Sunday, November 11, 2012

बिना बेटियों के कैसे हो लक्ष्मी पूजा

 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:' । अर्थात जहाँ नारियों की पूजा होती हैं, वहां देवता विराजते हैं। लेकिन जहाँ घरो सिर्फ लडको को ही मान दिया जाता हो, लड़के-लड़कियों में हमेशा विभेद किया जाता हो। घर आँगन को लडकियों के किलकारी से दूर रखा जाता हो। जहाँ लडको के आगमन पर खुशिया मनाई जाती हो और लड़कियों के आगमन पर मातम।जहाँ पती-पत्नी बात बात पर कलह करते हो, हमेशा एक दुसरे से मन-मुटाव रहता हो। हमेशा एक दुसरे की कमिया निकाली जाती हो। जहाँ लडकियाँ बोझ अभिशाप और ना जाने क्या क्या समझी जाती हो, वहाँ  चाहे आसमान से सोना ही क्यों ना बरसे "लक्ष्मी" सर पर पैर रखकर भागती हैं। ऐसी जगहों पर लक्ष्मी कभी निवास नहीं करती।

उत्तर बिहार खासकर बिहार में दिवाली की तैयारी अमूमन दसहरा से ही शुरू हो जाती हैं। घरों की साफ़ सफाई से लेकर रंगाई-पुताई सब शुरू हो जाती हैं। तरह-तरह के आयोजन कर लक्ष्मी और गणेश को मनाया जाता हैं। उनका स्वागत किया जाता हैं, की लक्ष्मी जी आइये, गणेश जी आइये आपका स्वागत हैं। आप हमारे घर पधारकर हमें कृतार्ध कीजिये। हमें धन, धान्य एवं समृधि प्रदान कीजिये। लेकिन हम देवी देवताओं के चक्कर में भूल जाते हैं की घर में जो लक्ष्मी अर्थात बेटी हैं वो उपेक्षा की शिकार हो रही हैं, उसको वो मान सम्मान नहीं मिल पा रहा हैं जो उन्हें मिलना चाहिए। जब घर की ही लक्ष्मी उदास हो तो बाहर के देवी लक्ष्मी कैसे खुश रह सकती हैं।

जी हाँ मिथिला ही नहीं अपितु पुरे भारतवर्ष में बेटियों को लक्ष्मी का दर्जा दिया गया हैं। बेटियों के जन्म के समय चाहे कितना भी मातम हो ये कहकर सांत्वना दी जाती हैं की घर में लक्ष्मी आई हैं। अगर देखा जाय तो बेटी लक्ष्मी का ही रूप होती हैं, इन्हें ये लक्ष्मी या अन्नपूर्णा का दर्जा यूँ ही नहीं दिया जाता। एक स्त्री कठिन परिश्रम के जरिये तिनका-तिनका जोड़कर घर बनाती हैं। घर के साफ़ सफाई से लेकर घर वालों के स्वास्थ का भी पूरा ध्यान अकेले ही रखती हैं। कितनी भी मुसीबते आये अकेले ही झेल लेती हैं, लेकिन अपने परिवार पर जरा सी भी आंच नहीं आने देती हैं। एक अकेले स्त्री एक साथ इतनी भूमिका निभाती हैं की देवी लक्ष्मी भी खुद शर्मिदा हो जाए। एक बेटी, एक पत्नी और एक माँ रूप में एक ही जन्म में कितने जीवन जीती हैं। हमारे यहाँ लड़कियों को ये संस्कार भी दिया जाता हैं की एक सुखी स्त्री का अर्थ हैं उसका सुखी परिवार, फिर बात चाहे मायके की हो या ससुराल की। बेटियां इसलिए लक्ष्मी हैं की वो जहाँ भी जाती हैं उस घर को ऐसा बना देती हैं की वहां से सुख और शांति कभी हटने का नाम नहीं लेती हैं। और पत्नी इसलिए गृहलक्ष्मी हैं की वह ना हो तो घर की कामना करना ही व्यर्थ हैं। परिवार की खुशियों में ही जिसकी ख़ुशी हैं ऐसे बेटी को लक्ष्मी नहीं तो और क्या कहेंगे।

लेकिन आंकड़े आज अलग हैं, लक्ष्मी का ये रूप आज हर घर में तिरस्कृत हो रही हैं। अब बेटी लक्ष्मी नहीं कुल्टा, और कुलाक्षिनी कहलाने लगी हैं। लोग स्त्रियों को आज भी लाचार, अबला और दया की दृष्टि से देखते हैं। जबकि धन, शक्ति और बुद्धि का विभाग आज भी देवियों के पास हैं। आज की लक्ष्मी ना सिर्फ समाज में शोषित हो रही हैं, बल्कि अपने घर में भी तिरस्कृत हो रही हैं। दहेज़ के लिए जलाई जा रही हैं, इज्जत के लिए मौत के घाट  उतारी जा रही हैं। बदनामी के डर  से शिक्षित समाज भी घर की लक्ष्मी को आँगन से बाहर कदम ना रखने पर मजबूर कर रही हैं। अकेले भ्रूण हत्या के मामले भी हम दुनिया से आगे हैं। अब सवाल हैं कैसे जब घर की लक्ष्मी के साथ ही ऐसे व्यवहार किया जाएगा तो बहार से लक्ष्मी कैसे आएगी।

