Monday, April 15, 2013

लंगट सिंह कॉलेज – खंडहर होता इतिहास

आज से सौ वर्ष पूर्व काशी और कलकत्ता के मध्य गंगा के उत्तरी तट पर कोई कॉलेज नहीं था। हाई स्कूल की संख्या नगण्य थी। उस समय उस शिक्षा के घोर अन्धकारच्छन्न युग में उच्‍च शिक्षा के लिए मुजफ्फरपुर में कॉलेज की स्थापना करके बाबू लंगट सिंह ने शिक्षा के लौ को उजागर किया। लंगट सिंह कॉलेज का स्थापत्य लन्दन के ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक कॉलेज की नकल है। इसका नकल ‘दिल्ली विश्वविद्यालय’ के अधीन हिन्दू कॉलेज ने भी किया है। कहने के लि‍ए घोटालेबाज के घर में स्‍कूल खोलनेवाला राज्‍य सरकार इसको विशेष कॉलेज का दर्जा दि‍या है जबकि बिहार को दो केंद्रीय विश्‍वविद्यालय देकर उपकार करनेवाले केंद्र सरकार के लिए ये एक एतिहासिक स्मारक है, लेकिन सच ये है जो कभी भारतीय उच्‍च शिक्षा की बुलंदी पर रहने वाला ये कॉलेज आज अपने अस्तित्‍व के लिए संघर्षरत है। इसकी उपेक्षा की हद ये है जो यूजीसी जैसी संस्‍था को इसका स्थापना वर्ष पता नहीं है। उसकी वेबसाईट पर कॉलेज का स्थापना वर्ष खाली है जबकी नाम भी संक्षिप्‍त में लिखा गया है, जैसे लंगट सिंह का नाम लेने में लज्‍जा आती हो। प्राचीन और एतिहासिक शिक्षा के महल लंगट सिंह कॉलेज का इतिहास और उसकी उपेक्षा पर प्रस्‍तुत है ये विशेष रपट। -सुनील


कहा जाता है मुश्‍कि‍ल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए। ठीक ऐसा हीं कुछ शपथ मांग रहा है बिहार के एतिहासिक और प्राचीन महाविद्यालय में से एक लंगट सिंह कॉलेज। कहने के लि‍ए इसे राज्‍य सरकार ने विशेष कॉलेज का दर्जा दे रखा है और हालहीं में भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण विभाग इसको स्मारक घोषि‍त कर चुका है। लेकिन हकीकत ये है कि ये सुंदर सा भवन अब खंडहर बनता जा रहा है। भवन पर छह से आठ फुट लम्‍बे पेड़ उ‍ग आए है और अगर जानकार का माने तो ये भवन कभी भी ढह सकता है। बिहार में धरोहर के प्रति उदासीनता नयी बात नहीं है। कई धरोहर नष्‍ट हो चुके हैं और कई नष्‍ट होने के कगार पर है। लंगट सिंह कॉलेज भी उसमें से एक कहा जा सकता है।

स्‍मारक बनाने के लिए चला था आंदोलन - इसको दुर्भाग्‍य कहना चाहिये या रोचक तथ्‍य, लेकिन लंगट सिंह कॉलेज सरकार के लिए मात्र गांधी की यात्रा के लिए महत्‍वपूर्ण स्‍थल हैं। सरकार और कॉलेज प्रशासन केवल गांधी से जुड़े पर्यटन स्थल के रूप में इसको विकसित करने की योजना तैयार कर रहा है। पर्यटन के दृष्टि से कॉलेज सुन्दर बने रमणीय बने उसके लि‍ए सरकार से पैसा नहीं मांगा जाता है। ऐसे में इस कॉलेज का इतिहास गाँधी तक जाकर ठहर जाता है। कॉलेज के विकास, इसके गौरवशाली इतिहास की कोई चर्चा कहीं नहीं होती है। लेकिन लंगट सिंह कॉलेज के कूछ उत्साही युवा जो दिल्‍ली आ चुके है और दिल्‍ली के कॉलेज परिसर को देख कर रोमांचित है उस ‘स्टुडेंट इनिसिएटिव फॉर हेरिटेज’ के बैनर तले प्रधानमंत्री से गप कि‍ए और इस कॉलेज की गरिमा और इतिहास से उनको अवगत करायें। एसएचआईसी के कोर्डिनेटर अभिषेक कुमार और उनके दल प्रधानमंत्री से इस कॉलेज के लिए भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग से बात करने का अनुरोध कि‍या। प्रधानमंत्री ने तत्‍काल अनुरोध स्वीकार कर भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण को इस बाबत एक पत्र लिखा जिसमें इस कॉलेज को ऐतिहासिक दर्जा देने की संभावना पर विचार करने के लि‍ए कहा गया। भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग इसको धरोहर तो घोषित कर दि‍या, लेकिन इसके संरक्षण के लिए कोई प्रयास अभी तक शुरू नहीं कर सका है। आशंका ये जताई जा रही है जो अगर प्रयास जल्‍द शुरू नहीं हुआ तो भवन ढहने जैसी स्थिति में है और परिसर फि‍र एक खंडहर के संरक्षणक योग्‍य हो जाएगा।

मात्र गांधी तक इसके इतिहास को समेटने की थी साजिश - राजेंद्र बाबू से जुड़े इस कॉलेज को गांधी तक सिमित रखने के पि‍छे कुछ लोग इसे राजनीतिक साजिश करार देते हैं। ये कॉलेज जब खोला गया था तब का बात छोडि़ए अभी भी एक कालेज खोलना कोई आसान काम नहि है। अगर लंगट सिंह इसके लि‍ए सामने नहीं आते तो देश कई विभूति से वंचित रह जाता। 1975 तक भारतीय प्रशासनिक सेवा मे इस कालेज के सबसे ज्‍यादा छात्र सफल होते रहे थे। लंगट सिंह कॉलेज तिरहुत क्षेत्र में मात्र ज्ञान की ज्‍योति नहीं जलायीं बल्कि सांस्कृतिक उत्थान और सामाजिक परिवर्तन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। लेकिन किसने ये सोचा था कि लंगट सिंह का नाम इतिहास के पन्‍नें में स्वर्णाक्षर में तो छोड़िये सामान्‍य स्‍याही तक से नहीं लिखा जाएगा। कॉलेज का चर्चा एलएस कॉलेज से होने लगा और इतिहास केवल गाँधी के चंपारण यात्रा के दौरान गाँधी-कूप तक सिमित हो गया। गाँधी के ऐतिहासिक यात्रा के दौरान कॉलेज परिसर में ठहरना, उनके स्वागत में उमड़ी भीड और छात्र द्वारा गाँधी के बग्घी अपने हाथ से खीचना कॉलेज के लिए ऐतिहासिक महत्व हो गया। वहीं चंपारण यात्रा के सूत्रधार आचार्य जे.बी. कृपलानी, गाँधी को कॉलेज हॉस्टल में ठहराने के कारण बर्खास्त विद्वान आचार्य मलकानी को लोग भुलते गए। राजेंद्र बाबू के कॉलेज के प्राध्यापक के रूप में काम करना, प्राचार्य (Principal) बनना, कॉलेज के वर्तमान स्थल के चयन करने में उनका योगदान किसी के लि‍ए चर्चा का विषय नहीं रहा। ये मांग भी नहीं उठाई गयी जो रामधारी सिंह दिनकर से जुड़ी चीज एक जगह संग्रहित कि‍या जाए, उनके नाम पर कॉलेज में कुछ स्‍थापित किया जाए। कॉलेज की गरिमा बढाने वाले अनेक संस्मरण को एक पुस्‍तकालय में संजोने का विचार तक किसी को नहीं आया। जबकि लगभग पांच दशक तक बिहार नहीं अपितु भारत के प्रतिष्ठाप्राप्त महाविद्यालय में लंगट सिंह कॉलेज क नाम प्रमुखता से लि‍या जाता रहा है। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा० राजेंद्र प्रसाद और राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जिस कॉलेज से संबंध रखते है उस कॉलेज का परिचय अगर कोइ ऐसे दे रहा है कि इस जगह गांधी रात बि‍ताए थे तो निश्चित रूप से ये एक साजिश कही जा सकती है।

‘भूमिहार ब्राहमण कॉलेज’ था पहले नाम - 3 जुलाई 1899 को वैशाली और तिरहुत के संधि भूमि में अवस्थित ये महाविद्यालय अपने प्रारंभिक दस वर्ष तक सरैयागंज के निजी भवन में भूमिहार ब्राहमण कॉलेज के नाम से चलता था। जनवरी 1908 में राजेंद्र प्रसाद कलकत्ता विश्वविद्यालय से उच्च श्रेणी में एमए पास कर जुलाई में इस कॉलेज के प्राध्यापक के रूप में नियुक्त हुए। उस समय ये कॉलेज कलकत्ता विश्विद्यालय के अधीन था। ऐसे मे समय समय पर निरीक्षण के लिए कलकत्ता विश्यविद्यालय से अधिकारी आते रहते थे। इसी क्रम में कलकत्ता विश्विद्यालय के वनस्पतिशास्त्र के प्रो० डा० बहल जब ये कॉलेज आयें तो वो इसे देख सख्त नाराजगी व्‍यक्‍त किएं जो कॉलेजक परिसर बहुत छोटा है और वर्ग दुकान के आसपास चल रहा है। उन्‍होने तत्‍काल कॉलेज के लिए पर्याप्‍त जमीन और भवन की व्‍यवस्‍था करने के लिए बोलें। इसके बाद राजेंद्र बाबू अपने कुछ सहयोगी शिक्षक के संग जमीन ढ़ुंढ़ना शुरू किए। आखिरकार खगड़ा गाँव के जमींदार और बाबू लंगट सिंह क सहयोग से कॉलेज के लिए प्रयाप्‍त जमीन मिला। कॉलेज 1915 में सरैयागंज से अपने वर्तमान जगह पर ‘ग्रीर भूमिहार ब्राहमण कॉलेज नाम से स्थान्तरित हो गया। लेकिन स्थानीय लोगों के विरोध के बाद कॉलेज का नाम इसके संस्थापक बाबू लंगट सिंह के नाम पर ‘लंगट सिंह कॉलेज’ राख दि‍या गया।

