Friday, January 17, 2014

मिथिला राज्य आंदोलन - इतिहास और वर्तमान

भारत में प्रस्तावित म‍िथ‍िला राज्य
विष्णु पुराण के मिथि‍ला पुराण अध्याय और चंदा झा लिखि‍त रामायण के आधार पर अलग मिथिला राज्य आंदोलन का आधार बताया जा रहा है। लेकिन जार्ज ग्रीर्यसन के १८९१ में हुए भारतीय भाषा सर्वेक्षण ने इस बात को और बल देने का काम किया। बिहार के २४ जिलें (अररि‍या, बांका, बेगुसराय, भागलपुर, दरभंगा, पूर्वी चम्पारण, जमुई, कटिहार, खगड़ि‍या, किशनगंज, लखीसराय, मधेपुरा, मधुबनी, मुंगेर, मुज्जफरपुर, पुर्णि‍या, सहरसा, समस्तीपुर, शेखपुरा, शि‍वहर, सीतामढ़ी, सुपौल, वैशाली और पश्चिमी चम्पारण) और झारखंड के ६ जिले (देवघर, दुमका, गोड्डा, जामताड़ा, साहेबगंज और पाकुड़) को मिलाकर अलग मिथि‍ला राज्य बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

झारखंड राज्य के अलग होने के अगले ही दिन यानी ४ अगस्त २००४ को एक प्रेस कांफ्रेस में बिहार के पूर्व महाधि‍वक्ता एवं भाजपा नेता पं० ताराकांत झा ने अलग मिथि‍ला राज्य हेतु आंदोलन की घोषणा कर दी। भाजपा से निष्कासि‍त होने पर वे मिथिला आंदोलन को समय समय पर हवा देते रहे परन्तु विधान परिषद सदस्य बनते ही उन्होने इस आंदोलन को ठंडे बस्ते में डाल दिया।

वर्तमान में मिथिला राज्य आंदोलन के लिए सबसे सक्रिय और पुरानी संस्था अंतर्राष्ट्रीय मैथि‍ली परिषद है जिसकी कमान मुख्य रूप से डा. धनाकर ठाकुर और डा. कमल नाथ ठाकुर के हाथों में है, वहीं महासचिव के. एन. झा दिल्ली में रहकर भी कार्यकर्ताओं के संग जमीनी रूप से जुड़े हुए हैं।

उधर अखिल भारतीय मिथिला राज्य संघर्ष समिति के अध्यक्ष और विद्यापति सेवा संस्थान के महासचिव वैद्यनाथ चौधरी बैजू भी समय समय पर मिथिला आंदोलन को हवा देते रहते है। इन्होनें मिथिला आंदोलन को धरना, रैली और बैठकों से आगे बढ़ाते हुए साहित्य अकादमी, मिथि‍ला के नाम पर पुरस्कार और अनुदान को बढ़ावा दि‍लाने का भी काम किया है, वैसे इनकी सक्रियता मिथि‍ला के बाहर ज्यादा रहती हैं और पूरे देश के मैथि‍लों को जोड़ने का भी किया इन्होनें किया है।

इसके बाद मिथि‍ला आंदोलन के लिए आगे आए स्व. जयकांत मिश्र और इन्होने मिथि‍ला राज्य संर्घष समिति का गठन किया और मिथि‍ला राज्य आंदोलन को एक नयी आवाज दी। वर्तमान में चुनचुन मिश्र इसके अध्यक्ष एवं उदयशंकर मिश्र इस संस्था के महासचिव हैं।

दिल्ली में प्रवासी मैथिलों को जोड़ने के लिए अखिल भारतीय मिथिला संघ के अध्यक्ष पूर्व सांसद राजेन्द्र प्रसाद यादव एवं महासचिव विजय चंद्र झा की सक्रियता भी दिल्ली में मिथिला आंदोलन को जगाए हुए है।

वहीं यूथ ऑफ मिथिला (अंतर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद की दिल्ली इकाई) और वॉईस ऑफ मिथि‍ला के भवेश नंदन और आनंद कुमार झा जमीनी कार्यकर्त्ताओं, युवाओं एवं बुद्धिजीवियों को जोड़ने में जुटे हैं। यह दोनो संस्था समय समय पर दिल्ली में विभीन्न प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन कर दिल्ली में अपनी उपस्थ‍िति और मिथिला आंदोलन को हवा देने का काम कर रही है।

