथि‍ला आंदोलन –:

तेलांगाना के अलग राज्य कि मांग ने मिथि‍ला राज्य आंदोलन को और हवा दे दी है। इस बीच केन्द्र सरकार को दस नये राज्यों के गठन के प्रस्ताव का आवेदन मिलने पर सरकार ने मिथिलांचल राज्य की मांग पर विचार करने की बात कह कर आंदोलनकारियों को लड़ाई लड़ने का एक रास्ता व मुद्दा बना दिया। सूत्रों की माने तो गृह मंत्रालय ने अब तक इस संबंध में कोई फैसला नहीं लिया है लेकिन बताया जाता है कि नये राज्य के गठन के संबंध में विभिन्न पक्षों और स्थितियों का अध्ययन कराने के पश्चात ही केन्द्र सरकार कोई निर्णय देगी, जिसका इंतजार इलाके के लोगों को है।

अपनी संस्कृति, अपनी भाषा, अपना व्याकरण, अपनी लिपी और जनसंख्या के लिहाज से मिथिला एक अलग राज्य होना भी चाहिए। बिहार से बाहर, बिहार का मतलब भोजपूरी होता है। जबकि मैथि‍ली बिहार में प्रमुखता से बोली जाने वाली भाषा है। मीडिया ने भी बिहार का महिमामंडन भोजपूरी से ही किया है। इन्हे बिहार के नाम पर गौतम बुद्ध तो दिखाई देतें है लेकिन जनक और माता सीता नहीं दिखायी देतें। यहाँ तक की बिहार गीत में भी मैथि‍ली और मिथि‍ला की उपेक्षा कि गई पुरे बिहार गीत में ना तो कवी विद्यापती है ना हीं माता जानकी। यहाँ तक की विकाश के नाम पर भी मिथि‍ला की उपेक्षा की गई। आज कोई भी कारखाना, विश्वविद्यालय आदि खोलने की मांग होती है तो उसे मगघ क्षेत्र में धकेल दिया जाता है। आई आई टी की बात हो या केन्द्रीय विद्यालय की मिथि‍ला हमेशा से उपेक्षीत रही है और यही कारन है जो अलग मिथि‍ला राज्य के आंदोलन को बढ़ावा दे रही है।

बिहार सरकार के उपेक्षाओं का हाल ये है कि आजादी के समय बिहार के राजस्व का कुल ४९ फीसदी मिथि‍ला क्षेत्र से आता था और जब २००० में झारखंड राज्य का बटवारा हुआ तो यह योगदान घटकर मात्र १२ फीसदी रह गई है। यानी मिथि‍ला इन पसास सालों में करीब चार गुणा गरीब हो गई है। यह सोचने वाली बात है जबकि अन्य क्षेत्र अमीर पर अमीर होते जा रहें है मिथि‍ला क्यों पिछड़ता जा रहा है। क्या इस क्षेत्र का पैसा इसी क्षेत्र में लगाया जाता है। अगर नहीं तो ऐसा क्यों। ये सोचने वाली बात है। क्योंकि अलग मिथि‍ला राज्य के बिना ये संभव नहीं है।

इस तरह बाढ़ भी मिथि‍ला इलाके की प्रमुख समस्या है। लेकिन आजादी से पहले ही लोर्ड वेवेल ने इसके निदान के लिए एक महत्वकांक्षी परियोजना बनाई थी। बाराह क्षेत्र में कोसी पर हाई डैम बनाना था। अनुमान था कि इस परियोजना के पुरा होने से मिथि‍ला क्षेत्र में समृधी आऐगी और बिहार इस भारी विभीषि‍का से बच पायेगा। लेकिन आजादी के बाद बनी बिहार सरकार ने बहाने बनाकर इस परियोजना से अपना हाथ खीच लिया और नतीजा हम सबके सामने है। शायद सरकार को डर था कि बाढ़ के नाम पर जो ये लाखों वोट हमें मिथि‍ला क्षेत्र से आता है वह इसके समृद्ध होने के साथ ही खतम ना हो जाए। यह बिहार सरकार की अनिच्छा का ही परिणाम था कि केन्द्र सरकार भाखड़ा नंगल परियोजना की और उन्मुख हुई और आज पंजाब का काया-कल्प कर गई। आज पंजाब देश में सबसे ज्यादा कृषि‍ उत्पादन के लिए जाना जाता है और उसी पंजाब के खेत में मिथि‍ला के किसान मजदुर बन कर काम करने को मजबूर हो गए है। इधर कोशी बांध परियोजना का पैसा दामोदर घाटी परियोजना में लगाकर मिथि‍ला के साथ एकबार फिर भेदभाव कर दिया गया।

दिल्ली हो मुंबई मिथि‍लावासी हाथ फैलाने को मजबुर है। आज इन मिथिला वासी के ही बदौलत दिल्ली, पंजाब, मुंबई और गुजरात विकाश के नित नये आयाम रच रहा है और मिथि‍ला दर दर कि ठाकरें खा रहा है। इसलिए भी ये जरूरी है कि मिथि‍ला राज्य अलग हो क्योंकी जो सपना मिथि‍ला वासी सोते जागते देखते आ रहें है वो बिना मिथि‍ला राज्य के संभव नहीं है।

क्रमश:
अगले अंक में पढ़गें क्या हुआ अगर मिथ‍िला राज्य हो जाता है अलग।

Monday, January 13, 2014

कुड़े के ढ़ेर पर खड़ा उम्मीदों का शहर – पटना

पिछले चंद महिनों से पटना में हूं। अच्छा शहर है। जैसा की हरेक शहर के साथ होता है कुछ अच्छायाँ है तो ढ़ेर सारी बुराइयॉ भी है। तो फिर से शुरू से शुरू करते है अपने पटना की ये कहानी। बात करीब तीन महिनें पुरानी है। एक अभीन्न मित्र के कहने पर पटना आया था। उन्होनें भरोषा दिलाया था कि पटना में पेट पालने का इंतजाम करवा देंगे। तो उत्सुक और ललायीत होकर पटना था। चुकीं पटना में अपना बिहार बसता हैं और दिल्ली में रहूं तो इंडिया में रहने का अहसास होने लगा था इसलिये पटना के लिये कुछ ज्यादा ही उत्सुक था। यहां इंडिया का जिक्र इसलिये क्योंकी दिल्ली अब लगभग अंग्रेजी या अंग्रेजो के सिकंजे में जकड़ गयी है। लोग हिंदी का प्रयोग अब रिक्शेवाले और जुता-पॉलीस करने वाले से भी करना पसंद नही करने लगे है। कुछ तो अंग्रेजी कंपनीयों में काम करनें का असर कुछ अपने आप को उस रंग में ढालने की कोशीश। खैर अपना क्या था मन जब तड़पने लगा तो भाग आया यहाँ वैसे बड़े भाई से भी अभीन्न मित्र ने भरोषा दिलाया था तो इतना तो लाजीमी था कि पेट पालने का जुगाड़ करवा ही देंगे। सो आशा, उत्सुकता, और ललायीत हुए आ गये पटना। अब जब आ गये तो मानव की मुलभुत व्यवस्था जैसा कि अरस्तु साहब कह गये हैं, रोटी, कपड़ा और मकान की खोज शुरू हुई। बाप रे बाप पुछीये मत....। इससे अच्छा तो दिल्ली थी। एकबार किसी मित्र को आवाज भर देने की देर होती थी कि पचास कमरे की लिस्ट सामने आ जाती थी। यहां एक मित्र थे लेकिन थे बड़े पक्के। पुरे एक महीने तक अपने साथ रखा। खिलाया पिलाया, अपने साथ रखा अपने परिवार की तरह। सचमुच उनका स्नेह और प्यार मैं कभी नही भुल पाउंगा। मुझे महसुस ही नहीं हुआ कि मैं अपना पुराना बसेरा, अपने पुराने मित्र सबको छोड़ के आया हूं। इतना प्रेम शायद ही कभी मुझे मिला हो। खैर...उन्होने भी रहने के लिए छत ढ़ढने के लिए एड़ी चोटी का जोड़ लगा दिया लेकिन मकान था कि‍ मिलने का नाम ही नहीं ले रहा था। कुछ मिला भी तो वो मन मिज़ाज को नही भाया। मैं थोड़ा परेशान हो गया। ज्यादा दिनों तक मित्र के यहाँ भी रहना ठीक बात नहीं है। वैसे मित्र ने एक भी बार ये नहीं कहा कि तुम कमरा क्यों नही ढ़ुढते हो वगैरह वगैरह। हमेशा कहते रहें अरे छोड़ि‍ये ना क्या हुआ जो नहीं मिल रहा है। यहाँ क्या दिक्कत हो रही है। काई दिक्कत तो नही है ना...वगैरह...वगैरह। लेकिन क्या करें मानव मन है...हमेशा विलग ही सोचता है। सो जैसे जैसे मित्र तसल्ली देते थे वैसे वैसे कमरा ढ़ुढ़ने की इक्षा और बलवती होती जाती थी। कई जगह देखा, मित्र के एक जान पहचान वाले जिनकी इस इलाके में काफी पकड़ है के साथ कई कई दिनों तक कितने जगह की खाक छानता रहा। कभी घर पंसद नही आए और कभी बहुत पसंद आ भी जाए तो मकान मालीक हम जैसे कथीत बैचलर (बकौल कुमार विश्वास : बैचलर बेचारे अपने मोहल्ले में प्रसीद्ध होते हैं लेकिन पड़ोसी के नज़र में गिद्ध होते है) को कमरा देने के लिए तैयार नही थे। नहीं भैया हमारे घर में बहु बेटीयाँ है, (जैसे हम उनकी इज्ज़त लुटने को आए हो) हम बैचलरों को कमरा नहीं दे सकते। फैमली वालों को ही कमरा मिलेगा। थक-हार कर कभी-कभी तो मन करता था कि शादी ही कर लूं लेकिन फिर मैने दिल को समझाया कि क्यों सात जन्मों तक झान बुझ कर दुख उघार ले रहा है, शादी शादी नही बरबादी है वगैरह, वगैरह। खैर बड़ी मिन्नतों के बाद दिल माना। अगर कोई कमरा मिलता भी जो बैचलर को कमरा देने के लिए तैयार होता तो उनकी शर्त होती थी कि रात नौ बजे के बाद मेन गेट बंद हो जाएगा। हम शाकाहारी है मीट-मछली-मुर्गा कुछ भी नही चलेगा, जोर से म्युजीक नहीं बजेगा, दोस्त घर पर नही आने चाहिए आदि आदि। 

खैर जब हमारी सारी कोशीशे बेकार गयी तो एक साहब ने मुफ्त की सलाह दी भाई साहब यहाँ कमरा ऐसे नही मिलेगा किसी प्रोप्रटी एजेंट से बात करो। वही तुम्हारी नैया पार लगा सकता है। हमने सोचा इतना हुआ तो ये भी ट्राय करके देखा जाय। निकल पड़े टू लेट वाले इस्तेहारो से ढ़ूढ कर नंबर उपर किया और फिर कॉल पर कॉल। कुछ नंबर मिला भी कुछ ने समय भी दिया। हे भगवान। ये प्रोपर्टी डीलर थे या वकील पता ही नहीं चल पा रहा था। इनसे बात करने के लिए भी फीस देनी पड़ी। अरे हाँ । इन्होने पहले तो रजीस्ट्रेशन चार्ज के नाम पर १००० रूपया लिया फिर दो ऐसे सड़े हुए घर दि‍खाए जिसे हम पहले ही रीजेक्ट कर चुकें थे। लो जी हो गयी थई। अब क्या करे हारकर हमने एक मित्र का सहारा लिया और उसके साथ ही सिफ्ट हो गऐ उनके साथ। अब फिलहाल वहीं है और मजे ले रहें है। 

