Tuesday, October 30, 2012

राम नहीं रावण चाहिए


गर्भवती माँ ने बेटी से पूछा क्या चाहिए तुझे? बहन या भाई..!!
बेटी बोली भाई !!
माँ: किसके जैसा?
बेटी: रावण सा….!
माँ: क्या बकती है?
पिता ने धमकाया, माँ ने घूरा, गाली देती है, रावण जैसे भी भाई भी किसी को चाहिए भला??
बेटी बोली, क्यूँ माँ?
बहन के अपमान पर राज्यवंश और प्राण लुटा देने वाला, शत्रु स्त्री को हरने के बाद भी स्पर्श न करने वाला रावण जैसा भाई ही तो हर लड़की को चाहिए आज, छाया जैसी साथ निबाहने वाली गर्भवती निर्दोष पत्नी को त्यागने वाले मर्यादा पुरषोत्तम सा भाई लेकर क्या करुँगी मैं? जिसने अपने प्यारी बहन शांता के लिए एक बार भी भात्रॄ धर्म ना निभाया हो, उस बहन के लिए जिसने त्याग कर दिया था अपने पिता के लिए अपने आपको, और जिसके प्रताप से आये थे राम इस दुनिया में.
और माँ अग्नि परीक्षा, चौदह बरस वनवास, और अपहरण से लांछित बहु की क़तर आहें तुम कब तक सुनोगी और कब तक राम को ही जन्मोगी …..!!!
माँ सिसक रही थी – पिता आवाक था..

Saturday, September 29, 2012

कितना सत्य हैं मैथिली का ग्लोबलाइजेशन

भोजपुरी ने विकिपीडिया पर भी प्रमुखता से अपना स्थान बना लिया हैं। ये मैथिल टेक-सेवी के लिये चितन-मनन का विषय तो हैं ही साथ-ही-साथ उन करोडो मैथिलो के मुंह पर करारा तमाचा भी हैं जो अभी भी मैथिली को सिर्फ आपसी द्वेष और मतभेद के कारण अंतरजाल पर अपनी जगह बनाने से रोक रहा हैं।

ऐसा नहीं हैं की मैथिलो ने इसके लिए प्रयास नहीं किया या मैथिलो ने इंटरनेट का प्रयोग सिर्फ सस्ती और क्षणभंगुर लोकप्रियता पाने के लिए किया हैं, बहुत से ऐसे मैथिल हैं जिसने मैथिली के ग्लोबलाइजेशन के लिए एडी चोटी का जोर भी लगाया हैं। लेकिन उनमे से ज्यादातर मैथिली के पैर-खिचो प्रवृति से तंग आकर अपना हाथ पीछे खीच लिया हैं। हम राजेश रंजन, संगीता कुमारी और उनके टीम के उस योगदान को नहीं भुला सकते जिसके कारण हमें मैथिली फायरफोक्स का बीटा वर्जन मिला हैं, जिसके अकथ मेहनत से एक युग का सपना साकार हो गया हैं, और ना ही हम गजेन्द्र ठाकुर के उस सहयोग को भूल सकते हैं जिसने ना केवल मैथिली को इन्टरनेट पर फैलाने का काम किया बल्कि विकिपीडिया से निरंतर मैथली के लिए लड़ते आ रहे हैं। लेकिन जिस तरह 'अकेला चना भाड़ नहीं भोड़ सकता' वैसे ही किसी एक के योगदान से मैथिली ग्लोबल नहीं हो सकती। विगत कुछ दिनों पहले हमने राजेश रंजन से इस मैथिली मोजिल्ला के भविष्य और मैथली के सुचना-प्रोधोगिकी में स्थान के बाबत करी थी, उन्होंने एक ही शब्द में कहा की मैथिली एप्लीकेशन का भविष्य इसके प्रयोक्ता पर निर्भर करता हैं; और प्रयोक्ता जब तक चाहे इसके भविष्य को उज्जवल और अंधकारमय बना सकता हैं। लेकिन एक सवाल हैं की कब तक और कहा तक, आज के समय में अगर अंतरजाल पर एक सर्वे करवाया जाय की कितने प्रतिशत मैथिल अंतरजाल पर मैथिल एप्लीकेशन का प्रयोग करते हैं तो ७० प्रतिशत से ज्यादा का सवाल होगा 'क्या मैथिली में कोई एप्लीकेशन भी हैं?' प्रयोग की बात तो दूर ही हैं। तिरहुत/मिथिलाक्षर की बात अगर छोड़ भी दे तो देवनागिरी में भी मैथिली लिखने वालों की संख्या ऊँगली पर ही गिनने को मिलेगी। अब सवाल ये हैं की क्या हमने इसके प्रचार प्रसार पर ध्यान नहीं दिया अथवा अपनी उन्नती के चक्कर में भाषा की भाषा की उन्नती भूल गए। सवाल ये भी हैं की क्या अपनी ज्यादा मायने रखती हैं भाषा की उन्नती के बनिस्पत। साहित्य से लेकर सिनेमा तक, इतिहास से लेकर भूगोल तक, घर से बाजार तक और कलम से अंतरजाल तक मैथिली सिर्फ और सिर्फ अपनी पैर खिचो प्रवृति का ही शिकार हुई हैं।