लक्ष्मी पूजा सही अर्थो में स्त्रियों की पूजा हैं। अपने घर की बहु-बेटियों के विकास में अपना योगदान देकर, उनके कार्यो की सराह्कर आप असल मायने में लक्ष्मी की की पूजा कर सकते हैं। अपने घर की बहु बेटियों को जिस दिन से आप आगे बढ़कर साथ देंगे असल मायने में अपने घर की सुख, समृधि, और वैभव को बढ़ने में योगदान देंगे। और असल में लक्ष्मी की पूजा तभी सार्थक होगी जब घर की लक्ष्मी का मान देंगे। तो आइये इस लक्ष्मी पूजा पर हम प्रण लें की स्त्री ही हमारे घर की असल लक्ष्मी हैं। और इनके मान सम्मान और हौसला आफजाई से हमारे घर धन-धान्य, वैभव, और समृधि आएगी।

Friday, November 9, 2012

मैं, तुम, और वो - एक प्रेम कहानी

दोस्तों नमस्कार आज मैं आप लोगो के सामने एक  प्रेम कहानी रखने जा रहा हूँ। अब जैसा की लाजिमी हैं कहानी प्रेम की हैं तो एक लड़का और लड़की तो होगी ही, तो पहले हम क्यों ना पात्र  परिचय करवा दूँ। इस कहानी में दो लोग हैं एक हैं "मैं" और एक  "तुम", चलो मान लेते हैं की, 'मैं' जो हैं वो एक लड़का हैं और 'तुम' जो हैं वो एक लड़की हैं।

पात्र परिचय -:

मैं -: 'मैं' एक मैंगो मेन  हैं, जो किताबे पढता हैं, कहानी लिखता हैं, घंटो अकेले बात करता हैं, अपने आप में खोये हुए हर वक्त कुछ सोचता रहता हैं। कभी खुद से बाते करता हैं, कभी खुद से शिकायत करता हैं, जो यमुना किनारे बैठा रहता हैं;घंटो अकेले, कभी भीड़ में खो जाता हैं पुराने सूटकेस की तरह, कभी भीड़ से अलग दीखता हैं नए गिटार की तरह, एक ओल्ड फैशन लड़का जो गुरुदत्त को देखता हैं और गुलाम नवी को सुनता हैं। ध्रुपद और धमार भी जिसे बहुत पसंद हैं। जो मूंगफली खाता हैं, और दूध पीता हैं। साफ़ शब्दों में कहे तो "मैं" एक मैंगो मेन  हैं यानी आम आदमी।

तुम -: 'तुम' एक महत्वाकांक्षी लड़की हैं, जो नए फैशन की हैं, जिसे शॉपिंग पसंद हैं, नए कपडे और ज्वेलरी जिसे खुद से भी ज्यादा प्यारे हैं। जो हिरोइनों  की नक़ल करना चाहती हैं। जो ब्रिटनी और शकीरा से भी आगे निकलना चाहती हैं। जिसे सिर्फ इस मतलब हैं की वो क्या हैं, लोग उसे किस नजरो से देख रहा हैं। वो सुन्दर दिखना चाहती हैं और सुन्दर। शायद अपने आप से भी। उसे नए ज़माने की चीज़े पसंद हैं, आइसक्रीम, पिज़्ज़ा, बर्गर, और हॉटडॉग उसे बहुत पसंद हैं। पता नहीं लेकिन कभी कभी वो वोडका भी पी लेती हैं। फुल टू  नए ज़माने की जिसे सिर्फ और फैशन पसंद हैं। कोस्टा की कॉफी, डोमिनोज का पिज़्ज़ा उसके प्रिय हैं। चलने की लचक, और बोलने की अदा सब अलग हैं उसकी, एकदम अलग।
वो -: वो सिर्फ एक छलावा हैं, एक ऐसा छलावा जिसने "मैं" और "तुम" की जिन्दगी में वो तूफ़ान ला दिया जिसकी उसने अपेक्षा भी नहीं की थी।