वैसे सच कहू तो दिल्ली जैसी साफ सफाई नहीं है यहाँ लेकिन जैसा की सुनता आया था कि लाइट नही रहती है वैसा कुछ भी नहीं है। बिजली 24 घंटे रहती है। और लोग हेल्पफुल है। हां कुछ अगर ज्यादा है तो वो है राजनीति‍, ऐसा लगता है जैसे लोगों के खुन में ही राजनीति घुसी हुई हो। लोग एकदुसरे को देखना पसंद नही करते है। हमेशा एक दुसरे को नीचा दिखाने की कोशीश में लगे रहते है। और जो सबसे बुरा लगता है वो है यहा के लोक-व्यवहार (मैनर और एटिकेट), यहाँ के लोगों में इसका घोर अभाव है। कहीं भी थूक देना। कही भी हल्का होना लेना। कुड़े की ढ़ेर की तरह कुछ भी कही भी बेतरतीब कर देना यहाँ की खासियत है। और सबसे गन्दी बात ये है कि लोगों को आप कुछ समझा नही सकते है। सीधी और बेतरतीब तरीके से ऐसे जबाव देते है कि आपको कुछ बोलते ही नही बनेगा। मसलन अगर किसी भाई साहब को कहो कि यहाँ मत थुको तो उनका जबाव होगा मैं तो यही थुकूंगा, तुझे चुल है तो तु साफ कर ले। या क्या कर लेगा बे मैं तो यही थुकूंगा आदि आदि। राजधानी होने के बावजूद भी एक भी जगह कुड़े का डब्बा नहीं मिलेगा। नालीयां भरी हुई मिलेगी। मुख्य सड़क से निचे उतरने पर गाँवों से भी बुरी जिदंगी नज़र आएगी। अभी कल की ही बात है हल्की बुंदा बांदी ही ने कैसे यहाँ की पोल खोल दी है। जगह जगह कीचड़ और गंदगी ने जीना यहाँ के लोगों का जीना मुहाल कर दिया है। लोग सड़को पर पैदल चलने से घबराने लगे है, पता नहीं कब पैर स्लीप हो और शरीर नाली के अंदर पड़ा हो। लेकिन फिर भी लोग जी रहे है। एक उम्मीद और एक आश लेकर। शायद वो सोचते है कभी तो उनके सपनों का शहर बनेगा ये पटना। 

अरे हाँ, कुछ मज़ेदार बात तो लिखना भुल ही गया। कुछ प्वाइंट जो हमें पटनीया संस्कृती से परिचय करवाता है।
  • सबसे पहला अगर भैया आपको कमरा चाहिए तो आपका शादी शुदा होना पड़ेगा।
  • आप अगर ऑटो में बैठे है तो आगे पिछे होकर बैठीये या फिर पतले होकर आइये।
  • यहाँ आपको पिज्जा हट, कैफे कॉफी डे, से लेकर बिग-बजार, और विशाल मेगा मार्ट आदि के नाम भी हिंदी में लिखा मिलेगा।
  • यहाँ गोलगप्पा खाने के बाद सुखा दिया जाता है, लोग गोलगप्पे का पानी नहीं मांगते ना ही मीठा पापड़ी।
  • रिक्शे का किराया दस रूपये से कम नहीं होगा। चाहे बैठ कर उतर हीं क्यो ना जाओ।
  • सड़को को नाम विदेशो के तर्ज पर देखने को मिलेगा मसलन एक्जीवीशन रोड, फ्रेजर रोड, आदि आदि।
  • यहाँ अंग्रजी की तो बात ही मत पुछीये हम हिंदी की भी माँ बहन करके बोलते है। मसलन कैइसन आ‍दमी है हो, किरीया खाकर कहते है, आदि आदि।
  • स को श, और श को स कहना यहाँ के लोगो का जन्मसि‍द्ध अघि‍कार है। वैसे र को ड़ और ड़ को र भी बोलने में हम सबसे आगे हैं।
  • लिट्टी चोखा हरेक दस कदम की दुरी पर मिल जाएगा।
  • गोलगप्पा कब पटना आकर फुचका बन गया पता ही नहीं चला।
और भी बहुत कुछ है, याद आने पर कभी आराम से लिखा जाएगा। अभी तो बस इतना ही कह सकते है कुड़े के ढ़ेर पर उम्मीदों की आश लगाया एक शहर है जिसका नाम पटना है। जो अशोक और गुरू गोविन्द सिंह के नाम को अभी भी नहीं भुला सका है। लेकिन याद रखने लायक भी नहीं छोड़ा है।

Wednesday, January 8, 2014

प्र‍ियतमा के नाम एक खुला पत्र

प्रियतम,

बहुत दिनों से एक बात कहना चाह रहा हूं लेकिन पता नही चल पा रहा था कि‍ कैसे बताउ। एक बात जो बार बार मन को कचोट रहा है वो ये है कि, क्या मैं सच में इतना बुरा गया हूं या ऐसा सिर्फ तुम्हे लग रहा है। प्र‍ि‍य शायद ये बात तुम्हारे समझ में नही आये लेकिन मैं आज भी तुमसे उतना ही प्रेम करता हूं जितना करता आया था। आज भी मेरे दिल में तुम्हारे लिये वही जगह है जो पहले थी। लेकिन प्रिय शायद मैं आज तुम्हे उतना समय नहीं दे पा रहा हूं जितना पहले देता था। या शायद नहीं; पहले भी मैं तुम्हे समय कहाँ दे पाता था वो तो हम एक ही ऑफिस में काम करते थे इसलिये शायद मिल लेते थे या आठ घंटे हम एक दुजे को देख लेते थे। (ये तुम्हारे ही शब्द है, शायद कुछ याद आ जाये). प्रिय मुझे आज भी याद है समय को लेकर हमारे बीच(नहीं..नहीं सिर्फ मेरे) कितना हो-हल्ला, चिल्ल-पो मची रहती थी। तुम्हारी हमेशा शिकायत रहती थी कि मैं तुम्हे समय नहीं दे पाता हूं। बकायदा तुमने तो उंगलीयों पर गिन भी रखा था कि हम कब-कब और कहाँ-कहाँ मिले है। एक-एक दिन वो छोटा सा छोटा लम्हा; पता नहीं तुम्हे इतना याद कैसे रहता है। ये लड़कियाँ होती ही ऐसी है लड़को में नुक्स निकालने और उन्हे निचा दिखाने में मजे लेने वाली। खैर....। एक दिन टेलीफोन पर बात नहीं होने से तुम ऐसे करने लगती थी जैसे मैने कोई बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो, और गुनाह भी ऐसा जिसका प्रायश्चि‍त करना नामुमकीन हो। तुम्हे ऐसे लगता था कि मैं हर पल तुम्हारे पास रहूं तुम्हारे नजरों के सामने...मैं आज तक ये नहीं समझ पाया कि ये तुम्हारा प्यार जताने का नजरीया था या तुम खुद को अनसिक्योर फील करती आ रही थी कि जैसे ही मैं नजरो से ओझल होउंगा कोई और नयी प्रियतमा की तलाश में लग जाउंगा। या मैं एक मिनट के लिये भी नजरो से ओझल होउंगा और अलादिन के जिन्न कि तरह हवा हो जाउंगा।

ये तो रही पुरानी बातें अब नयी बातों पर आता हूं। आजकल हमे पता है कि हम एकदुसरे से दुर है लेकिन तुम हमेंशा मुझे ये क्यों बतलाती रहती हो कि मैं तुमसे दुर हूं? या मैं जानबुझ कर तुमसे अलग हो गया हूं? प्रिय तुम्हे पता है जुदाई का दर्द मेरे अंदर भी है, मुझे भी तुम्हारे पास नहीं होने का गम सताता है। मुझे भी लगता है कि हम साथ होते थे तो अच्छा लगता था; मुझे भी तुम्हे भी। हमे ये भी मालूम है कि पहले कितना भी रूठो अगली सुबह तो मिलना हो ही जाता था जो की अब नही हो पाता है। हम एक दुसरे के चेहरो को देखकर भी संतोष कर लेते थे। समझ जाते थे ‍एक दुसरे को देखकर, उनके चेहरे को पढकर। और जब हम दुर हुये है तो ना वो चेहरा है और ना ही तुम्हारा सामिप्य। तुम्हे शायद पता नहीं है लेकिन मैं भी उतना ही उदास होता हूं जितना की शायद तुम होती होगी हमारी दुरीयों से। लेकिन प्र‍ि‍य तुमने कभी हमारे इस दुख को नहीं समझा हमेंशा मारती रही ताना कि तुम मुझे भूल गये हो या अब मैं याद क्यों आउ तुम तो नयी जगह पर आ गये हो तुम्हे नयी मिल जायेगी वगैरह-वगैरह। और जो तुम्हारा सबसे बेहतरीन राग है, वो है ‘’मिलने कब आ रहे हो’’। प्र‍ि‍य क्या तुमने कभी सोचा है ये 2700 किलोमीटर ‍की दुरी यूं ही तय नही होती, पुरे दो दिन लगते है। और हवाई जहाज से जाने लायक अपनी औकात नहीं हुई है अभी। फिर भी तुम मर्फिन कि सुईयों कि तरह हर रोज हर सुबह, हर दिन कोंच-कोंच कर सुनाती रहती हो कि मैं तुमसे मिलने नही आ रहा हूं। एक मिनट अगर तुम्हारा फोन लेट से उठाउ तो तुम्हे लगता है कि मैं कहीं और(बकौल तुम्हारे शब्दों में किसी और लड़की के साथ) व्यस्त हूं। कभी तुमने ये नहीं सोचा कि कुछ मजबूरीयाँ रही होगी इसलिये फोन नही उठा सके या फोन नही कर सके। लेकिन नहीं...। ऐसा कभी नही हुआ। मेरे हरेक लेट कॉल या कॉल नही करने पर मुझे एक-एक घंटे तक एक्सप्लेनेशन देना पड़ता है लेकिन फिर भी मैं तुम्हे ये नही समझा पाता हूं या तुम समझ नहीं सकती हो कि ऐसा क्यों होता है। तुमने कभी भी मेरे एकबार कहने पर ये नहीं मान लिया कि हां ये बात थी। हमेशा बात को बहस में ही तब्दील करके खत्म किया। चलो मैं इसे भी अपनी ही गलती मानता हूं। मेरे अंदर ही वो काबीलियत नहीं थी कि मैं तुम्हे समझा सकू लेकिन क्या कभी तुमने सोचा है कि प्यार में बहस करना या शक करना क्या जायज है। या एक ही बार में बात मान लेने से दोनो का भला नही हो सकता। या तुम्हे हमेशा ऐसा क्यों लगता है कि मैं झूठ बोल रहां हूं। पहले तो तुम्हे ऐसा नही लगता था। पता नहीं आज-कल तुम्हे क्या हो गया है। प्रेम पर या अपने प्यार पर भरोसा क्यों नहीं रहा।

एक छोटी सी कहानी सुनाता हूं प्लीज इसे उपरोक्त बातों से लिंक मत कर लेना ये बस ऐसे ही है याद आ गया तो सोचा लिख दूं। एक बार कबीर दास से मिलने एक व्यक्ति‍ पहुंचा। बातों ही बातों में उन्होने कबीर जी पुछा कि गुरूदेव एक बात बताइये ‘क्या शादी करनी चाहिये’? जाड़े का समय था कबीर दास जी धुप मे बैठ कर कुछ लिख रहे थे उन्होने बिना उत्तर दिये अपनी धर्मपत्नी को आवाज लगाई जरा लालटेन(लैम्प) जला कर लाना। कबीर की पत्नी ने चुपचाप लालटेन जला कर कबीर के पास लाकर रख दी और अंदर चली गयी। उस व्यक्त‍ि को घोर आश्चर्य हुआ उन्होने कबीर जी से कहा गुरूदेव इतनी धुप है सब कुछ साफ-साफ दिखाई दे रहा है फिर इस लालटेन का क्या प्रयोजन। कबीर जी ने जबाव दिया यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है। पत्नी शांत हो आज्ञाकारी हो और किसी भी बात पर आपस में मतभेद नहीं करती हो तो शादी करनी चाहिये।

मुझे पता है तुम क्या सोच रही होगी इस कहानी को पढ़कर लेकिन प्लीज ऐसा कुछ मत सोचना। हां इतना जरूर कहना चाहुंगा कि मैं रोबोट नहीं बनना चाहता हूं। मुझे इन्सान ही रहने दो। रूटीन में मुझे मत बांधो, मुझे स्वछंद ही जीवन गुजारने दो। मत रखो मुझसे कोई आशा बस अपना लो मुझे। इससे ज्यादा शायद मैं कुछ ना लिख सकू।

तुम्हारा
प्रिय

Monday, January 6, 2014

एक यादगार सफर की कहानी खुद अपनी जुबानी

पता है कल का सफर, शायद ही कभी भुल सकू। एक छोटी सी यात्रा कैसे मजेदार और यादगार बन गयी पता ही नही चला। इस बार नव वर्ष के लिए मामाजी के यहां आया हुआ था। मंशा दो थी, पहला अपने ममेरे भाईयों के संग नव वर्ष ( जैसा कि‍ पिछले कई वर्षों से अपने अनुज भ्राता से सुनता आया हूं की उनके संग नव वर्ष मनाना बेहद मज़ेदार और शानदार होता है) मनाया जाय। और दुसरा अपनी आँख जो पता नही क्यों अब सही तरीके से काम नहीं कर रहा है। दृष्टी दोश का तो नहीं कहा जा सकता हॉ कभी-कभी अत्याधि‍क लाल और आँखों से पानी आने की शि‍कायत रहती है, को अच्छे तरीके से जांच करवाया जाय। मैने सुना था कि नेपाल आँखों के इलाज के लिए एशिया में सबसे बेहतरीन जगह है। खैर...