आप नहीं थे शिक्षित, समाज को बनाए ग्रेजुएट - जानकी वल्लभ शास्त्री, रामबृक्ष बेनीपुरी, शहीद जुब्बा साहनी जैसे अनेक विभूति के नाम मुजफ्फरपुर की प्रतिष्ठा बढाती है। लेकिन सब से बड़े प्रेरणा के स्रोत थे बाबू लंगट सिंह। बाबू लंगट सिंह का जन्म आश्विन महीने में, सन 1851 में धरहरा, वैशाली निवासी अवध बिहारी सिंह के घर हुआ था। निर्धनता के अभिशाप और जीवन का संघर्ष ऐसा रहा की लंगट सिंह साक्षर नहीं हो सके। लंगट सिंह महज 24 वर्ष में जीविका की तलाश के लिए घर से निकल पड़े। पहला काम मिला रेल पटरी के किनारे बिछ रहे टेलीग्राम के खम्‍भे पर तार लगाने की। इस काम में उनके लगन को देखकर आगे काम मिलता गया और वो रेलवे के मामूली मजदूर से जमादार बाबू, जिला परिषद्, रेलवे और कलकत्ता नगर निगम के प्रतिष्ठित ठेकेदार बन गए। उनकी कहानी कोई आधुनिक फिल्‍म के पटकथा से कम नहीं है। साधारण मजदूर से उदार जमींदार के रूप में स्थापित लंगट सिंह आजके युवा के लिए प्ररेणा का स्रोत थे। कलकत्ता के संभ्रांत समाज में उनको हीरो माना जाता था। बंगाली समुदाय से वो इतने घुल-मिल गए थे कि शुद्ध बंगाली लगने लगे थे। स्वामी दयानंद, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, ईश्वरचंद विद्यासागर, सर आशुतोष मुखर्जी आदि के वो समर्थक थे। मंद पड़े विद्यानुराग का वो पवित्र बीज कलकत्ता मे फूटा और आज एलएस. कॉलेज के रूप में वटवृक्ष की भांति खड़ा हुआ।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में भी दिए दान - बाबू लंगट सिंह शिक्षा के विस्‍तार के लिए सब कुछ करने के लिए तैयार रहते थे। पं. मदन मोहन मालवीय जी, महाराजाधिराज कामेश्‍वर सिंह, काशी नरेश प्रभुनारायण सिंह, परमेश्वर नारायण महंथ, द्वारकानाथ महंथ, यदुनंदन शाही और जुगेश्वर प्रसाद सिंह जैसे विद्याप्रेमी के संग जुडकर उन्होनें शिक्षा के अखंड दीप को मुजफ्फरपुर हीं में नहीं बल्कि और जगह भी जलाने का काम कि‍यें। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के लिए भी लंगट सिंह ने रुपये दि‍ए थे। कहा जाता है काशी के लिए जो रुपया वो दि‍ए थे वो एल.एस. कॉलेज के भवन निर्माण के लिए रखे थे। अद्भुत मेधा के युग-निर्माता, एक कृति पुरुष बाबू लंगट सिंह को भूलना, तिरहुत को भूल बिहार मे शिक्षा के इतिहास को लिखना कठिन है। आज उनको दिवंगत हुए 100 साल से ज्यादा हो गए लेकिन फिर भी उनके काम उनके सोच और उनके शिक्षा-प्रेम शुभ कर्म करने के लिए प्रेरणा देता है। 15 अप्रैल, 1912 को उनके निधन के साथ तिरहुत में जो शून्य पैदा हुआ वो आज तक नहीं भरा जा सका है। तिरहुत खास कर के मुजफ्फरपुर का इतिहास बिना लंगट सिंह के चर्चा के पूरा नहीं हो सकता है।

कभी था सबसे सुंदर आज हो गया खंडहर - लंगट सिंह कॉलेज का विशाल गैस प्लांट आज कॉलेज के गौरव गाथा का मूक गवाह है। एक जमाना था जब ये विज्ञान संकाय से लेकर पीजी रसायन विभाग तक के सब प्रयोगशाला में निर्बाध गैस आपूर्ति करता था। आज केवल अपना निशान बरकरार रखने की जद्दोजहद में है। विशाल यंत्र की कई चीजें चोरी हो चुकी है। प्रशासनिक उदासीनता के कारण यंत्र के जीर्णोद्धार की चिंता किसी में भी नहीं देखी जा रही है। विद्वान शिक्षक सब चुटकी लेते कहते थे कि‍ यंत्र का स्‍वरूप देखना अब एक ज्ञान का चीज है, ऐसा यंत्र किसी भी महाविद्यालय के पास नहीं है। ये तो अब अपने आप में दर्शनीय और अध्ययन योग्‍य है। दो दशक पूर्व ये यंत्र ठीक था। 1952 में एक एकड़ में इसके लिए गैस प्लांट की स्थापना की गई थी। इसके देखरेख का जिम्मा पीएचईडी पर था। विभाग के तीन कर्मी इसके संचालन के लिए तैनात रहते थे। उनके लिए परिसर में आवास की व्यवस्था भी की गई थी। लेकि‍न धीरे-धीरे यह व्यवस्था चरमरा गयी। देश के महज तीन कॉलेज में से एक ये लंगट सिंह कॉलेज था जिसमें लैब के संचालन के लिए अपने व्यवस्था से गैस का निर्माण किया जाता था। इस जगह केरोसीन तेल के क्रैकिंग से गैस का फॉरमेशन कि‍या जाता था। तत्कालीन प्राचार्य डा.सुखनंदन प्रसाद अंतिम बार इसके जीर्णोद्धार की पहल कि‍ए थे। अगर ठीक से इसको संरक्षित कि‍या जाए तो ये भावी पीढ़ी के लिए अध्ययन में काफी सहायक हो सकता है। वैसे भी कॉलेज के लिए ये अमूल्‍य धरोहर है। लेकिन सवाल उठता है आखिर कब हम धरोहर के प्रति गंभीर बनेगें और अपने धरोहर के संरक्षण करने के लिए सक्रिय होंगे।

Monday, April 1, 2013

गर रूठो तुम मैं मनाउ

रूठना शायद महिलाओं के चारित्रिक विकास की एक कड़ी हैं। इतनी मज़बूत कड़ी की ये ना हो तो महिलाओं का शारीरिक और मानसिक विकास ही रुक जाए।

एक सम्पूर्ण औरत अपने जीवन काल में कितने बार रूठती हैं ये शायद उनको भी पता नहीं होगा। ना ही अभी तक किसी वैज्ञानिक ने इस बारे में कोई अटकले, कयास या कोई सार्थक प्रयास किया हैं। मुझे तो लगता हैं की रूठने को नापने का पैमाना ना तो अभी तक बना हैं ना ही कभी आगे बन सकता हैं।

लेकिन एक बात तो साफ़ हैं की यह जितनी तेजी से फ़ैल रहा हैं और छूत की तरह एक से होते हुए दुसरे तक पहुँच रहा हैं से इस आंकलन को टाला नहीं जा सकेगा की आने वाले समय में  महिलायें इस बिमारी से पेट से ही ग्रसित होकर आएगी।

वैसे अगर देखा जाय तो यह अनुमान भी काफी हद तक सत्य हैं बच्चे जन्म के साथ ही रूठने लगते हैं, कभी दूध के लिए तो कभी टाफी के लिए और ये बिमारी युवावस्था की अग्रसर होते होते और भी भयानक और छूत की तरह  लगती हैं। मेरा तो यहाँ तक मानना हैं की  आर्थिक मंदी और डांवाडोल अर्थव्यवस्था के लिए कही हद तक ये रूठना फैक्टर भी जिम्मेदार हैं। रूठे हुए को मानने के लिए ये दुखियारी माँ बाप या बेचारा पती या बोयफ्रैंड उनकी जरुरतो को पूरा करने में लगा रहता हैं वो भी बिना फायदे नुक्सान की चिंता किये। 

वैसे मेरे हिसाब से बिना फायदे नुक्सान के हमेशा इनकी हरेक बात मानना और इनकी जरुरतो को पूरा करना ही आपको इस भयानक बिमारी से बचा सकता हैं। वैसे चिकित्सा विज्ञान में इस समय तक इस बीमारी के लिए कोई भी इलाज़ नहीं आ पाया हैं। नहीं इस पर कोई शोध चल रहा हैं। इलाज़ सिर्फ एक हैं, इनकी जायज़ नाजायज़ मांग को आप आँख बंद करके पूरा करते रहे।

आशिक मिजाज़ मजनुओ और पतियों के संग उन दुखियारी माँ-बाप से भी विनम्र निवेदन हैं की अगर आपके आस-पास या नाते रिश्तेदार में इस प्रकार के रोग के चिन्ह मिलते हैं तो अभी से सावधान हो जाए, आपकी जरा सी चुक आपको हिटलर से जानी लीवर बना सकती हैं और आपकी जरा सी लापरवाही आपको पालतू कुत्ता बनाकर जीवन भर इनके कदमो को चाटने और इनके पीछे दुम हिलाकर चलने को मजबूर कर सकती हैं। सावधान!

