Saturday, July 7, 2012

अच्छा लगता हैं…

अच्छा लगता हैं
जब लोग कहते हैं
ये बुद्ध की धरती हैं
जिसने सिखाया दुनिया को
अहिंसा का पाठ

अच्छा लगता हैं जब
लोग कहते हैं
यही हुए थे गुरु गोविन्द
जिसने सिखाया अपने
बाजुओ पर भरोसा करना

अच्छा लगता हैं जब
लोग कहते हैं
यही हुई थी सीता
जो थी जगतजननी
वैदेही और जानकी भी

अच्छा लगता हैं
जब लोग कहते हैं
यही हुई थे भगवान् महावीर
जो बने जैनों के चौबीसवे तीर्थकर

अच्छा लगता हैं
जब लोग कहते हैं
यही हुए थे हज़रत मखदूम, बदरुद्दीन और सफरुल
जिनकी रहमत सबको प्यारी थी

अच्छा लगता हैं जब
लोग कहते हैं
ये बिहार हैं
जो सभी धर्मो का सार हैं

Thursday, June 21, 2012

धुल खा रही तालाब सोंद्र्यीकरण की योजना

दरभंगा - एतिहासिक हराही तालाब को आकर्षक पर्यटक स्थल बनाने की परियोजना सरकारी कार्यालयों में धुल खा रही हैं। सोंद्र्यीकरण के लिए राज्य के पर्यटन मंत्रालय ने तालाब को एक आकर्षक पर्यटक स्थल बनाने का निर्णय लिया था जिसे लिए प्रथम चरण में विभाग ने २३ लाख रूपये आवंटित किये थे।
इस पैसो से विभाग ने प्रथम चरण में कुछ काम भी किये जैसे तालाब के पश्चिमी किनारों पर सीढ़ी और घाट का निर्माण ताकि लोगो आसानी से नहा सके। संग ही कुछ पेड़ पौधों भी लगाये, जो सही रख रखाव के ना होने के वजह से दम तोड़ रही हैं।
जबकि के काम पुरे तालाब के सोंद्र्यीकरण के लिए काफी नहीं हैं, राज्य सरकार ने कोई अतिरिक्त धन इस योजना के लिए आवंटित नहीं किये जिसके परिणामस्वरूप अक्टूबर २०१० से ही इसका कार्य रुका पड़ा हैं। सरकारी सूत्रों के अनुसार प्रथम चरण में दिए गए फंड का सही इस्तेमाल नहीं किया गया जिस कारण से इसके अतिरिक्त फंड को रोक कर रखा गया हैं।
जिले के वर्तमान जिला अधीक्षक संतोष कुमार मल ने अपने पहले प्रेस कांफ्रेंस में कहा था की हराही तालाब को शहर का सबसे आकर्षक पर्यटक स्थल बनाया जाएगा। साथ ही यहाँ मोटरबोट की भी सुविधा दी जाएगी ताकि पर्यटक बोटिंग का आनंद ले सके। उन्होंने कहा था की तालाब के बीचो-बीच लकड़ी का के घर बनाया जाएगा ताकि पर्यटक को अपने घर के आस पास जल विहार जैसा आनंद मिल सके। शुरू शुरू में इस योजना को लोगो ने बहुत सराहा था और हर जगह इसकी प्रशंसा भी हुई थी लेकिन तेरह महीने बाद भी ये परियोजना ठंढे बस्ते में पड़ी हुई हैं।
ज्ञात हो की हराही दरभंगा के तीन बड़े तालाबो में से हैं दुसरे और तीसरे नंबर पर दिगी और गंगा सागर तालाब हैं। ललित नारायण मिश्रा जब रेल मंत्री थे तब उन्होंने एक सपना देखा था की इन तीनो तालाबो का भूमिगत मिलान हो जो पर्यटन और बोटिंग के लिए आकर्षक का केंद्र हो।
केंद्र सरकार ने इस बाबत जिला प्रशासन को एक पत्र भी लिखा था की इस परियोजना का एक प्रारूप तैयार कर केंद्र सरकार के पास अनुमोदन के लिए भेजे, लेकिन जिला प्रशाशन के आलसीपन और ललित बाबू की आसमयिक मृत्यु के बाद ये योजना भी ठंढे बस्ते में चली गयी।
हराही तालाब का निर्माण १९३४ में आयें भूकंप के बाद रेलवे स्टेशन के पश्चिम में बसे लोगो की पानी के जरुरत के लिए तात्कालिक दरभंगा महाराज ने किया था। लेकिन आज की तारीख में ये तालाब लोगो के नालो का निकास बनकर रह गया हैं। लोग ना इसका सिर्फ गलत इस्तेमाल कर रहे हैं बल्कि इस अनावश्यक रूप से गन्दा भी कर रहे हैं।
आज हराही तालाब को एक भागीरथी प्रयास की जरूरत हैं ताकि इसका पुनरुत्थान हो सके, जरुरत हैं इसके विकास की ताकि ललित बाबु ने जो सपना देखा था वो साकार हो सके हैं, और इसके लिए हमें किसी जिला प्रशासन, राज्य सरकार या केंद्र सरकार की जरुरुत नहीं बल्कि खुद आगे आना होगा ताकि हमारा दरभंगा फिर से उसी तरह हो सके जिस उचाई पर यह था


Tuesday, May 15, 2012

अब बिहार में बहार हैं, काम की किसे परवाह हैं

नालंदा विश्व विद्यालय को दिल्ली ले जाने की आशंका पर अंतरजाल और ब्लॉग जगत पर कई सारे आलेख आये हैं, के के सिंह के और इसमाद ने भी इस खबर को प्रमुखता से स्थान दिया की क्या अब मोतिहारी के बाद नालंदा का नंबर तो नहीं, इसमाद के इस खबर के साथ ही अंतरजाल और इसमाद पर संदेशो की बाढ़ आ गयी, अंतरजाल पर आये कुछ प्रमुख संदेशो को हम यहाँ सीधे-सीधे चस्पा कर रहे हैं ( मोडरेटर).
सम्बंधित खबर - त कि मोतिहारी क बाद नालंदा
                           नालंदा कए दिल्‍ली ल जेबाक मामला स अंतरजाल आओर ब्लॉग जगत मे उबाल