निकल पड़ा अपने सफर पर और माशा अल्लाह एकदम अजीब, रोमांचक, मजेदार और ना जाने क्या क्या।

हमने पिछली रात ही प्रोग्राम बनाया था कि सुबह जल्दी निकला जाय, लेकिन रात की खुमारी पता नहीं हम युवाओं को सुबह के ८-९ बजे से पहले उतरती हीं नहीं है। तो जैसा की पहले से तय था कि जल्दी उठना है उसको तहस-नहस करके हम १० बजे तक तैयार हुए और चल पड़े अपने यादगार सफर पर।

जैसे ही हम विरपुर, जिला-सुपौल के गोल-चौंक पहुंचे देखा की एक भी ऑटो नहीं है, पुछने पर पता चला कि ऑटो अब बस स्टैंड जो कि करीब एक किलोमीटर दूर है से मिलेगा ठीक है भाई हम वहां भी पहुंचे, जैसे-तैसे एक मैजीक मिला, जैसे-तैसे इसलिए कि हमने करीब १०-२० ऑटो वालो से पुछताछ की उसके बाद जाकर ये मिला। खैर हम भेड़ बकरीयों की तरह उसमें बैठे। भेड़-बकरी इ‍सलिए कि एक सीट पर पता नहीं कितने लोग बैठे थे। खैर...अभी हम कुछ दुर हीं चले थे कि सामने एक व्यापरी जो रास्ते में अपने सोनठी (पटसन निकालने के बाद जो डंठल बच जाता है) का करीब २० बोझा (गट्ठर) लेकर रास्ते में खड़ा था गाड़ी को मजबुरन वहां रूकना पड़ा और फिर चला सोनठी को उस पर चढ़ाने का सिलसिला। दुर से दिखने वाला वो बीस बोझा कब ३०-४० बोझ में बदल गया पता ही नहीं चला। खैर एक एक कर सारे गट्ठरों को उस पर चढ़ाया गया। लो जी हो गया एक घंटा बर्बाद। चढ़ाने के बाद उस गट्ठर का जो असली मालीक था वो और उस व्यापारी में पैसे को लेकर बहस होने लगी। व्यापारी के पास पुरे पैसे नहीं थे और मालीक बिना पैसे के उसे जाने नहीं देना चाहता था। बहस बढ़ी और फिर खींचती गयी। एक घंटे तक हमारे संग गाड़ी के सभी लोग मूकदर्शक बनें रहे। करीब एक घंटे के बहस के बाद मालीक ने गाड़ी ड्राईवर से बोझा उतार देने के लिए कहा। अब ड्राईवर इस बात पे अड़ गया कि हमें तो किराये के पैसे चाहिए। इतनी मेहनत से उसे चढ़ाया है, इतना पसीना बहाया है, हाथ में छाले पड़ गये है। मैं तो बिना पैसे लिए नहीं उतारूंगा। उसके बाद फिर शुरू हुई व्यापारी और ड्राईवर के बिच हि‍ल-हुज्जत। और अंतत: व्यापारी को १०० रूपये देने ही पड़े। खैर कैसे भी हो विवाद खतम हुआ और यात्रा प्रारंभ हुई। अभी मुश्कील से गाड़ी ५ किलोमीटर भी नहीं बढ़ने पाई थी की अचानक गाड़ी रूकी और एक यात्री उतर कर सामने के बैंक में चला गया। मैने सोचा इन्हें यहीं तक जाना था इसलिए ड्राईवर ने गाड़ी रोकी होगी लेकिन जब १० मिनट तक गाड़ी यू हीं यंत्रवत खड़ी रही तो मैने ड्राईवर से पुछा भाई साहब गाड़ी आगे क्यों नहीं बढ़ा रहे हो। उसने कहा क्या बताये भाई साहब... अभी-अभी जो बंदा बैंक गया हुआ है उसी के लिए गाड़ी रोक कर रखा है उसने कहा कि अभी १० मिनट में लौट आउंगा। मैं सन्न रह गया। एक बंदे के लिए गाड़ी के सारे पैसेंजर परेशानी उठा रहें है। ड्राईवर ने कहा क्या करें भाई आज अगर नहीं रुका तो कल से ये मुझे इस रास्ते में रुकने भी नहीं देगा। हो सकता है मारपीट भी करें। मै हतप्रभ। ऐसा ट्रनों में तो हमारें यहाँ होता ही रहता है। धमहरा घाट रूट याद ही होगा आप सबों को किस तरह गोप की मनमानी चलती है। और शायद आपको पता भी होगा भारत में ट्रेन हाइजेक भी सबसे पहले बार हमारे यहां ही हुआ था। हां हां हमारे यहां वर्षों से ऐसा ही होता आया है। वैसे इन छोटे गाड़ीयों में इस तरह की मनमानी पहली बार देख रहा था। उसके बाद तो गाड़ी रूकने का सिलसिला बढ़ता ही गया कभी पान खाने के बहाने कभी चाय के बहाने वगैरह-वगैरह। खैर जैसे-तैसे हम जोगबनी पहुंचे। वहां रिक्शा वालों ने घेर लिया। अपनी मनमानी...अरे भाई कैसे पैदल जाओगे। बॉर्डर तक पैदल ही चलना पड़ेगा। हम रिक्शा पर चढ़े और चल पड़े अभी बॉर्डर पार किये ही थे कि रिक्शा पंक्चर हो गया। लो भैया बढ़ गयी मुश्कीलें वैसे जाड़े की धुप गुनगुनी थी लेकिन फिर भी दूर-दूर तक रिक्शा ठीक होने का कोई निशान नहीं दिखाई दे रहा था। हम पैदल ही आगे बढ़ते रहे और रिक्शा वाले को आगे भेज दिया ताकि वो रिक्शा ठीक करवा सकें। करीब २ किलोमीटर चलने के बाद रिक्शा चालक एक दुकान पर पंक्चर ठीक करवाता मिला। चुंकि‍ भुख भी बहुत लगी थी इसलिए हमलोग भी पास के दुकान में मोमो खाने बैठ गये। मोमो भी ऐसा की जब ऑर्डर दिया तभी तैयार होने गया। खैर मोमो और उसकी चटनी अच्छी थी। हमने मजे लेकर खाया और फिर चल पड़े गंतव्य की और। हम हॉस्पिटल पहुंचे और रिशेप्शन पर पर्चा कटवाया। हमे ये देखकर हैरानी हुई की इतने बड़े अस्पताल की फीस मात्र २२ रूपये थी। अस्पताल में करीब १०० से ज्यादा स्टॉफ थे कैसे मैनैज होता था और खर्चा चलता था ये तो भगवान ही जाने। खैर हमें लगा ऐसा सिर्फ यहीं हो सकता है हमारे यहॉं तो इसी बात के कम से कम १००० रूपये लगते। वैसे आँखों का इलाज तसल्लीबख्स हुआ। करीब ६ चरणों में विभीन्न प्रकार के जांच के बाद डा. ने बताया कि आँख में कोई दोश नहीं है बस ज्यादा देर तक लैपटॉप पे काम करने के कारण आँखे ड्राय हो जा रही है। कुछ दवाई लिखी गयी और रीडींग ग्लास का सुझाव दिया गया। उसके बाद हम बाहर निकले संयोग से वही रिक्शा वाला मिल गया बोले भैया आपके कारण ही बैठा हूं वापस चलेगें क्या। हमने कहा नहीं यार हम आगे विराटनगर बजार तक जाना है कंबल और कुछ मशाले खरीदने है। सुना था कि वहाँ ये दोनो चीजे सस्ती मिलती है। रिक्शा वाला भी तैयार हो गया। बोला जो देने का होगा दे दिजीयेगा हम तो आपको ही लेकर जाएंगे। हमने बार बार पुछा और वो बार बार यही कहता रहा। खैर हमने भी सोचा कि ५० आने के हुए है तो जाने के क्रम में चुकीं बाजार भी जाना था तो ७० रुपये बनेगें। हमने सोचा और बैठ गये। वहां कंबल तो अच्छा मिला लेकिन मशाले ‍के नाम पर सिर्फ इलाइची ही हाथ लग पाया। दुकानदार ने कहा कि भैया इसके अलावा सारा माल भारत से हीं आता है। हम वापस चलें। जोगबनी पहुंचने से पहले ही रिक्शा वाले ने कहा कि भैया हमारी ट्रेन लगी है अगर आप बुरा ना माने तो मैं आपको यहीं उतार देता हूं क्योंकि मुझें यही रिक्शा लगाना है। हमने सोचा चलो बेचारे की ट्रेन छुट जायेगी इससे अच्छा होगा कि यहीं उतर जायें। हम उतरे और जैसा कि तय था ७० रूपया देने लगें। रिक्शा वाला अचानक से पलट गया और १०० रूपया मांगने लगा। हमलोगों ने बहुत कहा कि भाईसाहब इतना नहीं बनता है और हमें इतनी दुर पैदल ही चलना पड़ेगा फिर भी वो नहीं माना। हमने भी सोचा कि शाम हो गयी है हिल-हुज्जत से क्या फायदा दे दो यार। हमने पैसे दिये और चल पड़े आगे की सफर पर पैदल ही। हे भगवान इतना जाम कि पैदल चलना भी मुश्किल हो गया। बड़ी मुश्कीलों से हम जोगबनी बस स्टैंड पहुंचे वहां पहुचने पर ऑटो वाला गायब। एक भी ऑटो नहीं, पता नहीं चल पा रहा था कि कैसे घर पहुंचे। किसी तरह पटना जाने वाली एक बस से बथनाहा तक जाने का जुगाड़ हुआ। बस पर बैठे-बैठे एक घंटे हो गये और बस थी कि खुलने का नाम ही नही ले रही थी। पुछने पर पता चला कि एक यात्री जो पटना जाने वाला है अभी तक नहीं आया है और इसी वजह से ‘बस’ उस श्रीमान के इंतेजार में है। हम रूके रहें। करीब एक घंटे के बाद भी आखि‍रकार जब यात्री नहीं आया तो हार-थक कर बस को चलना ही पड़ा। संवाहक और चालक दोनो फोन कर-करके परेशान हो गये थे। खैर हम बथनाहा पहुंचे। वहां से भी एक भी ऑटो नहीं मिली। हम इन्तजार करते रहें। कुछ देर बाद एक मैजि‍क दिखाई दिया। उस छोटे से मैजिक पर कम से कम ५००० किलो माल लदा हुआ था उपर से लेकर निचे तक ठसाठस। चावल और गुड़ की बोरीयां। आगे की सीट खाली थी लेकिन उसके नीचे भी गुड़ के बोरे रखे हुए थे। खैर किसी तरह हम तीनो जने एक ही सीट पर बैठे। मैजीक चल पड़ी। ५००० किलो के भार से दबी मैजीक जरा से भी गड्ढ़े या मोड़ पर ऐसे लहराती कि लगता जैसे अब गये कि तब गये, जबकी गाड़ी की स्पीड कभी भी २० से ज्यादा नही हुई थी। ३० किलोमीटर का सफर लगभग २ घंटे में तय करने के बाद हम अभी विरपुर से ५ किलोमीटर ही दुर थे कि चालक ने यह कहकर बस रोक दी कि माल उतारना है। लो जी आ गयी शामत। हम समझ रहे थे कि माल विरपुर में उतरना है और ये तो यहीं रोके जा रहा है। खैर हम उतरे और माल उतरना शुरू हुआ। लदे हुए माल का एहसास तब हुआ जब वो उतरने लगा। करीब १ ट्रक का माल अकेले उस मैजीक पर लदा हुआ था। करीब १ घंटे की कड़ी मस्सक्त के बाद ६ लोगों ने उस माल को उतारा। हमने चैन की सांस ली और गाड़ी पर सवार हुए। लेकिन अब बारी ड्रायवर की थी, वो पैसे के हिसाब के लिए मालीक से उलझ पड़ा। उसे किसी जरूरी काम के लिए पैसे चाहिए था और मालीक कह रहा था कि कल आ कर ले जाना। करीब आधे घंटे के बाद ड्रायवर किसी तरह माना और चल पड़ा। अब उस मैजीक की स्पीड देखने लायक थी। २० की रफ्तार से चलने वाली मैजीक अब १०० के रफ्तार से चल रही थी। गड्ढ़ों में ऐसे उछलती की कलेजा मुंह को आ जाता। खैर हम विरपुर पहुंचे और राहत की सांस ली कि चलो कम से कम पहुंच तो गये। अभी हम घर पहुचे ही थे कि दरवाजे पर याद आया कि हम अपनी दवाई उस मुआ मैजीक में ही भुल आये है। लो भैया अब शुरू हुई उस मैजीक की तलाश। संयोग से हमने उस ड्रायवर का नंबर ले लिया था जिससे हमें उसे ढ़ुढ़ने में सहुलियत हुई। अतत: हमे दवाई मिल गया। और उस यादगार सफर को याद करते करते हम घर लौट चले। घर में जिस किसी को भी ये किस्सा सुनाया वही लोट पोट हो गया। इस तरह एक छोटा सा सफर हमारे मन के कोने में ऐसे बसा कि हम शायद कभी इसे भुल नहीं पायेंगे।