Thursday, March 21, 2013

हैप्पी बर्थडे टू यू बिहार



आज बिहार को अलग हुए पुरे १०१ साल हो गए हैं आजादी का जश्न सब पर चढ़ कर बोल रहा हैं। लोग ऐसे प्रतिक्रिया कर रहे हैं जैसे हम कभी गुलाम ही ना हो। सुशासन का असर हरेक गली चौराहे पर दिख रहा हैं। लोग जश्ने आज़ादी में झूम रहे हैं। पटना की गलियाँ सोनू निगम के पोस्टरों से सराबोर हैं। होली का रंग भी कही ना कहीं इस आवेश में दब गया लगता हैं। लोग उत्साहित हैं और जोश में भी, लेकिन इन जोश और खरोश में हम बिहार के विभाजन का सही अर्थ को नहीं समझ पाए हैं। ये आलेख शायद आपको इतिहास के उस पन्नो से रूबरू करा सके जिसकी आपको तलाश हैं - समदिया

वैसे तो बिहार की प्रशासनिक पहचान का अंत होना 1765 में ही शुरू हो गया था जब ईस्ट इंडिया कम्पनी को इसकी दीवानी मिली थी। उसके बाद यह महज एक भौगोलिक इकाई बन गया, अगले सौ सवा सौ सालों में बिहारी एक सांस्कृतिक पहचान के रूप में तो रही लेकिन इसकी बिहार का प्रांतीय या प्रशासनिक पहचान मिट सा गया। बिहार का इतिहास संभवतः सच्चिदानन्द सिन्हा से शुरू होता है क्योंकि राजनीतिक स्तर पर सबसे पहले उन्होंने ही बिहार की बात उठाई थी। कहते हैं, डा. सिन्हा जब वकालत पास कर इंग्लैंड से लौट रहे थे तब उनसे एक पंजाबी वकील ने पूछा था कि मिस्टर सिन्हा आप किस प्रान्त के रहने वाले हैं। डा. सिन्हा ने जब बिहार का नाम लिया तो वह पंजाबी वकील आश्चर्य में पड़ गया। इसलिए क्योंकि तब बिहार नाम का कोई प्रांत था ही नहीं। उसके यह कहने पर कि बिहार नाम का कोई प्रांत तो है ही नहीं, डा. सिन्हा ने कहा था, नहीं है लेकिन जल्दी ही होगा। यह घटना फरवरी, 1893 की बात है। उसके बाद एक से एक ऐसे हादसे होते गए जिसने बिहारी अस्मिता को झंकझोर कर रख दिया , एक समय ऐसा भी आया जब बिहारी युवाओं (पुलिस) के कंधे पर ‘बंगाल पुलिस’ का बिल्ला लटकाए बिहार की जमीन पर काम करना पड़ता था। उस समय बिहार की आवाज बुलंद करने के लिए चंद ही लोग थे, जिनमे महेश नारायण, अनुग्रह नारायण सिंह, नंदकिशोर लाल, राय बहादुर और कृष्ण सहाय आदि प्रमुख थे। ना कोई अखबार था ना कोई पत्रकार बिहार से प्रकशित एक मात्र अखबार 'द बिहार हेराल्ड' था जो बिहारियों के हित के लिए बात करता था। तमाम बंगाली अखबार बिहार पृथक्करण का विरोध करते थे, कुछ बिहारी पत्रकार बिहार हित की बात तो करते थे लेकिन अलग बिहार के मुद्दे पर एकदम अलग राय रखते थे। बिहार को अलग राज्य के पक्ष में जनमत तैयार करने या कहें की माहौल बनाने के उद्देश्य से 1894 में डॉ. सिन्हा ने अपने कुछ सहयोगियों के साथ ‘द बिहार टाइम्स’ अंग्रेज़ी साप्ताहिक का प्रकाशन शुरू किया। स्थितियां बदलते देख बाद में ‘बिहार क्रानिकल्स’ भी बिहार अलग प्रांत के आन्दोलन का समर्थन करने लगा। 1907 में महेश नारायण की मृत्यु के बाद डॉ. सिन्हा अकेले हो गए। इसके बावजूद उन्होंने अपनी मुहिम को जारी रखा। और 1911 में अपने मित्र सर अली इमाम से मिलकर केन्द्रीय विधान परिषद में बिहार का मामला रखने के लिए उत्साहित किया। 12 दिसम्बर 1911 को ब्रिटिश सरकार ने बिहार और उड़ीसा के लिए एक लेफ्टिनेंट गवर्नर इन कौंसिल की घोषणा कर दी। धीरे धीरे उनकी मुहीम रंग लाइ और 22 मार्च 1911 को बिहार बंगाल से अलग हो स्वतंत्र राज्य हो गया।

1911 में बिहार के बंगाल से अलग होने के एक सौ एक बरस होने वाले हैं. आज भी इतिहास के इस मोड का बिहार की ओर से इतिहास के इस पहलु को दिखाने का अभाव है। क्या कारण था कि बिहार को बंगाल से अलग लेने का निर्णय ब्रिटिश सरकार ने लिया ... इस प्रश्न का एक उत्तर यह दिया जाता है कि ब्रिटिश सरकार बंगाल के टुकडे करके उभरते हुए राष्ट्रवाद को कमजोर करना चाहती थी। पहले उसने बंग-विभाजन के द्वारा ऐसा करने की कोशिश की और फिर बाद में बंगाल से बिहार और उडीसा को अलग करके यही दोहराया। वैसे बंग विभाजन का जो विरोध बंगाल ने किया उतना विरोध बिहार विभाजन के समय नहीं हुआ, यह लगभग स्वाभाविक था क्योंकि बिहार को पृथक राज्य बनाने के लिए हुए आन्दोलन के पीछे सच्चिदानंद सिन्हा एवं महेश नाराय़ण समेत अन्य आधुनिक बुद्धिजीवियों के नेतृत्व में इसका शंखनाद हुआ था।

"बिहार बिहारियों के लिए" का विचार सर्वप्रथम मुंगेर के एक उर्दू अखबार मुर्घ -इ- सुलेमान ने पेश किया था.एक अन्य पत्र कासिद ने भी इसी तरह के वक्तव्य प्रकाशित किए. इसी दशक में बिहार के प्रथम हिन्दी पत्र- बिहार बन्धु जिसके संपादक केशवराम भट्ट थे ने भी इस तरह के विचार को आगे बढाया. तब से लेकर 1994 तक विविध रूपों में यह विचार व्यक्त होता रहा जिसका ही एक प्रतिफलन बिहार का बंगाली विरोधी आन्दोलन था जो बिहार के प्रशासन और शिक्षा के क्षेत्र में बंगालियों के वर्चस्व के विरोध के रूप में उभरा. एल. एस. एस ओ मैली से लेकर वी सी पी चौधरी तक विद्वानों ने बिहार के बंगाल के अंग के रूप में रहने के कारण बढे पिछडेपन की चर्चा की है. इस चर्चा का एक सुंदर समाहार गिरीश मिश्र और व्रजकुमार पाण्डेय ने प्रस्तुत किया है. इन चर्चाओं में यह कहा गया है कि अंग्रेज़ बिहार के प्रति लापरवाह थे और बिहार लगातार उद्योग धंधे से लेकर शिक्षा, व्यवसाय और सामाजिक क्षेत्र में पिछडता जा रहा था। चूँकि बिहार में बर्धमान के राजा या कासिमबाजार के जमींदार की तरह के बडे जमींदार नहीं थे यहाँ के एलिट भी उपेक्षित ही रहे. दरभंगा महाराज को छोडकर बिहार के किसी बडे जमींदार को अंग्रेज महत्त्व नहीं देते थे। जिस क्षेत्र में विदेशियों के साथ व्यापार का इतना महत्त्वपूर्ण सम्पर्क था उसका बंगाल के अंग के रूप में रहकर जो हाल हो गया था उससे यह निष्कर्ष निकालना स्वाभाविक था कि बिहार को बंगाल के भीतर रहकर प्रगति के लिए सोचना असंभव था।