२००३ में मैथिली को संविधान की आठवी अनुसूची में शामिल करवाकर हम चैन की नींद सोने चले गए की चलो लड़ाई तो अब ख़त्म हो गई, हमने तो जंग जीत लिया। लेकिन हमें कौन समझाए की ये तो जंग की शुरवात हैं वास्तविक जंग तो अभी बांकी हैं। मैथिली ने अभी सिर्फ अपना स्थान लिया हैं पहचान बनाना अभी बांकी हैं। वैसे कहने को तो मैथिली भोजपुरी से ८०० साल पुरानी हैं, हमारी खुद की लिपि हैं साहित्य हैं, क्रमानुगत भाषा का विकास हैं और हम सदियों से चले आ रहे हैं। लेकिन जिस तरह से हम चल रहे हैं क्या हम निरंतर रह पायेंगे क्या हमारी सतत यात्रा जारी रहेगी या हम पैर-खिचो प्रवृति की शिकार होकर रस्ते में ही दम तोड़ जाएंगे।
जिस तरह से भोजपुरी दिन दुनी रात चौगुनी तरक्की करते जा रहा हैं। फूहड़ जाने और बेकार चित्रण के बावजूद विश्व पटल पर छा रहा हैं, जिस तरह से भोजपुरी गीत-संगीत और सिनेमा व्यवसायिकता के चरम पर हैं, रोज नए-नए चैनल, अखबार, पत्रिका, और वेबसाईट आते जा रहे हैं और नित नए नए प्रयोग कर सबको चोकाए जा रहे हैं उस समय क्या हमें अपना फ़र्ज़ याद नहीं आ रहा हैं, क्या हमें माँ मैथिली की पुकार नहीं सुनाई दे रही हैं, क्या हम सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए माँ मैथिली का दोहन नहीं कर रहे हैं। क्या हम भी उसी रंग में रंगते नहीं जा रहे हैं। क्या हमारा साफ़-सुथरा संगीत श्रोताओं को रास नहीं आ रहा हैं, क्या हमारा प्राचीन और सुन्दर साहित्य सिर्फ कागज के डिब्बो तक में ही सिमट कर रहा गया हैं। जरा सोचिये?

भिखारी ठाकुर का एक नाटक 'विदेसिया' आता हैं और भारत सहित मरिसस में भी डंका बजा जाता हैं, लेकिन हम आज भी हरिनाथ झा का पाँच पत्र लिए पटना, दिल्ली, कलकत्ता और नेपाल ही पच सके हैं, जबकि विस्वपटल पर हम छाये हुए हैं। कारन सिर्फ एक हैं हमारा भाषा के प्रति झुकाव नहीं हैं, हम मैथिली को सिर्फ मनोरंजन और स्वार्थ सिद्धि का जरिया मानते हैं। हमें मैथिली तभी तक दिखाई देती हैं जब तक हमारी स्वार्थ सिद्धि होती रहती हैं स्वार्थ सिद्ध हुआ और हम और भाषा के पीछे दौड़ना शुरू कर देते हैं।

आज भोजपुरी विकिपीडिया पर प्रमुखता से हैं, सविधान की आठवी अनुसूची में आने की कगार पर हैं, इनके साहित्य और संगीत का चर्चा अंतररास्ट्रीय स्तर पर हैं और मैं ये सब सुन कर खुश हो रहा हूँ, की चलो कम से कम इसी वजह से तो प्रतियोगिता बढ़ेगी,कम से कम इसी वजह से तो मैथिलो की आँख खुलेगी, कम से कम अब तो मैथिल अपने भाषा के सर्वांगीण विकास के बारे में सोच सकेंगे। वैसे भाषा का विकास सिर्फ कविता, कहानी और नाटक लिख देने से नहीं होगा ना ही भाषा का विकास साहित्य अकादमी के पुरस्कार प्रप्त कर लेने से होगा, भाषा का विकास तभी संभव हैं जब हम अपनी पैर खिछु प्रवृति को छोड़, व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर, अपनी भावी पीढियों को इसके सही मूल्यों का बोध करवा सकेंगे। तभी हमारी मैथिली उस मुकाम तक पहुंचेगी जिसके लिए ये वांछनीय हैं।