 
ज्ञानेश्वर वात्स्यायन ने लिखा -  नीतीश को भी 'तवज्‍जो' नहीं देती गोपा सब्‍बरवाल, ईश्‍वर ही जानता है नालंदा अंतर्राष्‍ट्रीय विश्‍वविद्यालय का भविष्‍य । वैसे बिहार के वरिष्‍ठ पत्रकार के के सिंह साहब ने अगले वर्ष से शैक्षिक सत्र के शुरु होने की आस जगाई है । लेकिन कहां और कैसे शुरु होगा यह सत्र,कह पाना नामुमकिन है । विवादों में रहीं यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर गोपा सब्‍बरवाल को बिहार आने की फुर्सत ही नहीं मिलती । शायद राजगीर में 'फाइव स्‍टार' की सुविधाओं का इंतजार हो । मैंने दो दिनों पहले इस यूनिवर्सिटी की वेबसाइट www.nalandauniv.edu.in देखी थी । महीनों पहले बनी होगी,यह आप भी देखेंगे,तो पता चलेगा । यहां एपीजे कलाम के बिहार विधान सभा में दिये गये भाषण से लेकर अमर्त्‍य सेन और गोपा सब्‍बरवाल के विचार को भी देख-पढ़ सकते हैं । नीतीश कुमार का भी पेज बना है,लेकिन आप इसे जैसे ही क्लिक करेंगे,संदेश मिलेगा- we are in the process of updating the site....। इसके दो ही अर्थ निकलते हैं, यूनिवर्सिटी को 450 एकड़ भूमि उपलब्‍ध कराने वाले नीतीश कुमार ने या तो अपना संदेश नहीं दिया अथवा उनके संदेश को अपलोड करने लायक अब तक नहीं समझा गया । सच ज्‍यादा बेहतर मैडम सब्‍बरवाल ही जानती होंगी । आपकी जानकारी के लिए मैडम सब्‍बरवाल का पगार मासिक पांच लाख रुपये से अधिक है । यह पगार देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित जेएनयू के वाइस चांसलर से भी अधिक व दिल्‍ली यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर से दोगुणी है । अक्‍तूबर,2010 से ही मैडम यह पगार पा रहीं हैं । पगार को 'टैक्‍स फ्री' कराने की कवायद भी हुई । इतने बड़े पगार के बदले मैडम ने अब तक क्‍या उपलब्धि हासिल की,यह भी बहस का मुद्दा है । और तो और मैडम ने करीबी डा. अंजना शर्मा को पिछले वर्ष 3.30 लाख के वेतन पर ओएसडी नियुक्‍त कराया । यूनिवर्सिटी की गवर्निंग बोर्ड की बैठकों पर अब तक देश-विदेश में करीब तीन करोड़ रुपये फूंके जा चुके हैं । वैसे इन बैठकों की अहमियत पर एतराज नहीं है,लेकिन स्‍थान पर तो सवाल उठेंगे । मैडम सब्‍बरवाल भले जो कुछ कहें,सच तो यही है कि वेबसाइट पर भी उनके दिल्‍ली के आरके पुरम स्थित किराये के दफ्तर का ही महत्‍व दिखता है,राजगीर का नहीं । मैंने शुक्रवार को उनके राजगीर कार्यालय में कुछ जानकारियों के लिए फोन किया था,लेकिन वह रिसीव ही नहीं हुआ । नंबर था-2255330 . मैडम अब तक राजगीर कितने दफे आईं,यह भी जानने की इच्‍छा थी । बहरहाल,कुछ प्रश्‍न हैं,जिनका जवाब आरटीआई के माध्‍यम से यूनिवर्सिटी के मुख्‍य लोक सूचना अधिकारी एस के शर्मा से जानने की कोशिश कर रहा हूं । आज के लिए बस इतना ही...
 
कुमुद सिंह - मूर्तियां कहीं भी कितनी भी विशाल स्‍थापित कर दिया जाए, वो समाधि का स्‍थान नहीं ले सकती। नालंदा नालंदा ही रहेगा पालम इस जन्‍म में नालंदा नहीं बन सकता। वैसे दिल्‍ली का भूगोल पहले ही विदेशियों को भ्रमित कर रही है। जनकपुरी से वैशाली तक सफर एक घंटे का हो चुका है। अब मनमोहन नालंदा भी दिल्‍ली में ही चाहती हैं। लेकिन वो ये नहीं जानते हैं हथेली काट लेने से भाग्‍य की रेखाएं नहीं बदलती।

अतुलेश्वर झा -  हमारे हिसाब से मुख्यमंत्री नितीश कुमार गप्प जयादा हांकते हैं, कारन जितना वो बोलते हैं उसका एक अंश भी नहीं करते हैं। देखिये नए बिहार का निर्माण करते करते वो पुराने बिहार की अस्मिता भी नहीं बचा पा रहे हैं। इसमें गलती हम जनता जनार्दन की ही हैं, हम किसी को भी तुरंत ही भगवान् मान लेते हैं, ये उसी का प्रतिफल हैं

इश्वर चन्द्र - जनाब, अब बिहार में बहार हैं, काम की किसे परवाह हैं.




आशीष झा - भैया जिसके सिर पर प्रधानमंत्री का हाथ हो, वो नीतीश को क्‍या भाव देगी। जहां तक केके सर का सवाल है तो इस मसले पर उन्‍हें लगातार पढ रहा हूं। हमें तो लगता है कि इस विश्‍वविद्यालय का पहला स्‍कूल कागज पर तो बिहार मे लेकिन व्‍यावहारिक रूप से दिल्‍ली के पालम में ही खुलेगा।


कृष्ण कुमार सिंह - जिस दिन से , पूर्व राष्ट्रपति डॉ A PJ , जिन्होंने ऐतिहासिक नालंदा विश्विद्यालय के विनाश पर नालंदा विश्विद्यालय के पुनर्निर्माण का विचार रखा, उस दिन उन्हें विश्वविद्यालय से अलग कर दिया गया जिससे इसकी पुनर्निर्माण की अनिश्चितता उजागर हुई  जी बी युनिवर्सिटी के चेयरमेन प्रो अमर्त्य सेन के मनमानी व अड़ियल रवैये से असहमत होने के कारन डॉ कलाम को युनिवर्सिटी से अलग कर दिया गया, प्रोफेसर सेन की ज्यादा रूचि युनिवर्सिटी के ज्ञान व सिक्षा के दलाली में हैं, जिसके कारण दिल्ली युनिवर्सिटी के एक जूनियर रीडर रैंक के शिक्षक को युनिवर्सिटी में अत्यधिक वेतन पर वीसी के रूप में मनोनीत किया गया, जिससे देश के शिक्षा जगत में हाय तौबा मची हैं, जिसके लिए अमर्त्य सेन में बिहार व बिहारियों को तथा साथ ही साथ देश के तमाम शिक्षाविदो को जमकर भला बुरा कहा केवल उनके अहंकार और केंद्र सरकार के हाथ पर हाथ धरे बैठे होने के कारण इस महत्वकांक्षी विश्वविद्यालय के स्थापना के राह में बाधा आ रही हैं. इस विवादस्पद चयन का मामला यूनियन एक्सटर्नल अफेयर मंत्री इ अहमद ने राज्यसभा में उजागर किया की प्रोफेसर ने किस प्रकार वीसी पद के लिए गोपा का चयन किया. युनियन एक्सटर्नल अफेयर जो की नालंदा युनिवर्सिटी के ग्रन्थ सम्बन्धी मामलो से भी जुड़े हैं, के द्वारा अभी तक इस मामले पर कोई स्पष्टिकरण नहीं दिया गया हैं