Friday, December 13, 2013

गाँव छोड़ब नाही, जंगल छोड़ब नाही, माई माटी छोड़ब नाहीं, लड़ाई छोड़ब नाहीं


एक समय था जब पूर्णिया बिहार प्रान्त के लिए काला पानी के नाम से कुख्यात था। दुर्गम जंगल और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद आदिवासियो ने इस इलाके को स्वर्ग बनाया। लेकिन इन भूमिपुत्रों को आज भू-माफियायों कि नज़र लग गयी हैं। आज यही आदिवासी भू-माफियाओ के वजह से अपने अस्तित्व की लड़ाई के लिए पिछले कई दिनों से हाथो में तीर कमान लिए घूम रहे हैं। पुरे बिहार की पुलिस अब एसटीएफ के संग मिलकर इनका समूल नाश करने में लगी हैं। नाम दिया हैं ऑपरेशन अगस्त-नगर। मंशा हैं आदिवासियों के कब्जाए जमीन को खाली करवा कर वहाँ के भूमि माफियाओ को ऊँचे कीमत पर बेचना। प्रशासन चुप हैं, नेता शांत हैं, शायद सब अपना भला खोज रहे हैं। किसी को फिकर नहीं। और शायद यही एकमात्र कारण हैं कि बिहार में एक दर्जन से ज्यादा आदिवासी विलुप्त हो गए हैं और जो कुछ बचे हैं वो विलुप्ति के कगार पर।

कभी वनों से आच्छादित रहें पूर्णिया में जनसँख्या बढ़ोतरी का यह एक अजीब दुस्प्रभाव हैं। इंसानो ने अपने बढ़ते तादात के कारन जंगल तो साफ़ किये ही; लेकिन ये भूल गए कि इनके साथ जंगल में बसने वाले उन हज़ारो जीवों का भी नुक्सान पहुंचाया। यहाँ बास करने वाली करीब आधा दर्जन आदिवासी जनजातियाँ आज विलुप्ति के कगार पर हैं। एक समय था जब ये आदिवासियों की पहचान जमींदार के रूप में होती थी, लेकिन शिक्षा का अभाव और भोले-भाले होने के कारण भू-माफियायों ने इनका जमकर फायदा उठाया और आज हालत ये हैं की ये जनजातियां यहाँ इक्का दुक्का ही हैं। 1770 में बिहार में पड़े भयानक अकाल के बाद अंग्रेजो के द्वारा आदिवासियों का इस इलाके में पदार्पण हुआ। हट्ठे-कट्ठे शारीर के मालिक इन आदिवासियों के लिए यहाँ की भौगोलिक संरचना काफी मुफीद थी। अंग्रेजो ने इन आदिवासियों को यहाँ सड़क बनाने के काम के लिए लाया था। लेकिन अंग्रेजो का मुख्य उदेश्य दार्जिलिंग में चाय कि खेती और नेपाल से टैक्स वसूली था। ऐसा कहा जाता हैं कि श्रीनगर प्रखंड के जगेली स्थित दस नंबर सड़क आंग्ल-नेपाल युध के समय आदिवासियों ने बनाया था और इसी मार्ग से होकर अंग्रेजो ने नेपाल पर चढ़ाई की थी। अंग्रेजो ने यहाँ आदिवासियों की लगभग एक दर्जन जनजातियां बसाई थी जिसमे संथाली, उरांव, मुंडा, बेदिया, खरवार, लोहरा, माल, पहाड़िया, सूर्या पहाड़िया, खरिया, लोहरा-लोहार, आदि शामिल हैं। पहले यहाँ का पानी काले रंग का होता था, पानी के निकलने कि कहीं व्यवस्था नहीं थी, लोग इस इलाके में आने से कतराते थे, पूरा इलाका जंगल और गंदे पानी से भरा होता था और यही कारन हैं की इस जगह को यहाँ के काला पानी के नाम से जाना जाता था। लेकिन 1934 में आये भयंकर भूकम्प ने इस इलाके के पानी को साफ़ कर दिया और यही बाढ़ का पानी इन आदिवासियों के नसीब को भी इनसे छीन ले गया। गैर आदिवासी इस और आकर्षित होने लगे और धीरे-धीरे गैर आदिवासियों का यहाँ जमावड़ा होने लगा और साथ ही होने लगा जंगल साफ़ होने का सिलसिला। लोग आते गए जंगल कटते गए और साथ ही कटते गए इन आदिवासियों के सर। जंगल साफ़ होने के कारण इन आदिवासियों को अपने भरण-पोषण में काफी दिक्कते आने लगी। प्रकृति की गोद में रहनेवाले ये लोग खुले आसमान के निचे आ गए। ना तो जमीन बची और ना ही बची वो हरे भरे पेड पौधे जिनका उपयोग ये पाने दैनिक जीवन में खाने, पीने और जीने के लिए किया करते थे। हाल के कुछ वर्षो में शहर का विकास हुआ तो जमीन की कीमतें भी आसमान छूने लगी। रोजी रोजगार और शिक्षा के आभाव के कारण भूमि-माफियाओ ने इन भोले भाले आदिवासियों को अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया। अभी हाल ये हैं शहर की आसपास की कई ऐसी जमीन हैं जिनको लेकर आदिवासी और भू-माफियाओं में ठनी हैं।

मानव जाती के इतिहास के अध्ययन में ये जनजातियां जिवंत दस्तावेज कि तरह हैं। इस धरती पर इंसान के विकास के क्रम का आदिवासी हीं सभ्यता का सूत्रधार हैं। हड़प्पा युगीन मिटटी के बर्तनो और आभूषणो को देखकर तो यही लगता हैं कि‍ आदिवासियों ने ही सभ्य समाज की नीव रखी हैं। यही नहीं, वैदिक काल में भी हमें इसकी परंपरा लिखित तौर पर मिलती है। वैदिक ग्रंथो में जो ‘’जन’’ शब्द का उल्लेख है वह जन वाकई जनजाती ही है। वास्तव में आदिवासी शब्द आदि और वासी से मिलकर बना है जिसका अर्थ होता है मूल निवासी। भारत की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा इन आदिवासियों का है। प्राचीन संस्कृत ग्रंथो में इन आदिवासियों को वनवासी भी कहा गया है। ऐेतहासि‍क और पौराणि‍क रुप से भगवान शि‍व भी मूलत: एक आदवासी देवता थे। हड़पा में मिली पशुपित योगी की मुहर इसका एक प्रमुख प्रमाण है। बाद में आर्य ने भी उन्हें देवताओं के त्रयी यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप में स्वीकार कि‍या। आदि‍वासियों का जि‍क्र रामायण में भी मिलता हैं, जि‍समें राजा गोह और उनके प्रजा चि‍त्रकूट में वनवास के समय श्रीराम की सहायता करती है। आधुनि‍क युग में एक आदवासी बि‍रसा मुंडा एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ एक धार्मिक नेता भी थे। महात्मा बुद्ध की शरण में आया अंगुलि‍माल डाकू भी एक आदवासी हीं था।

आधुनि‍कीकरण के कारण आदवासी समूह के पर्यावरण का पतन हो रहा है। जसके प्रति‍ ये आदवासी काफी संवेदनशील हैं। व्यावसायि‍क वानि‍की और गहन कृषि‍ दोनों हीं उन जंगलों के लि‍ए वि‍नाशकारी साबि‍त हुए है, जो कई शताब्दि‍यों से आदवासि‍यों के जीवन यापन का स्त्रोत रहे थे। यही नहीं, पर्यटन ने भी इन आदवासि‍यों के संस्कृति‍ में कील ठोकने का काम कि‍या है। लोककलाएं और उन्हें जीवन देने वाली जनजाति‍यों के समक्ष आज खुद अपने अस्त‍ि‍त्व को बचाए रखने की चुनौती आ खड़ी हुई है।