Monday, August 27, 2012

मैलोरंग सम्मान की घोषणा

कल श्रीराम सेंटर में सुन्दर संयोग नाटक की प्रस्तुति के बाद, मैलोरंग ने अपने सम्मान/पुरष्कार की घोसना कर दी हैं। ज्ञात हो की मैलोरंग वर्ष २००५ से रंगकर्म और रंगमंच में अपने विशेष सहयोग के लिए ये पुरष्कार देते आ रहे हैं। ये पुरष्कार हैं 'ज्योतिरीश्वर सम्मान', 'रंगकर्मी प्रमिला झा सम्मान', और 'रंगकर्मी श्रीकांत मंडल सम्मान'। इस बार के सम्मान के लिए अंतिम सूचि तैयार हो चुकी हैं। और अंतिम रूप से चयनित प्रतिभागी रहे हैं... ! ज्योतिरीश्वर सम्मान से नवाजा गया हैं, मैथिली के सुप्रसिद्ध रंगकर्मी और निर्देशक महेंद्र मलंगिया को, वही रंगकर्मी प्रमिला झा सम्मान के लिए अनीता झा (जनकपुर, नेपाल) को सम्मानित किया गया और श्रीकांत मंडल सम्मान के लिए निलेश दीपक को चुना गया हैं। इस बार के तीनो पुरष्कार के लिए मुख्या चयनकर्ता थे मैलोरंग के अध्यक्ष देवशंकर नवीन, प्रसिद्द रंगकर्मी प्रेमलता मिश्रा, और मेलोरंग रेपर्टरी के चीफ मुकेश झा। चयनकर्ताओ ने ढेर सारे प्रतिभागियों के बीच इन तीनो के नामो की घोषणा की जो निश्चित रूप से काबिले तारीफ़ हैं। चयनकर्ता को आभार संग ही संग चयनित प्रतिभागी को बहुत बहुत बधाई।

दिल्ली में हुआ 'सुन्दर संयोग'


  • सुन्दर संयोग का मंचन
  • नए कलाकारों ने दी अद्भुत प्रस्तुति
  • मलंगिया महोत्सव की घोसना
दिल्ली में एक बार फिर मैथिलो की धमक सुनाई दी। श्रीराम सेंटर एक बार फिर गवाह बना मैथिलो के एक सुन्दर समागम का। मौका था मैथिली रंगमंच के सर्वश्रेष्ठ संस्था मैलोरंग ( मैथिली लोक रंग) के द्वारा मैथिली के पहले आधुनिक नाटक 'सुन्दर संयोग' के मंचन का। ज्ञात हो की सुन्दर संयोग मैथिली का पहला आधुनिक नाटक हैं जिसे स्वर्गीय जीवन झा ने १९०५ ई० में लिखा था। इस नाटक को आज के समय के अनुसार ढालने के लिए इसकी पुनर्लेखन की आवश्यकता पड़ी जिसे बखूबी से अंजाम दिया मैथीली के सुप्रसिद्ध नाटकार, रंग निर्देशक और चिन्तक 'महेंद्र मलंगिया' जी ने।
आशा के अनुरूप श्रीराम सेंटर खचाखच भरा हुआ था, दर्शको की भीड़ दिल्ली में मैथिल स्वर को गुंजायमान कर रही थी की मंच पर अवतरीत हुए संतोष....नट की भूमिका में आये संतोष को देख दर्शक अपनी हंसी रोक ना सके और पूरा ऑडिटोरियम हंसी की झंकार से धमक उठा। रही सही कसर नटी बने प्रवीण ने पूरा कर दिया, प्रवीण के हरेक ठुमके और हरेक इशारे पर हंसी का फुव्वारा और तालियों की गडगडाहट गूंजती थी। इन दोनों के मनोरंजन ने दर्शको को पेट पकड़कर लोट-पोट होने पर विवश कर दिया। फिर एक एक कर मंच पर बांकी कलाकार आये, अनिल मिश्रा, नीरा, ज्योति और बबिता ने भी अपनी सुन्दर आदकारी से दर्शको का मन मोह लिया। मुख्य भूमिका में सुन्दर बने अमर जी राय और सरला बनी सोनिया झा ने कमाल का अभिनय किया। ज्ञात हो की अमरजी राय ने मैलोरंग से ही अपनी कैरियर की शुरुआत की थी २००६ में काठक लोक से रंगमंच पर आये अमरजी राय मैलोरंग द्वारा निर्देशित जल डमरू बाजे में मुख्य भूमिका में थे। पिछले वर्ष स्कॉलरशिप मिलने के कारण एक वर्ष के अभिनय प्रसिक्षण के लिए आप मध्यप्रदेश गए और अभिनय की बारीकियो से अवगत हो पुनः मैथिली रंगमंच की और मूड गए, प्रसिक्षण के बाद 'सुन्दर संयोग' उनका पहला नाटक हैं। वहीँ सरला इससे पहले हिंदी रंगमंच के साथ जुडी थी और कुछ छोटे-छोटे अभिनय करती थी। मैथिली रंगमंच पर उनका ये पहला प्रयास हैं। लेकिन अपने पहले ही प्रयास में वो दर्शको के दिल में उतर गयी और अपनी पहली परीक्षा में शत-प्रतिशत पास हुई। सरोजनी की भूमिका में बबिता प्रतिहस्त ने भी अच्छा अभिनय किया, ज्ञात हो की बबिता का ये पहला अभिनय था रंगमंच पर। वैसे प्रकास जी की ये खासियत रही हैं की वो नए से नए कलाकारों से भी अच्छा अभिनय करवा लेते हैं, एक मंजे निर्देशक होने के सारे गुण इनमे विद्यमान हैं।