Saturday, May 12, 2012

विशेष राज्य की मांग और विकल्प

बिहार के विशेष राज्य के दर्जे की मांग खारिज हो चुकी हैं, होना भी चाहिए आखिर कार केंद्र सरकार ११ राज्यों को पहले से यह दर्जा देकर त्रस्त हैं, अब एक और राज्य को यह दर्जा देकर अपने ऊपर बोझ नहीं बनाना चाहती थी। वैसे भी केंद्र सरकार की नज़र में बिहार एक बोझ ही हैं जो विकास के दर में तो पिछड़ा हैं ही, गाहे बगाहे विशेष राज्य की मांग उठाकर केंद्र सरकार के लिए सरदर्द अलग से बना हुआ हैं
वैसे केंद्र ने जिन तीन कारणों के कारणों बिहार को को इस सूचि से अलग कर दिया उस पर एक बार फिर से गौर फरमाने की जरुरत हैं


क्या हैं विशेष राज्य के दर्जे की मांग -:
१) पर्वतीय और दुर्गम भू-भाग
२) कम जनसँख्या घनत्व या बड़ी संख्या में जनजातीय आबादी
३) सामरिक रूप से पडोसी देशो से लगी सीमाओं पर अवस्थिति
४) आर्थिक और ढांचागत पिछड़ापन
५) वित्तीय संसाधनों का आभाव


केंद्र सरकार ने जिन तीन कारणों को बताया हैं उसके अनुसार हमारे पास दुर्गम और पर्वतीय भू भाग नहीं हैं ; माना की हमारे पास दुर्गम और पर्वतीय भू भाग नहीं हैं, लेकिन उनका क्या जो बाढ़ की चपेट में हरेक साल अपने परिवार में से एक को खो देता हैं
। उनका क्या जो मेहनत से उगाई फसल को उस जल-प्लावन में स्वाहा होते देखता हैं
केंद्र सरकार ने यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया की बिहार के पास वित्तीय संसाधनों की कमी नहीं हैं, और ये भी सच हैं की ग्यारहवी पंचवर्षीय योजना के बाद राज्य की वित्तीय अर्थव्यवस्था सुधरी हुई हैं
, लेकिन क्या केंद्र ने उस अर्थ-व्यवस्था पर एक बार भी नज़र नहीं दौड़ाया जो हरेक साल भुखमरी और कुपोषण का शिकार हो रही हैं
हमारे पास जनसँख्या घनत्व भी कम नहीं हैं और ना ही ये जनजातीय बहुत इलाका हैं, लेकिन उन्हें इस भारी जनसँख्या के बीच खड़े वो भूखे नौनिहाल नज़र नहीं आते हैं जो आज भी आस लगाये हैं की उनके पापा सुदूर प्रदेश से कमाकर उनके लिए मुट्ठी भर अनाज का इंतजाम कर सके, उन्हें वो गरीब किसान नज़र नहीं आता जो अपनी खड़ी फसल सिर्फ इसलिए नहीं काट पाता की उसके पास संसाधनों का आभाव हैं, वो पलायन के शिकार लोग नज़र नहीं आते जो आज भी दिल्ली, मुंबई में बिहारीपन के शिकार हो रहे हैं, जिन्हें आज भी सिर्फ इसलिए पीटा जाता हैं की क्योंकि वो बिहारी हैं और अप्रवाशी हैं

वैसे केंद्र सरकार ने ने यह यह पता लगाने के लिए की बिहार को विशेष राज्य का दर्जा क्यों दिया जाय,  एक अच्छी खासी रकम खर्च की और एक अंतरमंत्रालयी समूह का गठन किया, इस समूह ने अपनी आठ महीनो की मशक्कत के बाद केंद्र को जो रिपोर्ट दी वो कुछ यूँ था " विकाश के मामले में बिहार काफी पिछड़ा हैं, बिहार का मानव विकाश सूचकांक निन्म्तम में से एक हैं
।.......  ढांचागत सुविधाओं खासकर बिजली और, सडको का आभाव, बिहार के विकाश में, खासकर निजी निवेश के अनुकूल माहौल बनाने में बाधक हैं।" इन सबके बावजूद केंद्र सरकार ने इस मांग को एक सिरे से ख़ारिज कर दिया, उनके अनुसार अगर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिया तो झारखण्ड, उड़ीसा और राजस्थान जैसे राज्यों से भी यह मांग उठने लगेगी। इन सबको देखने के बाद तो ऐसा लगता हैं की बिहार को विशेष राज्य का दर्जा सिर्फ इसके पूरक कारको की वजह से नहीं मिला बल्कि कही न कही ये वजह भी केंद्र सरकार को सता रही थी की और राज्य भी मांग ना उठाने लगे, वैसे केंद्र सरकार के इस फैसले ने शायद उनका मुंह भी अपरोक्ष रूप से बंद कर दिया हैं
आजादी के बाद से ही गुजरात, महाराष्ट्र जैसे समृद्ध राज्यों के मुकाबले बिहार को कम संसाधन मिलता आ रहा हैं, और हमारा पिछड़ा होने का मुख्या कारण ये भी हैं, अच्छा तो यह हो की किसी राज्य को विशेष रियायत की जरुरत ही ना पड़े और अगर हो तो उसमे भेदभाव ही ना हो

मेरा कहना ये नहीं है की बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दो, ना ही ये कहना हैं की बिना विशेष राज्य का दर्जा मिले बिहार में विकाश होगा ही नहीं, मेरा तो बस ये कहना ही की विकल्पों को तो नज़रअंदाज मत करो
। केंद्र के बिहार के विशेष राज्य के दर्जे की मांग को ख़ारिज करना उतना आपत्तिजनक नहीं लगा जितना की उसके लिए कोई विकल्प ना सुझाना। वैसे योजना आयोग और वित्त मंत्रालय की सयुंक्त समिति ने ये सिफारिश भी की हैं की इन्हें विशेष राज्य का दर्जा मत दो लेकिन अतिरिक्त केंद्रीय सहायता तो मिलनी ही चाहिए, लेकिन केंद्र ने इस और भी कोई ध्यान नहीं दिया जो की बड़ा ही दुखद है

Wednesday, May 2, 2012

क्या विलुप्त हो जाएगी "मैथिली"