क्या है अगस्त नगर का मामला - पूर्णिया के हरित इलाके अगस्त नगर कालांतर में आदिवासी बहुल इलाका था जो जनसंख्या वृधि के कारन धीरे धीरे ख़तम होता गया। और अब भू-माफिया इस पर नज़र गड़ाएं हुएं हैं। मिल्लिया एजुकेशनल ट्रस्ट की 120 एकड़ जमीन पर एक नीजी कॅालेज खोलने की योजना बना रहा है। ज्ञात हो की ये जमीन विवादित रही हैं और आदिवासियों का यहाँ पर शुरू से कब्ज़ा रहा हैं। करीब डेढ़ साल से पुलिस की मदद से इस जमीन को खाली करने की कवायद की जा रही हैं पुलिस बीच-बीच में इस जगह कि रेकी भी कर रही थी और आदिवासियों पर जोड़ जबरदस्ती करके वहाँ कि जमीन खाली भी करवा रही थी। इसी बीच आदिवासी कई बार उग्र भी हुए सड़क भी जाम किया और पुलिस के साथ मुठभेड़ भी कि लेकिन कल जो हुआ वो दिल दहला देने वाला था। हज़ारो की संख्या में पहुंची पुलिस ने करीब 50 से ज्यादा घरो में आग लगा दी और मासूम आदिवासियों पर फाइरिंग और आंसू गैस के गोले छोड़े। बुलडोजरों से घरो को तोडा जा रहा हैं और सैकड़ों घरो को बेघर किया जा रहा हैं। आदिवासी पुलिस के आधुनिक हथियारों का मुकाबला तीर और परम्परागत हथियारों से कर रहे हैं। प्रशासन बेखबर हैं और पुलिस दमनकारी निति अपना रही हैं। पूर्णिया के सांसद उदय सिंह उर्फ पप्पू सिंह की माने तो "जिला प्रशासन एवं पुलिस की विफलता का परिणाम है अगस्त नगर का भूमि विवाद। पांच माह बीत जाने के बावजूद इस मुद्दे का हल नहीं होना यही साबित करता है कि प्रशासन इसको लेकर गंभीर नहीं है।"
एक प्रत्यक्षदर्शी चिन्मय सिंह के अनुसार - ''मैं मौजूद था देर रात तक वहाँ। सुनने में सुबह से ही प्रमंडल के सारे आलाधिकारी मुख्यमंत्री के साथ वीडियो कोंफ्रेंसिंग कर बलप्रयोग की अनुमति मांग रहे थे। बारह बजे के बाद शायद अनुमति मिल गयी, क्योंकि अधिकारियों का बड़ा जत्था परोरा रवाना हो गया और साथ में छःजिलों से मगाई गयी पुलिस बल। दस एम्बुलेंस,दो शववाहन,फायर ब्रिगेड की कई गाड़ियां,करीब सात-आठ की संख्या में बुलडोजर, इत्यादि। यहाँ पर पहले से ही बड़ी संख्या (लगभग हज़ार) में स्थानीय ग्रामीण और भाड़े के लठैत बांस बल्लों और लाठी से मुस्तैद होकर (अंगरेजी में कहें तो 'मिलीशिया') प्रशासन का उत्साहवर्धन करने वाले नारे लगा रहे थे। अगस्त्यनगर के आदिवासियों का जत्था इस भीड़ को देखकर पहले तो कुच्छ-कुछ खाली होना शुरू हुआ, लेकिन जब मिलीशिया और पुलिस लगभग डेढ़ सौ मीटर की दूरी पर पहुँच गए, तो 99 प्रतिशत से ज्यादा आदिवासी अपने पारम्परिक हथियारों के साथ भाग गए। नवीन महतो को मैंने खुद अपनी आँखों से भागते देखा।(वहाँ भागने के सिवाय कोई दूसरा विकल्प नहीं था इनके पास) अब सबसे आश्चर्यजनक नज़ारा था। नागरिकों की सेना पुलिस के साथ मिलकर इस बस्ती में आग लगाते हुए। बुलडोजर चल रहे हैं, और चारों तरफ हर चीज़ में आग लगाई जा रही है। सैकड़ों घरों की इस बस्ती को धू-धू कर जलाते हुए लोगों की भीड़ के हाथ जो कुछ आ रहा है, सब लूट कर ले जा रहे हैं। करीब बीस मिनट बीते कि एक तीर कहीं से आकर गिरा। किसी को लगा नहीं। सबका ध्यान उधर गया, एक 20 साल का नौजवान करीब 80 मीटर की दूरी से हज़ार से ज्यादा की भीड़ को अकेले चुनौती दे रहा है।अद्भुत दृश्य था। उसने करीब बीस तीर चलाये, आखिरकार उसे घेरकर पकड़ लिया गया,और इतना पीटा गया कि शायद ही उसकी जान बचे। लेकिन सदर अस्पताल में अभी तक वह ज़िंदा है। इसी तारा कुल सत्रह आदिवासियों को पुलिस ने पकड़ा, किसी को भागते हुए ...तो किसी को लुका छिपी करते हुए। पुलिस ने गोली भी चलाई, जिसमें एक आदिवासी को पैर में गोली लगी। आधिकारिक पुष्टि के अनुसार एक आदिवासी की मौत हुई, जबकि सूत्रों के अनुसार संख्या ज्यादा हैं। मिलीशिया एकदम से मध्ययुगीन परिवेश का नज़ारा करवा रहा था। बाद में पता चला कि आदिवासियों ने कई पुलिसकर्मियों को बंधक बना रखा है, लेकिन मेरी जिलाधिकारी से रात करीब दस बजे घटनास्थल पर ही मुलाक़ात हुई, मेरे बंधक वाले सवाल को उन्होंने पूरी तरह से खारिज करते हुए कहा कि ''ऐसा कुछ भी नहीं है''। अभी फिलहाल अपडेट यह है कि कुल सात पुलिसकर्मी (एक थाना प्रभारी, एक ए एस पी. अन्य सिपाही) घायल हैं, सत्रह आदिवासी हिरासत में हैं। नवीन महतो को आज सुबह वहीं पास के एक गाँव से गिरफ्तार कर लिया गया है।''

भारतीय संवधान के अनुछेद 14(4), 16(4), 46, 47, 48(क), 49, 243(घ)(ड), 244(1), 275, 335, 338, 339, 342 तथा पांचवी अनुसूची के अनुसार अनुसूचि‍त जनजाति‍य के राजनैति‍क, आर्थिक, सांकृति‍क तथा शैक्षणि‍क वि‍कास जैसे कल्याणकारी योजनाओं के वि‍शेष आरक्षण का प्रावधान तथा राज्य स्तरीय जनजातीय सलाहकार परि‍षद की बात कही गई है परंतु इसे अब तक लागू नही कर पाना वाकई सरकार के लि‍ए चिं‍ता का वि‍षय है। यह सर्ववि‍दि‍त है की आदवासी क्षेत्रों में उपलध खनि‍ज संसाधन से सरकार को अरबों रूपए के राजस्व की प्राप्ति‍ होती है या सीधे शब्दों में कहा जाए तो सरकार के आय के स्त्रोत इन आदवासी क्षेत्रों में उपलब्ध वन संसाधन तथा खनि‍ज संसाधन ही हैं, परंतु इस राजस्व का कि‍तना प्रति‍शत हि‍स्सा उन अनुसूचि‍त क्षेत्रों के राजनैति‍क, सामाजि‍क वा आर्थीक वि‍कास में खपत कि‍या जाता रहा है। अनुसूचि‍त क्षेत्रों में सरकार द्वारा स्थापि‍त उद्योंग-धंधों से प्रभावि‍त परि‍वारों को दान की जाने वाली मुआवजा राशि‍ की बात हो, वि‍स्थापि‍त परि‍वार के सदस्य को नौकरी का मुद्दा हो, वि‍स्थापि‍त परि‍वार के सदस्य के शेयर होल्डिंग तय करने की बात हो तथा अनुसूचि‍त क्षेत्रों के वि‍कास हेतु स्वायत्ता स्थापि‍त करने की बात हो इन सभी मुद्दे पर सरकार को वाकई गंभीरतापूर्वक वि‍चार करने की जररत है, तभी देश के आदवासि‍यों की स्थिति में सुधार हो पाएगा।
साल २००६ के १३ दिसंबर को लोकसभा ने ध्वनि मत से अनुसूचित जाति एवम् अन्य परंपरागत वनवासी(वनाधिकार की मान्यता) विधेयक(२००५) को पारित किया। इसका उद्देश्य वनसंपदा और वनभूमि पर अनुसूचित जाति तथा अन्य परंपरागत वनवासियों को अधिकार देना है।

• यह विधेयक साल २००५ में भी संसद में पेश किया गया था, फिर इसमें कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए जिसमें अनुसूचित जनजाति के साथ-साथ अन्य पंरपरागत वनवासी समुदायों को भी इस अधिकार विधेयक के दायरे में लाना शामिल है।

मूल विधेयक में कट-ऑफ डेट (वह तारीख जिसे कानून लागू करने पर गणना के लिए आधार माना जाएगा) ३१ दिसंबर, १९८० तय की गई थी जिसे बदलकर संशोधित विधेयक में १३ दिसंबर, २००५ कर दिया गया।

• परंपरागत वनवासी समुदाय का सदस्य वनभूमि पर अधिकार अथवा वनोपज को एकत्र करने और उसे बेचने का अधिकार पाने के योग्य तभी माना जाएगा जब वह तीन पीढ़ियों से वनभूमि के अन्तर्गत परिभाषित जमीन पर रहता हो। कानून के मुताबिक प्रत्येक परिवार ४ हेक्टेयर की जमीन पर मिल्कियत दी जाएगी जबकि पिछले विधेयक में २.५ हेक्टेयर जमीन देने की बात कही गई थी।

Thursday, November 28, 2013

शिक्षा की मजबूत व्‍यवस्था और डरावनी सत्ता



जिस प्रकार से प्रांत के दस हजार से अधिक मास्‍टर साहब कक्षा पांच की परीक्षा भी पास नहीं कर पाये, उच्च शिक्षा के लि‍ए भी जि‍स प्रकार से बिहार में हंगामा मच रहा है और केंद्रीय विश्वविद्यालय के लिए जिस प्रकार से राज्‍य और केंद्र में तनाव देखा जा रहा है, ये सब सोचने के लि‍ए मजबूर कर देता है कि सही में बिहार कभी शिक्षा का केंद्र था और क्‍या बिहार फि‍र शिक्षा का केंद्र बन सकता है? क्‍या नालंदा से जो यात्रा शुरू हुई थी वो यात्रा नालंदा पर जा कर रूकेगी या आगे बढेगी। क्‍या ‘बेरोजगार पैदा करने की फैक्ट्री’ के नाम से मशहूर हो चुका बिहार का विश्वविद्यालय रोजगार का रास्‍ता दि‍खाने में कामयाब हो सकेगा? फि‍र से उस मुकाम तक पहुचने के लिए ये समझना ज्‍यादा जरूरी है कि हम उस मुकाम से नीचे कैसे आ गए। क्‍या बिना उस कारण को समझे बिहार में शिक्षा का विकास का नारा देनेवाले शिक्षा के क्षेत्र में बिहार को फि‍र से अगली पंक्ति मे खड़ा कर पाएंगे। कुछ ऐसे ही सवालों के उत्‍तर ढ़ढ़ने की कोशिश की है जो ये समझने में मददगार होगा की बिहार में कैसे कालखंड के संग शिक्षा का स्‍तर खंडित होता गया।


बिहार, वो जमीन है जहॉं से सत्‍ता अस्‍त्र-शस्‍त्र से ज्‍यादा ज्ञान से बदलता रहा है। चाणक्‍य हो या महेश ठाकुर इस जमीन पर कई ऐसे उदाहरण है जिससे ये प्रमाणित होता है जो सत्‍ता हथियार से नहीं ज्ञान से पाया जाता है। ऐसे में समाज में ज्ञान का प्रसार और सत्‍ता हमेंशा खतरा का कारण रहता है। बहुत लोगों का मानना है कि मगध को मूर्ख बनाकर उसपर राज करने की नीति के तहत सन् 1123 में बख्तियार खिलीजी नालंदा विश्वविद्यालय को बर्बाद कर बिहार के शिक्षा की संस्कृति को तबाह कर दिया था। मुगल हो या अंग्रेज या फि‍र आजाद भारत में लोकतांत्रिक नेता सब शिक्षा को केवल गर्त में ले जाने का काम किया है। अंगुली पर गिनने योग्‍य नाम मिलेगा जो बिहार में शिक्षा के लिए कुछ किया या करने का प्रयास किया।
बख्तियार खिलीजी की यह नीति इतना कारगर साबित हुआ जो बंगाल जीतने के बाद अंग्रेज भी इस इलाके पर उस नीति को जारी रखा। बागी बिहार में शिक्षा का विकास काफी कम गती से हुआ जिससे बिहार देश के और हिस्‍से से पि‍छे होता चला गया। 1608 में जब ईस्ट इन्डिया कम्पनी का फरमान लेकर अंग्रेज हॉकिन्स भारत आया था तब उसे इस जमीन का इतिहास बता दि‍या गया था। 1813 में जारी कंपनी चार्टर के अनुसार देशज भाषा और विज्ञान के विकास के लि‍ए बड़ी राशि जारी हुई, लेकीन बिहार के राशि को कलकत्‍ता, बांम्बे और मद्रास रेजिडेंसी को दे दिया गया। यूरोपिय ज्ञान और अंग्रेजी पढाई के लिए बिहार में केवल एक स्‍कूल का चयन हुआ, जो भागलपुर स्‍कूल था। 1835 में राजा राम मोहन राय और लॉर्ड मैकाले से प्रभावित होकर लॉर्ड बेंटिक बिहार में अंग्रेजी शिक्षा को बढावा देने के लिए प्रयास कियें। बिहारशरीफ और पूर्णिया में अंग्रेज़ी शिक्षा केन्द्र की स्थापना भी हुई। अंग्रेजी को बढाबा देने के लिए इसके जानकार को सरकारी नौकरी में रखा जाने लगा। 1854 में बिहार में शिक्षा की प्रगति के लिए अंग्रेजों ने एक कमेटी गठित किया जिससे शिक्षा की उन्नति पर कार्य होना था, लेकीन इसको दुर्भाग्य कहा जाए या किछु और 1857 के क्रांति के बाद फि‍र उस कमेटी की तरफ किसी का ध्‍यान नहीं गया। लोग लड़ाई के बीच पढाई को भुलते चले गए। वैसे दरभंगा महाराज ने उत्‍तर बिहार के लिए अपने स्‍तर पर अंग्रेजी स्‍कूल खोलने की योजना तैयार की थी। जि‍सके बावजूद 1899-1900 के दौरान बिहार में अवर प्राथमिक स्‍कूल की संख्‍या महज 8978 थी। पटना विश्‍वविद्यालय भी 1917 में जा कर स्‍थापित हो सका।