स्त्री समस्या को समाहित किये सुन्दर संयोग का ये मंचन सचमुच में अद्भुत रहा। अंत तक दर्शक अपने कुर्सी से चिपके रहे। बधाइयों का ताँता लगा रहा। अंत में हरेक बार की तरह जैसा की मैलोरंग में होता आया हैं। अपने एक नाटक के सम्पति के बाद दुसरे नाटक के मंचन की घोसना... प्रकाश जी ने समय और दिन तो नहीं बताया लेकिन ये अवस्य सुनिश्चित किया की अक्टूबर में उनका अगला मंचन होगा। साथ ही मलंगिया महोत्सव की भी पुनः घोषणा की जो २४-३० दिसम्बर तक होगा। एक शब्द में कहू तो सुन्दर रहा 'सुन्दर संयोग'।

Wednesday, August 15, 2012

हमें नहीं चाहिए ऐसी स्वतंत्रता


हमें नहीं चाहिए ऐसी स्वतंत्रता
जिसमे लाल किले पर एक गुलाम नेता का भाषण हो
जो इशारो पर चलता हो ‘मैडम’ जी के
हमें नहीं चाहिए ऐसी स्वतंत्रता
जो नहीं देती हो बराबरी हर नागरीक के सम्मान की
जो आज भी छुआछूत और आरक्षण में बंधी हो
हमें नहीं चाहिए ऐसी स्वतंत्रता
जहाँ जीने का हक़ सिर्फ अमीरों को हो
गरीबो को सिर्फ पिसने का फरमान
हमें नहीं चाहिए ऐसी स्वतंत्रता
जो मरीजों को नहीं दे सके दवा
जो भूखो को नहीं दे सके दो वक्त की रोटी
हमें नहीं चाहिए ऐसी स्वतंत्रता
जिसकी ध्वजा किसी पकिस्तान के डोर से बंधी हो
और कोई और रंग खीच रहा हो केसरिया, सफ़ेद के बीच
हमें नहीं चाहिए ऐसी स्वतंत्रता
जहाँ जीना दुस्वार हो और
मरने की इज़ाज़त ना मिले
हमें नहीं चाहिए ऐसी स्वतंत्रता
जहाँ कलम सिर्फ दलाली में लिखते हो
और मिडिया हो राजनेताओ की गुलाम
हमें चाहिए ऐसी स्वतंत्रता
जो कभी सपना देखा था
गाँधी, भगत सिंह, सुभाषचंद्र बोस और राजीव गाँधी ने
की हरे-भरे गाँव में
खेतो के बीच
लहराता हो तिरंगा
उसी शान से जैसे
हमने पहली दफे लहराया था
मुल्क के आजाद होने पर
जय हिंद – जय भारत

Monday, August 13, 2012

कल और आज

बहुत पहले
होता था एक गाँव
जहाँ सूरज के उगने से पहले
लोग उठ जाते थे
और देर रात तक
अलाव के निचे चाँद
को निहारते थे

बहुत पहले

रमजान में राम और
दीपावली में अली होता था
सब मिल के मानते थे
होली, दिवाली, ईद और बकरीद
फागुन का रंग सब पर बरसता था
नहीं होता था कोई
सम्प्र्यादायिक रंग
ना ही होता था दंगे
और उत्पातो का भय

बहुत पहले

भ्रष्ट नेताओ की
नहीं होती थी पूजा
ना ही बहाए जाते थे
किसी अपनों के मौत पर
घडियाली आँशु

बहुत पहले
सुदर दिखती थी लडकियां
होता था सच्चा प्यार
सच्चे मन से
लोग जानते थे प्रेम की परिभाषा

बहुत पहले

पैसा सब कुछ नहीं होता था
लोग समझते थे मानवता
और समाज की सादगी


और अब

उठते हैं हम दिन ढलने के बाद
और अलाव की जगह
ले ली हैं हीटर ने 
अब चाँद बादलो में नहीं दीखता
जैसे छुप गया हो
आलिशान महल के पीछे

और अब

रमजान और होली
हिन्दू मुसलमानों का
होकर रह गया हैं
साम्प्रदायिकता का रंग
सर चढ़ कर बोलने लगा हैं


  अब

साधुओ के भेष में चोर-उचक्के
घूमते हैं
शहर भर में होता है रक्तपात
और दंगाई घूमते है खुले-आम
होती हैं भ्रष्ट नेताओं के पूजा
नैतिकता के नाम पर
सुख चुकी हैं आंशुओ की धार

  अब

बदल गई हैं प्रेम की परिभाषा
नहीं करता कोई सच्चा प्यार
खत्म हो गयी वफ़ा की उम्मीद
हीर-राँझा और शिरी-फ़रियाद
किस्सों में भी अच्छे नहीं लगते

  अब

पैसा ही सब कुछ होता हैं
संबंध और मानवता से भी बड़ा
खत्म हो गयी समाज से सादगी
और खत्म हो गया आदमी
आदमियत के संग ...