सुनने में अजीब सा लगे और शायद थोडा बुरा भी, लेकिन भारतीय जन भाषाई सर्वेक्षण की पहली रिपोर्ट से तो कुछ ऐसा ही लगता हैं। करीब तीन सौ से भी अधिक भारतीय भाषा या तो दम तोड़ चुकी हैं या भाषाविदो के आईसीयु में पड़े अपनी अंतिम साँस गिन रही हैं। ना ही मिडिया का ध्यान इस और जा रहा हैं ना ही पश्चिमी सभ्यता के रंग में रंगी युवाओ का। भाषा मानव संचार का मूल आधार हैं, लेकिन फिर भी इस और इस तरह की निर्मोही दृष्टि से ऐसा लगता हैं जैसे 2150 से भी ज्यादा समृद्ध भाषाई क्षेत्र वाले इस देश में इसका कोई महत्व ही ना हो।
कोई ८० वर्ष पहले भारत का पहला भाषाई सर्वेक्षण हुआ था वो भी अंग्रेज अधिकारी जोर्ज ग्रियर्सन की अगुवाई में, जिसके अनुसार मैथिली बिहार और अब के झारखण्ड के कुछ हिस्सों में प्रमुखता से बोली जाने वाली भाषा हैं। जो की अब मानवी स्वार्थ और राजनैतिक कलह के कारण विभिन्न भाषा (जो की क्षेत्र विशेष के आधार पर विकसित हो रही हैं) में बटती जा रही हैं। एक अखंड मैथिली टूट-टूट कर अंगिका, बज्जिका और ना जाने क्या क्या बन गयी हैं। वैसे ग्रियर्सन के बाद इस भाषा की सुध लेने वाला कोई नहीं बचा, कुछ खड़े भी हुए तो राजनैतिक आस्थिरता और कलह के कारण आपस में लड़-लड़ कर कर रह गए। अब करीब आठ दशक बाद भारतीय जन भाषाई सर्वेक्षण ( पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ़ इंडिया) ने उस पर थोडा काम किया हैं और छह खंडो में अपनी पहली रिपोर्ट प्रकाशित की हैं, जो की भारतीय भाषा के कुछ अनछुए पहलु को उजागर करती हैं। सर्वे की अध्यक्ष गणेश देवी के अनुसार भारत की कोई २० प्रतिशत भाषा विलुप्त हो चुकी हैं।अभी तक सिर्फ ग्यारह राज्यों में हुए सर्वेक्षण का यह अधुरा रिपोर्ट बताता हैं की करीब ३१० से ज्यादा भाषा विलुप्त हो चुकी हैं और छह सौ से ज्यदा भाषा अपनी अंतिम पड़ाव में हैं। यह सब देख सुन कर लगता हैं की कहीं अगला नंबर अपना तो नहीं? अटल जी के अथक प्रयासों के फलस्वरूप मैथिली सविंधान में आठवी अनुसूची में जगह पाने में कामयाब तो हो गया लेकिन बहुभाषी संस्कृति के चक्कर में पद कर हम इस भाषा से दूर तो नहीं जा रहे हैं।
जनगणना के अनुसार भी भारतीय भाषा का ग्राफ देखे तो वो भी कम चौकाने वाले नहीं हैं, १९६१ की जनसँख्या के अनुसार १६५२ मातृभाषाए दर्ज की गयी थी जो की १९७१ के जनगणना तक सिर्फ १०९ रह गयी जो की बेहद शर्मनाक हैं। अकेले बिहार और झारखण्ड के वो क्षेत्र जिसे मैथिलो का गढ़ कहा जाता हैं ने अपनी मातृभाषा हिंदी दर्ज करा रखी हैं जबकि उस सूचि से गायब ही हो गयी हैं। हमारे बीच भाषाई अंतराल इतना बढ़ गया हैं की हम किसी भी भाषा ( यहाँ तक की अपनी मातृभाषा) का एक भी वाक्य पूरा-पूरा और सुद्ध-सुद्ध लिख बोल या पढ़ नहीं सकते।
भाषा के सम्बन्ध में मिल रही लगातार चौकाने वाली जानकारी कही ये चेतावनी तो नहीं दे रही की अलग नंबर हमरा हैं। क्या मैथिली भी इतिहास बनकर रह जाएगी, कही ऐसा तो नहीं की मैथिली के बारे भी ऐसा कहा जाए की ये कभी अस्त्तिव, चर्चा और चलन में मौजूद थी ! जरा सोचिये.....?
                        "मैथिल भए क जे नै बजय ये मैथिली"
                   " मोन होए अछि हुनकर कान पकड़ी ऐठ ली"
मेरी ये रचना मैथिली के प्रसिद्ध वेबसाईट इसमाद पर भी प्रकशित हो चुकी हैं देखने के लिए यहाँ क्लिक कर -:

की विलुप्त भ जाएत “मैथिली”

Friday, April 27, 2012

मेघ पानी अभियान से होगा बाढ़ का मुकाबला

बिहार के पाँच बाढ़ से तबाह शहरो के पच्चीस पंचायतो के ऊपर एक नया शोध जारी हैं, जो लोगो को उनके ज्ञान व उपलब्ध श्रोतो की मदद से एक नए जीवन शैली अपनाने  में मदद करेगी,  ये साल दर साल होने वाले वर्षा में कमी के कारन होने वाले नुक्सान में भी राहत पहुंचाएगी
मेघ पानी अभियान नाम की एक योजना चलाई जा रही हैं, जिसके अंतर्गत उत्तरी बिहार के पाँच शहरो सुपौल, सहरसा, खगड़िया, मधुबनी व् पश्चिमी चंपारण में आने वाले पच्चीस ग्रामीण इलाको में जल से सम्बंधित मुद्दों को गहराई से समझने का प्रयास हो रहा हैं।
इस परियोजना का मूल उदेश्य हैं सालो भर सुरक्षित पेय जल उपलब्ध करवाना खास कर बाढ़ के समय में, स्वास्थ संबंधी सुविधा उपलब्ध करना तथा कृषि के तरीको में बदलाव लाना, ताकि यहाँ के लोग भोजन व स्वस्थ जीवन शैली के लिए आत्मनिर्भर हो सके।
MPA (मेघ पानी अभियान) कार्यकर्ता एकलव्य प्रसाद ने इन मूलभूत बातो पर बल दिया हैं, सभी पंचयातो में लगभग बीस जगहों पर, वर्षा के जल से सिचाई के महत्वो का प्रदर्शन किया गया तथा इसके अलावे जल से सम्बंधित स्वास्थ, आर्थिक, व सामाजिक समस्याओं का विश्लेषण किया गया। चुकी यहाँ के लोगो ने जल को कभी इन समस्याओं का आधार नहीं माना हैं इसलिए MPA ने जल की जांच कराकर विभिन्न प्रकार के दूषित जलो व उनके दुष्प्रभावो से लोगो को अवगत कराया।
MPA ने जल संचय के अन्य विकल्पों की व्यवस्था की जिन्हें 'जल कोठी' नाम दिया गया, पाँचो शहरो ने अपनी आवश्यकता और क्षमता के मुताबिक़ जल कोठी का विकाश किया, प्रसाद जी ने कहा की इन पाँच शहरो में अब तक दू सो पचास अर्ध स्थायी तथा लगभग आठ सो अस्थायी वर्षा जल संचय सयंत्र स्थापित किये जा चुके हैं, जो बाढ़ के पानी से सुरक्षित होगा। प्रत्येक जल कोठी के निर्माण में करीब आठ सो सडसठ रूपये लगे हैं। जल में उपस्थित आयरन की अत्यधिकता को कम करने के लिए सुपौल में उपयोग किये जाने वाले दो 'मटकों वाले फ़िल्टर' के प्रारूप का इस्तेमाल किया हैं साथ ही साथ मटके को जल में उपस्थित अन्य गंदगी को छानने के लिए विकशित किया गया, अब तक ऐसे दो सो पच्चीस मटका फ़िल्टर लागए जा चुके हैं, जिनसे करीब ३५ हज़ार लोग लाभान्वित हो रहे हैं।