प्रेम कहानी -: इस प्रेम कहानी में पुराने ज़माने की तरह कोई राजा या रानी नहीं हैं, ना ही शिरी और फरहाद की तरह कोई पहाड़ तोड़कर नदी ला रहा हैं। ये कहानी हैं बस एक ऑफिस के दो लोगो की जो एक दुसरे के संग रहते रहते पता नहीं कब प्यार कर बैठे। ये घटना हैं 2 दिसंबर 2010 की हैं, आम आदमी ने अपने पुराने ऑफिस को छोड़कर एक नए ऑफिस को ज्वाइन किया। नए लोग नया काम। नए संगी साथी। पुराने सब छुट गए, बढ़ते वक्त के साथ। 'मैं' को नया काम मिला, दो नए प्रोजेक्ट, दो नए प्रोसेस, सोचा चलो काम में इतना मशगुल हो जाऊंगा की पुराने दोस्तों की याद नहीं सताएगी, लेकिन मैं गलत था, कहने को तो दो प्रोसेस थे लेकिन काम कुछ भी नहीं। पूरा दिन खाली बैठना पड़ता था। उसके कुछ दिनों बाद "मैं" के सामने वाली प्रोसेस में एक लड़की आई "तुम" जैसा की पहले ही लिख चूका हूँ, तुम बिलकुल वैसी ही थी। संयोगवश दोनों साथ ही में बैठते थे। नया ऑफिस दोनों के लिए नया था। और दोनों नए एक दुसरे के दोस्त बन गए। और ये दोस्ती पता नहीं कब प्यार में बदल गई, पता ही नहीं चला ना 'तुम' और ना हीं 'मैं' को। दोनों एक दुसरे को टूट कर चाहने लगे....रुकिए शायद मैं गलत था, टूटकर तो सिर्फ "मैं" चाहता था। तुम के लिए तो ये प्यार सिर्फ खेल था एक ऐसा खेल जो दिलो के संग खेला जाता हो। हम साथ में ऑफिस जाने और साथ में ऑफिस से आने लगे। कुछ दिनों बाद हम दोनों ने एक दुसरे को प्रपोज कर दिया। दिन था 11 दिसंबर। प्यार का इज़हार रविवार के दिन हुआ था वो भी सन्देश में हम दोनों दूर थे एक दुसरे से बहुत दूर। लेकिन कहते हैं न प्रेम किसी स्थान विशेष में नहीं बांध सकता, ठीक यही हुआ हमारे साथ। एक दुसरे से बहुत दूर होते हुए भी एक दुसरे के हो गए। फिर हम साथ साथ ऑफिस जाने लगे आने लगे, एक दुसरे के संग टाइम स्पेंड करने लगे, बड़े अच्छे  दिन थे कमबख्त, बड़े अच्छे  दिन थे। लेकिन कहते हैं ना अच्छे दिन ज्यादा दिन तक नहीं चलते, कुछ ऐसा ही हुआ मेरे साथ अचानक से मेरे प्यार को नज़र लग गई, कोई और आ गया शायद उसकी जिन्दगी में, या पता नहीं क्या हो गया, वो अचानक से एक दुसरे लड़के की तारीफे करने लगे, वो होता तो ऐसा करता, वो होता तो वैसा करता, उसे मेरी बहुत फिकर रहती थी। वो मेरे कहे बिना ही मेरी जरूरते समझ जाता था वगैरह-वगैरह... ! फिर तो हमदोनो के बीच "हम" कम और वो ज्यादा रहने लगा। उसे ये पसंद हैं, वो रहता तो मेरे लिए ये लाता, उसे और मुझे लाल और काला रंग पसंद हैं वगैरह-वगैरह। फिर क्या किसी भी मैंगो मेन को ये बुरा लगेगा की उसके रहते उसकी प्रेमिका किसी और के गुण गाये। "मैं" को भी बहुत बुरा लगा, वो भी एक मैंगो मेन था उसके पास भी एक दिल था जो सिर्फ उसके लिए धडकता था।  एक दिन 17 मार्च'2011 को उसने एक लड़के के बारे में बताया एक लड़का था मेरी जिन्दगी में नाम उसका "वो" हैं। "वो" मुझे बहुत प्यार करता था, वो मेरा ख्याल रखता था, वो ऐसा ,हैं वो वैसा है......
"मैं" को बुरा तो लगा लेकिन उसने सोचा की क्यों न वो "वो" से ज्यादा प्यार "तुम" को करने लगे ताकि वो "वो" को भूल सके। उसने उसे और प्यार करना शुरू कर दिया। तुम के लिए "मैं" ने अपने पुराने दोस्तों को छोड़ दिया नए ऑफिस में जो उसके दोस्त बने थे उससे किनारा कर लिया। "मैं" को यह भी पसंद नहीं था की "मैं" ऑफिस में किसी और लड़की से बात करे जबकि वो सारी लड़कियां उसे भाई बोलती थी। फिर भी "तुम" की ख़ुशी के लिए मैं ने वो सब छोड़ दिया। अपने दोस्त, अपने, रिश्तेदार, अपने घर और यहाँ तक की खुद को भी। "मैं" को लगा की हो सकता हैं की उसके प्यार में ही कोई कमी हैं। उसे ही बदलना चाहिए उसे ही कुछ ऐसा करना चाहिए की "तुम" सिर्फ उसकी बन कर रह जाए। लेकिन "मैं" को क्या पता था की "तुम" के मन में क्या चल रहा हैं। और एक दिन आखिरकार वो दिन भी आया जब "मैं" के सारे अरमान टूट-टूट कर बिखर गए। एक झटके में उसने अपने प्यार का महल गिरा दिया। एक शब्द ने उस सारी दुनिया में आग लगा दिया जिसके सपने वो सजा कर बैठा था। उसने अपने पुराने दोस्त से 'पैच-अप' कर लिया हैं। वो अब वापस लौट आया हैं और मुझे कभी ना छोड़कर जाने के साथ पहले से भी ज्यादा प्यार करने का वादा किया हैं। मैं जा रही हूँ। और इसी शब्द के साथ "तुम" चली गई। "मैं" की सपने की दुनिया चूर-चूर हो गयी। वो एक शब्द "मैं जा रही हूँ" तुम के कानो में पिघले शीशे की तरह बन कर गिरा। मैं टूट चूका था, हद से ज्यादा, अपने आप से, खुद से, और दुनिया से। उसे बेगानी लग रही थी ये प्यार मोहब्बत की बाते, ये इश्क का नाम, नफरत हो गयी थी उसे खुद से और दुनिया से। फिर जैसा की हरेक प्रेम कहानी में होता हैं, मजनू वाला हाल हो गया "मैं" का, ना किसी से ज्यादा बोलना, ना कुछ सुनना, सिर्फ खुद में रहना और खुद की सुनना... लेकिन कहते हैं न भगवान् जब एक रास्ता बंद करता हैं तो दूसरा खोल देता हैं, ठीक ऐसा ही हुआ "मैं" के साथ उसने कलम उठा ली, और उकेर दी अपने दिल के जज्बात कोरे कागज़ पर, पाट दिया अपने अरमानो को काले, नीले कलम से, डूब गया वो लेखन और कविता में। कहते हैं ना इश्क में सब शायर बन जाते हैं, लेकिन "मैं" इश्क के बाद शायर बन गया। कई कहानियाँ  और कई आलेख लिख डाले, कुछ तो अच्छे  अखबारों में प्रकाशित भी हो गए, और इस तरह से मशगुल हो गया वो अपनी दुनिया में की भूल गया अपनी पिछली जिन्दगी। पुनर्जनम लिया जैसे उसने और अपने जज्बातों को कागज़ पर सज़ा कर खुश हो गया। और इसी तरह ख़तम हो गई "मैं" की प्रेम कहानी।