Tuesday, July 24, 2012

शांता तुम बहुत याद आओगी




इतिहास हैं गवाह
एक बेटी थी दशरथ की
जो राम से भी बड़ी थी
बहुत बड़ी,
नाम था शांता
कहते हैं जब वो पैदा हुई थी
अयोध्या की धरती पर
वहां पड़ा था भयंकर अकाल
पुरे बारह वर्षो तक
धरती धुल हो गयी थी.
पानी की एक एक बूंद को
तरस गया था पूरा राज,
पंछी भी छोड़ चुके थे अपने
घोसले को..
और प्रजा कर रही थी त्राहिमाम
दुखी राजा को सलाह दी गयी
उनकी पुत्री ही हैं अकाल का कारण
जब से वो आई हैं
ये हाहाकार लाई हैं
खुली राजा की आँख
राज मोह में भूल गए
पिता का धर्म
बेटी को दान में दे दिया
शृंगी ऋषि को
उसके बाद, कहते हैं
कभी शांता ने मुड़ कर नहीं देखा
अयोध्या को एक बार भी
दशरथ भी डरते थे
उसे बुलाने से
फिर बहुत दिनों तक सुना रहा अवध का आँगन
फिर उसी शान्‍ता के पति शृंगी ऋषि ने
दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ कराया...
दशरथ चार पुत्रों के पिता बन गये...
सं‍तति का अकाल मिट गया...
पुत्र मोह में इस कदर रम गए दशरथ
की फिर ना याद आ सकी शांता
फिर समय का पहिया घुमा
राम हुए बड़े
अपने चारो भाइयो के संग,
राह देखती रही शांता
की आयेंगे
मेरे भाई
लेकिन उनकी आँखे पथरा गयी
राम ने एक बार भी नहीं ली उसकी
खोज-खबर
जबकि कहने को वो थे
मर्यादा पुरषोत्तम ..
शायद वो भी डरते थे
राम राज्य में अकाल पड़ने से
कहते हैं
वन में जाते समय, वो गुजरे थे
शृंगी ऋषि के आश्रम से होकर
लेकिन नहीं पूछा एक बार भी शांता का हाल
शांता जब तक जिन्दा रही
देखती रही आपने भाइयो की बाट
की कभी तो आयेंगे
भरत - सत्रुधन,
राम - लक्षमण
अकेले आने को राजी नहीं थी वो
बचपन में सुन चुकी थी
सती की कहानी
दशरथ से.
जिसने सिखाया था
किस कदर बेटियों को सहना पड़ता हैं
बेटी और सती का संताप
किस तरह देती हैं लड़की बलिदान
कभी बेटी, कभी पत्नी, कभी माँ,
और कभी सती के रूप में

आज जब आया हैं राखी का त्यौहार
शांता तू बहुत याद आई हैं
की क्यों ना मिला तुझे भाइयो का प्यार
क्यों ना मनाया तुमने राखी का त्यौहार
क्यों तुम्हे दान दे दिया गया था
एक निर्जीव जान समझ कर
कैसे एक भाई बन गया
मर्यादा पुरुषोत्तम
जबकि बहन की मर्यादा वो निभा न सके
शांता.........!!!!!!!!!!!!
जब जब भाई-बहन की बात आएगी
शांता तू बहुत  याद आएगी.

Thursday, July 19, 2012

बिहार शिक्षा - इतिहास और वर्तमान सच

उच्च शिक्षा के लिए जिस तरह बिहार में हाय तौबा मच रही हैं, और केंद्रीय विश्वविद्यालय के लिए जिस तरह नितीश जी की जोर आजमाइश चल रही रही हैं, उससे एक बात तो हमें सोचने पर मजबूर कर दिया हैं, की क्या इससे बिहार में शिक्षा के कुछ सुधार होगा?, क्या बिहार में शिक्षा के दिन बहुरेंगे?, क्या 'बेरोजगार पैदा करने की फैक्ट्री' के नाम से मशहूर हमारे विश्वविद्यालयो को छुटकारा मिलेगा? क्या फिर से बिहार शिक्षा में वही मुकाम हासिल कर पायेगा जहाँ कभी ये हुआ करता था। क्या बिहार विकास का का नारा देने वाले शिक्षा के क्षेत्र में भी इसे अगली पंक्ति में खड़ा कर पायेंगे। ऐसे बहुत सारे सवाल हैं....
बिहार में अगर शिक्षा के इतिहास पर अगर एक नज़र डाले तो इसे सिर्फ कुचलने वाले ही मिलेंगे, उँगलियों पर गिनने वाले ही ऐसे मिलेंगे जिसने बिहार में शिक्षा के लिए कुछ काम किया हो।
सन् १२१३ में बख्तावर खिलीजी ने नालंदा विश्वविद्यालय को बर्बाद कर बिहार के शिक्षा की संस्कृति को तबाह ही कर डाला, फिर अंग्रेजो की बारी आई और उसने ऐसी नीति बनाई की बागी बिहार शिक्षा के क्षेत्र में काफी पीछे छुट गया
। अंग्रेजो ने जैसी नीव रखी थी वैसी ही इमारत भी खड़ी हुई और आजादी के बाद राजनैतिक अराजकता और अफरा-तफरी ने इसे गर्त की और धकेल दिया यहाँ तक की पटना विश्वविद्यालय जो की देश का सातवां पुराना विश्वविद्यालय हैं की भी गरिमा ख़त्म हो गयी। रही सही कसर बाद में संयुक्त विधायक दल सरकार और बिहार आन्दोलन ने पूरी कर दी। जगन्नाथ मिश्र, महामाया प्रसाद से लेकर लालू प्रसाद यादव तक पालतुकरण की नीति अपनाकर विश्वविद्यालयो को अपना राजनैतिक चारागाह बना दिया। शिक्षा में व्याप्त राजनीती और गुंडाराज को देखकर जाने माने शिक्षाविद ने डॉ वी एस झा ने तो यहाँ तक कह दिया की " बिहार में महाविद्यालय स्थापित करना एक लाभप्रद धंधा हैं बशर्ते की संस्थापक राजनैतिक बॉस हो या जनता की नज़र में उनकी छवि के गुंडे की हो।"