बाढ़ के कारण होने वाले नुक्सान को देखते हुए MPA ने ग्रीष्मकालीन धान की खेती का विकास किया इसके लिए सुरुवात में ३६ किसानो के समूह के द्वारा, जहाँ औसतन ७०-९० किग्रा प्रति कट्ठा उपज होती थी वहीँ MPA ने १२०-२०० किग्रा प्रति कट्ठे की पैदावार की, MPA के अभियान ने लोगो में बाढ़ के कारण होने वाले भोजन की कमी व गरीबी से निजात दिलाने में मदद की हैं।

Tuesday, April 3, 2012

तो भला अच्छा क्यों ना लगे...

जहाँ पलायन अभिशाप बना हो और बिहारी शब्द गाली बनकर रह गया हो वहीँ कोई नवीन चन्द्र गुलाम और कमला प्रसाद बिसेसर विदेश में प्रधानमंत्री के पद पर आ जाए.

जब पॉप और रैप में सारी दुनिया डूबी हो और धूम धड़ाका संगीत की पहचान हो गयी हो वही कोई विदुर मल्लिक ध्रुपद के क्षेत्र में पुरे विश्व में झंडे गाड़ दे और अगले ६० वर्षो तक उसका परिवार यह झंडा गिरने ना दे.
जब आधे से ज्यादा औरत अपने आँगन की दहलीज को पार ना कर सकी हो और औरत आज भी सिर्फ लाज का प्रतिरूप बनकर रह गयी हो, वहीँ कोई अरुणा मिश्रा विश्व विमेन बोक्सिंग चैम्पियनशीप में एक झटके से स्वर्ण पदक ले आये.

जहाँ आधा से ज्यादा बच्चे स्कूल का मुंह तक ना देख सके हो और ४३% से ज्यादा लोग पहली कक्षा में ही स्कूल ड्रॉपआउट कर दे और वहीँ कोई संजय झा और सतीश झा सीईओ के पद पर विराजमान हो जाए.
जब तीन चौथाई से भी ज्यादा हिस्सा हरेक साल बाढ़ और सूखे की चपेट में आता हो वही कोई युवा किसान सुमंत एक हेक्टेयर में २५४ क्विंटल धान उत्पादन करके चीनी वैज्ञानिक युआन लोंगपिंग को भी पीछे छोड़ दे.

जब क्रिकेट किट के लिए पैसे ना हो और ताड़ के डंडे से बैटिंग करके कोई कीर्ति आजाद, सौरभ तिवारी और कविता राय  विश्व क्रिकेट में झंडे गाड़ दे.


जब
इंजीनयिरिंग में एडमिशन सिर्फ पैसे वालों हक़ बन जाए और कोई आनंद गरीबो के लिए इसे सुलभ बना दे.

जब राजनीति सिर्फ सियासी गलियारों की गुलाम बनकर रह जाए और विकाश सिर्फ नेताओं की जेब तक दिखे वहीँ कोई इंजिनियर मुख्यमंत्री बनकर विकाश पुरुष बन जाए


तो भला अच्छा क्यों ना लगे...











यूँ तो लिखने के लिए बहुत कुछ हैं लेकिन छोटी सी बात में अगर सब कुछ कह जाए तो भला अच्छा क्यों ना लगे

Sunday, April 1, 2012

ऐसा क्यों होता हैं?

ऐसा क्यों होता हैं? क्यों हो जाते है लोग उत्तेजित छोटी सी बात पर ? समझ में नहीं आता???  कभी लगता है मेरे में कुछ खामिया है, कभी लगता है सामने वाला जाहिल है। आखिर क्यों नहीं कोई समझ पाता मेरी भावनाओं को, क्यों उन्हें लगता है की वो जो कर रहा हैं वो ही सहीं है और पूरी दुनिया गलत...? क्यों लोग समझते है की दुसरो का ज्ञान बहुत अल्प है मेरे ज्ञान के आगे ? क्यों ऐसा होता है की दुनिया मानिनी बनी हुई है? क्यों हम कभी दुसरो को समझ नहीं पाते ? ऐसे कुछ ढेर सारे सवाल आज मन में कूद रहे हैं, रविवार होने के वाबजूद कार्यालय आया हूँ क्या करू निजी दफ्तरों में कुछ ऐसा ही हाल हैं अभी भारत में। आप गुलाम होते है और मालिक जमींदार कभी भी उनके पेट में ऐठन हुई और आप हुकुम बजाने सामने आ जाओ... कुछ ऐसा ही आज भी हुआ, सॉफ्टवेर की टेस्टिंग थी ऑफिस आना पड़ा, सोचा चलो घर में पड़े पड़े बोर हो रहे हैं तो ऑफिस में दिन अच्छा गुजर जाएगा, लेकिन यहाँ आकर लगा बेकार ही आ गया हूँ, वो आज फिर ऑफिस में टकरा गया, हालाँकि हमारी बातचीत कम ही होती है लेकिन जब भी होती है कुछ नोक-झोंक वाली ही होती हैं, उसे अपने आप पर गर्व है और मुझे खुद पर.... हो भी क्यों ना हम किसी से कम थोड़े ही हैं, बिहारी होने का जो तमगा सर पे लगा है उसे शायद कुछ हद तक धोने में कामयाब हो गया हूँ, अब लोग समझने लगे है की बिहार किसी से कम नहीं होते कुछ ज्यादा ही होते हैं, लेकिन फिर भी वो अधूरापन और वो खालीपन आज भी मुझे खलता है जब लोग किसी मजदूर बिहारियों को दिखा हमरा मजाक उड़ाते हैं। पता नहीं लोगो को नीचा दिखाने में क्या मिलता है, किस सुख की अनुभूति होती है उन्हें ऐसा करने में, क्या मिलता है उन्हें इस तरह किसी का मजाक उड़ने में लेकिन...। आज फिर एक बार उसने मुझे निचा दिखाने की कोशिश की मेरी खिल्ली उड़ाने की कोशिश की लेकिन सच कहू तो मुझे बुरा नहीं लगा, मुझे विस्मय हुआ उसकी अज्ञानता पर मुझे दुःख हुआ उसके व्यहार पर और जब मैंने इसे अनतर्मन से सोचा मैं खुद ही सहज हो गया...
लेकिन एक बात है मेरे मन में हमेशा से एक बात टीस बनकर उभरती रहती हैं, दर्द बनकर मुझे कहती रहती हैं क्या ये मेरी गलती थी की मैं बिहार में पैदा हुआ हूँ, क्या ये मेरा दुर्भाग्य है की मैं वहां पैदा लेने के बाद भी दिल्ली में काम कर रहा हूँ....। नहीं ढूंढ़ पाया हूँ आज तक इसका उत्तर, नहीं कर पाया हूँ अपनी जिजीवषा को शांत, सिर्फ इस ख्याल में जिन्दगी जिए जा रहा हूँ की कभी तो होगा मेरा सपना पूरा, कभी तो मिलेगा बिहारियों को सम्मान...