उसके बाद समय समय पर मिथि‍ला राज्य के निर्माण के लिए बहुतो लोग आगे आए कभी मिथि‍लांचल विकास सेना के नाम पर तो कभी दीना भद्री संस्थान, और मिथिला फ़ॉउडेशन आदि के नाम पर लेकिन हाल में ही २२-२५ मार्च तक दिल्ली के जंतर-मंतर पर चार दिनों का आमरण अनशन कर राजीव कुमार झा उर्फ कवि एकांत ने इस आंदोलन को एक नयी जान देने का काम किया। उन्होनें सभी संगठनों से एकजुट और एकसाथ मिलकर आंदोलन को बढ़ावा देने का न्योता दिया ताकी आंदोलन को मजबूत तरीके से पेश किया जा सके और सरकार पर दबाव बनाया जा सके। अभी राजीव जी राइज फॉर मिथि‍ला के नाम से एक नया दल बनाकर आंदोलन को हवा देने में लगे हैं।

अभी हाल में मिथि‍ला राज्य की लड़ाई के लिए जो संस्था सबसे आगे है वो है मिथि‍ला राज्य निर्माण सेना बहुत कम से सबसे ज्यादा जमीनी कार्य, धरणा प्रदर्शन और चक्का जाम कर देश को प्रमुख लोगों का ध्यान अपने और आकर्षि‍त करने का काम किया। इनके ही प्रयासों के फलस्वरूप भाजपा के सांसद कृति आजाद भी मिथि‍ला राज्य आंदोलन के लिए कूद पड़े हैं। चाहे बात रथ यात्रा की हो या जंतर मंतर पर प्रदर्शन की इन्होंने देश के दिग्गज नेताओं को साथ कर आंदोलन का रूख अपनी और करने का काम किया है।


क्यों जरूरी है मिथि‍ला आंदोलन –:

तेलांगाना के अलग राज्य कि मांग ने मिथि‍ला राज्य आंदोलन को और हवा दे दी है। इस बीच केन्द्र सरकार को दस नये राज्यों के गठन के प्रस्ताव का आवेदन मिलने पर सरकार ने मिथिलांचल राज्य की मांग पर विचार करने की बात कह कर आंदोलनकारियों को लड़ाई लड़ने का एक रास्ता व मुद्दा बना दिया। सूत्रों की माने तो गृह मंत्रालय ने अब तक इस संबंध में कोई फैसला नहीं लिया है लेकिन बताया जाता है कि नये राज्य के गठन के संबंध में विभिन्न पक्षों और स्थितियों का अध्ययन कराने के पश्चात ही केन्द्र सरकार कोई निर्णय देगी, जिसका इंतजार इलाके के लोगों को है।

अपनी संस्कृति, अपनी भाषा, अपना व्याकरण, अपनी लिपी और जनसंख्या के लिहाज से मिथिला एक अलग राज्य होना भी चाहिए। बिहार से बाहर, बिहार का मतलब भोजपूरी होता है। जबकि मैथि‍ली बिहार में प्रमुखता से बोली जाने वाली भाषा है। मीडिया ने भी बिहार का महिमामंडन भोजपूरी से ही किया है। इन्हे बिहार के नाम पर गौतम बुद्ध तो दिखाई देतें है लेकिन जनक और माता सीता नहीं दिखायी देतें। यहाँ तक की बिहार गीत में भी मैथि‍ली और मिथि‍ला की उपेक्षा कि गई पुरे बिहार गीत में ना तो कवी विद्यापती है ना हीं माता जानकी। यहाँ तक की विकाश के नाम पर भी मिथि‍ला की उपेक्षा की गई। आज कोई भी कारखाना, विश्वविद्यालय आदि खोलने की मांग होती है तो उसे मगघ क्षेत्र में धकेल दिया जाता है। आई आई टी की बात हो या केन्द्रीय विद्यालय की मिथि‍ला हमेशा से उपेक्षीत रही है और यही कारन है जो अलग मिथि‍ला राज्य के आंदोलन को बढ़ावा दे रही है।

बिहार सरकार के उपेक्षाओं का हाल ये है कि आजादी के समय बिहार के राजस्व का कुल ४९ फीसदी मिथि‍ला क्षेत्र से आता था और जब २००० में झारखंड राज्य का बटवारा हुआ तो यह योगदान घटकर मात्र १२ फीसदी रह गई है। यानी मिथि‍ला इन पसास सालों में करीब चार गुणा गरीब हो गई है। यह सोचने वाली बात है जबकि अन्य क्षेत्र अमीर पर अमीर होते जा रहें है मिथि‍ला क्यों पिछड़ता जा रहा है। क्या इस क्षेत्र का पैसा इसी क्षेत्र में लगाया जाता है। अगर नहीं तो ऐसा क्यों। ये सोचने वाली बात है। क्योंकि अलग मिथि‍ला राज्य के बिना ये संभव नहीं है।