"एशिया आज जिसे गर्व से प्रदर्शित कर सकता हैं, नालंदा उसका प्रतिनिधि हैं" - न्युयोर्क टाइम्स

१९६७ में जब महामाया प्रसाद मुख्यमंत्री थे और बिहार में पहली बार गैर कोंग्रेसी सरकार बनी थी उस समय समाजवादी पार्टी के नेता कर्पूरी ठाकुर ने जो उस समय शिक्षा मंत्री थे एक अजीब सा आदेश दे दिया उनके अनुसार अब "मैट्रिक में पास होने के लिए अंग्रेजी अनिवार्य विषय नहीं होगी"
। इसे लोगो ने "पास विदाउट इंगलिश" का कर्पूरी डिविजन नाम दिया फलतः शिक्षा में अंग्रेजी का स्तर इतना गिर गया जो आज भी देखने को मिलता हैं।
वैसे १९७२ में जब कोंग्रेस के केदार पाण्डेय की सरकार आई तो उन्होंने शिक्षा के गिरते स्तरों की तरफ ध्यान दिया और कर्पूरी राज के जिगर के टुकड़े ( कर्पूरी ठाकुर ने छात्रो के संबोधन के लिए ये नाम दिया था ) को दूर हटाने के लिए और विश्वविद्यालय से गुंडाराज खत्म करने के लिए कुछ ठोस और साहसिक कदम उठाये
। उनकी सरकार ने विश्वविद्यालय का जिम्मा अपने हस्तगत किया और सख्त आई.ए.एस. अधिकारियो को कुलपति और रजिस्टार के पद पर बहाल किया। इससे परीक्षाये और कक्षाए बंदूको के साए में होने लगी और शिक्षा की संस्कृति पटरी पर लौटने लगी। लेकिन शायद बिहार की शिक्षा को किसी की नज़र लग गयी थी या कुछ और इसलिए संपूर्ण क्रांति का दौर आ गया और शिक्षा की व्यवस्था संपूर्ण क्रांति में दब कर रह गयी।

"केवल एक विकसित और शिक्षित बिहार ही विकसित भारत का प्रतिनिधि करेगा" - अब्दुल कलाम ( पूर्व राष्ट्रपति )

फिर १९८० में जब जगन्नाथ मिश्र सत्ता में आये तो उन्होंने पहला काम किया उर्दू को राजभाषा का दर्जा देने का
। बिहार देश का पहला ऐसा राज्य बन गया जिसने यह कदम उठाया था। जगन्नाथ मिश्र के इस कदम ने जहाँ मैथिली को बहुत पीछे धकेल दिया वही मुस्लिम के बीच वो हीरो बन गए। आज अगर बिहार में मैथिली की हालत बदतर हैं तो इसका कही कही नहीं ठीकरा जगन्नाथ मिश्र को भी जाता हैं।
फिर लालू का दौर आया और उसने चरवाहा विद्यालयों के रूप में दलित समाज के लोगो को आगे उठाने का काम किया,
उस समय का नारा था कि घोंघा चुनने वालों, मूसा पकड़ने वालों, गाय-भैंस चराने वालों, शिक्षा प्राप्त करो । लेकिन उनकी भी ये योजना राजनैतिक अस्थिरता और सत्ता परिवर्तन के कारण खटाई में पड़ गयी और शिक्षा की हालत पुनः बदतर हो गयी। 
फिर आया नितीश राज, विकास के नाम पर मिले वोट से लोगो की उम्मीदे जगी, उन्हें एक नया विकाश पुरुष नज़र आया लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में फिर भी उस कदर काम नहीं हुआ जिस कदर होना चाहिए
। बदलते बिहार के परिवेश में या यूँ कहे की नितीश राज में जिस तरह बिहार नित नए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ रहा हैं उसमे जनता को शिक्षा के लिए भी कुछ उम्मीदे जगती नज़र आ रही थी। एक तरफ नितीश ने पंचायतो में शिक्षा के लिए शिक्षा मित्रो की नियुक्ति कर रोजगार के अवसर तो बढ़ा दिए लेकिन नियुक्ति के समय हुई धांधली और अनियमितताओ ने शिक्षा के स्तर को इस कदर गिरा दिया की अभी भी कुछ शिक्षक ढंग से सन्डे, मंडे भी नहीं लिख पाते हैं, विद्यर्थियो का क्या हाल होगा ये तो पूछिये ही मत।