"मैं" और "तुम" आपके हर घर हर शहर में हैं, हर गली नुक्कड़ पे आपको एक "मैं" और "तुम" दिखाई पड़  जाएंगे, जो किसी "वो" के इन्तजार में होंगे। "वो" आज भी हैं हमारे बीच ही जो "तुम" को "मैं" से छीन ले रहा हैं। अगर आपके साथ भी कुछ ऐसा ही लग रहा हैं तो सावधान हो जाइए , क्योंकि "वो" जब आता हैं तो "मैं" की कोई अहमियत नहीं रह जाती। "मैं" बेचारा अकेला सा सिर्फ कहानी ही लिखता रह जाता हैं, और "तुम" आज भी "वो" के साथ अपने जिन्दगी के हसीन सपने देखने में व्यस्त हो जाती हैं। लेकिन क्या पता अगला नंबर उस "वो" का हो जो "तुम" के लिए अपने आप को "मैं" समझ रहा हो। क्या पता उस "वो" के लिए भी कोई दुसरा "वो" तैयार हो रहा हो। जरा सोचिये....?

Monday, November 5, 2012

देखा हैं हमने

पत्थरों को रोते देखा हैं हमने
सपनो को बदलते देखा हैं हमने

देखा हैं दिन का ढलता सूरज
और देखा हैं रातो के शुरू को भी

कोरे कागज़ पे निशा देखे हैं हमने
और देखा हैं शिकन हँसते चेहरे पर

हंसी चेहरे के गम को देखा है हमने
और रोया है हमने खुश होने पर

छलकती आँखों को देखा हैं काजल के तले
सिसकते होंठो को देखा हैं भींचते हुए

मुस्कुराते हैं लोग मतलब की दुनिया में
कई चेहरों को देखा हैं, एक चेहरे के पीछे

खोलो खोलो अपनी आँखे

खोलो खोलो अपनी आँखे,
कुछ लाया हूँ मैं तुम्हारे लिए,

जो हैं तुमसे भी प्यारा,
तुमसे भी अच्छा.

एक चुटकी धुप
सूरज से मांगकर

एक मुट्ठी रौशनी
किरणों से मांगकर

कुछ आँशु पत्थर दिल के
एक हंसी मासूम दिल से

दो मोती सीपियो से
दो बूंद बादलो से

अच्छा लगे तो और मांग लेना
मैं लाया हूँ सिर्फ तुम्हारे लिए

खोलो-खोलो अपनी आँखे
कुछ लाया हूँ मैं तुम्हारे लिए.