इस तरह बाढ़ भी मिथि‍ला इलाके की प्रमुख समस्या है। लेकिन आजादी से पहले ही लोर्ड वेवेल ने इसके निदान के लिए एक महत्वकांक्षी परियोजना बनाई थी। बाराह क्षेत्र में कोसी पर हाई डैम बनाना था। अनुमान था कि इस परियोजना के पुरा होने से मिथि‍ला क्षेत्र में समृधी आऐगी और बिहार इस भारी विभीषि‍का से बच पायेगा। लेकिन आजादी के बाद बनी बिहार सरकार ने बहाने बनाकर इस परियोजना से अपना हाथ खीच लिया और नतीजा हम सबके सामने है। शायद सरकार को डर था कि बाढ़ के नाम पर जो ये लाखों वोट हमें मिथि‍ला क्षेत्र से आता है वह इसके समृद्ध होने के साथ ही खतम ना हो जाए। यह बिहार सरकार की अनिच्छा का ही परिणाम था कि केन्द्र सरकार भाखड़ा नंगल परियोजना की और उन्मुख हुई और आज पंजाब का काया-कल्प कर गई। आज पंजाब देश में सबसे ज्यादा कृषि‍ उत्पादन के लिए जाना जाता है और उसी पंजाब के खेत में मिथि‍ला के किसान मजदुर बन कर काम करने को मजबूर हो गए है। इधर कोशी बांध परियोजना का पैसा दामोदर घाटी परियोजना में लगाकर मिथि‍ला के साथ एकबार फिर भेदभाव कर दिया गया।

दिल्ली हो मुंबई मिथि‍लावासी हाथ फैलाने को मजबुर है। आज इन मिथिला वासी के ही बदौलत दिल्ली, पंजाब, मुंबई और गुजरात विकाश के नित नये आयाम रच रहा है और मिथि‍ला दर दर कि ठाकरें खा रहा है। इसलिए भी ये जरूरी है कि मिथि‍ला राज्य अलग हो क्योंकी जो सपना मिथि‍ला वासी सोते जागते देखते आ रहें है वो बिना मिथि‍ला राज्य के संभव नहीं है।

क्रमश:
अगले अंक में पढ़गें क्या हुआ अगर मिथ‍िला राज्य हो जाता है अलग।

7 comments:

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  2. आपका आलेख मिथिला राज्य के औचित्य का सही प्रतिपादन करता है _ कौन संस्था अधिक काम कर रही या कम यह आपका विश्लेषण है जिसके विषयमे मुझे कुछ नहीं कहना है - लेकिन तथ्यगत कुछ बातों का संसोधन आवश्यक है जो मैं लिख रहा हूँ -----------------------वर्तमान में मिथिला राज्य आंदोलन के लिए सबसे सक्रिय और पुरानी संस्था अंतरराष्ट्रिय मैथि‍ली परिषद है हो १९९२ से लगातार इस मुददे को उठाये हुवे है –और २६ अंतर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मलेन एवं ४३ प्रशिक्षण वर्ग के द्वारा मिथिलामे एवम भारत भर में इस मुद्दे को जीवंत कर सतत कार्य कर रहा है - जिसकी कमान मुख्य रूप से डा. धनाकर ठाकुर और डा. कमलकान्त झा एवं डॉ भुबनेश्वर प्रसाद गुरुमैता के हाथों में है, वहीं इसके पूर्व महासचिव के. एन. झा दिल्ली में रहकर भी कार्यकर्ताओं के संग जमीनी रूप से जुड़े हुए हैं।----------------------------
    इसके बाद मिथि‍ला आंदोलन को आगे करने के लिए अंतरराष्ट्रिय मैथि‍ली परिषद की ईकाइ मिथि‍ला राज्य संघर्ष समिति का गठन १९९४ में क्या गया . अंतरराष्ट्रिय मैथि‍ली परिषद के दुसरे अंतर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मलेन मधुबनी में १९९६ में स्व. जयकांत मिश्र को इसका अध्यक्ष घिषित किया गया और इन्होने और मिथि‍ला राज्य आंदोलन को एक नयी आवाज दी। उनके बाद स्वर्गीय चुनचुन मिश्र इसके अध्यक्ष हुवे एवं उदयशंकर मिश्र इस संस्था के पूर्व महासचिव हैं। वर्तमान में नगीना प्रसाद महतो इसके अध्यक्ष एवं प्रमोद कुमार झा , मधुबनी इस संस्था के महासचिव और डॉ सत्यनारायण महतो, दलसिंगसराय इसके सरक्षक हैं । ------------------------अंतरराष्ट्रिय मैथि‍ली परिषद की हाल में एक नइ ईकाइ मिथि‍ला राज्य निर्माण समिति का गठन २०१३ में किया गया है जिसके अध्यक्ष जोगी जनक कुशवाहा, मधेपुरा और महसचिव श्री महेंद्र मिश्र, मधेपुर(मधुबनी) हैं . स्वतंत्र किन्तु अंतरराष्ट्रिय मैथि‍ली परिषद से अनुप्राणित आदर्श मिथिला पार्टी के अध्यक्ष श्री सुधीरनाथ मिश्र, अररिया और महासचिव श्री मनोज कुमार यादव , वैशाली हैं .