वर्तमान शिक्षा की अगर मैं बात करू तो उच्च शिक्षा के लिए बिहार पुरे भारत में ऐसा राज्य हैं जहाँ के विद्यार्थियों पर बाहरी राज्यों के गैर सरकारी संस्थान अपनी गिद्ध दृष्टि जमाये रखते हैं
। एक अध्यन के मुताबिक उच्च शिक्षा के लिए प्रतिवर्ष एक लाख छात्र बिहार से बाहरी राज्यों जैसे महाराष्ट्र, राजस्थान, और कर्नाटक आदि में पलायन कर रहे हैं जबकि  कहने को भारत के दस प्राचीन विश्वविद्यालय में से तीन हमारे यहाँ हैं। पलायन कर रहे छात्रो के अगर रहने, खाने, पहनने और मूलभूत सुविधाओ पर हुए खर्च को छोड़ भी दे तो भी प्रति छात्र ७०,००० रूपये सालाना ( जो की कुछेकू राज्यों की इंजीनियरिंग में प्रवेश के लिए सरकार फीस हैं ) के हिसाब से ७०० करोड़ होती हैं (ज्ञात हो की इसके अलावा संस्थान डोनेशन के नाम पर भी काफी चंदा वसूलती हैं) बिहार से बाहर चली जाती हैं। इतना ही पैसा प्रवेश दिलाने के नाम पर शिक्षा के दलाल और ठग उगाही कर लेते हैं। इसके अलावा कोचिंग, गैर सरकारी संस्थान, और पब्लिक स्कूलों का यह गढ़ हैं, वैसे आंकड़े बताते हैं की आज तक इन कोचिंग संस्थानों में ( एकाध को छोड़ दे ) कोई भी छात्र राष्ट्रिय या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई प्रतियोगिता नहीं झटक सका हैं। सरकारी संस्थानों की अगर बात करे तो इनमे से ज्यादातर भगवान् भरोसे ही हैं। कुछ में व्यवस्थाओ का रोना है तो कुछ में शिक्षको का। राज्य के कई कॉलेज में चल रहे बीसीए पाठ्यक्रम के लिए कंप्यूटर विभाग की अपनी लैब तक नहीं हैं, कई विभागों में लैब तो हैं लेकिन वो भी बस नाम के उनमे ना तो प्रयोगिक सामान हैं ना ही अच्छे केमिकल। यही हाल पुस्तकालयों के संग भी हैं। बिहार के हरेक विश्वविद्यालयो को अपने आप में पुस्तकालय होने का गौरव तो प्राप्त हैं लेकिन इनकी हालत बद से भी बदतर हैं। हवादार कमरे और बैठने की व्यवस्था तो छोड़ दीजिये, धुल धूसरित आलमारियो और चूहे की कतरनों से सजी किताबो ही देखने को मिलती हैं। कुछेकू सोधार्थियो और दान के फलस्वरूप चलने वाले इस पुस्तकालयो में नई किताबो का सर्वथा आभाव रहता हैं। शिक्षा का आलम ये हैं की मधेपुरा जिले में स्थापित बी.एन. मंडल यूनिवर्सिटी अकेले पाँच जिलो का बोझ उठाये हुए हैं।
एक तरफ देश की तकनिकी और उच्च शिक्षा के हजार संस्थानों में ओम्बुड्समैन की नियुक्ति की केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री की घोषणा अभी मूर्त रूप नहीं ले सकी हैं। जो शिकायतों के निपटारण  एवं भ्रस्टाचार को रोकने में मदद करेगा, और दूसरी तरफ केंद्रीय विश्वविद्यालयो और आईआईटी को लेकर हो राजनीती जिसके वजह से इसमें देरी हो रही हैं चिंता का विषय हैं। माननीयो को इसपर ध्यान देना चाहिए वर्ना बिहार विकास की रफ़्तार जिस तरह से पटरी पर लौटने के बाद फुल स्पीड से चल रही हैं, कही आगे जाकर शिक्षा के कारण औंधे मुँह न गिर पड़े।

Thursday, July 12, 2012

सिर्फ नालंदा का मतलब बिहार नहीं हैं नितीश बाबु

  • नालंदा में बना दिया जायेगा हवाई अड्डा
  • इंडोर शूटिंग रेंज का उद्घाटन
  • विवरेज एंड फ़ूड प्लांट का उद्घाटन
  • पहला आल विमेन कोपरेटिव बैंक
  • २३ हज़ार करोड़ की योजना हुई आवंटित
  • खेती में बनाया अंतर्राष्ट्रीय रिकॉर्ड
  • स्वास्थ सेवा में लगातार दुसरे साल पहले नंबर पर
उपरोक्त खबर बिहार विकास की दास्तान जरुर कह रही हैं लेकिन आपको ताज्जुब होगा की सारी खबर नालंदा से सम्बंधित हैं, मतलब विकास तो हुआ हैं लेकिन किसी एक जिले में ही सिमट कर रह गया हैं। इसे मुख्यमंत्री जी की कृपा कहे या गृह जिला होना का फायदा नालंदा सबमे अव्वल हैं। इधर हाल में ही टाइम्स ऑफ़ इंडिया में एक खबर छपी की महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार दो जिलो में आल विमेन कोपरेटिव बेंक खोल रही हैं, खास बात यह की इसमें से भी एक जिला नालंदा हैं। इस मौके पर एक पत्रकार ने सहकारी मत्री रामाधार सिंह से सवाल किया की इस बार भी नालंदा ही क्यों तो मंत्री जी गोलमोल जवाब देकर चुप हो गए। बोलते भी क्या सुशासन का डंडा जो हैं।