उपरोक्त सारी बातें मेरे साथ घटित हुई हैं, सोचा लिख दूंगा तो मन हल्का हो जाएगा, सोचा कभी आप सबके साथ शेयर कर लू तो कुछ कम होगा दर्द, कही पढ़ा था बाटने से ही दर्द कमता है और ख़ुशी बढती हैं ....

Saturday, March 31, 2012

जहाँ होती है खुशियों की बर्षा वही तो हैं मेरा सोनबरसा...


बहुत दिनों से दिल में टीस थी देश-विदेश से लेकर दुनिया के तमाम मुद्दे और राजनीती पर चर्चा करता आ रहा हूँ लेकिन अपने गाँव के बारे में नहीं लिख पाता था, वो तो मेरी दीदी ने अनुरोध किया तो अपने गाँव पर चन्द शब्द लिख पाया हूँ, आप भी पढ़िए शायद अच्छा लगे, एक ऐसा इतिहास जो आज भी दफ़न हैं....

परिचय
एक ऐसे राजा का गाँव है जो निरकुंश नहीं था, एक दिलवालों का गाँव जो खुशियाँ मानना जानते है, एक ऐसे किसानो का गाँव जिन्हें पता है मिटटी से सोना कैसे उगाया जाता है, एक ऐसे व्यापारियों का गाँव जिन्हें पता है व्यपार पैसों से नहीं दिल से किया जाता है, एक ऐसे युवाओं का गाँव जिन्हें अपना मुकाम खुद तय करना आता है, एक ऐसे नौनिहालों का गाँव जिन्हें सपने को हकीकत में बदलना आता है, एक ऐसी अर्थव्यवस्था का गाँव जिन्हें आज भी मुहताज नहीं होना पड़ता किसी और के दया और भीख की, एक ऐसे प्रसाशन का गाँव जहाँ बिना डंडे के जोर पर कानून चलता है, एक ऐसा गाँव जहाँ साम्प्रदायिकता नाम की कोई चीज़ नहीं है, एक ऐसे नारी शक्ति का गाँव जिन्हें पता है देश बराबरी से चलता है ना की मर्दों से, एक ऐसे इतिहास का गाँव जिन्हें महाभारत काल में भी याद किया गया था. जी हाँ हम बात कर रहे है सोनबरसा राज की, कोशी के कछार पर खड़े अगर किसी गाँव को हँसते हुए देखना चाहते है तो आइये इस गाँव में आपको पता चल जाएगा कैसे बिहार की शोक नदी कहलाने के बावजूद कैसे यहाँ के लोगो ने इसका मुकबला करना सिखा है और किस तरह हसी ख़ुशी से रह रहे हैं।

सोनबरसा राज जैसा की नाम से ही स्पस्ट है, सोनबरसा = सोना ( ख़ुशी) + बरसा (वर्षा) यानी जहाँ खुशियों की वर्षा होती है ऐसा है; ये गाँव. और राज इसलिए क्योंकि ये राजा का गाँव है।

इतिहास -
आरंभ में सोनबरसा राज  क्षेत्र अंगुत्तरप कहलाता था, और उत्तर बिहार प्रसिद्ध वैशाली महाजनपद के सीमा पर स्थित था। अंग देश के शक्ति समाप्त होने के बाद यह मगध साम्राज्यवाद का शिकार हो गया, इसके आस पास के इलाके में मौर्य स्तम्भ मिलने से यह बात प्रमाणित होता है। सोनबरसा राज के सटे बिराटपुर गाँव में खुदाई के दौरान बोध धर्म के कुछ स्मृति चिन्ह मिले है जिससे ये भी कहा जा सकता है की यहाँ बोध धर्मं का भी प्रादुर्भाव रहा होगा। महाभारत के समय पांडव के अज्ञात वास के समय में विराटपुर गाँव का नाम पड़ता है जिससे यह भी साबित होता है की वो इस गाँव से गुजरे होंगे।
 

भौगोलिक स्थिति -

सोनबरसा राज सहरसा जिले का एक प्रमुख गाँव है जिसके उत्तर में सोहा और बिराटपुर, दक्षिण में पररिया, पश्चिम में सुगमा और कोशी नदी और पूरब में देहद गाँव हैं। सोनबरसा राज का कुल क्षेत्रफल ....... इतना है, समूचा गाँव एक समतल उपजाऊ क्षेत्र है, लेकिन जनसँख्या घनत्व होने के कारण इसके कुछ ही हिस्सों में खेती की जाती है, मौसमी फलो जैसे आम, और लीची और अमरुद के संग कही कही केले की खेती भी देखने को मिल जाती है. यहाँ की मिटटी चिकनी और दोमट है जो धान और गेहूं की फसल के उपयुक्त है, यहाँ साल में तीन फसल हो जाती है, कही कही दलहन के बिच, तिलहन फसल उगाने का भी मिल जाता है. हरेक साल बिहार का शोक कही जाने वाली नदी कोशी की विभीषिका से भी इस गाँव को दो चार होना पड़ता है, हरेक साल कोशी की बाद लीला कइयो को लील जाती है. हरेक वर्ष कम से कम १०-१५ लोगो को डूबने से मौत हो जाती है. साथ ही बाढ़ अपने साथ महामारी भी लाती और उचित इलाज़ के आभाव में आज भी यहाँ बच्चे दम तोड़ते दिखाई पड़ जाते है.