Tuesday, October 30, 2012

राम नहीं रावण चाहिए


गर्भवती माँ ने बेटी से पूछा क्या चाहिए तुझे? बहन या भाई..!!
बेटी बोली भाई !!
माँ: किसके जैसा?
बेटी: रावण सा….!
माँ: क्या बकती है?
पिता ने धमकाया, माँ ने घूरा, गाली देती है, रावण जैसे भी भाई भी किसी को चाहिए भला??
बेटी बोली, क्यूँ माँ?
बहन के अपमान पर राज्यवंश और प्राण लुटा देने वाला, शत्रु स्त्री को हरने के बाद भी स्पर्श न करने वाला रावण जैसा भाई ही तो हर लड़की को चाहिए आज, छाया जैसी साथ निबाहने वाली गर्भवती निर्दोष पत्नी को त्यागने वाले मर्यादा पुरषोत्तम सा भाई लेकर क्या करुँगी मैं? जिसने अपने प्यारी बहन शांता के लिए एक बार भी भात्रधर्म ना निभाया हो, उस बहन के लिए जिसने त्याग कर दिया था अपने पिता के लिए अपने आपको, और जिसके प्रताप से आये थे राम इस दुनिया में.
और माँ अग्नि परीक्षा, चौदह बरस वनवास, और अपहरण से लांछित बहु की क़तर आहें तुम कब तक सुनोगी और कब तक राम को ही जन्मोगी …..!!!
माँ सिसक रही थी – पिता आवाक था..

Saturday, September 29, 2012

कितना सत्य हैं मैथिली का ग्लोबलाइजेशन

भोजपुरी ने विकिपीडिया पर भी प्रमुखता से अपना स्थान बना लिया हैं। ये मैथिल टेक-सेवी के लिये चितन-मनन का विषय तो हैं ही साथ-ही-साथ उन करोडो मैथिलो के मुंह पर करारा तमाचा भी हैं जो अभी भी मैथिली को सिर्फ आपसी द्वेष और मतभेद के कारण अंतरजाल पर अपनी जगह बनाने से रोक रहा हैं।

ऐसा नहीं हैं की मैथिलो ने इसके लिए प्रयास नहीं किया या मैथिलो ने इंटरनेट का प्रयोग सिर्फ सस्ती और क्षणभंगुर लोकप्रियता पाने के लिए किया हैं, बहुत से ऐसे मैथिल हैं जिसने मैथिली के ग्लोबलाइजेशन के लिए एडी चोटी का जोर भी लगाया हैं। लेकिन उनमे से ज्यादातर मैथिली के पैर-खिचो प्रवृति से तंग आकर अपना हाथ पीछे खीच लिया हैं। हम राजेश रंजन, संगीता कुमारी और उनके टीम के उस योगदान को नहीं भुला सकते जिसके कारण हमें मैथिली फायरफोक्स का बीटा वर्जन मिला हैं, जिसके अकथ मेहनत से एक युग का सपना साकार हो गया हैं, और ना ही हम गजेन्द्र ठाकुर के उस सहयोग को भूल सकते हैं जिसने ना केवल मैथिली को इन्टरनेट पर फैलाने का काम किया बल्कि विकिपीडिया से निरंतर मैथली के लिए लड़ते आ रहे हैं। लेकिन जिस तरह 'अकेला चना भाड़ नहीं भोड़ सकता' वैसे ही किसी एक के योगदान से मैथिली ग्लोबल नहीं हो सकती। विगत कुछ दिनों पहले हमने राजेश रंजन से इस मैथिली मोजिल्ला के भविष्य और मैथली के सुचना-प्रोधोगिकी में स्थान के बाबत करी थी, उन्होंने एक ही शब्द में कहा की मैथिली एप्लीकेशन का भविष्य इसके प्रयोक्ता पर निर्भर करता हैं; और प्रयोक्ता जब तक चाहे इसके भविष्य को उज्जवल और अंधकारमय बना सकता हैं। लेकिन एक सवाल हैं की कब तक और कहा तक, आज के समय में अगर अंतरजाल पर एक सर्वे करवाया जाय की कितने प्रतिशत मैथिल अंतरजाल पर मैथिल एप्लीकेशन का प्रयोग करते हैं तो ७० प्रतिशत से ज्यादा का सवाल होगा 'क्या मैथिली में कोई एप्लीकेशन भी हैं?' प्रयोग की बात तो दूर ही हैं। तिरहुत/मिथिलाक्षर की बात अगर छोड़ भी दे तो देवनागिरी में भी मैथिली लिखने वालों की संख्या ऊँगली पर ही गिनने को मिलेगी। अब सवाल ये हैं की क्या हमने इसके प्रचार प्रसार पर ध्यान नहीं दिया अथवा अपनी उन्नती के चक्कर में भाषा की भाषा की उन्नती भूल गए। सवाल ये भी हैं की क्या अपनी ज्यादा मायने रखती हैं भाषा की उन्नती के बनिस्पत। साहित्य से लेकर सिनेमा तक, इतिहास से लेकर भूगोल तक, घर से बाजार तक और कलम से अंतरजाल तक मैथिली सिर्फ और सिर्फ अपनी पैर खिचो प्रवृति का ही शिकार हुई हैं।