बिहार को बंगाल प्रेसिडेंसी से अलग कर एक अलग राज्य का निर्माण 1870 से ही शुरू हो गया था जब बिहार के पढ़े लिखे लोगों को ये समझ में आना शुरू हो गया की स्कूल, कॉलेज से लेकर अदालत और किसी भी सरकारी दफ्तरों की नौकरियों में बंगालियों का वर्चस्व अनैतिक है और जनतंत्र के खिलाफ भी। बिहार के प्रथम समाचार पत्र बिहार बन्धु में इस आशय के पत्र और लेख प्रकाशित हुए जिसमें यहाँ तक कहा गया कि बंगाली ठीक उसी तरह बिहारियों की नौकरियाँ खा रहे हैं जैसे कीडे खेत में घुसकर फसल नष्ट करते हैं! सरकारी मत इससे अलग था उनके अनुसार बंगाली; बिहारियों की नौकरियों पर बेहतर अंग्रेज़ी ज्ञान के कारण कब्ज़ा जमाए हुए हैं। 1872 में , बिहार के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर जॉर्जे कैम्पबेल ने लिखा था कि चूंकि बिहार का शासन बंगाल से बंगाली अधिकारियों द्वारा नियंत्रित किया जाता है, इसलिए हर मामले में अंग्रेजी में पारंगत बंगालियों की तुलना में बिहारियों के लिए असुविधाजनक स्थिति बनी रहती है। सरकारी द्स्तावेज़ों और अंग्रेज़ों द्वारा लिखित समाचार पत्रों के लेखों में भी यही भाव ध्वनित होता था. यह बात खास तौर पर कही जाती थी कि शिक्षित बंगाली रेल की पटरियों के साथ साथ पंजाब तक नौकरियाँ पाते गये। कलकत्ता से प्रकशित एक पत्र के सम्पादकीय में इस बात का विश्लेषण खास तौर किया गया गया लिखा गया की बिहार के लगभग सभी सरकारी नौकरियाँ बंगाली के हाथों में हैं. बडी नौकरियाँ तो हैं ही छोटी नौकरियों पर भी बंगाली ही हैं। जिलेवार विश्लेषण करके पत्र में लिखा गया कि भागलपुर, दरभंगा, गया, मुजफ्फरपुर, सारन, शाहाबाद और चम्पारन जिलों के कुल 25 डिप्टी मजिस्ट्रेटों और कलक्टरों में से 20 बंगाली हैं. कमिश्नर के दो सहायक भी बंगाली हैं. पटना के 7 मुंसिफों ( भारतीय जजों) में से 6 बंगाली हैं. और यही स्थिति सारन की भी है जहां 3 में से 2 बंगाली हैं। छोटे सरकारी नौकरियों में भी यही स्थिति है। मजिस्ट्रेट , कलक्टर, न्यायिक दफ्तरों में 90 प्रतिशत क्लर्क बंगाली हैं। यह स्थिति सिर्फ जिले के मुख्यालय में ही नहीं हैं, सब-डिवीजन स्तर पर भी यही स्थिति है. म्यूनिसिपैलिटी और ट्रेजेरी दफ्तरों में बंगाली छाए हुए हैं। इस प्रकार के आँकडे देने के बाद पत्र ने अन्य प्रकार की नौकरियों का हवाला दिया था. पत्र के अनुसार दस में से नौ डॉक्टर और सहायक सर्जन बंगाली हैं. पटना में आठ गज़ेटेड मेडिकल अफसर बंगाली हैं. सभी भारतीय इंजीनियर के रूप में कार्यरत बंगाली हैं. एकाउंटेंट, ओवरसियर एवं क्लर्कों में से 75 प्रतिशत बंगाली ही हैं. संपादकीय का सबसे दिलचस्प हिस्सा वह था जिसमें यह उल्लेख किया गया था कि जिस दफ्तर में बिहारी शिक्षित व्यक्ति कार्यरत है उसको पग पग पर बंगाली क्लर्कों से जूझना पडता हैं और उनकी मामूली भूलों को भी सीनियर अधिकारियों के पास शिकायत के रूप में दर्ज कर दिया जाता हैं। सम्पादकीय का निष्कर्ष था कि बिहार की नौकरियों को बंगाली आकांक्षाओं की सेवा में लगा दिया गया है।

बंगालियों के बिहार में आने के पहले नौकरियों में कुलीन मुसलमानों और कायस्थों का कब्ज़ा था। स्वाभाविक था कि बंगालियों के खिलाफ सबसे मुखर मुसलमान और कायस्थ ही थे। यहीं से 'बिहार बिहारियों के लिए' का नारा उठा, पहले कुलीन मुसलमानों ने इसे मुद्दा बनाया और बाद में कायस्थों ने। अंग्रेज़ी शिक्षा के क्षेत्र में बिहार ने बहुत कम तरक्की की थी, सबकुछ कलकत्ता से ही तय होता था इसलिए बिहार में कॉलेज भी कम ही खोले गये. यह बहुत प्रचारित नहीं है कि जब कॉलेज खोलने का निर्णय किया गया तो ब्रिटिश कम्पनी सरकार ने तय किया था कि बंगाल प्रेसिडेंसी में दो कॉलेज खोले जाएं- एक अंग्रेजी शिक्षा के लिए कलकत्ता में और एक संस्कृत शिक्षा के लिए तिरहुत अंचल में क्योंकि पारम्परिक संस्कृत शिक्षा केन्द्र के रूप में तिरहुत प्रसिद्ध था। यह बंगाल के प्रसिद्ध भारतियों को पसंद नहीं आया और प्रयत्न करके संस्कृत कॉलेज भी कलकत्ता में ही खोला गया। बिहार में बडे कॉलेज के रूप में पटना कॉलेज था जिसकी स्थापना 1862-63 में की गयी थी. इस कॉलेज में बंगाली वर्चस्व इतना अधिक था कि 1872 में जॉर्ज कैम्पबेल ने यह निर्णय लिया कि इसे बंद कर दिया जाए। वे इस बात से क्षुब्ध थे कि 16 मार्च 1872 को कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में उपस्थित 'बिहार' के सभी छात्र बंगाली थे! यह सरकारी रिपोर्ट में उद्धृत किया गया है कि "हम बिहार में कॉलेज सिर्फ प्रवासी बंगाली की शिक्षा के लिए खुला नहीं रखना चाहते". इस निर्णय का विरोध बिहार के बडे लोगों ने किया. इन लोगों का कथन था कि इस कॉलेज को बन्द न किया जाए क्योंकि बिहार में यह एकमात्र शिक्षा केन्द्र था जहाँ बिहार के छात्र डिग्री की पढाई कर सकते थे।

बिहार की सरकारी नौकरियों में बंगाली वर्चस्व पर कई सरकारी रिपोर्टों में प्रमुखता से लिखा गया। यहाँ तक की एक रिपोर्ट ऐसी भी थी जिसमे ये कहा गया की बिहारी ;बंगाली के रहमोकरम पर हैं जो नौकरी वो नहीं करना चाहते वो बिहारियों को मिल जाती हैं। इस रिपोर्ट ने तहलका मचा दिया अंतत: सरकार जगी और सरकारी आदेश दिए गए कि जहाँ-जहाँ रिक्त स्थान हैं उनमें उन बिहारियों को ही नौकरी पर रखा जाए जिन्हें शिक्षा का सुयोग मिला है। आदेश में कई जगहों पर यह स्पष्ट कहा जाता था कि इसे बंगालियों को नहीं दिया जाए। इसी तरह के कुछ आदेश उत्तर पश्चिम प्रांत में भी दिए गये थे. इस तरह के सरकारी विज्ञापन भी समाचार पत्रों में छपा करते थे जिसमें स्पष्ट लिखा होता था- "बंगाली बाबु आवेदन न करें". बिहार में भी 1870 और 1880 के दशक में कई सरकारी आदेश दिए गये थे जिसमें यह कहा गया था कि बिहारियों को ही इन नौकरियों में नियुक्त किया जाए।

बिहार के कई समाचार पत्रों में इस आशय के कई लेख और पत्र प्रकाशित होते रहे जिसमें यह कहा जाता था कि बिहार की प्रगति में बडी बाधा बंगालियों का वर्चस्व है. नौकरियों में तो बंगाली अपने अंग्रेज़ी ज्ञान के कारण बाजी मार ही लेते थे बहुत सारी जमींदारियां भी बंगालियों के हाथों में थी।

इसमें संदेह नहीं कि बंगालियों के प्रति सरकारी विद्वेष के पीछे सिर्फ स्थानीय लोगों के प्रति उनका लगाव नहीं था. विभिन्न कारणों से बंगाल में चल रही गतिविधियों से जुडने के कारण बिहार में भी बंगाली समाज सामाजिक और राजनैतिक रूप से सजग था. उनके प्रभाव से शांत समझा जाने वाला प्रदेश बिहार भी अंग्रेज़ विरोधी राष्ट्रवादी आन्दोलन से जुडने लगा था. कई इतिहासकारों का मत है कि बंगालियों के प्रति बिहारियों के मन में विद्वेष को बढाने में सरकार की एक चाल थी. वे नहीं चाहते थे कि राष्ट्रीय और क्रांतिकारी विचारों का जोर बिहार में बढे.