    दिल्ली में प्रवासी मैथिलों को जोड़ने के लिए अखिल भारतीय मिथिला संघ के अध्यक्ष पूर्व सांसद राजेन्द्र प्रसाद यादव एवं महासचिव विजय चंद्र झा की सक्रियता भी दिल्ली में मैथिली भाषाई आंदोलन को जगाए हुए है यद्यपि वे मिथिला राज्य के पक्ष में नहीं हैं उनकी तरह ही यूथ ऑफ मिथिला (जो अब अंतरराष्ट्रिय मैथिली परिषद की इकाई नहीं रही राज्य के मुद्दे को छोड़ने पर) और वॉईस ऑफ मिथि‍ला के भवेश नंदन और आनंद कुमार झा जमीनी कार्यकर्त्ताओं, युवाओं एवं बुद्धिजीवियों को मिथिला के विकास के लिए जोड़ने में जुटे हैं। यह दोनो संस्था समय समय पर दिल्ली में विभीन्न प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन कर दिल्ली में अपनी उपस्थि ति और मिथिला के विकास के आंदोलन को हवा देने का काम कर रही है।
    Dr. Dhanakar Thakur

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  3. आपके झारखण्ड के संदर्भ के लिए_ When demanding Mithila state in India we are not against Neetish or others but have sufficient logic that small states fared better.
    The ill-named Jharkhand despite Kodas had done far better than parent state of Bihar
    Referring TOI (20.11.2011)
    In the article of Subodh Verma
    Vital statistics
    Bihar-
    2002-3 vs. 2009-10 Bihar Jharkhand
    % increase in primary schools 13 97
    Literacy rate 64(from 47) 68(from 54)
    Economic growth 6.8(from 4.9) 7.0(from 5.3)
    Infant Mortality rate 52(from 62) 44(from 70)
    Help from the centre(of grants and loans as % of total expenditure) 25 13
    Despite draughts more in Jharkhand plateau food production lowered -15 -19

    India is a union of state and Mithila fulfills all that is needed for any state- its rights have been denied and so it should be given otherwise its exploitation will continue.

    Magadh was benefited ruling over Mithila. Read what George Grierson wrote in his Linguistic Survey of India page 5, in the description of Bihari language)
    “Magadha, on the other hand, although it is intimately connected with the early history of Buddhism, was for too long a time cockpit for contending Musalman armies, and for long subject to the head-quarters of a Musalman Province, to remember its former glory of the Hindu age. A great part of it is wild, barren, and sparsely cultivated, and over much of the reminder cultivation is only carried on with difficulty by the aid of great irrigation works widely spread over the country, and dating from prehistoric times. Its peasantry, oppressed for centuries, and even now, under British rule, poorer than that of any other neighboring part of India, is uneducated and unenterprising. There is an expressive word current in Eastern Hindustan which illustrates the national character. It is ‘bhadesh’, and it has two meanings. One is ‘uncouth, boorish,’ and the other is ‘an inhabitant of Magadha.’ Which is the original, and which the derivative, I do not know: but a whole history is contained in these two syllables.”

    Magadh and Mithila have been different. Why any Magdhi will rule over Mithila or a Bhojpuri – they too need states. Make magadh a union territory to be best dealt for Naxal menance and Bhojpuris part of Purvanchal need named as Bhojpur. In Up may be Purvanchal- but India’s Purvanchal is Manipur, Assam etc. Call that Bhaojpur.
    Anyway that is not our problem – we need Mithila state under India(Nepali Mithila should be a state of Nepal) keeping international boundary intact.

    In fact Bihar has Ang also but Ang has been with Mithila always(from the days of Mahabharat) sharing same shade of cultre and language.

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  4. मिथिला राज्य आंदोलन कमजोर क्यो है

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  5. हम साथ छी मुदा आन्दोलन में निष्पक्षता आ जमीनी सकियता हो
    https://yuvamithila.blogspot.in/?m=1

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  7. Mai maithil bhaiyo ko namaskar karta hun mai maithil bhaiyon she judna chahta hun state uttar Pradesh dist aligarh. The. Khair post tappal village milak fayehpur. Con.9034821370

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