२००३ में मैथिली को संविधान की आठवी अनुसूची में शामिल करवाकर हम चैन की नींद सोने चले गए की चलो लड़ाई तो अब ख़त्म हो गई, हमने तो जंग जीत लिया। लेकिन हमें कौन समझाए की ये तो जंग की शुरवात हैं वास्तविक जंग तो अभी बांकी हैं। मैथिली ने अभी सिर्फ अपना स्थान लिया हैं पहचान बनाना अभी बांकी हैं। वैसे कहने को तो मैथिली भोजपुरी से ८०० साल पुरानी हैं, हमारी खुद की लिपि हैं साहित्य हैं, क्रमानुगत भाषा का विकास हैं और हम सदियों से चले आ रहे हैं। लेकिन जिस तरह से हम चल रहे हैं क्या हम निरंतर रह पायेंगे क्या हमारी सतत यात्रा जारी रहेगी या हम पैर-खिचो प्रवृति की शिकार होकर रस्ते में ही दम तोड़ जाएंगे।
जिस तरह से भोजपुरी दिन दुनी रात चौगुनी तरक्की करते जा रहा हैं। फूहड़ जाने और बेकार चित्रण के बावजूद विश्व पटल पर छा रहा हैं, जिस तरह से भोजपुरी गीत-संगीत और सिनेमा व्यवसायिकता के चरम पर हैं, रोज नए-नए चैनल, अखबार, पत्रिका, और वेबसाईट आते जा रहे हैं और नित नए नए प्रयोग कर सबको चोकाए जा रहे हैं उस समय क्या हमें अपना फ़र्ज़ याद नहीं आ रहा हैं, क्या हमें माँ मैथिली की पुकार नहीं सुनाई दे रही हैं, क्या हम सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए माँ मैथिली का दोहन नहीं कर रहे हैं। क्या हम भी उसी रंग में रंगते नहीं जा रहे हैं। क्या हमारा साफ़-सुथरा संगीत श्रोताओं को रास नहीं आ रहा हैं, क्या हमारा प्राचीन और सुन्दर साहित्य सिर्फ कागज के डिब्बो तक में ही सिमट कर रहा गया हैं। जरा सोचिये?

भिखारी ठाकुर का एक नाटक 'विदेसिया' आता हैं और भारत सहित मरिसस में भी डंका बजा जाता हैं, लेकिन हम आज भी हरिनाथ झा का पाँच पत्र लिए पटना, दिल्ली, कलकत्ता और नेपाल ही पच सके हैं, जबकि विस्वपटल पर हम छाये हुए हैं। कारन सिर्फ एक हैं हमारा भाषा के प्रति झुकाव नहीं हैं, हम मैथिली को सिर्फ मनोरंजन और स्वार्थ सिद्धि का जरिया मानते हैं। हमें मैथिली तभी तक दिखाई देती हैं जब तक हमारी स्वार्थ सिद्धि होती रहती हैं स्वार्थ सिद्ध हुआ और हम और भाषा के पीछे दौड़ना शुरू कर देते हैं।

आज भोजपुरी विकिपीडिया पर प्रमुखता से हैं, सविधान की आठवी अनुसूची में आने की कगार पर हैं, इनके साहित्य और संगीत का चर्चा अंतररास्ट्रीय स्तर पर हैं और मैं ये सब सुन कर खुश हो रहा हूँ, की चलो कम से कम इसी वजह से तो प्रतियोगिता बढ़ेगी,कम से कम इसी वजह से तो मैथिलो की आँख खुलेगी, कम से कम अब तो मैथिल अपने भाषा के सर्वांगीण विकास के बारे में सोच सकेंगे। वैसे भाषा का विकास सिर्फ कविता, कहानी और नाटक लिख देने से नहीं होगा ना ही भाषा का विकास साहित्य अकादमी के पुरस्कार प्रप्त कर लेने से होगा, भाषा का विकास तभी संभव हैं जब हम अपनी पैर खिछु प्रवृति को छोड़, व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर, अपनी भावी पीढियों को इसके सही मूल्यों का बोध करवा सकेंगे। तभी हमारी मैथिली उस मुकाम तक पहुंचेगी जिसके लिए ये वांछनीय हैं।