जादी के बाद राजनेता भी अंग्रेजों के रखे नीव पर महल खड़ा करने से पि‍छे नहीं रहें। उपर से राजनैतिक अराजकता और मुख्‍यमंत्री के आवाजाही का सबसे ज्‍यादा असर शिक्षा पर देखा गया। शिक्षा के स्‍तर में समतलीकरण ऐसा हुआ कि‍ पटना विश्वविद्यालय जो देश के सात पुराने विश्वविद्यालय में से था, उसकी गरिमा तक ख़त्म हो गई। आजादी के बाद बिहार में शिक्षा पर पहला बड़ा चोट हुआ केबी सहाय युग में। 1967 में केबी सहाय शिक्षा के लिए ‘’सब धन 22 पसेरी’’ का फार्मूला अपनाये। सहाय ने बिहार के प्राथमिक से लेकर उच्‍च शिक्षा तक को तहस-नहस कर दि‍ए। ये बिहार में आजादी के बाद शिक्षा के लि‍ए सबसे खराब समय कहा जा सकता है। उन्‍होनें राज्‍य में नये विश्‍वविद्यालय खोलने के साथ-साथ उसके लि‍ए निजी कालेज को आंख मूंद कर सरकारी मान्यता देते चले गए। इस प्रकार से उन्‍होनें कॉलेज की प्रतिष्‍ठा को गर्त मे मिला दिया। उनकी इसी नीति को बाद में जगन्‍नाथ मिश्र अंतिम मुकाम तक ले गए। ज्ञात हुो जो केबी सहाय के कार्यकाल से पहले बिहार में केवल दो यूनिवर्सिटी थी। उनके कार्यकाल में भागलपुर, रांची और मगध यूनिवर्सिटी बना। इस विश्‍वविद्यालय के लिए उन्‍होनें निजी कॉलेज सब को एक तरफ से सरकारी मान्यता देते गए, जिससे कॉलेज के बीच अंतर मिटता गया और अच्‍छे कॉलेज सबकी स्थिति भी दोयम दर्जे की होती गइ। कॉलेज और विश्‍वविद्यालय में अराजकता और गुंडागर्दी संयुक्त विधायक दल सरकार और बिहार आन्दोलन के दौरान शुरू हुआ। 1969 में परीक्षा के दैरान चोरी करने की मांग कर रहे छात्र को ‘जिगर का टूकड़ा’ कहकर सत्‍ता पर पहुंचे महामाया प्रसाद बिहार में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार के मुखिया हुए। उनके मंत्रिमंडल में समाजवादी पार्टी के नेता कर्पूरी ठाकुर शिक्षा मंत्री बने। उन्‍हाने अपने शासनकाल में एक अजीब सा आदेश पारि‍त किया जिसका नासूर अभी तक बिहार को रूला रहा है। उस आदेश के अनुसार मैट्रिक में पास करने के लि‍ए अंग्रेजी अनिवार्य विषय नहीं रहेगा। उस समय में लोग “पास विदाउट इंगलिश” को कर्पूरी डिविजन नाम दिया फलतः शिक्षा में अंग्रेजी का स्तर इतना गिर गया जो आज तक बिहार की छवि उससे अपने आप को दूर नहीं कर सकी है।


वैसे 1972 में जब कांग्रेस के केदार पाण्डेय की सरकार बनी तो उसने शिक्षा के स्‍तर को उठाने का प्रयास किया और महामाया बाबू के जिगर के टुकड़े सब को सुधारने के लिए कुछ कठोर निर्णय लिए। पांडेय सरकार विश्वविद्यालय का जिम्मा अपने हस्तगत कि‍ए और सख्त आईएएस अधिकारी को कुलपति और रजिस्टार के पद पर बहाल किए। इसका असर भी हुआ। विश्वविद्यालय से गुंडाराज खत्म हुआ। परीक्षा और कक्षा बंदूक के साये में सही लेकिन सुचारू रूप से शुरू हुआ। बिहार में शिक्षा की संस्कृति पटरी पर लौट हीं रही थी, तभी केंद्र सरकार ने राजनीतिक मजबूरी में केदार पांडेय को मुख्‍यमंत्री पद से हटा दिए। इसके बाद संपूर्ण क्रांति का दौर आ गया और विश्‍वविद्यालय अध्‍ययन से ज्‍यादा राजनीतिक मंच बन गया। शिक्षा की सब व्यवस्था संपूर्ण क्रांति में ध्‍वस्‍त हो गया।


बिहार में अगर शिक्षा के समाधी बनाने को श्रेय किसी को दिया जा सकता है तो वो हैं जगन्नाथ मिश्र। जगन्नाथ मिश्र कहने के लिए तो थोड़े-थोड़े दिन के लिए तीन बार मुख्‍यमंत्री हुए, लेकिन उनकी नीति पीढी दर पीढी प्रभावित करने योग्‍य रही। वो केबी सहाय के नीति को आगे बढाते गए। जिस कॉलेज के पास भवन तक नहीं था वैसे कॉलेज सबको सरकारी घोषित कर विश्‍वविद्यालय पर बोझ बढाते गए। साथ हीं साथ अच्‍छे और बुरे में अंतर इतना मिटा दिए कि कोइ कॉलेज अपने आप को कम आंकने के लिए तैयार नहि रहा। उपर से उर्दू को दुसरे राजभाषा का दर्जा देकर भाषाई शिक्षा को राजनीतिक रंग भी प्रदान कर दि‍ए। बिहार देश का पहला राज्य हो गया जहॉं दुसरे राजभाषा को मान्‍याता मिली। डॉ साहेब से प्रसिद्ध जगन्‍नाथ मिश्र अपने तीनो कार्यकाल में शिक्षा विभाग को अपने राजनीति स्‍वार्थ की पूर्ति के लिए उपयोग करते रहें। उनके कार्यकाल में शिक्षण संस्‍थान राजनीतिक अखाडा बन गया। डॉ मिश्र टूटपुन्जिया कालेज सब को विस्वविद्यालय का मान्यता देकर उनके शिक्षकों को मनचाहे अच्‍छे कॉलेज में पदस्‍थापित करा दिए। जिससे प्रतिष्ठित कॉलेज की पढाई प्रभावित हुई। दुसरा यूनिवर्सिटी बिल में संसोधन करके बिहार के युनिवेर्सिटी सबकी पहचान ख़त्म करा दिए। नए यूनिवर्सिटी बिल में किसी भी यूनिवर्सिटी के कर्मचारी किसी भी यूनिवर्सिटी में अपना स्थानांतरण करवा सकते थे। जग्ग्न्नाथ मिश्र सबसे पहले इस बिल का फायदा उठाए। उन्‍होनें बिहार विश्‍वविद्यालय के एलएस कॉलेज से अपना तबादला पटना विश्‍वविद्यालय के बीएन कॉलेज में करा लिए। इसके साथ हीं अपने कुछ खास लोगों का तबादला भी मनपसंद कॉलेज में करा दिए। इस संशोधन से छोटे कॉलेज के शिक्षक बड़े कॉलेज में चले गये, लेकिन उससे ज्‍यादा खतरनाक ये रहा जो बहुत अयोग्‍य शिक्षक बढिया कॉलेज में जाकर उसकी प्रतिष्‍ठा को खत्‍म कर दि‍ए। ऐसे बहुत शिक्षक अच्‍छे कॉलेज पहुंच गए जिन्‍होनें कभी भी एक भी कक्षा नहीं लिया हो और ना हीं प्रयोगशाला गए हो। इससे योग्‍य शिक्षक सबमें तनाव बढ़ना शुरू हो गया और वो पढायी कम करते चले गए। जगन्‍नाथ मिश्र के कार्यकाल में कुर्सी तबादला के लिए भी प्रसिद्ध रहा। उनके कार्यकाल में जब कोइ अच्‍छे कॉलेज में शिक्षक के लिए जगह नहीं रहता था तब और कॉलेज के लिए आवंटित शिक्षक कोटा में से एक पद उस प्रसिद्ध कॉलेज के लिए दे दिया जाता था। ऐसे उदाहरण देश के किसी और राज्‍य में मिलना मुश्किल था।


1969 से 1990 तक बिहार में शिक्षा इतना गर्त में पहुंच गया था कि लालूजी के लिए बहुत कुछ करने का स्‍कोप नहीं रहा। उन्‍होनें चरवाहा विद्यालय के रूप में दलित समाज के लोगों को आगे उठाने का काम किया, उनका नारा था- घोंघा चुनने वालों, मूसा पकड़ने वालों, गाय-भैंस चराने वालों, शिक्षा प्राप्त करो । लेकिन उनकी ये योजना भी राजनैतिक अस्थिरता और सत्ता परिवर्तन के कारण खटाई में चली गर्इ। शिक्षा का हालत बद स बदतर होता गया। लालूजी के राज में विद्यार्थी पलायन एक नया शब्‍द आया। उदारवाद के बाद रोजगारपरक शिक्षा के लिए बिहार के छात्र दुसरे राज्‍य के लिए पलायन शुरू कि‍ए, जिससे बिहार को सबसे बड़ी आर्थिक क्षती हुई।


2005 में नीतीश राज आया। विकास के नाम पर मिले वोट से नीतीश ने सब क्षेत्र में विकास की बात की। उम्‍मीद जगा की शिक्षा के क्षेत्र में भी विकास होगा। लेकिन पिछले आठ वर्षो में शिक्षा के क्षेत्र में कोइ खास काम नहीं दि‍ख रहा है। शिक्षक की नियुक्ति तो हो रही है लेकीन शिक्षा का स्‍तर नहीं सुधर रहा है, बल्कि एक ऐसा शिक्षित जमात पैदा हो रहा है जो मूर्ख है। हालात ये है की 25 फिसदी से ज्‍यादा शिक्षक 5वीं के शिक्षक पात्रता परीक्षा में फेल हो गए है। कुल मिलाकर महामाया प्रसाद से लेकर नीतीश कुमार तक पालतुकरण की नीति अपनाकर विश्वविद्यालय को अपना राजनैतिक चारागाह बनाकर रखे हुए है। आंकडे पर गौर करें तो 1970 से लेकर 1980 के बीच बिहार में शिक्षा के लिए सबसे ज्‍यादा नीतिगत फैसले लि‍ए गए। इस दौरान राज्‍य में आठ सरकार बनी और सात राज्‍यपाल बदले गए। चार बार राजभवन सत्‍ता का केंद्र बना। इस कालखंड में केवल पटना विश्‍वविद्यालय में 11 कुलपति नियुक्‍त किए गए। कुल मिलाकर कोइ भी स्थिर रूप से कहीं काम नहीं कर सके। इस दौरान शिक्षा में व्याप्त राजनीति औ गुंडाराज को देख कर जाने माने शिक्षाविद डॉ वीएस झा इतना तक कह गए ‘’बिहार में महाविद्यालय स्थापित करना एक लाभप्रद धंधा है बशर्ते संस्थापक राजनैतिक बॉस हो या जनता के नज़र में उसकी छवि‍ एक दबंग की हो।‘’