प्रमुख नदी -
बिहार का शोक कही जाए वाली कोशी नदी मुख्य रूप से इस गाँव के पश्चिमी छोर से होकर गुजरती है जो इस गाँव को अन्य पडोसी पश्चिमी गांवों के सीमा क्षेत्र का काम करती है. हरेक वर्ष इसकी विभीषिका जान माल के संग अर्थव्यवस्था को भी क्षति पहुंचती है।

जनसँख्या और साक्षरता -
वर्ष २०११ की जनसँख्या के अनुसार इस गाँव की कुल जनसँख्या ९६४५ है जिसमे पुरुष वर्ग की संख्या ५०९६ और महिलाओं की संख्या ४५४९ है।

प्रशासनिक विभाजन -
सोनबरसा राज प्रशासनिक तौर पर भी भरा पूरा है, गाँव में पुलिस थाना, अस्पताल, मवेशियों का अस्पताल, डाकघर, दो मध्य विद्यालय, एक उर्दू मध्य विद्यालय, एक उच्च विद्यालय और एक महाविद्यालय भी है. साथ ही साथ यह सोनबरसा राज गाँव सोनबरसा प्रखंड होने के नाते इसका खुद का प्रखंड मुख्यालय भी है।

शैक्षणिक संस्थान -

सिक्षा में मामले इस गाँव को आप एक मिशाल कह सकते है। आस पास के करीब पंद्रह गांवों का इसे पालनहार कह सकते है। आस पास के करीब १५-२० गांवो में उच्च विद्यालय नहीं होने के कारण यह उन सभी गांवों के सिक्षा का केंद्र बिंदु है. इसकी खासियत यह है की यहाँ शिक्षक ज्ञानी और महान है ही साथ ही साथ उनके पढ़ाने का ढंग भी इस तरह का है विद्यार्थी ज्यादा आकर्षित होते है, एक तरह से आप कह सकते है की आसपास के लगभग १५-२० गांवों के सिक्षा का गढ़ है ये गाँव।
मध्य विद्यालय - ३ ( दो हिंदी मध्य विद्यालय और एक उर्दू मध्य विद्यालय )
उच्च विद्यालय - १ ( आठवी से बारहवी तक की पढाई)
महाविद्यालय -  १ ( बारहवीं और स्नातक की पढाई के लिए )
साथ ही साथ यहाँ तीन चार पब्लिक स्कूल भी है जो शिक्षा के परचम को दूर दूर तक फैला रहा है.
कोंचिंग संस्थानों की भी यहाँ कमी नहीं है जो गुणवत्ता पूर्ण सिक्षा मुहैया करवाते है वो भी कम शुल्को पर. यहाँ के स्कुलो में राष्ट्रीय अनुसंधान, सैक्षानिक परिषद् के द्वारा मान्य पाठ्यक्रम की पढाई होती है, लेकिन कुछ पब्लिक स्कुलो में केंद्रीय माध्यमिक सिक्षा बोर्ड का पाठ्यक्रम भी पढाया जाता है।

पर्यटन स्थल - छोटा गाँव के होने के वाबजूद भी सोनबरसा अपने आप में कई महत्वपूर्ण स्थानों को सिमटे बैठा है जो ऐतिहासिक महत्व तो रखता ही है साथ ही साथ हमें अद्भुत वास्तुकला का नमूना भी दिखता है।

१) राज-विलास  या महाराज परिसर -  प्रकृति के गोद में बसा महाराजाधिराज सर हरिबल्लभ नारायण सिंह का यह महल इतिहास को तो दिखता ही है साथ ही साथ वास्तुकला का बेजोड़ नमूना भी पेश करता है, सरक्षण के आभाव में आज ये किला बर्बादी के कगार पर खड़ा जो इसके लिए बड़ी ही चिंता का विषय है। एक छोटे से गाँव के रजा होने के वाबजूद इन्हें सर की उपाधि से नवाजा गया था ये हमरे लिए गर्व की बात है. इतिहास के बेहतरीन पन्नो पर अंकित ये महल आज अपनी दुर्दशा पर खुद आँशु बहा रहा है. जरूरत है एक भागीरथी प्रयास की जो इसे फिर से संवार सके. महराजा परिसर कोशी नदी के किनारे बसे इस किले की अनुपम छटा देखते ही बनती है, बिना सीमेंट और बालू के सिर्फ खड़िया और कत्थे के बलबूते कड़ी की गयी इस आलिशान महल का सोंदर्य आज भी कुछ कम नहीं है, नक्काशी और आधुनिक वास्तुकला का बेजोड़ नमूना कुल मिलकर कह सकते है आप इसे।
२) उच्च विधालय सोनबरसा - यूँ कहने को तो ये सिक्षा का मंदिर है, लेकिन महाराजाधिराज के कर-कमलो से बना होने कारण ये और भी पूजनीय और दर्शनीय है, इसकी भव्यता और नक्काशी किस भी तरह महल से कम नहीं है, दो  मंजिले इस भवन के निर्माण में वास्तु विशेषज्ञों ने अपना जैसे संपूर्ण ज्ञान लगा दिया हो। पुरे ५००० वर्ग मीटर से भी ज्यादा में फैले इस विद्यालय का खुद का दो दो खेल के मैदान और आधुनिक सुविधाओ से युक्त एक व्ययाम शाला है. इस विद्यालय का गौरव इस लिहाज से भी बढ़ जाता है क्योंकि पुरे बिहार में भागलपुर के बाद सिर्फ यही एक गाँव है जिसमे आधुनिक व्यायाम शाला होने का गौरव प्राप्त है.
३) रानी सती मंदिर -  २०वीं के सदी के प्रारंभ में इस गाँव में प्रवासी माड़वारियो का आगमन हुआ जो आज भी इस गाँव में देखने को मिल जाएंगे में से एक ने इस मंदिर का निर्माण किया. अति भव्य इस मंदिर में माँ रानी सती की प्रतिमा विराजमान है जो स्वेत संगमरमर के मंदिर में विराजमान है, धर्मार्थ के लिए ये मंदिर परिसर रानी सती विद्या मंदिर को दिया गया है जिससे गाँव के बच्चे कम शुल्क में लाभान्वित होते है. रानी सती मंदिर की भव्य छटा इस मंदिर में देखते ही बनती है। प्रातः और सायं काल में प्रार्थना के समय श्रधालुओ की भीड़ मंदिर परिसर में देखते ही बनती है. खास त्योहारों और पर्वो के मौको पर भी यहाँ अच्छी भीड़ जुटती है।
४) धर्म-स्थान - सोनबरसा राज की विसेषता यह भी है की यहाँ मंदिर गली कुचो में ना होकर एक ही जगह सारे मंदिर अवस्थित है, इस मंदिर समूह को धर्म स्थान कहा जाता है. यहाँ विभिन्न देवी-देवताओं की करीब पाँच से ज्यादा मंदिर है जिसमे दुर्गा माँ का प्रांगन कुछ ज्यादा ही विशाल है। नवरात्रों और काली पूजा में प्रमुख रूप से भीड़ जमा होती है और मेले का आयोजन किया जाता है. मंदिर से सटा ही राजाओ के ज़माने के एक पोखर भी है जो इस मंदिर परिसर की महत्ता और भी बढ़ा देती है।
५) मुक्ति-स्थान -  पर्यटन स्थल के रूप में तो नहीं लेकिन इसका जिक्र यहाँ पर इसलिए हो रहा है की जो भी इस गाँव में आता है इस जगह को एक बार देखना जरुर चाहेगा. हिन्दू-मुश्लिम के परस्पर भाई चारे के रूप में विख्यात यह स्थान हिन्दू मुश्लिम के सोह्रद का प्रतिक है, यह संभवतया पहली जगह है जहाँ हिन्दुओ का शमशान और कब्रिस्तान एक जगह है। कोशी नदी के किनारे बसे इस मुक्ति धाम की प्राकृतिक छटा भी देखने को बनती है, इस जगह पर आ कर भी दर का अनुभव नहीं होता अपितु एक अजीब जी सुखद अनुभूति होती है.
६) कोशी का किनारा - कोशी का यह रमणीय किनारा किसी भी मायने में यहाँ के लोगो को गंगा की अनुभूति से कम सुख नहीं देता है, प्रकृति के गोद के बीच गुजरती कोशी की शांत धारा देखते ही बनती है. ऐसा लगता है जैसे स्वर्ग धरती पर उतर आया हो।