Monday, August 27, 2012

मैलोरंग सम्मान की घोषणा

कल श्रीराम सेंटर में सुन्दर संयोग नाटक की प्रस्तुति के बाद, मैलोरंग ने अपने सम्मान/पुरष्कार की घोसना कर दी हैंज्ञात हो की मैलोरंग वर्ष २००५ से रंगकर्म और रंगमंच में अपने विशेष सहयोग के लिए ये पुरष्कार देते आ रहे हैं। ये पुरष्कार हैं 'ज्योतिरीश्वर सम्मान', 'रंगकर्मी प्रमिला झा सम्मान', और 'रंगकर्मी श्रीकांत मंडल सम्मान'। इस बार के सम्मान के लिए अंतिम सूचि तैयार हो चुकी हैं। और अंतिम रूप से चयनित प्रतिभागी रहे हैं... ! ज्योतिरीश्वर सम्मान से नवाजा गया हैं, मैथिली के सुप्रसिद्ध रंगकर्मी और निर्देशक महेंद्र मलंगिया को, वही रंगकर्मी प्रमिला झा सम्मान के लिए अनीता झा (जनकपुर, नेपाल) को सम्मानित किया गया और श्रीकांत मंडल सम्मान के लिए निलेश दीपक को चुना गया हैं। इस बार के तीनो पुरष्कार के लिए मुख्या चयनकर्ता थे मैलोरंग के अध्यक्ष देवशंकर नवीन, प्रसिद्द रंगकर्मी प्रेमलता मिश्रा, और मेलोरंग रेपर्टरी के चीफ मुकेश झा। चयनकर्ताओ ने ढेर सारे प्रतिभागियों के बीच इन तीनो के नामो की घोषणा की जो निश्चित रूप से काबिले तारीफ़ हैं। चयनकर्ता को आभार संग ही संग चयनित प्रतिभागी को बहुत बहुत बधाई।

दिल्ली में हुआ 'सुन्दर संयोग'


  • सुन्दर संयोग का मंचन
  • नए कलाकारों ने दी अद्भुत प्रस्तुति
  • मलंगिया महोत्सव की घोसना
दिल्ली में एक बार फिर मैथिलो की धमक सुनाई दी। श्रीराम सेंटर एक बार फिर गवाह बना मैथिलो के एक सुन्दर समागम का। मौका था मैथिली रंगमंच के सर्वश्रेष्ठ संस्था मैलोरंग ( मैथिली लोक रंग) के द्वारा मैथिली के पहले आधुनिक नाटक 'सुन्दर संयोग' के मंचन का। ज्ञात हो की सुन्दर संयोग मैथिली का पहला आधुनिक नाटक हैं जिसे स्वर्गीय जीवन झा ने १९०५ ई० में लिखा था। इस नाटक को आज के समय के अनुसार ढालने के लिए इसकी पुनर्लेखन की आवश्यकता पड़ी जिसे बखूबी से अंजाम दिया मैथीली के सुप्रसिद्ध नाटकार, रंग निर्देशक और चिन्तक 'महेंद्र मलंगिया' जी ने।
आशा के अनुरूप श्रीराम सेंटर खचाखच भरा हुआ था, दर्शको की भीड़ दिल्ली में मैथिल स्वर को गुंजायमान कर रही थी की मंच पर अवतरीत हुए संतोष....नट की भूमिका में आये संतोष को देख दर्शक अपनी हंसी रोक ना सके और पूरा ऑडिटोरियम हंसी की झंकार से धमक उठा। रही सही कसर नटी बने प्रवीण ने पूरा कर दिया, प्रवीण के हरेक ठुमके और हरेक इशारे पर हंसी का फुव्वारा और तालियों की गडगडाहट गूंजती थी। इन दोनों के मनोरंजन ने दर्शको को पेट पकड़कर लोट-पोट होने पर विवश कर दिया। फिर एक एक कर मंच पर बांकी कलाकार आये, अनिल मिश्रा, नीरा, ज्योति और बबिता ने भी अपनी सुन्दर आदकारी से दर्शको का मन मोह लिया। मुख्य भूमिका में सुन्दर बने अमर जी राय और सरला बनी सोनिया झा ने कमाल का अभिनय किया। ज्ञात हो की अमरजी राय ने मैलोरंग से ही अपनी कैरियर की शुरुआत की थी २००६ में काठक लोक से रंगमंच पर आये अमरजी राय मैलोरंग द्वारा निर्देशित जल डमरू बाजे में मुख्य भूमिका में थे। पिछले वर्ष स्कॉलरशिप मिलने के कारण एक वर्ष के अभिनय प्रसिक्षण के लिए आप मध्यप्रदेश गए और अभिनय की बारीकियो से अवगत हो पुनः मैथिली रंगमंच की और मूड गए, प्रसिक्षण के बाद 'सुन्दर संयोग' उनका पहला नाटक हैं। वहीँ सरला इससे पहले हिंदी रंगमंच के साथ जुडी थी और कुछ छोटे-छोटे अभिनय करती थी। मैथिली रंगमंच पर उनका ये पहला प्रयास हैं। लेकिन अपने पहले ही प्रयास में वो दर्शको के दिल में उतर गयी और अपनी पहली परीक्षा में शत-प्रतिशत पास हुई। सरोजनी की भूमिका में बबिता प्रतिहस्त ने भी अच्छा अभिनय किया, ज्ञात हो की बबिता का ये पहला अभिनय था रंगमंच पर। वैसे प्रकास जी की ये खासियत रही हैं की वो नए से नए कलाकारों से भी अच्छा अभिनय करवा लेते हैं, एक मंजे निर्देशक होने के सारे गुण इनमे विद्यमान हैं।