इसमें संदेह नहीं कि बिहार में बंगाली नवजागरण का प्रभाव पडा था और बिहार के बंगाली राजनैतिक और बौद्धिक क्षेत्र में आगे बढे हुए थे. शैक्षणिक, स्वास्थ्य, सार्वजनिक संगठन तथा समाज सुधार के क्षेत्र में बंगाली समाज बिहार में बहुत सक्रिय था. यह नहीं भूला जा सकता कि भूदेव मुखर्जी जैसे बंगाली बुद्धिजीवी-अधिकारी के कारण ही हिन्दी को बिहार में प्रशासन और शिक्षा के माध्यम के रूप में स्वीकृति मिल सकी। बिहार में प्रेस के क्षेत्र में क्रांतिकारी भूमिका प्रदान करने वाले दो महापुरूषों- केशवराम भट्ट और रामदीन सिंह को आज बिहार के पत्रकार भुला ही चुके हैं। इन सबके बावजूद यह मानना ही पडेगा कि बिहार के बहुत सारे शिक्षित लोगों को यह लगता था कि बंगाल के साथ होने के कारण और प्रशासन का कलकत्ता से नियंत्रण होने के कारण बिहारियों के प्रति सरकार पूरी तरह से न्याय नहीं कर पाती। और यही एक खास वजह थी जिसने बिहार को अलग करने में खास भूमिका निभाई।

बंगाल से बिहार के अलग होने की प्रशासनिक भूमिका के दशकों पहले से बिहार के पढ़े-लिखो के बीच बंगाली वर्चस्व के विरूद्ध भाव सक्रिय होने लगे थे. इस भाव का एक प्रकाशन अल- पंच में 1889 में प्रकाशित नज़्म में मिला था जिसका शीर्षक था- 'सावधान ! ये बंगाली है". ऐसे ही भाव की एक और प्रस्तुति 1880 में 'बिहार के एक शुभ-चिंतक' का पत्र है जिसमें बंगालियों की तुलना दीमकों से की गई है जो बिहार की फसल (नौकरियों) को 'खा रहे हैं'. बुद्धिजीवियों के बीच बंगाली वर्चस्व के प्रति इस भाव के कारण ही इस बात के लिए समर्थन पैदा होने लगा कि बंगाल के साथ रहकर बिहारियों की स्वार्थ -रक्षा संभव नहीं हैं।

1890 के दशक में बिहार की पत्र पत्रिकाओं में (खासकर बिहार टाइम्स में ) इस आशय के लेख नियमित रूप से छपने लगे जिसमें बिहार की दयनीय स्थिति के प्रति सचेतनता और परिस्थिति के प्रति आक्रोश व्यक्त किया गया था। बिहार टाइम्स ने लिखा था कि बिहार की आबादी 2 करोड 90 लाख है और जो पूरे बंगाल को एक तिहाई राजस्व देते हैं उसके प्रति यह व्यवहार अनुचित है। इस पत्र ने विभिन्न क्षेत्रों में बिहारियों के प्रतिनिधित्व को लेकर जो तथ्य सामने रखे उसे ध्यान में रखने पर बंगाल में बिहार की उपेक्षा की सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता। ऐसे अनेक कारण थे जो बिहार के क्षेत्र में बिहारियों की उपेक्षा को दिखाते थे जैसे - बंगाल प्रांतीय शिक्षा सेवा में 103 अधिकारियों में से सिर्फ 3 बिहारी थे, मेडिकल एवं इंजीनियरिंग शिक्षा की छात्रवृत्ति सिर्फ बंगाली ही पाते थे, कॉलेज शिक्षा के लिए आवंटित 3.9 लाख में से 33 हजार रू ही बिहार के हिस्से आता था, बंगाल प्रांत के 39 कॉलेज (जिनमें 11 सरकारी कॉलेज थे) में बिहार में सिर्फ 1 था, कल-कारखाने के नाम पर जमालपुर रेलवे वर्कशॉप था (जहाँ नौकरियों में बंगालियों का वर्चस्व था) , 1906 तक बिहार में एक भी इंजीनियर नहीं था और मेडिकल डॉक्टरों की संख्या 5 थी।

ऐसे हालात में बिहारी प्रबुद्धों द्वारा बिहार को पृथक राज्य बनाए जाने का समर्थन दिया जाने लगा और स्वदेशी आन्दोलन के उपरांत हालात ऐसे हो गये कि कांग्रेस के 1908 के अपने प्रांतीय अधिवेशन में बिहार को अलग प्रांत बनाए जाने का समर्थन किया गया। कुछ प्रमुख मुस्लिम नेतागण भी सामने आये जिन्होंने हिन्दू मुसलमान के मुद्दे को पृथक राज्य बनने में बाधा नहीं बनने दिया। इन दोनों बातों से अंग्रेज शासन के लिए बिहार को अलग राज्य का दर्जा दिए जाने का मार्ग सुगम हो गया। अंतत: वह घडी आयी और 12 दिसंबर 1911 को बिहार को अलग राज्य का दर्जा मिल गया और आखिरकार 145 बर्ष बाद बिहार को उसका सम्मान प्राप्त हो गया।

बिहार के इतिहास में 12 दिसंबर 1911 का दिन मील का पत्थर साबित हुआ। इसी दिन ब्रिटिश सरकार ने भारत की राजधानी कलकत्ता से स्थानांतरित कर दिल्ली ले जाने की घोषणा की। बिहार को बंगाल से अलग कर गर्वनर इन काउंसिल के शासन वाला राज्य घोषित कर दिया। इसके बाद 22 मार्च 1912 को की गयी उद्घोषणा के द्वारा बंगाल से अलग कर बिहार को नए राज्य का दर्ज मिला । जिसमें भागलपुर, मुंगेर, पूर्णिया एवं भागलपुर प्रमंडल के संथाल परगना के साथ-साथ पटना, तिरहुत, एवं छोटानागपुर को शामिल किया गया। सर चाल्र्स स्टूबर्स बेले, के.सी.एस.आई. राज्य के प्रथम राज्यपाल तथा उपराज्यपाल नियुक्त किए गए। 29 दिसंबर 1920 को बिहार राज्य को राज्यपाल वाला प्रांत बनने का गौरव प्राप्त हुआ। महामहिम रायपुर वासी सत्येन्द्र प्रसन्नो सिन्हा राज्य के प्रथम भारतीय राज्यपाल नियुक्त किए गए। मार्च 1920 में लेजिस्लेटिव काउंसिल भवन की स्थापना की गयी। सात फरवरी 1921 को सर मुडी की अध्यक्षता में प्रथम बैठक आयोजित की गयी जो आज बिहार विधानसभा कहलाता है। बिहार के अंतिम राज्यपाल सर जेम्स डेविड सिफटॉन हुए। वर्ष 1935 में बिहार विधान परिषद भवन का निर्माण शुरू किया गया। गर्वमेंट आफ इंडिया एक्ट 1935 में निहित प्रावधानों के अनुसार एक अप्रैल 1937 को प्रांतीय स्वायत्ता का श्रीगणोश हुआ। जिसके तहत द्विसदनीय व्यवस्था की शुरूआत हुई। इसके तहत बिहार विधानसभा व विधान परिषद प्रस्थापित किया गया। इसके तहत 22-29 जनवरी 1937 की अवधि में बिहार विधानसभा का चुनाव संपन्न हुआ। 20 जुलाई 1937 को डा. श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में प्रथम सरकार का गठन हुआ। उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में चुना गया। 22 जुलाई 1937 को विधानमंडल का प्रथम अधिवेशन हुआ। स्वाधीनता के बाद 15 अगस्त 1947 को श्री जयरामदास दौलत राम प्रथम राज्यपाल नियुक्त किए गए। पुन: बिहार विधानसभा के चुनाव के बाद 29 अप्रैल 1952 को श्रीकृष्ण सिंह मुख्यमंत्री के रूप में चुने गए।

यहाँ एक रोचक तथ्य बतलाना चाहूँगा की "बंगाल से अलग होने के बाद जब पटना को बिहार की राजधानी बनाने का फैसला लिया गया, तो इस शहर में आधारभूत संरचनाओं का घोर अभाव था। इसे तैयार करने में समय लगता, जबकि सरकार पटना से चलना था। ऐसे में दरभंगा के महाराजा रामेश्‍वर सिंह ने पटना के छज्‍जू बाग को खरीदा और वहां अस्‍थायी तौर पर विधानसभा और सचिवालय का निर्माण कराया। उस वक्‍त अगर ऐसा नहीं किया जाता तो बिहार-उडीसा की संयुक्‍त राजधानी पटना की जगह भुवनेश्‍वर बन सकता था। उस अस्‍थाई भवन में विधानसभा तक तक चला जब तक नया भवन तैयार नहीं हो गया। उस अस्‍थाई विधानसभा भवन में आज पटना उच्‍च न्‍यायालय के प्रधान न्‍यायधीश का आवास है।" आज जब बिहार बदल रहा हैं और बिहारी भी तो दुख की बात यह है कि बिहार की राजधानी पटना बनाने में अहम भूमिका निभानेवाले रामेश्‍वर सिंह को सौ साल गुजर जाने के बाद भी न तो बिहार याद करता है और न ही राजधानी पटना।

बिहार अलग हुआ और अपने आप पर इतराता चाणक्य के कदमो पर चलता दिन-दुनी रात तरक्की करने लगा। इस बीच बहुत से उतार चढ़ाव आये। कई राजनीती समीकरण बदले, कई बार इमरजेंसी हुई। जगन्नाथ और लालू ने मिलकर कई बार राज्य का बलात्कार किया। राज्य कई बार गर्त में गिरा और कई बार बुलंदी को छुआ। लालू राज के बुरे साल को झेलने के बाद नितीश का सुशासन भी बिहार ने देखा। बिहार हमेशा से एक ऐसे प्रदेश के रूप में पहचाना जा रहा हैं जो अपने आप को बदलने की बजाय देश और दुनिया को बदलने में तल्लीन रहता हैं। आज जब बिहार बदल रहा हैं, बिहार और बिहारी के बारे में सोच रहा हैं, कृषि से ज्यादा उधोग धंधे के बारे में सोच रहा हैं, चाणक्य को छोड़कर चार्वाक के बारे में सोचने लगा हैं, बिहारी संस्कृति को भुलाकर पश्चिमी रंग में रंगने लगा हैं उस समय बस एक ही टीस दिल में उठती हैं ... क्या सचमुच ये वही नालंदा विश्वविद्यालय वाला बिहार हैं जिसने आज बिहार को शिक्षा मित्र के चुंगल में धकेल दिया हैं।