र्तमान शिक्षा की अगर बात करें तो उच्च शिक्षा के लिए बिहार भारत में एक ऐसे राज्‍य के रूप में जाना जाता है जहॉं के विद्यार्थी पर बाहरी राज्‍य के गैर सरकारी संस्थान अपनी गिद्ध दृष्टि जमाये रखते है। एक अध्यन में ये दावा किया गया है की सब साल बिहार से लगभग 25 हजार करोड रूपया बाहर जा रहा है। अध्‍ययन के मुताबिक उच्च शिक्षा के लिए प्रतिवर्ष एक लाख छात्र बिहार से बाहर जाते है। महाराष्ट्र, राजस्थान और कर्नाटक जैसे राज्‍य की आर्थिक मजबूती में बिहार से गया पैसा एक महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा बन चुका है। यह स्थिति तब है जब भारत के दस प्राचीन विश्वविद्यालय में से तीन बिहार में खंडहर बना है। अध्‍ययन के अनुसार रहने, खाने, पहनने और अन्‍य मूलभूत सुविधा पर और राज्‍य में हो रहे खर्च को छोड़ दे तो भी प्रति छात्र 70,000 रूपया सालाना ( जो की किछु राज्‍य के इंजीनियरिंग में प्रवेश के लिए सरकारी फीस है) के हिसाब से 700 करोड़ होता है (ज्ञात हो की इसके अलावा संस्थान डोनेशन के नाम पर भी काफी चंदा वसूल लेता है) बिहार से बाहर चला जाता है। इसके अलावा प्रवेश देने के नाम पर शिक्षा के दलाल की उगाही अलग है। बिहार से कुछ इतना ही राशि कोचिंग, गैर सरकारी संस्थान और पब्लिक स्कूल के लि‍ए भी बाहर जा रहा है। वैसे आंकडे बता रहे है कि अभी तक ऐसे कोचिंग संस्थान में ( एकाध को छोड़ दे तो) कोइ छात्र राष्ट्रिय या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोइ भी प्रतियोगिता में अव्‍वल नहीं आ सका है। सरकारी संस्थान की अगर बात करे तो इसमें से ज्यादातर भगवान् भरोसे है। कूछ में व्यवस्था नहीं तो कुछ में शिक्षक नहीं। राज्य के कई कॉलेज में चल रही बीसीए पाठ्यक्रम के लि‍ए कंप्यूटर विभाग को अपना लैब तक नहीं है। कई विभाग में लैब है लेकिन वो बस नाम के लिए है, उसमें कोइ सामान नहीं है। कुछ ऐसा हीं हाल पुस्तकालय सबका है। बिहार के सब विश्वविद्यालय को अपना पुस्तकालय होने का गौरव तो है लेकिन उसकी हालत बद स बदतर हो चुकी है। हवादार कमरे की बात तो छोड़ि‍ये धुल धूसरित आलमारी सब से पुस्‍तक निकालने का प्रयास करना भी कठिन। कई किताब फटे है तो कई पढने योग्‍य नहीं है। नए किताब के खरीद की तो बात हीं मत कीजिए। कुछ सोधार्थी और दान के फलस्वरूप कुछ पुस्‍तक नया मिल जाता है। उच्‍च शिक्षा के प्रसार की हालत ये है की मिथिला विश्‍वविद्यालय का बंटवारा होने के बावजूद आलम ये है जो मधेपुरा जिले में स्थापित बी.एन. मंडल यूनिवर्सिटी अकेले पाँच जिला का बोझ उठाए है। एक तरफ देश के तकनिकी और उच्च शिक्षा के हजारों संस्थान में ओम्बुड्समैन की नियुक्ति होने की केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री की घोषणा अभी मूर्त रूप नहीं ले पाई है। जो शिकायत का निपटारा और भ्रष्‍टाचार को रोकनें मे मदद करगी और दुसरी तरफ केंद्रीय विश्वविद्यालय और आईआईटी को लेकर राजनीति भी चिंता क विषय है। ऐसे में केंद्र और राज्‍य सरकार को बिहार में शिक्षा पर ध्यान देना चाहीए वर्ना बिहार में विकास की रफ़्तार जिस तेजी से बढ रहीं है उससे कदमताल अगर शिक्षा का विकास नहीं करेगी तो यह विकास कभी भी औंधे मुँह गिर सकता है।



मैथिली में पढ़ने के लिए क्‍लीक कर यहॉं - शिक्षा क मजबूत व्‍यवस्‍था आ डराइत सत्‍ता

Monday, October 21, 2013

चीनी उद्योग - मीठी यादें, तीखी सच्चाई


एक समय था जब देश के चीनी उत्पादन का 40 फीसदी चीनी बिहार से आता था, अब यह मुश्किल से 4 फीसदी रह गया है। आजादी से पहले बिहार में 33 चीनी मिलें थीं, अब 28 रह गई हैं। इसमें से भी 10 निजी प्रबंधन में चल रही हैं। जिनमें बगहा और मोतिहारी की स्थिति जर्ज़र हो  चुकी है। जहाँ सकरी का अस्तित्व मिट चुका है और रैयाम चीनी मिल अपनी दुर्दशा पर आँशु बहा रहा  है वहीँ सबसे पुराना लोहट चीनी मिल अपने उद्धारक का इन्तेजार कर रहा है। क्या है बिहार में चीनी मीलों का इतिहास और वर्तमान की शोधपरक रिपोर्ट में पत्रकार नीलू कुमारी और सुनील कुमार झा ने कई पहलूओं और कारणों पर प्रकाश डाला है। यह आलेख निश्चित रूप से आपकी जिज्ञासा शांत करेगा। - समदिया 

शर्करा से चीनी तक - चीनी का प्रयोग भारत में कब से हो रहा है ये शायद अभी ज्ञात नहीं हो पा रहा है लेकिन अथर्ववेद और रामायण में एक से कही ज्यादा बार इसका प्रयोग (चीनी शब्द संस्कृत के शर्करा, और प्राकृत के सक्कर शब्द से व्युत्पित हुआ है ) ये दिखाता है की चीनी भारत में करीब ३००० वर्ष पुराना है। मनू, चरक और सूश्रुत संहिता में इसका उल्लेख दवाओं के रूप में किया गया है। मैगस्थनीज और चाणक्य के अर्थशास्त्र (321 से 296 ईपू) में भी इसका उल्लेख है। एक चीनी एनस्कालोपिडिया में यह रिकॉर्ड है की सम्राट ताई सुंग (६२७ से ६५० AD ) के शासनकाल के दौरान चीनी सरकार ने चीनी छात्रो के एक बैच को बिहार भेजा था, ताकि वो गन्ना और चीनी के विनिर्माण की खेती की विधि का अध्यन कर सके। उस वक्त भारत का पूर्वी हिस्सा चीनी उत्पादन में माहारथ हासिल कर चुका था और विदेशों में निर्यात करने लगा था। लेकिन 1453 में इंडोनेशिया पर तुर्क शासन के बाद निर्यात पर अतिरिक्त कर का बोझ बढने से इसके कारोबार पर प्रतिकूल असर पडा। और धीरे धीरे यह कारोबार दम तोड दिया। इधर विदेशों में चीनी की मांग बढती रही। 

नील से ईख तक का सफर - 1792 में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने विदेशो में उठ रही चीनी की माँग को देखते हुए अपना एक प्रतिनिधि मंडल भारत भेजा। चीनी उत्पादन की संभावनाओं का पता लगाने के लिए लुटियन जे पीटरसन के नेतृत्व में भारत आया प्रतिनिधिमंडल ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि बंगाल प्रसिडेंसी के तिरहुत ईलाके में न केवल जमीन उपयुक्त है, बल्कि यहां सस्ते मजदूर और परिवहन की सुविधा भी मौजूद है। उस वक्त यह ईलाका नील की खेती के लिए जाना जाता था। इस रिपोर्ट के आने के बाद नील की खेती में मुनाफा कम देख ईलाके के किसान भी ईख की खेती को अपनाने लगे। इधर, ईख पैदावार के साथ ही 1820 में चंपारण क्षेत्र के बराह स्टेट में चीनी की पहली शोधक  मिल स्थापित की गयी। मिस्टर स्टीवर्ट की अगुवाई में 300 टन वाले इस कारखाने में ईख रस से आठ फीसदी तक चीनी का उत्पादन होता था। यहां उत्पादित चीनी तिरहुत ईलाके के लोगों को देखने के लिए भी नहीं मिलता था और सारा माल पंजाब समेत पश्चिमी भारत में भेज दिया जाता था। 1877 आते आते पश्चिमी तिरहुत के 5 हजार हैक्टेयर वाली नील की खेती सिमट कर 1500 हैक्टेयर में रह गयी और 2 हजार हैक्टेयर में ईख की खेती शुरू हो गयी। 1903 आते आते ईख ने तिरहुत से नील को हमेशा के लिए विदा कर दिया।   

आधुनिक चीनी मिलों का आगमन-  तिरहुत का र्ईलाका परिस्कृत चीनी का स्वाद 19वीं शताब्दी में चख पाया, जब यहां चीनी उद्योग का विकास प्रारंभ हुआ। १९०३ से तिरहुत में आधुनिक चीनी मिलों का आगमन शुरू हुआ। 1914 तक चंपारण के लौरिया समेत दरभंगा जिले के लोहट और रैयाम चीनी मिलों से उत्पादन शुरू हो गया। 1918 में न्यू सीवान और 1920 में समस्तीपुर चीनी मिल शुरू हो गया। इस प्रकार क्षेत्र में चीनी उत्पादन की बडी ईकाई स्थापित हो गयी, लेकिन सरकार की उपेक्षा के कारण इसका तेजी से विकास नहीं हो पाया। प्रथम विश्व युद्ध के समय इनकी कुछ प्रगति अवश्य हुई, लेकिन ये विदेशी प्रतियोगी के आगे टिकी नहीं । 1929 तक भारत में यह कारोबार संकटग्रस्त हो गया और देश में चीनी मीलों की संख्या घटकर सिर्फ 32 रह गयी, जिनमें पांच तिरहुत क्षेत्र से थे। 


संरक्षण का उठाया फायदा – तिरहुत चीनी उद्योग की यह अवस्था नहीं हुई होती यदि 1920 की चीनी जाँच समिति द्वारा इसके संरक्षण की सिफारिस की गई होती। बाद में सम्राजीय कृषि गवेषणा परिषद् ने ईख उत्पादकों के हितो की रक्षा के लिए चीनी उद्योग को संरक्षण देने की सिफारिश की। फलतः 1932 में पहली बार 7 वर्षो के लिए इस उद्योग को संरक्षण दिया गया। तिरहुत ने इस मौके का भरपूर फायदा उठाया और यहां जिस तीव्रता से इस उद्योग का विकास हुआ वह संरक्षण की सार्थकता को सिद्ध करता है। चार वर्ष के भीतर ही चीनी मीलों की संख्या 7 से बढ़कर 17 हो गयी। चीनी का उत्पादन 6 गुना बढ़ गया, आयात किये गए चीनी यंत्रों का मुल्य 8 गुना बढ़ गया। संरक्षण प्रदान करने के 6 वर्ष के भीतर ही चीनी आयात में साढ़े आठ करोड़ रूपये की कमी हो गयी और केवल 25 लाख रूपये के चीनी का आयत भारत में किया गया। चीनी कंपनियों द्वारा दिया जाने वाला लाभांश जो 1923 और 31 के बीच औसतन 11.2% था बढ़कर 1932 में  19.5% हो गया और 1934 में 17.2% हो गया। 