Thursday, February 16, 2012

भ्रस्टाचार की रफ़्तार...

गुरुवार को अखबार में लालू की फोटो मुख्य पृष्ठ पर देख नज़र ठहर गयी, चुकी खबर लालू जी की थी और भी मुख्य पृष्ठ पर तो यह सोचकर की खबर बिहार की होगी पढने बैठ गया, जों-जों खबर पढता गया उत्सुकता और आश्चर्य दोनों सावन के मेघ की तरह बढ़ता गया। और खबर के अंत तक जो बात ठीक-ठीक समझ में आई उसको अगर एक शब्द में कहे तो वो था " भ्रस्टाचार की रफ़्तार"।


वैसे खबर पर गौर करे तो वो बिहार के बहुचर्चित घोटाले 'चारा घोटाला' से सम्बंधित था जिसका वृतांत अगर सही सही लिखा जाय तो यह आजाद भारत में भ्रस्टाचार का प्रतिनिधि उदहारण बन सकता है। खबर थी घोटाले में गुरवार को सीबीआई की आदालत में एक आरोप पत्र दाखिल किया गया जिसमे लालू प्रसाद, जगन्नाथ मिश्रा, ध्रुव भगत और उनके कुछ सहियोगियो को इस घोटाले में आरोपी बनाया गया है। वैसे यह आरोप पत्र १९९४-१९९६ के बीच ४६ लाख रूपये के चारे घोटाले का है। यह आरोप पत्र यह भी बताता है की ताकतवर लोगों के लिए भारत में भ्रस्टाचार की गति कितनी तेज है। लगभग १७ साल सिर्फ आरोप पत्र दाखिल होने में लग गए तो कब मुकदमा चलेगा और कब सुनवाई होगी और कब सजा सुनाई जायेगी इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। वैसे भारत की न्याय-व्यवस्था से हर कोई परिचित है, ना तो यहाँ न्यायालयो की कमी है ना ही न्यायाधिशो की। वैसे भी बड़े लोगो का मामला हमेशा से ऊँची और ऊँची अदालतों में चलता रहता है, चलता रहता है, और कभी कभी तो ऐसा होता है की फैसला आते आते उम्र कम पड़ जाती है। कुछ ऐसा ही वाकया इस केस में भी हुआ है भोलाराम तूफानी, और राधो सिंह अब इस दुनिया को छोड़ चले है, शायद अब ऊपर की अदालत में उनका फैसला हो। वैसे ये बात अलग है की लालू प्रसाद और जगन्नाथ मिश्रा इस घोटाले के सिलसिले में कई बार जेल भी जा जुके है, लालू जी के लिए ये तो इतना महंगा पड़ा की एक बार उन्हें मुख्यमंत्री के पद से भी हाथ धोना पड़ गया था। अब खुदा ना खास्ते कल को न्यायधीश बिक गए या फिर किसी और कारण से ये निर्दोष करार कर दिए गए तो क्या ? ये बेमतलब से इतने दिनों से इसे ढो रहे थे, बेकार में ही इन्होने बिना किसी वजह के मुख्यमंत्री का पद खो बैठे थे।
वैसे देखा जाय तो गलती हमरी है। १९८५ में अगर हमारी सरकार और कानून कैग की उस रिपोर्ट को गंभीरता से ले लेती तो ये ४५-४६ लाख का घोटाला आज करीब दस अरब तक नहीं पहुँचता। वैसे भारत में देखा हमेशा से देखा गया है कानून पूंजीपतियों और राजनेताओ की गुलाम रही है, चाँदी के जूते बड़े बड़े कानून का मुंह बंद कर देती है। और उस समय लालू जी सत्ता में थे और उनके कुछ सहियोगी केंद्र में इसलिए यह प्रकरण एक तरह से दब गया था या रुक रुक कर चल रहा था। लेकिन अब ना तो जगन्नाथ मिश्रा मुख्यमंत्री है और ना ही लालू का राजीनीति में दबदबा है, बिहार से उनका राजनैतिक पतन तो हो ही गया है केंद्र में भी कुछ खास पहुँच नहीं दिखाई दे रही है, तो हो सकता है की अब इस मामले के निपटारे में तेजी आये और फैसला जल्द हो।
लेकिन अभी भी हमें जरुरत ये नहीं है की चारा घोटाले पर फैसला जल्द आ जाए या, सीबीआई किसी को भी झूठ मुठ फसाकर इस फ़ाइल को जल्द से जल्द बंद की जाय, हमें जरुरत है एक प्रभावी कानून की जो भ्रस्टाचार को रोकने में प्रभावी हो।
मेरा इस लेख का मैथिली अनुवाद, मैथिली के चर्चित न्यूज़ पोर्टल इसमाद.कॉम पर भी छप चूका है, आप इस लिंक का उपयोग कर इसे पढ़ सकते है... भ्रष्‍टाचार क रफ़्तार आ लालू