रेफरेंस -:
द जर्नल आफ बिहार रिसर्च सोसाइटी, पटना
दैनिक जागरण, 18 मार्च 2010, पटना , सम्पादकीय पृष्ठ
पुस्तक -: बिहार - सृजन से शताब्दी वर्ष

Friday, March 1, 2013

प्रिय तुम बहुत याद आती हो

प्रिय,

हम अलग हैं एक दुसरे से बहुत दिनों से। विछोह का दर्द दोनो तरफ उठ रहा हैं। जितना तुम तड़प रही हो उससे कहीं ज्यादा तड़प इस दिल में भी उठता हैं। रोता मैं भी हूँ, लेकिन आंसू खुद ही पोछना पड़ता हैं। सवाल ये नहीं हैं की यहाँ पर आंसू पोछने वाला कोई नहीं हैं, सवाल ये हैं की मैं उन्हें समझा नहीं सकता की प्रियतम से बिछड़ने का गम क्या होता हैं।

इस भीड़ भाड़ में ना तो समय मिलता हैं ना ही फुर्सत। मोबाइल कुछ कसर जरुर पूरी करता हैं लेकिन कमबख्त अरमान हैं जो पुरे ही नहीं होते। जी ही नहीं भरता और दिल भी। दिल ... कैसे भरेगा ये ... ये तो तुम्हारे पास हैं वहां ............बहुत दूर ..... तुम्हारे दिल के नज़दीक। प्रिय तुम्हारे ही धड़कन से धड़कता हूँ मैं। तुम हो तो मैं हूँ और बिना तुम्हारे मेरा भी नहीं हैं कोई वजूद।

प्रिय मुझे पता हैं तुम्हारी बेकरारी भी उतनी ही होगी जितना व्याकुल हूँ मैं। ठीक किसी विरहे की तरह तुम भी तड़प कर रही होगी मेरा इन्तेजार। चातक की तरह राह ताकती होगी तुम मेरा। मोबाइल के हरेक रिंग पर चमक जाती होगी तुम्हारी आँखे। दरवाजे की आहट पर उठ जाती होगी तुम्हारी नज़र। ध्यान होता होगा तुम्हारा उन चप्पलो की खडखडाहट पर जो हौले होले दस्तक देती हैं दरवाजे पर किसी अपने का। और फिर निराश हो जाती होगी ठीक किसी मोरनी की तरह जों धुएँ से भरे आसमान को सावन की घटा समझकर झुमने लगती हैं और फिर निराश हो जाती हैं धुवां छटने के बाद।

प्रिय मैं आऊंगा जल्द ही अपना वादा पूरा करने। आऊंगा जल्द ही क्योंकि मुझे पता हैं जी नहीं पाओगी तुम हमारे बिना और रह नहीं पाऊंगा मैं तुम्हारे बिना।

नारी अब स्वयंसिद्धा बनकर उभर रही हैं

प्रियतम,

तुम्हे पता हैं समाज किस कदर तेजी से बदल रहा हैं? इतना जितना नाभिकीय विस्फोट के समय परमाणु भी नहीं टकराते होंगे आपस में। अब महिलायें भी आगे आ रही हैं, पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर। अब वो भी ढूंढ़ रही हैं बराबरी का हक़ पुरुषो के वनिस्पत। अब वो भी आगे बढ़ रही हैं वक्त की रफ़्तार के संग नए स्वरुप में नए परिवेश में।

अब महिलाए चुप होकर नहीं सहती अपने पती और स्वसुर का रौब। अब वो खुद लेती हैं फैसला बनवास में  जाने का। चाहे दशरथ पुत्र वियोग में अपना प्राण क्यों ना त्याग दे। चाहे राम शोकाकुल हो वन में सन्यासी क्यों न बन जाए। अब वो नहीं सहती विमाता का क्रोध संताप। अब अग्नि परीक्षा भी नहीं देती महिलाए। मना कर देती हैं आप ही, रावण जैसे महापंडित पर नहीं लगने देती व्यभिचार का आरोप। अब राम के ना होने पर खुद ही संभाल लेगी राज पाट नहीं करती इन्तजार किसी भरत जैसे अनुज का चरण पादुका पर रोकर समय बिताने का  ।

अब किसी अहिल्या को पत्थर का नहीं बनना पड़ता अब वो स्वयं को सिद्ध करने के लिए भगवान् को भी उतार सकती हैं धरती पर। अब नहीं सहती वो किसी की टेढ़ी नज़र चाहे देवराज ही क्यों ना तान रखे हो भृकुटी उस पर।

प्रिय अब द्रोपदी भी किसी कृष्ण के चीर की मोहताज़ नहीं हैं। वो खुद कर सकती हैं अपने लाज की रक्षा। संभाल सकती हैं अपना आँचल वक्त के समय और लड़ सकती हैं किसी शेरनी की तरह दुश्मनों से। अब भगवान् भी दुहाई देते हैं महिलाओं की।

दामिनी अब बन गयी हैं मिशाल। बन गयी हैं निर्भया और दे गयी हैं शक्ति उन लाखो भुजाओं को जो अब खुलकर कर  सकती हैं हैवानो से अपनी रक्षा। प्रिय अब महिलायें लाज का गहना या प्रतिरूप से ऊपर उठ चुकी हैं। अब भारत माँ भी गर्व से अपनी बेटी की पीठ थपथपा सकती हैं, क्योंकि नारी अब सचमुच बदल रही और स्वयंसिद्धा बनकर उभर रही हैं।


Monday, January 28, 2013

प्रिय तुम मुस्कुराती रहो

प्रिय,

इस तरह गुस्से से लाल होना कहाँ सीखा आपने? पल में इतने सारे रंग, इतने सारे भाव की खुद गिरगिट भी शर्मा जाए आपको देखकर। ये आपके अन्दर की नैसर्गिक कला हैं या सिखा हैं तुमने इन मगरमच्छो से भरी दुनिया में रहकर। तुम्हारा वो मुखचन्द्रकमल जो कभी चाँद को भी मात दे देता था आज अस्ताचलगामी सूरज की तरह हो गया था। वो रोद्ररूप, रणचंडी सा विशाल मुख क्रोध के कारण कितना कुरूप हो जाता हैं पता भी हैं तुम्हे। ऐसा भयावह की रक्तबीज भी गश खा के गिर जाय हमारी क्या मजाल हैं।
प्रिय तुम जब गुस्सा करती हो तो अच्छा लगता हैं लेकिन जब तुम क्रोध आता हैं ना तो तुम बिलकुल कुरूप हो जाती हो ठीक किसी चाँद की तरह जो पूर्णिमा के बाद सीधा अमावास देख लिया हो। प्रिय क्या क्रोध करना जरुरी हैं, क्या जरुरी हैं अपने इस मुख कमल को अनार की फुल की तरह बनाना।
प्रिय तुम हँसते हुए कितनी सुन्दर दिखती हो पता भी हैं तुम्हे। मन मयूर सा नाच उठता हैं तुम्हारे हँसते हुए चेहरे को देखकर। ऐसा लगता हैं जैसे बच्चे को मिल गया हो उसका सबसे बेहतरीन खिलौना। प्रिय आपका वो शांत चेहरा मुझे शकुन देता हैं तन्हाई में भी। जब भी मुझे परेशानी होती हैं या फिर होता हूँ उदास तुम्हारा वो हँसता मुस्कुराता चेहरा याद कर लेता हूँ और बस भर जाती हैं मेरे अन्दर एक नई चेतना एक नै स्फूर्ति। प्रिय तुम हमेशा मुस्कुराती रही ताकि खिल सके फुल बागों में और गा सके पंक्षी और नाच सके मोर। प्रिय तुम हमेशा मुस्कुराती रहे ताकि जी संकू मैं और जिन्दा रह सको तुम।