चीनी मामले में आत्म निर्भर – 1937 में चीनी प्रशुल्क बोर्ड ने चीनी उद्योग को दो साल और संरक्षण देने की सिफारिश की। बोर्ड की सिफारिश मंजूर होने के बाद तिरहुत में चीनी की बढती उत्पादकता से 1938 -39 में भारत ना केवल चीनी के मामले में आत्मनिर्भर हो गया था, अपितु अतिरिक्त उत्पादन भी करने लगा था। उद्योग को दिया गया संरक्षण इसका प्रमुख कारण था। दूसरा कारण ये भी था कि दूसरे विश्व युद्ध के कारण कच्चा माल तथा यंत्रों की लागत अत्यंत कम हो गयी थी जो इस उद्योग के प्रसार में सहायक सिद्ध हुआ। लेकिन 1937 में विश्व के 21 प्रमुख चीनी उत्पादक देशो में हुए एक अंतरराष्ट्रीय समझौते से संरक्षण का लाभ प्रभावित हुआ। इस समझौते में निर्यात का कोटा तय हुआ और वर्मा को छोड़कर समुद्र के रास्ते अन्य किसी भी देश में चीनी का निर्यात करने के लिए भारत पर 5 वर्षो के लिए रोक लगा दी गयी। इसके कारण 1942 तक बिहार सहित पूरे भारत में अति उत्पादकता की समस्या पैदा हो गयी। इसलिए कई चीनी मिले निष्क्रिय हो गयी।

आधिपत्य को लेकर बढा तनाव – चीनी की अधिकता से उत्पन्न परिस्थिति का सामना करने के लिए चीनी उत्पादकों ने चीनी संघ की स्थापना की, ताकि चीनी के मूल्य के ह़ास को रोका जा सके। यह संघ अपने सदस्य कारखानों के द्वारा चीनी के बिक्री को सुनिश्चित करने लगा। 
1966-67 तक बिहार के निजी मिल मालिकों ने चीनी कंपनियों पर पूरी तरह अपना कब्जा जमा लिया और ऐसी नीति अपनाने लगे ताकि चीनी पर से सरकार का नियत्रण पूर्ण रूप से खत्म हो जाये। इस कारण चीनी मीलों पर मालिकों और सरकार के बीच टकराव बढने लगे। 1972 में केंद्र सरकार द्वारा चीनी उद्योग जाँच समिति की स्थापना की। चीनी उद्योग की स्थिति और समस्या की जांच कर यह समिति 1972 के आखिरी सप्ताह में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी। समिति ने सरकार को चीनी कारखानों का अधिग्रहण करने का सुझाव दिया। फलस्वरूप 1977 से 85 के बीच 15 से ज्यादा चीनी मिलों का अधिग्रहण बिहार सरकार ने किया। इसमें समस्तीपुर (समस्तीपुर शुगर सेन्ट्रल शुगर लिमिटेड ), रैयाम ( तिरहुत कोपरेटिव शुगर कंपनी लिमिटेड ), गोरौल( शीतल शुगर वर्क्स लिमिटेड), सिवान ( एस.के.जी. शुगर लिमिटेड), गुरारू ( गुरारू चीनी मिल), न्यू सिवान ( न्यू सिवान शुगर एंड गुर रिफ़ाइनिग कम्पनी), लोहट ( दरभंगा शुगर कंपनी लिमिटेड), बिहटा ( साउथ बिहार शुगर मिल लिमिटेड), सुगौली( सुगौली शुगर वर्क्स लिमिटेड), हथुआ ( एस.के.जी. शुगर लिमिटेड), लौरिया (  एस.के.जी. शुगर लिमिटेड), मोतीपुर ( मोतीपुर शुगर फेक्टरी ), सकरी ( दरभंगा शुगर कंपनी लिमिटेड), बनमनखी ( पूर्णिया कोपरेटिव शुगर फेक्टरी लिमिटेड), वारिसलीगंज (वारिसलीगंज कोपरेटिव शुगर मिल लिमिटेड),  का अधिग्रहण किया गया। 

और बढती गयी मीलों की दुर्दशा - इन मिलों को चलाने के लिए बिहार स्टेट शुगर कॉर्पोरेशन लिमिटेड की स्थापना 1974 ई० में हुई थी, जो चीनी मिलो के घाटे को नियत्रित कर इसे सुचारू रूप से प्रबंधन करने का काम करता, लेकिन इनमें से ज्यादातर इकाई कीमतों में गिरावट और इनपुट लागत में वृद्धि के दवाब को नहीं झेल सकी। फलस्वरूप एक के बाद एक यूनिट बंद होते चले गये। 1996-97 के पेराई सीज़न के बाद इसको पुनर्जीवित करना बंद हो गया और सारी इकाई बंद पड़ गये। घाटे का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन इकाइयों पर किसानो का 8.84 करोड़ रुपया और कर्मचारियों का 300 करोड़ रुपया बकाया था। 1990 आते आते तिरहुत के ईख की खेती कुछ जिलों तक सिमट कर रह गयी और हजारों हैक्टेयर में गेहूं की खेती शुरू हो गयी। 1997 आते आते गेहूं ने तिरहुत से ईख को नकदी फसल के रूप में विदा कर दिया।   
सरकार ने रखे हथियार - फरवरी 2006 में बिहार सरकार आखिरकार हथियार रख दिये और यह स्वीकार कर लिया कि वो बंद मिलों को चलाने में असमर्थ है। 1977 में चीनी मिलो के घाटे को नियत्रित कर इसे सुचारू रूप से प्रबंधन करने का दावा झूठा साबित हुआ। मिलों को फिर से चालू करने के लिए सरकार ने गन्ना विकास आयुक्त की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय बैठक बुलायी। इसमें समिति ने राय दी कि बिहार स्टेट शुगर कॉर्पोरेशन लिमिटेड के बंद पड़े चीनी मीलों को पुनर्जीवित करने के लिए एक वित्तीय सलाहकार को नियुक्त किया जाय, जो इन बंद पड़े चीनी मिलो के पुनरुद्धार के लिए कोई सटीक योजना बना सके। इसके तहत एसबीआई कैपिटल को यह काम सौंपा गया। समिति ने अंततः इन इकाइयों के लिए निविदा आमंत्रित करने का फैसला किया और निजी निवेशको आमंत्रित किया कि वो इन बंद पड़े चीनी मिलो को पुनरुद्धार / पुनर्गठन / लीज़ पर ले सके। शुरुआत से ही निवशकों की दिलचस्पी ना के बराबर रही। पिछले साल भी दिसंबर में टेंडर भरने के आखिरी दिन तक तीन चीनी मिलों के लिए सिर्फ छह आवेदन ही मिले हैं। 

पुनरुद्धार के नाम पर मिट गया अस्त्तिव - एसबीआई कैपिटल ने परिसंपत्तियों का मूल्यनिर्धारण, परिचालन और वित्तीय मापदंडों के आधार पर बिहार सरकार को एक संक्षिप्त रिपोर्ट दिया। इसके अनुसार बंद पड़ी १५ मीलों में से १४ मीलों को ही केवल फिर से चलाने का सुझाव दिया जबकि सकरी मिल को विलोप करने की बात कही गयी समिति के अनुसार लोहट और रैयाम  के बीच स्थित होने के कारण इस मिल के लिए गन्ना अधिकार क्षेत्र उपलब्ध नहीं सकता है। अतः इसके ११५  एकड़ जमीन को किसी अन्य कार्य के लिए आवंटित किया जाना चाहिए। लोहट के मुनाफे से १९३३ में स्थापित ७८२ टीएमटी क्षमता वाले इस मिल के वजूद को खत्म कर दिया गया। इस प्रकार बिहार के चीनी मीलों के इतिहास में सकरी पहली इकाई रही जो केवल बंद ही नहीं हुई बल्कि उसे हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया।  सरकार के इस पहल से ऐसा भी नहीं की अन्य मिलें पुनर्जीवित हो गयी सकरी और रैयाम को महज़ 27.36 की बोली लगाकर लीज़ पर लेने वाली कंपनी तिरहुत इंडस्ट्री ने नई मशीन लगाने के नाम पर रैयाम चीनी मिल के सभी साजो सामान बेच चुकी है। २००९ में २०० करोड़ के निवेश से अगले साल तक  रैयाम मिल को चालु कर देने का दावा करने वाली यह कम्पनी मिल की पुरानी सम्पति को बेचने के अलावा अब तक कोई सकारात्मक पहल नहीं कर सकी। वैसे बिहार सरकार ने अब तक कुल ५ मीलों को निजी हाथों में सौंपा है जिनमे से केवल दो सुगौली और लौरिया चीनी मिल एक बार फिर चालू हो पाई है जबकि रैयाम और सकरी मीलों का भविष्य निजी हाथों में जाने के वाबजूद अंधकारमय है। 

इथेनॉल ने बढा दी मुश्किल - निवेशकों की रुचि चीनी उत्पादन में कम ही रही, वे इथेनॉल के लिए चीनी मिल लेना चाहते थे, जबकि राज्य सरकार को यह अधिकार नहीं रहा। क्योंकि 28 दिसंबर, 2007 से पहले गन्ने के रस से सीधे इथेनॉल बनाने की मंजूरी थी। उस समय बिहार में चीनी मिलों के लिए प्रयास तेज नहीं हो सका, जब प्रयास तेज हुआ तब दिसंबर, 2007 को गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 1996 में संशोधन किया गया, जिसके तहत सिर्फ चीनी मिलें ही इथेनॉल बना सकती हैं। इसका सीधा असर बिहार पर पड़ा है। मुश्किलें यहीं से शुरू होती हैं। ऐसे में बंद चीनी मिलों को चालू करा पाना एक बड़ी चुनौती आज भी है। जानकारों का कहना है की राज्य सरकार पहले पांच साल के कार्यकाल में निवेशकों का भरोसा जीतने का प्रयास करती रही। अब जब निवेशकों की रुचि जगी है, तब केंद्र ने गन्ने के रस से इथेनॉल बनाने की मांग को खारिज कर राज्य में बड़े निवेश को प्रभावित कर दिया है। जो निवेशक चीनी मीलों को खरीदने के शुरुआती दौर में इच्छा प्रकट की थी वो भी धीरे धीरे अपने प्रस्ताव वापस लेते चले गये। 

फिर चाहिए संरक्षण – पिछले पेराई मौसम में 5.07 लाख टन के रिकार्ड उत्पादन के बावजूद चीनी मिलों को करीब 250 करोड का घाटा सहना पड रहा है। बिहार में गन्ने से चीनी की रिकवरी की दर 9.5 फीसदी से घटकर 8.92 फीसदी हो गयी है। बिहार में चीनी का उत्पादन मूल्य करीब 3600 प्रति क्विटल है, जबकि चीनी का मूल्य घटकर 2950 प्रति क्विटंल हो गया है। छोआ का दाम राज्य सरकार ने 187 रुपये तय कर रखा है जबकि उत्तरप्रदेश में इसकी कीमत 300 से 325 रुपये प्रति क्विंटल है। इसी प्रकार स्प्रीट की कीमत बिहार में महज 28 रुपये प्रति लीटर है जबकि उत्तरप्रदेश में 33 से 35 रुपये प्रति लीटर है। ऐसे में बिहार शूगर मिल एसोसिएशन ने सरकार से कैश सब्सिडी 17 की जगह 30 रुपये प्रति क्विंटल करने की मांग की है। ऐसे में बिहार के चीनी उद्योग को एकबार फिर संरक्षण की जरुरत हैं। चीनी उद्योग को लेकर बिहार की मीठी यादें यह विश्वास दिलाती है कि आज की कडवी सच्चाई कल एक नयी तसवीर बनकर सामने आयेगी।
साभार - इसमाद.कॉम
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