सम्बंधित खबर -: नालंदा मे बना देल जाएत हवाई अड्डा


सच पूछिये तो कोई आश्चर्य नहीं हुआ इस बात से आये दिन आखबार के पन्नो पर यह खबर दिखने को मिल जाती हैं। मुख्यमंत्री के गृह जिला होने का फायदा इस जिले को इतना मिल रहा हैं की आज राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर की सौ से ज्यादा एजेंसी हर क्षेत्र में यहाँ विकास के लिए कार्य कर रही हैं। ऐसा नहीं हैं की नालंदा को यह स्थान लालू और जगन्नाथ के समय में भी मिल रहा था या प्राचीन होने का गौरव यह जिला कांग्रेस के ज़माने में भी ले रहा था, नालंदा में विकास का सफ़र तो नितीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने से शुरू हुआ हैं। आये दिन यह जिला अखबार के सुर्खी का काम करता हैं, चाहे वो हवाई अड्डा के निर्माण प्रस्ताव के लिए हो, या फिर मनरेगा में राष्ट्रीय अवार्ड के लिए, स्वास्थ सेवाओ में लगातार दो सालो तक पहले नंबर पर आने का हो या फिर कृषी के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ने का हो। नालंदा सबमे अव्वल हैं।

वैसे आंकड़ो की यह लम्बी कहानी यूँ ही नहीं बनी हैं। मुख्यमंत्री के गृह जिला होने के कारण मंत्रियो की अनवरत कृपा इस जिले पर बरसती रहती हैं, आपको बता दे की खेती में प्रयुक्त होने वाले पॉवर टिलर पुरे देश में सबसे ज्यादा यही पर हैं जो की पुरे बिहार का ७५% हैं। हरेक संस्था अपने विकास के लिए इसी जिले को चुनती हैं, पूछने पर एक संस्था के प्रतिनिधि ने बताया की मुख्यमंत्री के गृह जिला होने के कारण वो सारी सुविधा मिल जाती हैं जिसकी हमें जरुरत होती हैं।

सवाल ये नहीं हैं की नालंदा में विकास क्यों हो रहा हैं, सवाल ये हैं की ये भेदभाव क्यों हो रहा हैं। दरभंगा में हवाई अड्डा रहते हुए भी आई आई टी नहीं बना कहा गया हवाई संपर्क नहीं हैं, मोतिहारी में छोटे रनवे का बहाना बनाकर विश्वविध्यालय नहीं खुला, लेकिन नालंदा में विश्वविद्यालय के लिए हवाई अड्डा बना देना कुछ हज़म नहीं हुआ। एक तरफ कोशी क्षेत्र को हरेक साल बाढ़ की विभीषिका का सामना करना पड़ता हैं और नदी जोड़ो परियोजना की तरफ सरकार का कोई ध्यान नहीं हैं।  कोशी क्षेत्र की एकमात्र लाइफलाइन डुमरी पुल क्षतिग्रस्त हैं और सरकार चैन की नींद सो रही हैं, नालंदा को मॉडल जिला बनाया जा रहा हैं और एतिहासिक दरभंगा को नाकारा जा रहा हैं। क्यों ? क्या बिहार का मतलब सिर्फ नालंदा हैं या नितीश सिर्फ नालंदा जिले के मुख्यमंत्री हैं।

मेरी यह रचना मैथिली के प्रसिद्ध न्यूज़ पोर्टल इसमाद पर भी छाप चुकी हैं पढने के लिए यहाँ क्लिक करे - नीतीश जी अहां बिहारक मुख्‍यमंत्री छी

Saturday, July 7, 2012

अच्छा लगता हैं…

अच्छा लगता हैं
जब लोग कहते हैं
ये बुद्ध की धरती हैं
जिसने सिखाया दुनिया को
अहिंसा का पाठ

अच्छा लगता हैं जब
लोग कहते हैं
यही हुए थे गुरु गोविन्द
जिसने सिखाया अपने
बाजुओ पर भरोसा करना

अच्छा लगता हैं जब
लोग कहते हैं
यही हुई थी सीता
जो थी जगतजननी
वैदेही और जानकी भी

अच्छा लगता हैं
जब लोग कहते हैं
यही हुई थे भगवान् महावीर
जो बने जैनों के चौबीसवे तीर्थकर

अच्छा लगता हैं
जब लोग कहते हैं
यही हुए थे हज़रत मखदूम, बदरुद्दीन और सफरुल
जिनकी रहमत सबको प्यारी थी

अच्छा लगता हैं जब
लोग कहते हैं
ये बिहार हैं
जो सभी धर्मो का सार हैं