तुम्हारा
प्रिय

Thursday, January 17, 2013

एक छोटे सफ़र की छोटी दास्तान

Indian railway information

प्रिय,
याद हैं तुम्हे वो लोकल ट्रेन सहरसा से पटना के बीच की कितना हिलती थी यार, कभी कभी तो लगता था आगे वाला डब्बा हमें छोड़ कर आगे ना चले जाए। मालगाड़ी से भी ज्यादा हिचकोले खाती वो ट्रेन का डब्बा जब धगड़ धगड़ करके चलता तो एक मीठा सा डर और अजीब सा आनंद आ जाता था ना तुम्हे किस कदर चिपक के बैठ जाती थी तुम मुझसे। तुम्हारा सामीप्य और भी अधिक गहरा जाता था ना उन चंद घंटो में। तुम्हारी उँगलियों की वो छुअन मैं आज तक नहीं भूल पाया हूँ। वो गुदगुदाता एहसास, वो अजीब सी ख़ुशी कैसे भूल पाऊंगा। अब भी वो यादे किसी काली-सफ़ेद चलचित्र की तरह धुंधली धुंधली सी मेरे यादो में चलती रहती हैं। प्रिय ना तो अब वो छूअन हैं ना ही वो एहसास और अब पैसेंजर ट्रेन की शांति भी अजीब सी धक्का मुक्की में बदल गयी हैं। गाड़ियों की वो मंथर गति अब तेज रफ़्तार की ट्रेन में बदल गयी हैं। छुक छुक करता धुवां अब बिजली के तारों में उलझ कर रह गयी हैं, अब ना तो वो शांति हैं ना शुकून। पटरियों के साथ लगे वो पेड़ भी औधोगीकरण की मार से बेहाल हो दम तोड़ चुके हैं। अब सुबह सुबह ट्रेन में आँख खुलने से चिड़ियों की चहचाहट नहीं सुनाई देती अब बस सुनाई देती हैं ट्रेन का कोरस। अब पटना के पुल से गुजरते हुए या सिमराही घाट से गुजरते हुए गंगा का शुकून भी नहीं मिलता, जैसी मैली गंगा कातर भाव से कह रही हो अब नहीं सहा जाता। प्रिय कितना बदल गया हैं हमारा गाँव, एक छोटा सा क़स्बा जो कभी कोशी के किनारे शांत सा पड़ा रहता था गाड़ियों की धुक-धुक और धुल मिटटी से दब गया हो जैसे। अब आम कोल्ड स्टोरेज से आने लगे हैं, आम की मिठास कोल्ड स्टोरेज की बदबू में दबकर रह गयी हैं। अब रेलगाडी भी रेलगाड़ी नहीं रही अब तो वो पेलमपेल गाडी हो गयी हैं। हा हा हा मुझे पता हैं तुम हँसोगी ये शब्द सुनकर लेकिन अब कुछ ऐसा ही हैं अब, एक 72 सीट वाले डब्बो में हजारो लोग सफ़र करने लगे हैं। दूधिये का आंतक तो अलग ही हैं, अगर इन भीड़ से बचकर अगर कहीं खडकी के पास बैठ भी गए तो दूध और घास की गट्ठर ही दिखाए देंगे। ताज़ी हवा उन हजारो लोगो के पसीनो में दब कर रह जाती हैं। प्रिय कैसे बताऊँ तुम्हे मैं उस यात्रा को, कितना तकलीफदेह और दुखदाई हैं लेकिन फिर भी लोग सफ़र करते हैं इस आश में की उनकी जन्मभूमि पुकार रही होती हैं उन्हें हौले हौले से। और यही शब्द जैसे भर देता हो उनके अन्दर एक अलग जोश एक अलग जज्बा और यही उन्माद उसे जिन्दा रखता हैं उन अंसख्य लोगो के बीच और बस इसलिए नहीं निकल पाती उसी जान उससे क्योंकि मातृभूमि होती हैं उनके आँखों के करीब। प्रिय फिर कभी मिलो तो हम जरुर घूमेंगे फिर से उस मजेदार सफ़र में ... मैं और तुम सिर्फ मैं और तुम।

तुम्हारा प्रिय
 

Thursday, January 3, 2013

एक ख़त दामिनी के नाम

प्रिय दामिनी,

मुझे पता हैं, मेरे पिछले ख़त की तरह ये ख़त भी तुम्हे नहीं मिलेगा फिर भी मैं ये ख़त लिख रहा हूँ। दामिनी मुझे पता हैं की आजकल तुम बैकुंठ में विराज स्वर्गलोक का आनंद ले रहे होंगी। लेकिन फिर भी अगर समय मिले और ये ख़त मिले तो पूरा जरुर पढना। दामिनी मुझे पता हैं अब ब्रह्मषि नारद भी मर्त्यलोक का चक्कर नहीं लगाते, भूलोक का कृत्य देखकर अब वो भी लजाने लगे हैं लेकिन फिर भी लिखे जा रहा हूँ।
दामिनी बस ये पूछना चाहता था की क्यों इस तरह रात के अँधेरे में तुम हमें छोड़कर चली गयी। क्या इतना भी नहीं सोचा की कैसे जियेगा तुम्हारा ये भाई तुम्हारे बिन। बहन मुझे पता हैं पूस की ये रात तुम्हारे लिए दुष्कर और दुसहः था तुम्हारे लिए और उससे भी दुसहः था तुम्हारा वो दर्द जो उन पापियों ने दिया था तुम्हे, लेकिन इस तरह लाखो लोगो के आशाओं पर तुषारापात कर तुम्हे विदा नहीं लेनी चाहिए।
प्रिय बहन मुझे ये भी पता हैं की तुम नहीं जीना नहीं चाहती थी इस दुष्ट संसार में, सोच रही होंगी तुम की कैसे ढोंउगी मैं अपना ये अपवित्र देह। लेकिन बहन तुम क्यों भूल गई की गंगा कभी अपवित्र नहीं होती चाहे क्यों ना बहा दी जाए उसमे दुनिया जहान की गंदगी। क्यों तुम भूल गयी थी तुम पवित्र थी आज भी उतनी ही जितना थी पहले। एकदम गंगा की तरह साफ़ और निर्मल। बहन क्या दुष्टों की दुनिया से इस तरह मुँह छिपाकर अँधेरी रात में विदा लेना कायरता नहीं हैं। क्यों नहीं रुकी तुम इस दुनिया में उस दुष्टों के संहार के लिए, क्यों भूल गयी तुम की अनाथ हो जायेगी वो सारी अबला तुम्हारे बिन जिसके अरमान जगे थे तुम्हारे मुहीम से। हाँ बहन! तुम्हे पता हैं कितना आंदोलित हुआ हैं ये देश तुम्हारे साथ हुए अन्याय पर, कितना रोया हैं, कितना दर्द हुआ हैं, लेकिन दामिनी जो भी हो तुमने झंकझोर कर रख दिया उनकी आत्मा को, जो  कल तक  लाज की गठरी और चूड़ियाँ पहने घर में बैठी थी समाज और सरकार के डर से वो अब बाहर आ रही हैं; हक़ और इन्साफ के लिए।

प्रिय बहन तुम्हे पता हैं, तुम्हारी ये शहादत बेकार नही जाने वाली, देश की दामिनी अब जाग गयी हैं। जम्मू की खबर तो तुम्हे मिल ही गयी होगी किस तरह तुम्हारी बहादुर बहन ने गुंडों के को मुंह तोड़ जवाब दिया था। अब वो सब भी मुंह छिपाकर जुल्म और अत्याचार को नहीं सहती बल्कि सीना चौड़ा कर उसका सामना करने लगी हैं और ये सब सिर्फ तुम्हारे कारण हो पाया हैं।
प्रिय दामिनी एक बात और जो मैं तुमसे पूछना चाहता था - कभी मौका मिले तो पूछना उस भगवान् से की उसे तुम्हारी दारुण पुकार क्यों नहीं सुनाई दी थी। क्या हो गया था उस समय भगवान् को देश के लाखो लोग हाथो में मोमबत्ती लिए तुम्हारी सलामती की दुवा कर रहे थे? क्या उन लाखो लोगो की दुवा भी नहीं पहुँच पायी थी उन तक, अगर हाँ तो फिर क्यों नहीं भेज किसी हनुमान को तुम्हारे पास संजीवनी लेकार। या फिर देखने और सुनने की शक्ति कम हो गयी हैं उनकी। क्या वैद्धराज भी आकस्मिक छुट्टी पर चले गए थे जो नहीं कर पाए उनका इलाज़ सही समय पर। ऐसे कुछ सवाल हैं जिसे तुम जरुर पूछना।

अंत में, प्रिय मुझे पता हैं तुम खुद नहीं रहना चाहती थी इस जालिम समाज में जो जिन्दगी के बाद भी कदम-कदम पर तुम्हे उस गलती के लिए उलाहना देते जो तुमने किया ही नहीं था। बहन बस इतना कहना चाहूँगा की ये क्रांति की मशाल जो तुमने जलाई थी उसे खतम मत होने देना, और अगले जनम अगर मनुष्य देश मिले तो मेरी बेटी बनकर आना।