स्त्री समस्या को समाहित किये सुन्दर संयोग का ये मंचन सचमुच में अद्भुत रहा। अंत तक दर्शक अपने कुर्सी से चिपके रहे। बधाइयों का ताँता लगा रहा। अंत में हरेक बार की तरह जैसा की मैलोरंग में होता आया हैं। अपने एक नाटक के सम्पति के बाद दुसरे नाटक के मंचन की घोसना... प्रकाश जी ने समय और दिन तो नहीं बताया लेकिन ये अवस्य सुनिश्चित किया की अक्टूबर में उनका अगला मंचन होगा। साथ ही मलंगिया महोत्सव की भी पुनः घोषणा की जो २४-३० दिसम्बर तक होगा। एक शब्द में कहू तो सुन्दर रहा 'सुन्दर संयोग'।

Wednesday, August 15, 2012

हमें नहीं चाहिए ऐसी स्वतंत्रता


हमें नहीं चाहिए ऐसी स्वतंत्रता
जिसमे लाल किले पर एक गुलाम नेता का भाषण हो
जो इशारो पर चलता हो ‘मैडम’ जी के
हमें नहीं चाहिए ऐसी स्वतंत्रता
जो नहीं देती हो बराबरी हर नागरीक के सम्मान की
जो आज भी छुआछूत और आरक्षण में बंधी हो
हमें नहीं चाहिए ऐसी स्वतंत्रता
जहाँ जीने का हक़ सिर्फ अमीरों को हो
गरीबो को सिर्फ पिसने का फरमान
हमें नहीं चाहिए ऐसी स्वतंत्रता
जो मरीजों को नहीं दे सके दवा
जो भूखो को नहीं दे सके दो वक्त की रोटी
हमें नहीं चाहिए ऐसी स्वतंत्रता
जिसकी ध्वजा किसी पकिस्तान के डोर से बंधी हो
और कोई और रंग खीच रहा हो केसरिया, सफ़ेद के बीच
हमें नहीं चाहिए ऐसी स्वतंत्रता
जहाँ जीना दुस्वार हो और
मरने की इज़ाज़त ना मिले
हमें नहीं चाहिए ऐसी स्वतंत्रता
जहाँ कलम सिर्फ दलाली में लिखते हो
और मिडिया हो राजनेताओ की गुलाम
हमें चाहिए ऐसी स्वतंत्रता
जो कभी सपना देखा था
गाँधी, भगत सिंह, सुभाषचंद्र बोस और राजीव गाँधी ने
की हरे-भरे गाँव में
खेतो के बीच
लहराता हो तिरंगा
उसी शान से जैसे
हमने पहली दफे लहराया था
मुल्क के आजाद होने पर
जय हिंद – जय भारत

Monday, August 13, 2012

कल और आज

बहुत पहले
होता था एक गाँव
जहाँ सूरज के उगने से पहले
लोग उठ जाते थे
और देर रात तक
अलाव के निचे चाँद
को निहारते थे

बहुत पहले

रमजान में राम और
दीपावली में अली होता था
सब मिल के मानते थे
होली, दिवाली, ईद और बकरीद
फागुन का रंग सब पर बरसता था
नहीं होता था कोई
सम्प्र्यादायिक रंग
ना ही होता था दंगे
और उत्पातो का भय

बहुत पहले

भ्रष्ट नेताओ की
नहीं होती थी पूजा
ना ही बहाए जाते थे
किसी अपनों के मौत पर
घडियाली आँशु

बहुत पहले
सुदर दिखती थी लडकियां
होता था सच्चा प्यार
सच्चे मन से
लोग जानते थे प्रेम की परिभाषा

बहुत पहले

पैसा सब कुछ नहीं होता था
लोग समझते थे मानवता
और समाज की सादगी


और अब

उठते हैं हम दिन ढलने के बाद
और अलाव की जगह
ले ली हैं हीटर ने 
अब चाँद बादलो में नहीं दीखता
जैसे छुप गया हो
आलिशान महल के पीछे

और अब

रमजान और होली
हिन्दू मुसलमानों का
होकर रह गया हैं
साम्प्रदायिकता का रंग
सर चढ़ कर बोलने लगा हैं


  अब

साधुओ के भेष में चोर-उचक्के
घूमते हैं
शहर भर में होता है रक्तपात
और दंगाई घूमते है खुले-आम
होती हैं भ्रष्ट नेताओं के पूजा
नैतिकता के नाम पर
सुख चुकी हैं आंशुओ की धार

  अब

बदल गई हैं प्रेम की परिभाषा
नहीं करता कोई सच्चा प्यार
खत्म हो गयी वफ़ा की उम्मीद
हीर-राँझा और शिरी-फ़रियाद
किस्सों में भी अच्छे नहीं लगते

  अब

पैसा ही सब कुछ होता हैं
संबंध और मानवता से भी बड़ा
खत्म हो गयी समाज से सादगी
और खत्म हो गया आदमी
आदमियत के संग ...