Monday, December 24, 2012

दामिनी तुम्हे उठना होगा

प्रिय दामिनी,

एक सवाल कौंध रहा हैं मेरे मन में, पिछले कुछ दिनों से जब से घटी हैं वो मर्मान्तक घटना तुम्हारे साथ। लुट लिया था कुछ दरिंदो ने तुम्हारी अस्मत, घायल कर दिया था तुम्हारी अस्मिता को, और फेक दिया था सड़क के किनारे पूस की उस रात में नील आसमान के निचे। दमिनी तब से सोच रहा हूँ मैं, एक नासूर बन कर पनप रहा हैं वो सवाल मेरे भीतर .... की क्यों नहीं आई तुम्हे याद की तुम्ही हो चंडी जिसने वध किया था चंड और मुंड जैसे दैत्यों का, तुम्ही हो काली जिसने चूस लिया था रक्त-बीज का लहू, और तुम्ही हो दुर्गा जिसने किया था उस दुरात्मा महिष का वध। क्या भूल गयी थी तुम झाँसी की रानी को जिसने अंग्रेजो के छक्के छुडा दिए थे। क्या किरण बेदी का आत्मविश्वास भी तुम्हे याद नहीं आया था या तुम भूल गयी थी मलाल के जिगर को। दामिनी ; क्या तुम्हे किसी जामवंत की याद आन पड़ी थी उस समय जो याद दिलाता तुम्हे तुम्हारी शक्तियों का तुम्ही हो बुद्धि, बल और विद्या की देवी। जब वो भूखे भेड़िये टूट पड़े थे तुम पर जैसे कुत्ते टूटते हैं हड्डियों पर तो तुमने क्यों नहीं दिखाया था अपना रोद्र रूप जिसे देखकर देवता भी काँप जाते हैं। या तुम इन्तेजार में थी उस कृष्ण की जिसने द्वापर में बचाया था द्रोपदी की लाश। दामिनी तुम भूल गयी की वो द्वापर थे इसलिए कुछ पुण्य बचा था। ये कलयुग हैं जहाँ पाप ही पाप हैं। जहाँ देवता भी कतराते हैं अवतार लेने से। आने की बात तो दूर उन्होंने सुनी भी नहीं होगी पुकार क्योंकि दब गई होगी तुम्हारी चीख, उन टायरो के शोर में, बस की घड्घडाहट में और पापियों की अनंत शोर के बीच। प्रिय दिल्ली के इस प्रदुषन के बीच कृष्ण का श्याम स्वरूप कही काला ना पड़ जाए इस डर से नहीं आये थे तुम्हारे कृष्ण कन्हैया। लेकिन तुम्हे तो होना चाहिए न अपने बाज़ुओ पर भरोसा। जब वो दरिन्दे नोच रहे थे तुम्हारी अस्मत तब कहा गुम गयी थी तुम। बोलो जवाब दो। बताओ दुनिया को। क्योंकि तुम्हारी चुप्पी रोज एक दमिनी को जन्म देगी। और रोज एक लड़की होती रहेगी इन भूखे भेडियो के हवस का शिकार। रौंदी जाएगी लडकियाँ सिर्फ तुम्हारे चुप रहने से। तुम्हे उठाना ही होगा। तुम्हे देना ही होगा आवाम को ठोस जवाब। तुम्हे फिर से उठाना होगा एक शेरनी की माफिक और देना होगा जवाब उस दुरात्मा को। तुम्हे जागना होगा क्योंकि तुम नहीं चाहोगी की लाखो लड़की ऐसे ही रोज दामिनी बनती रहे। सरे राह, बीच बाज़ार, और बसों की अगली सीट पर। तुम्हे उठना होगा ताकि नहीं हो लग सके फिर किसी लड़की की बोली। तुम्हे उठाना होगा क्योंकि नहीं सह सकती तुम इंडिया गेट पर कड़ी उन लडकियों की पीड़ा जो सरकार के कोप का शिकार हो रहे हैं तुम्हारे हक़ के लिए। तुम्हे उठाना होगा अपने लिए नहीं अपितु उस आवाम के लिए जो पलक पावडे बिछाए हैं अपने प्यारी "दामिनी" के लिए।

तुम्हारा
एक अज्ञात लेकिन अन्दर ही अन्दर झुलसता लेखक

प्रिय तुम डरो मत, तुम दुर्गा, चंडी, और काली हो

प्रियतम,

याद हैं तुम्हे दिल्ली की वो ताजातरीन बलात्कार की घटना, कितना उद्धेलित कर दिया था ना उस घटना ने तुम्हे, रोक नहीं पायी थी तुम अपने आँसुओ को, सरोवर समुन्द्र स विशाल बन गया था तुम्हारे आंसू की धार से। लेकिन प्रिय तुम्हे समझना होगा की स्त्री आज भी उतनी ही हैं विचलित है, जितना हुआ करती थी सतयुग, द्वापर और त्रेता में। याद हैं तुम्हे अहिल्या का, पत्थर की बन रह गयी थी बेचारी उफ़ तक नहीं किया, और बन गयी पत्थर की उस पाप के लिए जिसको उसने किया ही नहीं। क्योंकि नारी तब भी सिर्फ सहनशीलता और त्याग की ही ही मूर्ति थी। फिर आया त्रेता, सब ने सोचा राम राज्य हैं । महिलाओं को अब मिलेगा मान-सम्मान लौटेगा उनका खोया हुआ स्वरूप, फिर स पूजी जाएगी महिला उसी रूप में जिसके लिए वो हैं वांछित। लेकिन प्रिय राम ने मर्यादापुरषोत्तम की लाज ही नहीं रखी, दसरथ ने जिस पुत्री को ठुकरा दिया दिया था उसे ना ला सके वापस। फेर लिया मुंह शांता से । और शांता चुप रही क्योंकि उसने सुन रखी थी सती की कहानी अपनी माँ से, ताकती रही बाट लेकिन एक बार भी नहीं मिल सकी अपने भाई या पिता से। सब सह गयी चुपचाप। फिर आयी सीता, लोगो ने सोचा दसरथ ने जो प्यार बेटी को नहीं दिया उससे ज्यादा बहु को मिलेगा, राम-राज्य स्थापति होगा, स्त्रियाँ फिर से सर उठाकर जी सकेगी। लेकिन प्रिय सीता नहीं छोड़ सकी अपनी पति का साथ, या फिर स्त्री होने का बोझ, निभाया उनहोंने स्त्री होने का धर्म ( प्रिय यहाँ धर्म ही कहूँगा क्योंकि शास्त्रों को तो ये लोग अपनी उंगलिया पर नचाते हैं) और चल पड़ी अपने पती के पीछे जंगल तक, लेकिन क्या सिला दिया राम ने उसके सती प्रेम का, पहले ली अग्नि परीक्षा और फिर फ़ेंक दिया जंगल में एक धोबी के कहने पर। क्या यही कहता हैं राज धर्म ? की क्या पत्नी कुछ भी नहीं होती राज के सामने क्या इतना प्रिय था उन्हें अपनी गद्दी। या फिर सीता ने सिर्फ चुकाया था अपने स्त्री होने की कीमत। की क्या इसलिए चढ़ी आग पर ताकि वो एक स्त्री थी। क्या राम ऐसा कुछ कर सकते थे अपने पिता या भाइयो के साथ। नहीं प्रिय क्योंकि स्त्री हमेशा से सहने के लिए होती हैं। कितने रूपों में ना जाने कितने कीमत चुकाती हैं। कभी माँ, कभी बेटी और कभी बहन के रूप में कितने जीवन एक ही जीवन में जीती हैं। और प्रिय द्रोपदी की वो करूण पुकार तो आज भी गूंज रही होगी ना तुम्हारे कानो में की किस तरह उनके ही बंधू बांधवों ने लुट ली थी उनकी अस्मत। किस तरह वो करूण क्रदन नहीं सुनाई दिया था भीष्म पितामह और घ्रितराष्ट्र को। क्या हो गया था उस भरी सभा को, क्यों मार गया था लकवा, क्योंकि सिर्फ वो स्त्री थी। प्रिय सोचो क्या होता अगर भगवान् नहीं आते उस पुकार को सुन कर। क्या मिशाल देते लोग, एक राजा सिर्फ इसलिए जुए में हार गया अपने बीवी को क्योंकि वो स्त्री थी। और प्रिय ये तो फिर भी कलयुग हैं। पुण्य जहाँ मंदिरों में भी नहीं रहते हैं। वहां लोगो से क्षमा और मर्यादा की क्या बात करे। प्रियतम उस लड़की ने जो सहा वो उसका नसीब हैं ये कह कर इस जघन्य अपराध को टाला नहीं जा सकता हैं। क्योंकि स्त्री सहती आई हैं, सतयुग, त्रेता और द्वापर से ;अहिल्या, सीता और द्रोपदी के रूप में तो कलियुग की क्या बिसात, ये सोच कर हम चुप नहीं रह सकते। हम लड़ेंगे तब तक जब तक नहीं मिल जाती लडकियों को उनका खोया हुआ सम्मान। प्रिय याद हैं तुम्हे बल, बुद्धि और विद्या की देवी स्त्री हैं। फिर क्यों ये स्त्री इतनी अबला हैं। प्रिय कभी कभी तो लगता हैं की इन्हें भी जरुरत हैं किसी जामवंत की जो हनुमान की तरह याद दिला सके इन्हें इनका भुला हुआ ज्ञान, और बल। बता सके इन्हें की तुम झाँसी की रानी थी जिसने छुड़ाया था अंग्रेजो के छक्के। तुम्ही थी वो मैत्रयी  जिसके आगे पराजित हुए थे शंकराचार्य भी। बस प्रिय जिस दिन इनकी अन्दर की भावना जाग गयी ना उस दिन नहीं कर सकेगा कोई भी हिम्मत इनकी और आँख उठाने का। फिर नहीं होगी बलात्कार की शिकार किसी बस या किस होटल में। फिर नहीं लुटेगी स्त्रियों की अस्मत सरे आम बाज़ार में और कुछ लोग हिजड़ो की तरह खड़े होंगे हाथ बांधे। फिर नहीं बहा सकेगा कोई इनके अस्मत लुटने के बाद घड़ियाली आंसू। फिर नहीं लगेगी बेटियों की बोली। नहीं बिकेगी कोई स्त्री बाज़ार में। नहीं समझी जायेगी स्त्रियाँ मर्दों के पावों की जूतियाँ। और नहीं फैलेगा कोई जनसैलाब इंडिया गेट और जंतर मंतर पर इनके अधिकारों के लिए क्योंकि प्रियतम ये जो इनका हक़ हैं उन्हें किसी संवैधानिक मुहर की जरुरत नहीं हैं, क्योंकि ये खुद तय कर सकती हैं समाज की दशा और दिशा।

प्रिय अंत में इतना ही कहूँगा की तुम्हे अहिल्या, सीता, और द्रोपदी बनने की जरुरत नहीं हैं। तुम्हे जरुरत हैं वक्त के साथ रणचंडी बनने की जिसने ना जाने कितने रक्तबीज का संहार कर दिया। जरुरत हैं झाँसी की रानी बनने की जिसने छुड़ा दिया था अंग्रेजो के छक्के। तभी प्रिय तुम रह सकोगी इस समाज में, जिसमे मनुष्य की खाल में छिपे भेड़िये स्त्रीयों को देखकर उसी प्रकार लार टपकाते हैं जैसे हड्डी को देखकर कुत्ता।

तुम्हारा
प्रिय